अनिरुद्ध प्रसाद विमल की रचनाएँ

वरदान चाहियो

हमरा देशोॅ के उत्थान चाहियोॅ
प्रभु यहेॅ विमल वरदान चाहियोॅ।

हर गीत यहाँ पर टूटलोॅ छै
हर साज यहाँ बिखरलोॅ छै
अपने लोगोॅ के भीतर घात सें
जन के मन यहाँ हहरलोॅ छै
देश लूट में जे सौसे डूबलोॅ छै,
ओकरा शुद्ध-बुद्ध के ज्ञान चाहियोॅ।

टूटलोॅ जे छै उनका जोड़ोॅ
भरलोॅ अन्हार के कारा तोड़ोॅ
जीयोॅ-मरोॅ बस देशोॅ लेली
धार नदी के आबेॅ मोड़ोॅ
हास-विलास छोड़ी केॅ हमरा
निज देश अभिमान चाहियोॅ।

झूठ नै बोलोॅ विधाता वाम छै
हर काम लेली मत कहोॅ कि राम छै
पत्थर भी पिघली जैतेॅ अतना में
बस देशोॅ लेॅ तोरोॅ पिघलै के काम छै
अलस भाव त्यागी केॅ जागोॅ
हमरा वहेॅ पुरानोॅ शान चाहियोॅ।

हर लोग यहाँ छै लूटै में भिड़लोॅ
सबके मन छै कुढ़लोॅ- कुढ़लोॅ
के बदलतै ऊ रसना सत्ता लोभी केॅ
ई रं जौं रहबौ तोंय डरलोॅ- डरलोॅ
सड़लोॅ- पचलोॅ ई ढ़ाँचा लेली
सच में हमरा अर्जुन के बाण चाहियोॅ।

 

साथी आगू बढ़तें रहबै 

हम्में चलतें रहबै, साथी आगू बढ़तें रहबै
गिरबै, उठबै, रूकबै नै, तनियो नै सुस्तैबै।
रूकै के बात तेॅ लिखलोॅ छै
अकरमलोॅ के इतिहासोॅ में,
डरतै वहेॅ तूफानोॅ सें
जे डूबलोॅ हास-विलासोॅ में।
अंधड़-बतास मुट्ठी में दाबी
बादल-बिजली साथ मचलबै।

लंबा डगर पथ सूनसान छै, काँटोॅ- कूसोॅ बियावान छै
मंजिल लेली दौड़ला पर भी, एैलोॅ तनियो कहाँ थकान छै।
शुभ काम शुभ मंजिल साथी, हिम्मत सें जोर लगैवै।

छंद-बन्ध जे टूटलोॅ छै, बीणा के तार बिखरलोॅ छै
गिरी-गिरी, फिसली-फिसली केॅ, ऊ काम करी दम लेना छै
बस तनी दूर बचलोॅ छै आबेॅ, मंजिल पावी केॅ ही सुस्तैबै।

ई कुहासोॅ तेॅ छँटबे करतै
सौसें दुनियां साथें चलतै,
छिन्न भिन्न होतै जड़ माथोॅ
जन-मन के जब पारा चढ़तै,
चिता शहीद के चंदन समझी, हम्में कपार सिर धरबै।
आँख-आँख देखै छौं तोरा
निरयासी केॅ ताकै छौं तोरा,
पंच देश के देखोॅ आबेॅ
धीरज टूटलै, तोड़ी कूल किनारा।
नव क्रांति के जयघोष करी केॅ, देशोॅ के मांटी अंग लगैबै
साथी आगू बढ़तें रहबै।

 

हे मधुमास कहो

केना कटलै दिन जिनगी के, हे मधुमास कहोॅ,

रात ऊ कतना सुहानोॅ, याद में बीतलोॅ छेलै
प्यार तोरेह सें सिरिफ छै, कान में कहनें छेलै
दर्द सहना ई कठिन छै, दर्द फागुन तोंय सहोॅ
केना कटलै दिन जिनगी के, हे मधुमास कहोॅ।

छूछ्छे खटिया पर साँपोॅ रं, एैठी-एैठी बीती गेलै,
हमरा भी अचरज लागै छै, प्राण केनां केॅ रहि गेलै,
कोय गहै नै छै आबेॅ हमरा, ऐ फागुन तोंही गहोॅ
केना कटलै दिन जिनगी के, हे मधुमास कहोॅ।

हमरा सें आवेॅ की पूछै छै, पूछोॅ धूप बतास सें,
लाल-लाल फागुन सें पूछोॅ, पूछोॅ लाल पलास सें
विष वाण रंग रोॅ छूटै छै, ऐ फागुन खाड़ोॅ रहोॅ
केना कटलै दिन जिनगी के, हे मधुमास कहोॅॅ।

बाग-बगीचा, बहियारोॅ तक, रसता ताकी कानै छै,
हठी प्रेम रोॅ रिसता कैन्होॅ, बातोॅ नै केकरोॅ मानै छै,
ऐ प्राणवायु बात मानोॅ, याद में हुनकोॅ बहोॅ
केना कटलै दिन जिनगी के, हे मधुमास कहोॅ।

 

युवा कवि राहुल शिवाय 

कंधा पर जुआ लेनें, आवी गेलै शिवाय।
अंग-अंगिका वासतें, राहुल धूम मचाय।।

खोजै छेलै अंगिका, सेवा लेली विकल्प।
जग भर फैलै अंगिका, राहुल रोॅ संकल्प।।

सालोॅ नै पुरलै अभी, देलकै तीन किताब।
राहुल जिनगी समय के, लेतै सही हिसाब।।

साल सिर्फ तेइस उमर, लागै चतुर सुजान।
जीवन अरू साहित्य में, राहुल एक समान।।

लौकेॅ आँखोॅ में ललक, खोजै नया मुकाम।
राहुल रोॅ साहित्य छै, देश प्रेम रोॅ नाम।।

तरसै स्वातिबूंद लेॅ, राणा रोॅ मेवाड़।
राहुल रोटी घास रोॅ, खइहौ खाड़े-खाड़।।

राहुल बदलोॅ देश रोॅ, आबी केॅ तकदीर।
टुटलोॅ अरू बिखरलोॅ छै, भारत रोॅ तस्वीर।।

 

अब नै सहबै हमें जुलुम हो पिया

अब नै सहबै हमें जुलुम हो पिया
तोरा संग संग लड़वै ना
हों जेलो जैवैं ना गोलियो खैवै ना
अब नै सहबै हमें जुलुम हो पिया
बरस चलीसा बीती गेलै दुखवो नै घटलैं मोर
चित्थी-चित्थी लू गा पर छै सपना लाल हिंगोर
आबेॅ रहबैं नहियें नैहरवा हो पिया
ससुररिया जैवैं ना

रोजे रोजे बढ़ी रैल्होॅ छै किस्म-किस्म रं रोग
जे पंडित पोथियो नै जानै ओकरै लागै भोग
लूटी खैलकै हमरे रे कमैया हो पिया
चुप केना केॅ रहबै ना

के छेकै ऊ जे तोड़ै छै अखंड राज राज के सपना
जात धरम सें ऊपर छै एक सबल देश के सपना
जाति के फैलाबै जे कुविचार हो पिया
ओकरा रौदीं ऐवैं ना

ई ढाँचा केॅ बदलै खातिर करै विमल आह्वान
मिलिये केॅ करना छै साजन एक नया निर्माण
किरिया ई माता माँटी के हो पिया
सुराजोॅ के अर्थ बदलवै ना

 

सखि रहि-रहि टीसै छै प्राण गे 

सखि रहि-रहि टीसै छै प्राण गे

यादोॅ में केकरोॅ नै सुतलौं ई रात
टुकुर टुकुर ताकै में होय गेलैं प्रात
टारी पर बैठी काग करै काँव-काँव
कहियो केॅ ऐलै नै पिया मोरा गाँव
लागै लोरोॅ सें छै उबडूब विहान रे

रात के परात में हाँसै छै चान
कंठोॅ में अटकी केॅ बचलोॅ छैं प्राण
हरी घुरी खोजै छै हुनके ही छाँव
खोजी केॅ थकलौं हमें पिया केरोॅ गाँव
हाय टूटी गेलै हिरनी के मान रे

राखियोॅ तोंय प्रेमोॅ केॅ बनले अहिवात
मने में रहि गेलै मनोॅ केरोॅ बात
निर्दय जुआनी चाहै हरदम सिंगार
मानियो नै मानै छै ई आपनोॅ हार
जिनगी भै गेलै पाषाण रे

 

सैकट में पड़लै हिन्दुस्तनमा हो तुलसी के रामा 

सैकट में पड़लै हिन्दुस्तनमा हो तुलसी के रामा

सिंह सृग पीयै छेलै एक्के घाट पानी हो
सकल खूशियाली छेलै तनियो नै बेमानी हो
जग में देल्हौ समता के दर्शनमा हो तुलसी के रामा

धरमोॅ के राज गेलै, पापोॅ के राज ऐलै
भ्रष्टाचार घूसखोरी भारतोॅ में बढ़ी गेलै
केना होतै भारत के निरमनमा हो तुलसी के रामा

धोबी के कहला पर तोंय सीता केॅ त्यागी देलौं
पितृ वचन खातिर राजोपाट छोड़ी देल्हौ
तनियो नै सुख पर देल्हौ धियनमा हो तुलसी के रामा

जनम ले कॅ फेरू भगवन भारत में आवो हो
सिंहासन लैॅ झगड़ा केॅ तोंही मिटाबो हो
व्याकुल छै विमल के परनमा हो तुलसी के रामा

 

ई देश के जबानी चल्लोॅ गेलॉे छै कहाँ 

ई देश के जबानी चल्लोॅ गेलॉे छै कहाँ
बर्बादी सें वतन केॅ कोय बचाबै छै कहाँ

आपनोॅ ही देशोॅ में वीरानोॅ होय गेलै सभ्भे
लोर पोछी केॅ हिरदय सें कोय लगाबै छै कहाँ

अब्दुल हमीद, धरती गोविन्दो भी कानै छै
मंदिर केॅ मस्जिदोॅ से कोय जुड़ाबै छै कहाँ

भिड़लोॅ छै कैक लोग यहाँ देश तोड़ै में
माथा सें देश-माँटी कोय लगावै छै कहाँ

आदमी के भीतर के मरी गेलोॅ छै आदमी
आबेॅ आदमी मरै सें कोय बचावै छै कहाँ

 

