अनिमेष मुखर्जी की रचनाएँ

दोहे

भौंचक्की सी जूलिएट, कैसे देखे ख़्वाब।
दिखा आज जब रोमियो, लिए हुए तेज़ाब॥

चाल अजब है प्रेम की, खो कर ही मिल पाय।
छाप तिलक सब छिन गए, खुसरो बलि बलि जाय॥

बंधन था जो प्रेम का, रत्ना ने दिया खोल।
दो अक्षर को गूंथकर, तुलसी हुए अमोल॥

तूने बढ़कर छू लिया, बात लगे हर गीत।
ढाई आखर ने किया, जीवन को संगीत॥

हर सूरत तेरी लगी, जब देखा भरपूर।
गोया जब तू पास है, लगे ना कोई दूर॥

कबिरा की दीवानगी, मीरा का विश्वास।
धरती है बेचैन क्यों, बादल को अहसास॥

दृग उलझे कुछ खो गया, मीठी सी है पीर।
एक नज़र में चल गए, नावक के सौ तीर॥

आँसू बहते देख कर, क्या होना हैरान।
बंद कोठरी में खुला, बस एक रौशनदान॥

अरमाँ यूँ तो थे बहुत, ख्वाहिश कई हज़ार।
पाया सबकुछ इश्क में, बस डूबे एक बार॥

चखे राम का सोमरस, मन से जो एक बार।
फिर वो कैसे रह सके, नर का मनसबदार॥

अंतर्मन का जब हुआ, ब्रज रज से संयोग।
बिन दर्शन बिन ज्ञान के, सिद्ध हुए सब योग॥

जीवन में ऐसा मिला, गीतों का उपहार।
सबने पाया कारवाँ, उसको मिला गुबार॥

गंगा के पास

दूर कहीं से खड़ा
देखता हूँ
ढलते सूरज की फालसई रोशनी में
तुम्हारे विस्तृत आँचल को
वो आँचल
जिसने देवव्रत को भीष्म बनाया
भगीरथ की साधना और हिमालय की वेदना
को परिमार्जित कर
उस देव को
महादेव बनाया
पर, जब तुम्हारी स्वाति बूँदों के आचमन से
अंर्तमन को माँजने जाता हूँ
तो अँजुरी भर जल में
हृषिकेश की दिव्यता
और
दशाश्वमेध की मंगला आरती के नाद की जगह
तुम्हारी घुटी हुई चीखें
और
तु6हारे उद्धार के खोखले नारों के
अश्रुओं का लवण मिलता है
और तभी किसी को
कोई टूटी मूरत, सूखे फूल, सीवेज नालों
का अर्पण तुम में कर
बिसलरी को
चरणामृत-सा चखते देखता हूँ
तो मेरी जर्जर श्रद्धा का
श्राद्ध भी हो ही जाता है।

बनारस 

दो प्याली चाय
कुछ किस्से
और तुम्हारी हँसी चखकर
न जाने क्यों
असी की शाम
याद आती है
न तुम साकी
न मैं ग़ालिब
बस बातों-बातों में
ये ज़िन्दगी
बनारस हो जाती है।

आरोपों की अभिव्यंजना 

आरोपों की अभिव्यंजना में
दोष पश्चिम पर मढ़ा किसी ने
तो वैदेही
अशोक वन में बैठी
बस मुस्कुराती रही
कहीं किसी निर्भया पर
उँगलियाँ उठाई किसी ने
तो कृष्णा
मन-ही-मन केशव को
बस पुकारती रही
समता की बातें हुईं जब
नारी के जीवन में
तो गार्गी
स्तब्ध-सी खड़ी
बस शून्य में निहारती रही।

जबसे नींद टूटी है 

जबसे नींद टूटी है
स्वप्न की तलाश में हूँ
पार्थ हूँ महासमर का
कृष्ण की तलाश में हूँ
मन में छिपा रावण
रोज़ सर उठाता है
थोड़ा-सा राम मैं भी हूँ
मगर
मन-ही-मन
किसी विभीषण की तलाश में हूँ।

ये बात 

ये बात
परसों से दो दिन पहले की ही तो है
जब रोज़ के
सूनसान चेहरे से हटकर
एक डरी-डरी-सी मुस्कान दी थी तुमने
फिर
बातों-बातों में पता चला कि
कागज़ के फूल तो तुम्हें भी अच्छे लगे थे
और अमृता से ‘रसीदी टिकट’
तुमने भी ले रखा था
इतवार को नुक्कड़ की जलेबी के संग छनकर
हर बार कई किस्से मीठे हुए
मगर जब पिछले मोड़ पर रास्ते घूमे
तो घर तक का सफ़र
कुछ तनहा हो गया
आज जब कभी
खिड़की से झाँककर देख लेता हूँ
तो कतरा-कतरा
हम दोनों को
उन्हीं गलियों में छूटा पाता हूँ।

दीवारों पर 

दीवारों पर
अब वो टेढ़ी लाइनें नहीं दिखतीं
बिस्तर की चादर में
उड़ता सुपरमैन नहीं है
जूते भी करीने से रखे हैं अब
लॉन में गमलों का विकेट नहीं है
पड़ोसन की कोई शिकायत नहीं आती
दादी भी अब सताई नहीं जाती
न रिमोट की अब लड़ाई होती है
न मैथ टेस्ट की कोई कॉपी खोती है
बस
गर्मी की धूप में सूखता अचार नहीं दिखता
और
इतवार की शाम ये घर बात नहीं करता।

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