तरुण देश रोॅ

ऐ तरुण देश रोॅ भूलोॅ नै, छौं कठिन परीक्षा तोरोॅ
देश विथा सें दूर कहाँ, भटकै छौं मन तोरोॅ
ऊ दीप शिखा जे जललोॅ छै, दूर क्षितिज के कोना में।
ज्ञानदीप ऊ तोरोॅ छेकौं, दूरेॅ कैन्हेॅ रखलोॅ छौं
बूझै के पहिले पहुँचोॅ, तेज बहुत तेज तोंय दौड़ोॅ
भरतवंश के मान धरोहर, तोरे आस में धरलोॅ छौं
चाहत रहौं अधूरा नै, नै रहौं अधूरा सपना
काँटोॅ- कूसोॅ जत्ते भी हुअेॅ, रूकौं नै पग तोरोॅ।

सात सुरोॅ में साथ बँधी केॅ, तार बीन के बजलोॅ छै
नागिन संग नागोॅ भी नाचै, कठिन घड़ी काल के एैलोॅ छै
बीन बाज पर जे नै नाचै, ऊ बैठलोॅ छै नेठुआय
सीना तानी निडर ऊ बोलै, कहाँ लड़ै लेॅ के बचलोॅ छै
श्ब शहीद रोॅ सपना तोड़ी, छूछ्छे बजबै गाल वहीं
हास-विलास छोड़ी के साथी, दिशा देश रोॅ मोड़ोॅ।

देश समस्या सें जूझै छै, भूखोॅ सें जन-मन कानै छै
ताल, तराई तलहट्टी में, लोगें थूकोॅ सें सत्तू सानै छै
शहर-शहर में पैसा गाड़ी, वें झूठ्ठेॅ भाषण खूब बखानै छै
पितमरूवोॅ छै लोग देश के, जे नै ओकरोॅ कब्बर खानै छै
नस-नस में लैकेॅ नया खून, जौं बढ़भेॅ तेॅ मंजिल मिलथौं
ेन्हां में ऐ तरुण देश रोॅ, खाली-खाली एक भरोसा तोरोॅ।

गति काल रोॅ रोकोॅ तोंय, जंजीरोॅ केॅ झकझोरोॅ
बंधन-बाधा आभौं जे रसता में, वै बंधन केॅ तोड़ोॅ
जड़ छूबी लेनें छौं यै कीड़ा, राह कठिन नै थोड़ोॅ
तूफानोॅ के ताकत लै चलिहोॅ, तनियो नै तोंय डरिहोॅ
किरण आस तोरेह पर टिकलोॅ, जागोॅ होलै सबेरा।
लेॅ कुदाल जड़ जंग उखाड़ोॅ, धरती तक ओकरा कोड़ोॅ

 

पहली निराशा / साँवरी

गाँव के बाहर वाले
मंदिर के चबूतरे पर
हर सोमवारी को
सीमर पूजा के समय
डूबते सूरज
और उगते चाँद के
बीच के वक्त में
अरदसिया दिए
टकटकी लगाए

मुझे भर आँख देखने के लिए
खड़े रहने वाले मेरे मीत
आज तुम्हें उस जगह पर नहीं देख
कितनी निराश हो गई हूँ मैं
शायद तुम्हें याद न हो
भूल भी जा सकते हो तुम
कितनी बार तुम्हारे पूछने पर
मैंने कहा है
कि मैं सीमर पूजा के लिए नहीं
सिर्फ तुम्हें देखने के लिए
भर आँख निहारने के लिए
आती रही हूँ।

ओ मेरे प्राण !
आजतक
शिव मानकर मैं
सिर्फ तुम्हें ही पूजती आई हूँ
कि जब-जब शिव पर जल चढ़ाया है मैंने
तब-तब आँखों में तुम्हारी ही सूरत घूम गई है।

गठजोड़ में दुल्हा बनकर
तुम्हीं आए हो
हर वक्त साथ में

आज तुम नहीं आए हो
तो लगता है
सूना-सूना आकाश
सुनसान, व्यर्थ-सी यह संझौती बेला

किरणें निष्प्राण हैं
तुम्हारी साँवरी भी तो निष्प्राण है
व्यर्थ लगते हैं नयन वाण

देह में भरी हुई थकान है
ओठों पर टंगे हुए प्राण हैं
छिन गई मुस्कान अब
तारे भी मारते हैं तीर तान अब

सोचती हूँ
किसलिए सजी थी इतनी
गले में मोतियों की यह माला
कपाल पर का यह लाल गोल टीका
सबके सब उदास हैं
कितने निराश हैं

आज कितनी लगन से
सँवारी थी मैंने
अपनी यह सूनी-सी अजवारी माँग
जिसे देखकर बरबस कह उठते थे तुम
कि भर दूँगा मैं
सूनी इस माँग में प्यार के रंग
नहीं छोड़ूँगा संग
आज मेरा आना व्यर्थ हुआ प्रीतम
झाँझर के झन-झन
घंटा के टन-टन
तुम्हारे समीप रहने पर
कितने सुहाने लगते थे ये
पैर की पायलें झनकती थीं
कानों के झुमके सिहरते थे
कि हँसता था सारा जहान

और आज तुम नहीं हो
तो देखो ना
ये सभी मिलकर मुझे टीसते हैं
रुलाते हैं
अंग-अंग दुखाते हैं
ये सब मिलकर सताते हैं
लगता है सब ठठाकर मुझपर हँसते हों
कि सूखे पत्ते की तरह देह को जारते हों ।

मंदिर की दीवारें
आए सब लोग
कुछ नहीं दिखाई पड़ता है मुझे
तुम्हीं बताओ पिया
मंदिर की चौतरफा सीढ़ियों में से
किस सीढ़ी से होकर मैं जाऊँ
सभी सीढ़ियों पर तो भंक-ही लोटता है
लगता है सिर्फ साँप-ही-साँप हो
निराश अब मैं
लौट रही हूँ प्रियतम

तुम्हें याद होगा
किसी तरह तुम भूल नहीं सकते हो
कि जब मैं जाने की बात कहती थी
तो डबडबा उठती थीं तुम्हारी आँखें
और तुम कहते थे
कि जरा और देर ठहरो
पल-दो पल के लिए ही सही
लेकिन और ठहरो
……..और इसी तरह मैं
कितने पलों के लिए रुक जाती थी

और तुम कभी मेरे उलझे बालों को सुलझाते थे
थकी जानकर अंग-अंग सहलाते थे
कभी अपने सर को मेरी जाँघों पर रखकर
न जाने क्या-क्या तुम सोचते रहते थे
क्या-क्या निरखते थे मेरे चेहरे में
क्या-क्या खोजते थे मेरी आँखों में
और कहते थे
कि तुम्हें निहारते मेरा मन किसी तरह क्यों नहीं भरता
कुछ भी पलों के लिए क्यों नहीं ये आँखें
वंचित होना चाहती हैं देखने के सुख से।

मुझे याद है
कि ऐसे में मैं तुम्हारी आँखों की गहराइयों में
बेसुध डूब जाती थी
क्या कहूँ मनमीत
तुम्हें एकटक उसतरह ताकते देखकर
तुम्हारी आँखों की गहराइयों की
थाह लेने की कोशिश में लगता
कि आकाश उलट कर कुआँ हो गया है
और पनघट पर खड़ी है साँझ साँवरी
अथाह जानते हुए भी
कूद जाने के लिए व्याकुल।

तुम्हें जरूर याद होगा
कि बेसुधी की ऐसी वेला में
सीमर पूजा के बाद
तुम मुझे अकेले ही छोड़कर जाने लगे थे
और तुम्हारे जाने के बाद मैं
उसी तरह ताकती रह गई थी
जिस तरह पश्चिमी आकाश में
डूब रहे लाल सूरज के मुँह को
एकटक ताकती है साँवरी साँझ
यह कहती हुई
कि फिर कब मिलोगे ?

 

स्मृति-डंक / साँवरी

जब तक
तुम नहीं आओगे
मैं चाँद को डूबने नहीं दूँगी !

मुझे याद है
कि मैं भूल भी नहीं सकती
वह सँझौती वेला
प्रतीक्षा में भींगती आँखों के कोर
निराश देखते ही
आ जाते थे तुम
पुकारते मेरा नाम।

और तुम्हें देखते ही मैं
खिल जाती थी
अमलतास की तरह
महक जाती थी
रातरानी की तरह
भूल जाती थी दुनिया का सारा दुःख
और निकल जाती थी तुम्हारे संग
चानन नदी के कछार पर

नजर भर दूर-दूर तक बिछे
चाँदी के वे बालू

देर तक चाँदी के उसी बालू पर
चलने के बाद
थककर बैठ जाने पर तुम मुझे निरयासने लगते
और बस एक ही बात पूछते थे
कि सही-सही कहो मेरे प्राणों की गंध
इस बालू की राशि के ढेर पर
दक-दक उजली साड़ी पहनकर
तुम ही सोई हुई हो
या सोई हुई है चाँदनी

और फिर
मेरे चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में थामे
देर तक न जाने क्या देखते थे तुम

प्रीतम इसका अर्थ
तुम्हारी आँखों के वे भाव
मैं आज समझ पा रही हूँ
अब कैसे बताऊँ तुम्हें
कि उस समय क्या हो गया था मुझे

कौन था वह ?
किसका था वह स्पर्श ?
जिसने बना दिया मुझे बावली
हाँ
तुम्हारे प्यार ने ही तो
तुम्हारे प्यार ने ही तो
तुम्हारे प्यार ने ही तो।

 

अंतिम निराशा / साँवरी 

आज कितने ही दिनों से साँवरी
सेज पर क्षण-क्षण
चित्त-पट्ट होती हुई
हाथ-गोड़ उसी तरह फेंक रही है
जैसे कि
चन्दन नदी के किनारे पर
फेंकी हुई बुआरी मछली
ठीक वैसे ही
साँवरी कुँआरी।

घन्टे-घन्टे पर
थोड़ा-थोड़ा आँखें खोलती है
रह-रह कर क्या-क्या
अनर्गल-सी बोलती है।
‘‘देखो तो भाभी
कागा क्या संदेश उचारता है
उड़ गया, उड़ गया
पिंजड़े का सुआ रे,
मैं ही तो कागा रे,
मुझे ही दो दूध-भात

भाभी
उड़ा दो मुझे
बिठा दो छप्पर पर
देखो-देखो
लौट आया सुआ रे
…………………
मेरा ही पाला हुआ
पोखर पर पुकारता है कागा’
इसी तरह प्रलापती है
दिन में ही नहीं
रात में भी
नींद में ही नहीं
जागी हो, तब भी
बोलती है
‘‘घर-द्वार
टोला-पड़ोस सब जगह
कागा का वास हैै।

करता है-काँव-काँव
काँव-काँव
भाभी किधर जाऊँ
आँखों का हंस जाकर
अँचरे में गिरा
दौड़ कर गई शिवालय तक
देखती हूँ
शिव के स्थान पर
कागा ही बैठा है
तब तो फिर कागा की ही
सीमर पूजा न हुई !’’

प्रलापती है ऐसे ही
आती है होश जैसे ही
माता-पिता रोते हैं
आँगन-ओसरे पर
क्या हुआ बेटी को
जाने किस ओझा
और डायन की है ये करतूत।

भाभी सहलाती है
सर से ले पाँव तक
फिर भी तो साँवरी को
लगती है दाँती
दाँती पर दाँती
द्वार पर चिन्ता में
भाई-बाबा जागते हैं।

और कोई सखी अगर पूछती है
तो कहती है
‘‘जैसे हुई बीजूवन में
कागा का बोल
दौड़ी
की रात कहीं बीते न
पकड़ने को चाँद
कि चाँद को डूबने न दूँगी

कल सुबह तक भी
बीजूवन में बोला था कागा
सखी, तोड़ दूँगी मैं
सोने की उसकी चोंच
बोलता है कि
हँसना और गाल फुलाना
साथ-साथ नहीं होता है।

सखी, कागा का बोल तो
मधु-सा ही चूता है
न तोडूँगी उसकी चोंच’’

और यह कह-कह कर
साँवरी फुलाती है गालों को
हँसती है पगली-सी
भाभी के गले से लिपट कर
और कहती है
‘‘देखो रे कागा
दोनों ही साथ-साथ
मैंने यह किया कि नहीं
झूठ हुआ या कि नहीं
तुम्हारा वह बोल
नीम की डाली पर बैठ
क्या चोंच को पिजयाते हो।’’

साँवरी की हालत यह देख
चाची की आँखों से
छूटते हैं आँसू
भींगे ही रहते हैं
आँचल के छोर
रोते ही होता है भोर
पूछती है कुछ भी जो
तो साँवरी बोलती है कुछ और
‘रूई भरे बोरे-सी ……
मुलायम चन्दन नदी की रेतों पर
जुटा है हँसनियों का महारास

सबसे ही मिल-जुल कर
नाचता है कागा
तुम्हीं कहो काकी
किसका सराहने लायक है भाग्य
लेकिन एक हंसनी
सिंगार किए रोती है
चन्दन नदी के एक कोने में।’’

कि तब ही
चिल्ला उठी सांवरी
‘‘ओ री माँ
दौड़-दौड़
देखो, जेठोर का पहाड़ बन कागा
उड़ता ही आता है
नोचने को मुझको
बचाओ अय भाभी ।’’

भाभी और माँ
आँखें फाड़ देखती है साँवरी को
पूछती है
‘क्या हो गया है तुम्हें’
तो आँखों पर हाथ रखे
बोलती है साँवरी
‘‘मेरी आँखों में
बैठा है कागा

झूठ नहीं बोलती हूँ
मैं नहीं गई थी
चन्दन-कछार पर
इसी ने डाका भर जेठ में
मुझको बुलाया था
चैत में इसी ने तो
मुझको दौड़या था
खेतों में
बहियार में
और फिर सावन में
बन कर के श्याम-श्याम मेघ।

सुनों माँ
कहता था
‘‘ऋतु-ऋतु में धूमने से
यह मन बहलता है।’’
लेकिन माँ
मैं तो हूँ ठीक ही
सुनो-सुनो भाभी
मेरे इन केशों के नीचे
छिप कर के बैठा है कागा
बोलता है
‘‘यही चाह, यही तड़प
उधर भी है।
पर किसमें भाभी ?’’
समझ नहीं पाती है माँ
ताकती है टुक-टुक
और भाभी मुँह सावरी का
लेकिन उस साँवरी को
बस एक ही तो रट है
‘‘सुनो माँ
कागा उचारता संदेश क्या ?

बोलता है
चन्दन के पार
उस पीपल के वृक्ष पर
योगी एक आया है
देने को मुझको आशीष
चलो, ले चलो मुझको।

सुनो अय भाभी
अभी तो मैं
ठेहुने भर पानी में
उतर भी न पाई हूँ
देखो, वह कागा है बहता
बहने दो ।’’

अय दादी
देखो, वह देखो
काले उस मेघ में
काला वह कागा
किसकी पटोरी लिए
भागा वह आता है
काँव-काँव कर संदेश सुनाता है
देखो न दादी
वह अपने पैरों में
लिए हुए आता है
ईख के गोल-गोल गुल्ले
और टिकोले
किसके लिए।’’

बूढ़ी दादी बेचारी
आँखों से कमजोर
कनमुँही बैठी वह देखती है
आकाश की ओर डर से
कहीं तो कुछ भी नहीं
सिर्फ आकाश है
और है आकाश में
दपदप दमकता हुआ सूरज।

सेज पर साँवरी अकेली
रह-रह चमकती है
पूछती है बार-बार
भाभी से लिपट कर
‘‘जाड़े से ठिठुर रहा
बोलता है कागा क्या ?

भाभी
वर्षा रानी तो आखिर में मर गई
अब क्या देखने को आया है
आम्रपल्लव का मोर पहन
घोड़ी पर चढ़ कर के
हाँफता-हाँफता वसन्त।

पीपल के वृक्ष पर
टंगी है बिहौती पटोरी
खोड़ड़ में पड़ी हुई चूड़ियाँ
अय भाभी, देखो
राजा-सा कागा
क्या कानों में बोलता है
झरकाहा
मरता भी तो नहीं है।

देखो न भाभी !
चुनरी लिए वसन्त गया
घोड़ी पर चढ़कर
चन्दन नदी के उस पार
और कागा गया चूड़ियाँ ले
बीजूवन

काँव-काँव-काँव
ओ भाभी
कागा क्या बोलता है
बोलता है
चुनरी जब लाकर के दोगे
तब दूँगा तुमको ये चूड़ियाँ।

भाभी सुनो
सुबह से ही
यह कागा असगुनिया
बाबा की फुलबारी में बैठा
बोलता है
कितने तरीके से
मूँझरका यह
आदमी-सा बोलता है क्यों नहीं।’’
साँवरी अब
साँसों के तारों पर झूलती है
माँ
कितने ही देवों के द्वार पर
कर आई है कबूलती।

ओझा के कहने पर
पिंजड़े में बंद एक कौआ
साँवरी के सामने ही
चौखट से टंगा है
साँवरी का तन और मन संग
जीवन भी टूटा है
पचासों साल से रखी
पोसाखी साड़ी को जैसे
धोने में फाड़ कर रख दिया हो
धोबी ने
जिसको अब रखना भी मुश्किल
और फेंकना भी मुश्किल ।’’

 

प्रियतम वसन्त आया / साँवरी

सुनो काग !
आज मैं तुम्हारे सामने
खड़ी हूँ निराश
आशा में
वसन्त भी तो आ गया
मैं अपने प्रियतम को
खोजती रही रोती हुई
पहले की तरह ही
जैसे कोयल और पपीहा
न जाने कितने युगों से
अपने खोये मीत को
खोजते फिर रहे हैं

ग्यारह मासों तक
तुम निरर्थक ही गगलते रहे
न जाने क्या क्या बोलते रहे

और आज फिर तुम
छपरी से लेकर अगरी तक
ढहती दीवाल और आँगन में
उड़-उड़ कर बैठता है
कैसा संदेश उचारता है
क्या कहता है ?

क्या सज-संवर कर
यह जो वसन्त आया है
आम्र मंजरी का मोर पहने

 

ऋतु-ऋतु में खोजूं तुम्हें / साँवरी

मुझे भुला देने वाले
ओ मेरे प्रीत
तुमसे बिछुड़ने का दर्द
मैं अपने हृदय में समेटे
आज तक जिन्दा हूँ मैं।

लेकिन क्या सचमुच ही
मैं जीवित हूँ।

ऋतु-ऋतु में
तुम्हें खोजती फिरती हूँ
फिर भी क्या
पा पाती हूँ तुम्हें

प्रियतम
यह ग्रीष्म ऋतु है
रात भर नहीं सो पाई हूँ
क्या करूँ
नींद जो नहीं आती है।

रात को ही
बोल उठा एक कागा
अब मैं क्या बताऊँ कि
रात को क्यों बोल गया कागा
लेकिन
इतना तो जानती हूँ
कि रात में कौआ का डाकना
अपशकुन होता है।

इतना सोचते ही
डर गई थी मैं
और छर-छर चूने लगा था
मेरे देह से घाम।

सुबह होते न होते
पड़ोकी बोली
शायद
वेदना से बहुत व्यथित थी
लेकिन भोर होते ही
चहक उठी गोरैया चूँ-चूँ
तब कहीं जाकर
मिला मुझको त्राण।

प्रियतम
ग्रीष्म का दिन
लगता है
मेरे ही विरह की आग है
सूर्य
उसी तरह उगता आता है
जैसे पूरब के आकाश में
आग लग गई हो

हाय विरही सूर्य
अपने हृदय की अग्नि में
अग्नि हो उठा है यह
कि चाह कर भी
नहीं मिल पाता है कभी
अपनी प्रेयसी साँझ से
अग्नि का पिण्ड बन गया है
अपने ही विरह में
सूर्य।

प्रियतम !
आज मेरी देह और मेरा मन
दोनों अग्नि बन दहकते हैं
सोचती हूँ
कहीं तुम भी
सूर्य-सा दहकते होगे।

सुबह में बहती है जो
मन्द-मन्द मलय पवन
वह भी कहाँ
देह को शीतल कर पाता है
मेरे साँसों के साथ
वह भी गरम हो जाती है।

जेठ और बैशाख की
यह तपती दुपहरिया
प्रियतम
यह मेरी ही विरहाग्नि है
और यह ग्रीष्म
मुझसे ही पाकर के आग
मुझे ही जला रहा है।

और जोर-जोर से
बहने वाली यह पछुवा हवा
जैसे यम की जिहृा हो
कि विषबुझा तीर ही
मुझ पर छुटा है
निर्दय निपुण संताल का ?

द्वार पर खड़ी हो कर
देखती हूँ उठता बवंडर
दूर-दूर तक हेरती हूँ
कहीं कोई नहीं है
इस ग्रीष्म ने तो
दूब तक को जला दिया है।

सुनसान बहियारों में
दौंड़ती है सिर्फ धूप
जैसे कोई औघड़
अपने हाथों में
लहकती अग्नि से भरी धुपौड़ी लेकर
धुमना का धुआँ उड़ाता रहे।

और ऐसे में
मैं अकेली।

बेली-गेंदा
कटहल-चम्पा
नीम-कनेर
और रजनीगंधा के फूल
डालों-लताओं पर खिले हैं
बढ़ाते हैं सभी मिल कर
ग्रीष्म की शोभा
एक वह भी दिन था
जब तोड़ती थी मैं
साजी भर-भर फूल
और सजाती थी
बालों को गजरे से
चुन-चुन कर सुगन्धित सुन्दर फूलों की
गूंथती थी माला
शिव पर चढ़ाने
तुम्हारे गले में डालने
हृदय जुड़ाने
आज जब तुम्हीं नहीं हो पास
तो यह सब किसलिए ?

मेरा मन
आज भी चकोर ही है
लेकिन मेरा चाँद ही नहीं है
मेरे पास।

यह सारी सृष्टि ही
घोर अंधेरे से भरी लगती है
प्रियतम
साँझ और भोर का
कुछ पता ही नहीं लगता है
लगता है बार-बार
मन को खखोरता रहे
संजों कर रखी हूँ आँसू
जब दुलार से
इन्हें पोछने वाला ही कोई नहीं
तो ये बहे ही किसलिए ?

 

सखी, आई शरत / साँवरी 

प्रियतम
फिर मनहर शरद आ गयी
आकास में अकेले ही
चमक रहा है अगस्त
कास फुला गये
और गाँव के बच्चे सब
सुबह-सुबह
अपनी मुट्ठियाँ काँखों में दबाए
चले जा रहे हैं
खुली देह ही
किटकिटाते दाँत
ठंड को बांधे।

आकाश अपने समर्पण से
धरती को तृप्त कर रहा है
लेकिन मुझे तो
अभी भी नहीं नींद है
न है चैन।

प्रियतम
शरत के यह शीत कण
मेरी ही आँखों के आँसू हैं
सभी जगहों में बिखरे
जो बता रहे हैं
कि मैंने तुम्हें सब जगह ही
रो-रो कर खोजा है।

हाय, इस शरत ऋतु में
हंसों का तो आगमन हुआ
लेकिन मेरा ही हंस…….
हाय !
हंस की प्रतीक्षा में
कहीं मेरा हंसा ही न उड़ जाए

घर के समीप ही
बाबा के पोखर में
चक्रवाक का जोड़ा
चोंच से चोंच लड़ाता है
जोर से रव करता है
क्या मुझे ही चिढ़ाता है।

धान पुष्ट होने पर आए
चारों ओर हरियाली है
लाल-लाल कमल के फूल
साफ-सुथरे पोखर के जल पर
भौरें का गुंजार सुन कर
सिहरते हैं
धरती का अंग-अंग।

गमकने लगा है
नई-नई सुगन्धों को पाकर
सरसों के पीले-पीले फूलों से
धरती
उबटन लगाई बिहौती लड़की-सी
सज रही है धरती
अमलतास की चुनरी
शेफाली की अंगिया
गेंदे, जूही और चमेली का लहंगा
किस्म-किस्म के धानों के
बाजूबन्द और कमरबन्द
सबकुछ ही पहनकर।

प्रियतम
यह धरती आज
सचमुच में बावली हो गई है
निकल पड़ी है
व्याह से पहले ही
अपने प्रियतम से मिलने।

शरत की यह चाँदनी
इतनी स्वच्छ
इतनी निर्मल है
जैसे लगता है
शरत ने दुग्ध-स्नान किया हो।

आश्विन का महीना
स्वाति ने बरस कर
चातकी की प्यास बुझाई
समीप ही है चन्दन नदी
जिसकी पतली धार के किनारे
खड़ी सारसी की बोली
क्यों नहीं सुहाती है ?
प्रियतम
देखो फिर आ गया दीवाली का मेला
जरूर बिकते होंगे ईख
पूरे गाँव के घर-घर में
दीये जल उठे

एक मेरा ही घर
अंधकार में डूबा है
जैसे गाँव भर का अंधेरा
यहाँ इकट्ठा हो गया हो।

दीदी-माँ
और भाभी पूछती हैं
‘‘क्या लाऊँ तुम्हारे लिए मेले से’’
तो कह पड़ती हँू ‘ईख’
सुन कर सभी हंस पड़ती हैं।

क्या कहूँ प्रियतम
माँ के कहने पर
जब छठ का अर्ध्य देने लगी
तो तुमसे
मिलने की इच्छा कर
एक सूप मैंने भी गछ लिया

पूजा में
कहाँ खाया गया मुझसे
तिलसंक्रान्ति में
दही-चूड़ा और लड़ुआ
नवान्न भी बीता ऐसे ही

प्रियतम
क्या करती।
खाया ही नहीं जाता है
तुम्हारे खिलाए बिना
कैसे खाती ?

बस कुछ खा लेती हूँ
इस देह को जो बचाना है
कभी तुमने
अधिकार जताते कहा था
कि तुम्हारी यह देह
सिर्फ तुम्हारी ही नहीं है
मेरी भी है।

इसलिए
बस, इसीलिए
अब तक टिकाती रही हूँ
यह देह
तुमहारी ही बात मानती हुई
इसे संभाल रखी हूँ
विवश होकर।

लेकिन बताओ तो
तुम्हारी यह बात
कब तक संभाले रखूंगी ?

 

समर्पण / साँवरी 

प्रियतम
बहुत इच्छा है
चाहती हूँ
साँझ होने से पहले
तुम्हारी इच्छा की वह साँझ
तुम्हें दे दूँ।

आओ मेरे प्रियतम
मेरे साँवले रूप के प्यासे
और समेट लो मुझे
अपनी मजबूत बाँहों में
हाँ, हाँ, बाँध लो मुझे
हमेशा-हमेशा के लिए
अपनी मजबूत बाँहों के पाश में।

बड़ी तेज चल रही हैं मेरी साँसे
तुम्हारी साँसों से मिल जाने के लिए
देह से देह
मन से मन
बज उठे प्राणों के तार-तार।

फन काढ़ते
काले नाग की तरह
हवा से खेलते
मेरे काले केश गुच्छ
खुल कर बिखर जाना चाहते हैं
कि समेट लेना चाहते हैं
तुम्हें ठीक-ठीक
सम्पूर्ण रूप से अपने अन्दर।

प्राण !
आज मैं मेघ बूंद बनकर
धरती सी तुम्हारी देह में
अपने को समा देना चाहती हूँ
धूल और पानी की तरह।

आओ
मेरे नाम के बावले
मेरे मीत
मेरे अधमुँदे-अलसाये
पलकों का फड़कना
अग्नि की तरह दहकते अधरों के संकेत
इन्हें समझो पिया
पगला गई हूँ मैं
बौरा गई हूँ मैं
देखो चारों ओर
प्रकृति के भी अंग-अंग सिहर रहे हैं
कि मेरे ही समर्पण भाव से
भर उठी है।

देखो इस मेघ को प्रियतम
कितना तो बौरा गया है यह
कि दौड़ने लगा है
आकाश की छाती पर
कमरूप शिव की तरह
तांडव नृत्य की मुद्रा में
हिमालय के बेटी की तपस्या को
फिर से पूरा करने के लिए
उसकी देह से
लिपट जाने के लिए
धरती पर बरस जाने के लिए
उसकी प्यास बुझा देने के लिए।

और ऐसे में
भला तुम्हीं कहो
मुझे तुम्हारी याद क्यों नहीं आए।

उधर देखो
बरसाती नासमझ हवा के झटके खाकर
किस तरह लचकने लगी हैं
वृक्ष की डालें
एक दूसरे के गले से
मिलने के लिए उतावली।
ऐसे में
मेरी सोई इच्छाओं का
अचानक ही जग जाना
क्या स्वाभाविक नहीं है मेरे मीत ?

आज तुम्हें
आना ही पड़ेगा
आज तुम्हारी छाती पर
अपने सर को टिका कर
मैं सो जाना चाहती हूँ
तब तक के लिए
जब तक कि
तुम्हारे आलिंगन की कठोरता
मेरी शिथिलता को
तोड़ कर जगा नहीं देती है।

मीत मेरे
मुझे कस कर बांधो
कि मेरे रोम-रोम बज उठे हैं
बाँस-वन के संगीत की तरह
चंदन की डाल पर
कुंडली मारकर बैठे साँप की तरह
स्वर्ग के पारिजात पुष्प की तरह
मेरी यह देह
न जाने कौन से अनचिन्हे
स्वर्गिक छुवन से
बेसुध हुई जा रही है।

आओ, देखो प्रियतम
जेठ की यह तपती धरती
आकाश से रिमझिम बरसती
बूदों की फुहार पाकर
कितनी शांत हो गई है।
अब हवा की भी
सिहरा देने वाला यह स्पर्श
नहीं सहा जाता है मुझसे।

मेरे मीत
अभी-अभी हवा ने
लाज से हुई लाल टुभुक
हो गये मेरे अधरों को
चूम लिया
आखिर क्यों नहीं
यह हवा
तुम्हारे घर की दिशा से
चल कर जो आती है।

आज फिर एक बार
बीते वर्ष की तरह
नदी की उफनाई गति सी
उमड़ती धार में
कूद जाना चाहती हूँ
उस पार जाने के लिए
पा लेना चाहती हूँ
उसी सुख को
जो मिला था मुझे
नदी में घुस कर।

सच कहती हूँ मेरे मीत
तुम से मिलने की बेसुधी में
मैं जैसे ही नदी में कूदी
तो मुझे लगा
मैं पानी में नहीं
बल्कि तुम्हारी सुखकारी
मजबूत बाँहों में समा गई हूँ

और नदी की धारा ने
मुझे उसी तरह उठा लिया था
जैसा कि
तुमने उठा लिया था मुझे
समेट कर अपनी बाँहों में ।

 

रहस्य / साँवरी

शायद तुम
नहीं समझ पाओगे
कि इस जवान रात्रि में
समान रूप से ही रही बरसात में
मेरे भींगने का कारण
इसमें स्नान करने का रहस्य।

क्या कहूँ प्रियतम
मैं भी नहीं जानती हूँ
तब भी
भींगती जा रही हूँ।

देखो प्रियतम
वर्षा की इन बून्दांे ने
कैसा जादू कर दिया है
कि मेरी देह की एक-एक उभार
दिव्य दृष्टि पाकर
ताकने लगी है मुझे
और मैं

 

एक यह भी दुख / साँवरी

मेरे नाम को
दिन-रात चौबीसांे घंटा
आठो पहर
रटने वाले ओ मेरे मीत !
इस मध्य रात्रि में
वह कौन अनचिन्हा सा दर्द है
जिसके सताये तुम
मेरे नाम का
लगातार जाप कर रहे हो
ओ प्रीत मेरे
बोलो ऐसा क्यों होता है
कि इसी तरह बहुत बार
जाग पड़ती हूँ मैं
मेरी नींद बार-बार
क्यों टूट जाती है
आधी-आधी रात में ?

कहीं यह सच तो नहीं
कि उस समय तुम
मुझे पुकारते रहते हो।

जरूर ही
मेरी याद में तुम्हारा हृदय
तड़प कर
हाहाकार कर उठता होगा
कि मुझसे बिछुड़ने के दुख से
व्याकुल होकर
तुम्हारे अनियंत्रित मन का कोना-कोना
भींग गया होगा

मुझ बाबली को
पूर्ण रूप से पाने के लिए
तुम्हारा अंग-अंग दुखने लगा होगा

और फिर तुम
जाग कर बैठ गये होगे
मुझे अपने समीप नहीं पाकर
तुम मुझे पुकारते ।

 

सब मैं ही / साँवरी 

सुनो प्रियतम
मेरी आँखों का बरसना देख कर
सावन ने बरसना छोड़ दिया है

यही कारण है कि
नहीं बरसते हैं अब
सावन के ये मेघ।
सूखा ही रहता है यह पूरा सावन
और यह जो कभी-कभी
चाँद छिप जाता है मेघ से
जानते हो प्रियतम
यह क्या है ?
यह मेरी आँखों के बहते काजल हैं
और मेरे ही बिखरे केश
अगर मेघ होते
तो बरसते नहीं ?

 

केलि-इच्छा / साँवरी 

प्रियतम, आज फिर
कितने युगों के बीत जाने पर
वही चाँद निकला है
इंजोरिया
वही महारास की ठहाका इंजोरिया
जब कृष्ण की
मुरली बजी थी
और सुध-बुध भुला कर
नाची थी
वृन्दावन की कुवाँरियों के संग-संग ब्याही भी
आज वही पूर्णिमा की रात है
वही इंजोरिया रात।

मैं यह भी मानती हूँ कि
यह द्वापर नहीं है
न तो यह जगह ही वह वृन्दावन है
न तो बगल में बहती नदी यमुना है
और न ही किनारे तमाल के वृक्ष
न तो गायों के बथान हैं
और न उसी तरह बछड़ों की कूद
लेकिन रसीली रात तो वही है

आकाश भी तो वही है
हवा भी वैसी ही बह रही है
तारों को टकटकी लगाए
चाँद का निहारना भी तो वैसा ही
जैसे कि साठ हजार गोपियों के बीच
अकेला कृष्ण

लेकिन आज मैं अकेली
वही रात-
वही आकाश –
हवा और तारों के बीच।

चन्दन नदी के किनारे-किनारे
आँख भर खोज रही हूँ तुम्हें

प्रियतम
रूई से भरे बोरे की तरह मुलायम ये बालू
नागफनी की तरह गड़ रहे हैं
अब भी तो आओ पिया
कि जब तक तुम नहीं आओगे
मैं चाँद को डूबने नहीं दूंगी।

आँख भर दिखाई दे रही है जमीन
परती-पलांट
ऊसर-टीकर
पहाड़-पत्थर
सभी जगहों पर फैला है
चाँदनी का बिछौना

प्रियतम
जानते हो
किसके लिए यह बिछा है ?
मेरे तुम्हारे लिए ही तो।

वह देखो
बांसवन से झांकता है चाँद
बाँस की फुनगी पर चढ़ी है चाँदनी
इतराती है
कि रह-रह कर बुलाती है
पहले की तरह ही।

अब भी तो आओ प्रियतम
जब तक तुम नहीं आओगे
मैं चाँद को डूबने नहीं दूँगी।

कि नहीं डूबने दूँगी मैं चाँद को
नहीं जाने दूँगी मैं चाँदनी को
गवाही देगा यह जेठोर पहाड़-
मेरे मौन क्र्र्रन्दन का
और इतिहास सुनेगी सखी चन्दन नदी ।

 

बदलाव

अवश
परकटे पक्षी की तरह
निढाल पड़ा मधुआ
उठा
ठीक वैसे ही
जैसे जेठ का सूरज
उसने उठा लिया
तमक कर
अपने कंधे पर
कुदाल
और उसका चेहरा
दमकने लगा
परशुराम की तरह

 

विश्वास

उसने कहा था कि मैं सुबह तक
जरुर लौट आऊँगा
पर वह लौटता कैसे
जिसकी जिन्दगी में
कभी सुबह हुई ही नहीं
लेकिन
वह हारा नहीं है
वह जरुर लौटेगा
और
इस बार
जब वह लौटेगा
तो उसके हाथ में
एक नया सूरज होगा

 

मेरा अंधा इतिहास

आसमान पर आधा बांस
सूरज के ऊपर आ जाने के बाद भी
मैं उठ नहीं पाता हूँ
अपने बिछावन से
रोज-रोज की तरह आज भी
तन मन का विरोध
मेरी कोशिश के विरूद्ध
-जारी है

मैं बिछावन में
और भी धँसता जा रहा हूँ
राधेय रथ के चक्र सा
मुझे लगता है-
मैं दीवार में धंसी कील हूँ
हिलने डुलने में भी असमर्थ

मैं खाट से ही
देखता हूँ
-पनहाती हुई गायें
-खेत को तैयार बैलें

मैं स्पश्ट सुन रहा हूँ
रह रह कर बर्तनों की झनझनाहट
(जिन्हें अभाव के कारण
गुस्से में मेरी पत्नी पटक रही होगी)
मैं अपनी आँखें बंद कर लेता हूँ
और
-पत्नी का बच्चों पर बरसना
-बच्चों का रोना
-गायों का रंभाना
-बैलों का डकरना
सब के सब
मेरी बंद आंखों में घूमने लगते है
और मुझे लगता है
ये सब मुझे बुला रहे हैं
कोल्हू के बैल की तरह
-जुतने के लिये

घबराहट में
मैं अपनी आंखें खोल लेता हूँ
देखता हूँ –
आसमान का सूरज
बीचोबीच दरक गया है
जिससे काला धुआँ निकल रहा है
लगातार
मेरी आँखों में
अंधेरा करता हुआ

 

मुझे देवत्व नहीं चाहिए

मैंने
जब से तुम्हें देखा है
मेरा भीश्म
अपने संकल्प को भूल गया है
मैं क्या करुँ
कि मैं त्रेता का राम तो नहीं
कि शूर्पनखा के प्रेम निवेदन को
ठुकरा सकूँ
संभव है
मेरा यह सच
तुम्हें बुरा लगे
लेकिन यह सच है

हे राम !
मुझे तुम्हारा देवत्व नहीं चाहिए
मैं आदमी हूँ
मुझे आदमी ही रहने दो
हो न हो
तुम्हारा देवत्व पा लेने से
फिर कहीं किसी
शूर्पनखा की
नाक न कट जाय

 

परिवर्तन

एक लंबी चुप्पी के बाद
जब धरती
आग की हाँडी बन गई
और जिसकी बौराई हुई लपटों में
आसमान सिंदूर पुते औघड़ की तरह
लाल हो उठा
तब ताड़ के पेड़ पर अचानक ही
एक सोने का सिंहासन दिखाई दिया
जिस पर शुभ्र स्फटिक से बने वस्त्र को ओढ़े
सोने की अँगुलियों में
मोतियों की अंगुठी पहने
कोई देव पुरुश बर्फीली हँसी हँस रहे थे
और जब उनकी बर्फीली हँसी से
धरती के मेरुदंड के बीचोबीच
झुरझुरी दौड़ने लगी
तभी उन्होंने कुछ गंभीर होते हुए
नीचे बौने बने
खजूर की शक्ल में खड़ी भीड़ को
रेंगते हुए जीवों के जुलूस से
कहना शुरु किया
मित्रों ! मैं आपलोगों के लिए हूँ
आप मेरे लिए
आपका सुख मेरा सुख है
और मेरा दुख आपका दुख
फिर यह सब क्यों होता है
कि धरती के साथ साथ

आसमान भी लाल हो उठता है
मुझे काफी दुख है
जब आप सबों ने मुझे
अपनी सामर्थ्य से स्वर्ग भेज ही दिया
तो फिर आप सब ऐसा क्यों करते हैं
कि मुझे लाचार किया जाता है
कुछ समय के लिये ही सही
नरक को झांक आने के लिए
मेरे सुख निर्माताओं
मेरी परेशानी का कारण न बनें
जिस तरह मैंने
आपलोगों को आश्वासनों का अमृत पिलाया
और उसके ही नशे में गोलोक हासिल कर लिया है
आपलोग भी कुछ ऐसी ही कोशिश करें
वादे गढ़ें
अभिनय करें
स्वर्ग आपके हाथ में होगा
फिर यह सेवक
इस नरक में नहीं
स्वर्ग में आपके साथ होगा
इतना कह
उस देवपुरुश की बर्फीली आवाज
रुक गई
मात्र एक सर्दीली लहर
पूरे परिवेश को चबाती रही
सब चुप थे
और भीड़ के बीच उसकी प्रेती हँसी
आती रही/जाती रही

 

इस सदी का आदमी

कुछ होने से पहले
न जाने क्यों
सब कुछ शांत हो जाता है
सही में
तुमने देखा होगा
तूफान आने की संभावना पाकर
वातावरण शांत हो जाता है
आकाश
धूलधुसरित बच्चे की तरह
मटमैला दिखने लगता हैं

और बकरियाँ मिमयाती हैं
कल गाँव में तूफान उठेगा
आज गाँव
पहले दिनों से ज्यादा
शांत नजर आने लगा है
मन में भय
रह-रह कर समाने लगा है
सारा आकाश
लहू से लाल हो उठेगा

अब बकरियाँ मिमियाती नहीं हैं
उसकी आँखे उन घासों पर टिकी हैं
जो बहुत शीघ्र ही जल जायेंगी
और घास
आसन्न मृत्यु से
जड़ी भूत हो गई हैं
निश्कंप
डरी हुई
और खेतों की पगडंडियाँ
सहमी
झुकी घासों के आँचल में
छुप गई हैं

तूफान के आने का
कोई भी विरोध नहीं कर रहा
कोई पहाड़ बनना नहीं चाह रहा
इसकी गति को मोड़ देने के लिये

सब अपनी-अपनी टांगों में
सर छुपाये
आँखे बन्द किये
खतरे के डर से
मुक्त हो गए हैं
आदमी समझ क्यों नहीं पा रहा है
क्यों एक विरोधी हाल होने के बावजूद
वह शुतुरमुर्ग हो रहा है

 

स्थिति

मीरा
मैंने तुमसे
इतना ही तो कहा था
कि इधर देखो
ये बेली के पौधे
जिसे तुमने लगाये थे
किस तरह फूलों से
लद-लद गये हैं
आओ, हम दोनों रात भर
इन फूलों को प्यार करें।
लेकिन
न जाने क्यों
क्या समझ कर
तुम
उदास शाम के अंधकार सी
लगने लगी हो
मैं
इन खिले फूलों
और
तुम्हारे उदास चेहरे के बीच
हथौड़े और पत्थर के मध्य
चूर होते
कोयले की तरह
हो रहा हूँ।

 

नहीं समझोगे दर्द 

हे प्रभो !
मेरी मौन पुकार
मेरे मन के एक कोने से उठकर
बाहर जाना चाहती है
मगर लहू से सने जबड़े की तरह
ये जेल की दीवारें
हर बार इसे रोक लेती हैं
रोक लेती हैं इसे
बाहर जाने नहीं देती
और प्रभो !
तस्वीर में तुम्हें
तुम्हारी प्रिया के साथ पा कर
मेरा विरही मन
और भी व्याकुल हो जाता है
यह तो तुम भी
सोच सकते हो प्रभो
कि जब तुम्हारा मन
जेल में जन्म से बाद ही
नहीं लगा
तब मेरे बेल होने की प्रतीक्षा में
द्वार पर अकेली खड़ी
मीरा के बिना
कैसे लग सकता है ?

 

तुम/मैं/वह और वह

तुम भी ठीक हो
मैं भी ठीक हूँ
वह भी ठीक है
फिर वह अकेला कौन है
जो कभी भी दीखता नहीं है ?
पर जिसके इशारे पर
हम सब ढाक के पत्ते की तरह
होते रहते हैं
वह आदमी
कभी क्या दीख सकेगा ?
हम कभी क्या एक हो सकेंगे ?

 

अमरेन्द्र से शिकायत

मैं जानता था मेरे मित्र
कि तुम चले ही जाओगे
और तुम चले गये
मेरी आँखों में अँधेरा करते हुए
तुम्हें गाँव की मिट्टी ने
जब भी बाँधना चाहा है
तुम्हारा मन पुरुरवा की तरह
बार-बार उड़ गया है आकाश में
तुम नगर की तरफ दौड़े हो
मेरे मित्र ! अब मैंने यह जान लिया हैं
कि खेत की मेढ़ पर
यूँ ही तुम्हारा घन्टों बैठे रहना
‘अबकी ऐबा तेॅ लानियोॅ सिंगार सोलहो’
गुनगुनाना, फसलों को टकटकी बाँधे देखते रहना
और कभी पड़ोकी की आवाज को
बेसुध बने सुनते रहना
घाटियों में प्रतिध्वनित होती
मित्रों की हँसी
ये सब तुम्हारे लिये
कुछ वैसे ही थे
जैसे राजा जनक के प्रासाद में
भोग समारोहों का होना
और इनके बीच तुम्हारा होना
जनक के होने के समान था।
यह बात मुझे कितनी साल रही है !

 

इसे क्या कहोगे 

यह क्या है मेरे दोस्त
कि जब मेरे पिता ने
मुझे जन्म दिया था
तब भी मैं नंगा था
और जन्म से लेकर
अब आजादी के बाद भी
मैं नंगा ही हूँ ।
पूरे पैंसठ वर्श के बाद भी
अपनी देह को ढक नहीं पाया
इसे तुम क्या कहोगे मेरे दोस्त ?



अन्तहीन नाटक
आज भी
बीते कल का ही नाटक होगा
लागातार सीटी बजने
और शोर होने के बाद
अब पर्दा उठा है
लोग किसी भुतहा मकान की तरह शांत हैं

मंच पर इन्द्र हैं
और विश्वामित्र क्रोध में
क्या-क्या कहे जा रहे हैं
देवमुख और ऋशिमुख से हो रहे
गालियों का प्रयोग जारी है

दृश्य बदले, शैव्या बेची गई
धार्मिक नगर के एक धनवान ने
खरीदी है
दक्षिणा चुकाने के लिये
राजा डोम के घर बिकेंगे

सिंहासन पर
विश्वामित्र ऊँघ रहे हैं
आदेश की प्रतीक्षा में
सभाशद भी थककर सो रहे हैं
इधर दृश्य परिवर्त्तन के लिये
पेक्षागृह में प्रेक्षकों का शोर जारी है।

 

अंधेरी घाटियों के बीच

चारो तरफ पर्वतों का
वही लम्बा सिलसिला
निर्जन, नीरव, अनजान
मैं अपने आप को
अंधेरी घाटियों के बीच पाता हूँ
जिसकी पथरीली सतहों को
छेद कर उग आए हैं
लंबे ऊँचे पेड़
और जहाँ पर
बर्फीली हवा की चोट
खा-खा कर
गिरे पत्ते
सड़ने लगे हैं

घाटियों की जगह-जगह पर
जंगली भेड़ियों की फुसफुसाहट
कैसे-कैसे जानवरों का शोर
सुरसा की तरह फैला हुआ है
जिसे सुन कर
भय

मेरे मन के कोने तक
पसर जाता हैं
और एक अनचाही चीख
मेरे मुँह से निकल पड़ती है
मेरी काँपती आँखें
जिधर भी देखती हैं
उधर ही पिघले कोलतार सी फैली
घाटियाँ
और घाटियों के बीचोबीच
अंधेरा
फैला हुआ है
मेरे पाँवों के आसपास
रेंगते जन्तुओं की सरसराहट
जाने कब से हो रही है
शब्दहीन हो गई है मेरी आत्मा
लकवा मार गया है संकेतों को
मैं अपने बचाव में
हिलडुल भी नहीं पा रहा हूँ
एक मजबूत जबड़े में
अपने को
फंसा हुआ पाता हूँ

जंगल की फुसफुसाहट
धीरे-धीरे अब भयानक शोर में
बदलने लगी है
और घाटियों की जगह-जगह पर
ज्वालामुखी के मुँह
निकल आये हैं
जिनसे आग

रह रह कर निकलने लगी है
धरती हिलने लगी है
कहीं पर भी कोई
बचाव का रास्ता नहीं दिखता
कोई भी मेरा कुछ नहीं सुनता
लगता है
सब मेरे विरुद्ध
लगे हुए हैं
जैसे संसद तक आते-आते
भारी विरोध के बावजूद
आपसी मनमुटाव को भूलकर
अपने हित के मुद्दे पर
सारे दल एक हो गए हैं
व्यर्थ है
इस तरह से खड़े होकर
सिर्फ इनका खौफनाक तमाशा
देखते रहना
बार-बार मरने से
बेहतर है
एक बार मरना
कान पकने लगे हैं
जंगलों का अट्टहास सुनते-सुनते।
अब मुझे
इस अंधेरी घाटियों में
अकेले ही कुछ करना होगा
मारना होगा
या खुद ही मरना होगा

 

जहाज पर 

घंटों से बैठा हुआ हूँ
जहाज पर
पानी की दूर तक फैली हुई बस्ती में
पानी ही पानी है
गंगा की धार को
फाड़ता जा रहा है
जहाज
एक रेखा बनती जा रही है
बीचोबीच
जैसे विस्तृत खेत के मध्य में
किसी संकल्पी किसान ने
हल की एक लम्बी रेखा
खींच दी हो
जहाज
जाने कितने दिनों से चल रहा है
विशाल घड़ियाल सा तैरता
मेरा मन
डरा हुआ सा हो गया है
उकताने भी लगा है मन
आखिर इस सफर का
कोई अंत है भी या नहीं
ये मेरे यात्रा मित्र
स्लेट पर खिंची लकीर से स्थिर हैं

चुप हैं
हाय ! आदमी आदमी से कितना कट गया है
वे सिर्फ मुझे घूर रहे हैं
कि अचानक एक शोर
और शोर बढ़ता ही जाता है
हिन्दुस्तान की गरीबी और जनसंख्या की तरह
मेरे कुछ भी संभलने से पहले
जहाज की सतह पर
तीन लाशें बिछ जाती हैं

आदमी अब भी चुप हैं
कुछ नहीं बोलते
कुछ नहीं हिलते
हाय ! आदमी कितना जड़ हो गया है
क्रोध में संझाती किरणें लाल हो उठी हैं
और गंगा का पानी भी
लहू से लाल हो रहा है
और सब पहले से हैं
कहीं कुछ नहीं बदला
मेरी आंखों के कोवे
आँसू से फूल गये हैं
कि अब बहे, तब बहे
गंगा में जहाज
अब भी चला जा रहा है
हवा में तैरता
प्रेत सा

 

संकल्प (1)

सुनो !
अगर तुम्हारे परमार्थ ने
ले ली है जगह स्वार्थ की
और तुम्हारा हृदय पत्थर का हो गया है
तो मुझे मत जीने दो
मेरे नाम/सौ इल्जाम गढ़ लो
और मुझे ईशु की तरह
सूली पर चढ़ा दो
वैसे भी मेरा दम घुट रहा है
इस मुल्क में
जो तुम्हारी कसती हुई मुट्ठी में
सिमटा चला जा रहा है
और मैं झुलसने लगा हूँ
तुम्हारी कसती हुई मुट्ठियों के ताप से
मैं जानता हूँ
कि मैं तुम्हारे प्रशस्त पथ का काँटा हूँ
तो फिर देर क्यांे ?
तुम्हारे हाथ में तलवार है
(जिसे तुमने मुझसे बनवायी थी)

सुनो, क्या तुम्हारी गोलियाँ
शेश हो गई हैं ?
जो मुल्क में पिरामिड का
निर्माण करती हैं ?

मैं क्या करुँ
मैं लाचार हूँ
कि तुम्हारा साथ नहीं दे पा रहा हूँ
न जाने कब मेरा यह मन
महाभारत का कृश्ण बन गया है

दुर्योधन के उन तमाम साजिशों के खिलाफ
जिसकी नीतियों के पीछे
शकुनी का छल है
दुःशासन का बल है

मैं अपने जन्म से
पांव के नीचे
जमीन नहीं पा रहा हूँ
ऊपर शून्य है
और मैं बीच में
त्रिशंकु की तरह लटका हुआ हूँ
मैंने स्वर्ग पहुँचना चाहा था
(किसी के तप के सहारे)
जो झूठ सिद्ध हुआ
सुनो
अब मेरा निर्णय बदल गया है
मैंने यह जिद्द ठान ली है
कि अपने लिए नहीं
अपने सभी भाइयों के लिए
अब स्वर्ग लेकर ही
धरती पर उतर जाऊँगा

 

संकल्प (2)

मैं चीख रहा हूँ युगों से
इतिहास के पन्नों पर
बियाबान जंगलों में
संसद से सड़क तक
परन्तु मैं
अपनी आवाज के उत्तर में
सिर्फ अपनी आवाज ही
सुन पा रहा हूँ
असम्भव है मूल्यांकन मेरे उत्पीड़न का
लेकिन मैं इससे घवड़ाता नहीं
मैं अकेला ही युग के शकुनियों से
लड़ता रहूँगा अन्तिम सांस तक

 

प्रतीक्षा में

अमावस की
उस रात का मेरा वह स्वप्न
स्वप्न था या कि कुछ और
चढ़ती हुई घूप थी
और हिमालय पिघल रहा था
समतल की छोटी-बड़ी
नदियों के साथ मिलकर
सारी धरती को डुबो रहा था

अपने को बचाने की कोशिश में
मैं जब हाथ-पाँव मार रहा था
तब तुम प्रभु मेरे पास आये थे
मुझे याद है
मैंने सोचा था-
तुम मुझे बचाओगे
लेकिन बचाने के बजाय
बाढ़ में तुमने मुझे गोतना शुरु किया
मेरे अधर्मों को गिनाते हुए
मैं चींख रहा था-
मेरे प्रभु !
तुम्हारे चित्रगुप्त ने तुम्हें धोखा दिया है
लेकिन तुमने

मेरी बातों को सुनने के बजाय
मुझे अपने सुदर्शन का
भय दिखाते रहे
देवता होने के मद में
तुम भूल गये थे
कि तुम्हारे निर्माण में
मेरा भी कुछ हिस्सा है
और तब मैं अचानक ही
बलभद्र में बदल गया था
तुम्हारे सुदर्शन को
गुस्से में निगल गया था
तुम्हारा सुदर्शन
अपनी तेज गति के बावजूद
निकल नहीं पाया था
मेरी अँतड़ियों को फाड़कर

कैसा था वह स्वप्न !
आमावस का
उस रात का मेरा स्वप्न।
और आज की तारीख
-भूख की
-दहशत की
-उत्पीड़न की तारीख
मैं बरामदे में बैठा
सोचता हूँ
क्या उस रात का स्वप्न
सच नहीं हो सकता

 

आँसू से अभिनन्दन

उजड़ी मम सपनों की दुनिया
उजड़ा मेरा नन्दन वन ;
रे मीत बता किस तरह करुँ ?
मैं एक तुम्हारा अभिनन्दन !
गीतों की दुनिया में डूबा
गीत हुए न पूरे !
मीत मिला मनमाना ;
लेकिन सपने रहे अधूरे !
इंगित करता है मुझको
माहौल दुखों के क्षण का ;
कोई तो रखवाला होता
इस दर्दीले मन का।
जीने का एक संबल था,
वह भी किसने छीन लिया ?
जीवन के मधु प्याले को
कौन क्रूर था ? तोड़ दिया !
जिसको पाया, उसको खोया,
मूक मिलन की आशा में ;
संभल-संभल भी ठोकर खाया
नई-नई प्रत्याशा में।
आज विदाई का अभिनन्दन
आँसू से लिखकर देना है !
मेरे जीवन का लक्ष्य आखिरी
चुप-चुप कर बस रोना है।

 

कोयल क्यों नहीं कूकी 

रातें बीती
दिन भी बीते
रंग-राग में
फागुन बीता
नूतन अभिसारिका सी
बरसा फिर-फिर आई
महुवे की रस भरी डाल पर
कोयल कूकी
लेकिन मैंने
अपने आंगन में
जो चंदन का वृक्ष लगाया है
उस पर
कोयल क्यों नहीं कूकी ?

 

उसका स्वार्थ 

उसका स्वार्थ मुझसे नहीं सधा
वे मेरे पीछे पड़ गये
और मैं इस बात की चिंता किये बिना
उस एक आदमी की खोज में लग गया
जो शहर आया था
और शहर में ही खो गया था।
मुझे प्रतीक्षा थी
वह शहर से खुद हीं निकल आयेगा
लेकिन बरसों की प्रतीक्षा के बाद
मैंने यह जाना
कि इस शहर में आया हुआ आदमी
लौटता नहीं है।
यही हुआ भी
शहर के दस्तुर के अनुकूल
वह वहीं फंस गया
हमेशा के लिये
वहीं रुक गया
यह जानते हुए भी
कि वह लाखों लोगों की भूख
अपनी मुट्ठी में बन्दकर
इस शहर में आया है।

 

बचाव की कला

भेड़िया गुर्राता है
आदमी की शक्ल में
और तुम
मेमने की तरह मिमियाते हो ;
तुम्हारा यही भय
तुम्हें भेड़िये का भोजन बनाता है
अगर तुम
भोजन बनना नहीं चाहते
तो तुम्हें
गुर्राने की कला सीखनी होगी,
गुर्राने की ही नहीं
झपटने की भी।

 

दर्द की दहलीज से

मन व्यकुल तेरे बिना
कुछ ऐसा,
क्या कहुं प्रिये ?
बिच्छू के काटे जैसा

तेरे जाने के बाद का समय
कुछ ऐसे ही बीता,
जैसे बकरे की बलि के लिए
तैयार कसाई
और उसके हाथ में काता।

करेत काटे सा दिन कटा
रातें कटी
जैसे बिजली का करंट,
दर्द टीसता रहा
जैसे किसी निरपराध पर
पुलिश का वारंट।

किसने छिरयाया है ?
तुम्हारी साँवरी देह को
आकाश के कोने-कोने में
और मैं क्यों ?
टकटकी बाँधे देखने लगा हूँ
लगातार

 

हुँकार 

बाधाओं की संधि रेख पर
उलझा मन कुछ गाता है,
चिन्ता से कुंठित काया को
कौन घेर यह जाता है ?
सम्मुख समुद्र का क्रुद्ध शोर
सोई अलसाई मानवता को
जो होश गवाँ खो बैठी है
दे रहा उसे, यह आमंत्रण।
व्यथित हृदय की पीड़ा को, मिलता है संतोष-स्वाद।
जर्जर जीवन के जड़ को दे रहा, आज कोई है खाद।।
प्रतिकार हेतु उठ रहा आज हूँ, लहरों का यह देख रोष,
पागल हुई जवानी जगती है, लेकर देखो नया जोश।
शोषित होने वालों का, उद्धार तुम्हें करना होगा।
मेरे जर्जर जीवन का, निर्णय तुमको करना होगा।
मैं तो तूफां हूँ, जो कभी भी ऐसे नहीं रूकेगा।
एक खास आदेश हूँ, कभी जो ऐसे नहीं टलेगा।
मैं निज स्वर में घोल रहा, मानव हित सुन्दर गान।
पतझड़ की मुरझाई रंगों में, भरता हूँ नव प्राण।
अय, अतीत से, भीत मनुज-गण
क्यों वर्त्तमान लगता बेकार ?
है भविष्य भरने वाला
निश्चय ही एक नया हुँकार।

 

वसंत / ऋतुराग

1.

ऐलै वसंत
होतै दुखोॅ के अंत
आबी जा कंत।

2.

वसंत रंग
प्रीतम के छै संग
फेरू की भंग।

3.

वसंती हवा
आँचल लहरावै
प्रीत जगावै।

4.

चन्दन वन
वसंत ही घूमै छै
रे, की खोजै छै।

5.

आमोॅ के ठारी
बैठलौ छै वसंत
झुलावै हवा।

6.

वसंत गावै
रिझावै वाला सुर
छन्द ही छन्द।

7.

वसंत के ई
मदमस्त महीना
पीर हरोॅ ना।

8.

गोरी के मुँह
चूमी रैल्होॅ छै हवा
ऐलै वसंत।

9.

वसंत रंग
उमंग छै उमंग
बाजै मृदंग।

10.

चैती बयार
छै रंगोॅ के फुहार
यौवन भार।

11.

फागुनी साँझ
पथ निहारै गोरी
कागा नै ऐलै।

12.

वसंती रंग
लाल-लाल गुलाल
कहाँ छोॅ पिया?

13.

रंग बरसै
भींगै लेली तरसै
गोरी हरसै।

14.

हुनकोॅ याद
कैन्होॅ सूनापन छै
दुखी मन छै।

15.

महुआ पीबी
झूमै छै वसंत
हवा के रंथ।

16.

वसंत कृपा
बौरेलोॅ छै मंजर
तर-ऊपर।

17.

कुसुम रंग
लहँगा पिन्ही नाचै
वसंत-प्रिया।

18.

वसंत राजा
महुआ लेॅ, सूती जा
हवा में नै जा।

19.

सजनी कहै
कुसुम रंग लावोॅ
अंग सजावोॅ।

20.

वसंत छेकै
आशा, जीव जिज्ञासा
प्रेम पिपासा।

21.

फागुनी भोर
झकझक इंजोर
ओर नै छोर।

22.

रास रचावै
वसंत संग तारा
नाचै छै चाँद।

23.

हे, रे फागुन
तोरा सें की कहियो
पिया लानी देॅ।

24.

मुस्कै छै गोरी
वसंत खेलै होरी
रंग चपोरी।

25.

तीसी फूलोॅ पेॅ
पीरोॅ फूल गोटोॅ पेॅ
नाचै वसंत।

26.

पछुआ हवा
हट्टोॅ-हट्टोॅ नै हुओॅ
शिशु वसंत।

27.

गली सें गली
मौसम के ठिठोली
होली के बोली।

28.

फागुन मास
वसंत के सुवास
हास-विलास।

29.

हवा बजाबै
पत्ता के पैंजनी
वसंत ऐलै।

30.

मदमातली
जूही गेंदा चमेली
खेलै छै होली।

31.

केशर क्यारी
बूलै चिकनाधारी
वसंत प्यारी।

32.

मदन मन
हाँसै लाल पलास
पिया नै पास।

33.

पी-पी कहि केॅ
पिकवैनी थिरकै
अंग लहकै।

34.

जी तरसै
केकरा देवै रंग
पिया नै संग।

35.

फागुन छेकै
पिया, रंग-महीना
अंग लगोॅ ना।

36.

छोड़ोॅ प्रीतम
ई झूट्ठेॅ के झगड़ा
फागुन छेकै।

37.

विरह दुख
चकवा-चकई के
कानै छै रात।

38.

हे ऋतुराज
सच्चे पावी केॅ तोरा
धन्य छी हम्में।

39.

गावै छै पिकी
पंचम स्वर-गान
साँझ-विहान।

40.

चंदनी गंध
फूल गाछी में भौंरा
छै उमतैलोॅ।

41.

कुसुम ठारी
बौर-बौर भौंरा छै
रस चूसै छै।

42.

खुशी सें झूलै
सुगंध सें भरलोॅ
पत्ता के देह।

43.

दर्दीला स्वर
मोती भरलोॅ सीपी
पपीहा पी-पी।

44.

आमोॅ के बौर
पत्ता बैठलोॅ भौंर
कहाँ छै ठौर।

45.

बंशी बजाबै
नाची-नाची भौरा
वसंत छौड़ा।

46.

सिहरै देह
बेरथ ई वसंत
कानै छै नेह।

47.

देखी केॅ मेह
कानै-कानै छै नेह
सूनोॅ छै गेह।

48.

डारी पेॅ डोलै
कारी कोयल बोलै
जिया केॅ खोलै।

49.

कारी नागिन
ठारी-ठारी बूलै छै
निर्मोही पिया।

50.

ज्ञानोॅ के भास
जीवन रोॅ उल्लास
वसंतेॅ पास।

51.

चैतोॅ में कंत
ऋतु में वसंत
प्यारोॅ लागै छै।

52.

भाव संचारी
छै काम रूपधारी
प्रेम पुजारी।

53.

वसंतें दै छै
प्रणय अनुभूति
डूबोॅ जी भरी।

54.

धरा दुकूल
भरलोॅ माघी फूल
मिलै के हूल।

55.

खेतोॅ में वसंत
किसान नांकि घूमै
आरी पेॅ झूमै।

56.

गाँव-गाँव में
द्वारी-द्वारी दस्तक
दै छै वसंत।

57.

वसंतोत्सव
प्रणय के उत्सव
प्रेम केॅ पूजोॅ।

58.

रात बजै छै
जेना वीणा के तार
मद झंकार।

59.

स्नेह स्पर्श सें
भींगलोॅ छै वसंत
शीतोॅ के लोर।

60.

कोयल कूकै
सुनावै प्रेम कथा
राजा-रानी के।

61.

वसंत नाचै
गीत में, संगीत में
छंद, फूल में।

62.

वसंती साँझ
मृदु मंद बयार
रंग बौछार।

 

ग्रीष्म / ऋतुराग

1.

आग छै आग
सगरोॅ सरंग में
ई ग्रीष्म छेकै।

2.

ग्रीष्म के दिन
रुद्र प्रलय नांकी
रात छै शिव।

3.

किरण वाण
आगिन के तनलोॅ
देह झुलसै।

4.

मंद प्रखर
प्रलय रूप लेनें
आबै छै ग्रीष्म।

5.

धरती तावा
ताप-तृष्णा आकुल
जीव सृष्टि के।

6.

पंथी विरमै
पक्षी खोजै छै छाया
ग्रीष्म के माया।

7.

प्रचंड ताप
लू सें हाँफै बैशाख
उड़ै छै भाँप।

8.

चुअेॅ छै घाम
छर-छर पसीना
जेठ महीना।

9.

पीतें नै मिटै
घोर प्यास पापिनी
हवा डाकिनी।

10.

बिजली पंखा
सब होलै बेकार
छै ग्रीष्म राड़।

11.

ग्रीष्म ताप सें
परेशान छै प्राणी
माँगै छै पानी।

12.

जेठोॅ के तॉव
होॅ-होॅ पछिया बॉव
मिलै नै ठॉव।

13.

बैशाखोॅ के लू
छाया खोजै छै छाया
प्रभु के माया।

14.

सुखलै नदी
बेकल मृग-मीन
आशा छै क्षीण।

15.

जवान जेठ
बिन्डौवोॅ सें भरलोॅ
आँधीये आँधी।

16.

उड़ै छै धूल
खाली धरा दुकूल
मिलै नै फूल।

17.

निडर ग्रीष्म
लू बनी केॅ भटकै
साँसोॅ अटकै।

18.

ग्रीष्म छीनै छै
क्रिया-कर्म उद्वेग
कामोॅ के वेग।

19.

ग्रीष्म के रात
भोर आरो प्रभात
सुहानोॅ लागै।

20.

अंग जरावै
लूओॅ के लहर छै
दुपहर छै।

21.

हे ग्रीष्म तोंय
छेकोॅ वर्षा जननी
मारोॅ नै तानी।

22.

नीमोॅ के छाँह
पानी भरलोॅ कुँआ
खोजै बटोही।

23.

ग्रीष्म चाँदनी
घामें घमजोर छै
हवा चोर छै।

24.

दुबड़ी जरी
होय गेलोॅ छै खाक
आग बैशाख।

25.

जेठोॅ के ताप
जेनां उसना रोॅ भांप
हफसै साँप।

26.

थर्थर काँपै
आगिन देखी आग
जेठोॅ के भाग।

27.

जेठोॅ के भोग
लागलोॅ प्रेम रोग
प्रिया वियोग।

28.

हमरोॅ रूप
पिया लागै अनूप
तै पेॅ ई धूप।

29.

चुभै छै सूई
पिया चुभै छै पिन
जेठोॅ के दिन।

30.

जेठें खोजै
अपनां सें बरियों
कुश्ती लड़ियों।

31.

लप-लप जी
मुँह बैनें बैशाख
हाँफै-दौड़ै छै।

32.

जेठ भटकै
कोय नै छै आपनोॅ
क्रुद्ध झटकै।

33.

पछुआ बॉव
वन-वन भटकै छै
प्रिया खोजै छै।

34.

जेठें बोलाबै
हल जोतोॅ किसान
बनोॅ महान।

35.

लड़ोॅ लू सें
खाय केॅ सत्तू-साग
गा ग्रीष्म राग।

 

पावस / ऋतुराग

1.

सखि नाचै छै
हमरोॅ तन-मन
वर्षा ऐली छै।

2.

वर्षा में नाचै
झूमै गाँमोॅ के बेटी
अंग समेटी।

3.

भाव विह्वल
हर्षित छै किसान
होतै जे धान।

4.

बीजोॅ केॅ पारी
घूमै खेतोॅ के आरी
बाँधै छै क्यारी।

5.

वर्षा रानी
दै छर-छर पानी
भरी जुआनी।

6.

सोॅन बरसै
लागै कोय कपसै
गोरी तरसै।

7.

दौड़ै छै मेघ
सरंगोॅ छाती पर
तांडव नृत्य।

8.

फुनसी परै
अंग-अंग सिहरै
गोरी हहरै।

9.

मेघोॅ के बून
धरती में समाबै
प्रेम जताबै।

10.

लचकै छै देखोॅ
गाछोॅ के ठार-पात
वर्षा के रात।

11.

सुतलोॅ इच्छा
अनचोके जगावै
वर्षा सतावै।

12.

बाजै लागलै
रोम-रोम गोरी के
पावस झरै।

13.

निष्ठुर पिया
कारोॅ मेघ सौनोॅ के
जी केॅ जराबै।

14.

वर्षा के साँझ
झरै छै बरसात
तोरे नै साथ।

15.

उफनै नदी
पिया उमड़ै धार
हमरे प्यार।

16.

हमरे लोर
गरजी केॅ बरसै
भादोॅ के मेघ।

17.

मेघ अखारी
आबै छै घिरी-घिरी
धरा दुलारी।

18.

यक्ष संदेश
लानलै छै अखार
लोरोॅ के धार।

19.

लाजोॅ सें लाल
छै कवि-यक्ष प्रिया
उन्मत्त हिया।

20.

तितलोॅ साड़ी
रोपनी रोपै धान
छेड़ी केॅ गान।

21.

चूड़ी खनकै
खेतोॅ में रोपनी के
मेहा ठनकै।

22.

खेतोॅ में कादोॅ
उमड़लोॅ छै भादोॅ
लेॅ होॅर लादोॅ।

23.

अखारी मेघ
अंग-अंग टहकै
कहाँ छोॅ पिया।

24.

ई पनशोखा
पिया, धोखा छै धोखा
ताकै छी मोखा।

25.

वर्षा पानी सें
होलै देहोॅ में फोंका
दर्द अनोखा।

26.

बेरथ लागै
मेंहदी के रचैबोॅ
अंग सजैबोॅ।

27.

काटै लेॅ दौडेॅ
ई बिछलोॅ बिछौना
पानी पड़ना।

28.

कनखी मारै
चमकी केॅ बिजुरी
हँसी उड़ाबै।

29.

उठी बेठलौं
देखलौं छुछछे खाट
जोहै छी बाट।

साँझ लगाबै
आँख भरी काजल
पौन्हा बादल।

31.

उजरोॅ पाँत
बगुला बूलै पानी
ध्यानी छै ज्ञानी।

32.

वर्षा के झड़ी
वन के चारों ओर
नाचै छै मोर।

33.

ऋतु पावस
सोॅन-भादोॅ सुहावै
संग पी भावै।

34.

उमडै़ मेघ
सुहागन भरै मांग
रचै मेंहदी।

35.

रात छै काल
पिया बिनु बेहाल
बरसै भादोॅ।

36.

सुन्नोॅ छै घोॅर
पिया लागै छै डोॅर
पड़ै छै झोॅर।

37.

बिना सुहाग
सेज बैठलोॅ नाग
आग छै आग।

38.

आस जगाबै
पावस के भरोसा
भगजोगनी।

39.

भींगै छै गाँव
रिमझिम पानी में
झिंगुर गाबै।

 

शरद / ऋतुराग 

1.

अलग सत्ता
सौन्दर्य सें भरलोॅ
शरद ऋतु।

2.

श्वेत वस्त्र में
छै शरद सुन्दरी
हरी चुनरी।

3.

शरद धूप
ससरी उतरै छै
उषा काल में।

4.

लाल कमल
हिलै तरन तल
स्वच्छ निर्मल।

5.

आरी ससरै
छम-छम छहरै
धानों के बाली।

6.

पायल बाजै
धानों के रुनझुन
नाचै शरद।

7.

लाल छै ठोर
कमल मुख भौंर
शरद मुस्कै।

8.

फूल फुलैलें
अंग में अनंग छै
पी के संग छै।

9.

ठंडा से काँपौं
थरथरावै जिया
कैन्होॅ छोॅ पिया।

10.

धरा इतरावै
पाबी फूल सौगात
चाँदनी रात।

11.

फूले फूल छै
छै मालती, शेफाली
जूही-चमेली।

12.

बिन बादल
सरंग छै निर्मल
स्वच्छ-धवल।

13.

शरद छै प्यारोॅ
कातिक उजियारोॅ
सेज सँवारोॅ।

14.

मिटी गेलों छै
स्वाती बूँद पाबी केॅ
चातक प्यास।

15.

खाड़ी शरद
कै सोलहों शृंगार
फूलों के डार।

16.

बत्तीसों कला
लै चाँद उगलोॅ छै
पिया ऐलोॅ छै।

17.

पपीहा पी-पी
शरद केॅ पुकारै
पंथ निहारै।

18.

शरद देखी
खुश छै जन-जन
ऋतु पावन।

19.

ऋतु शरद
घुंघट में मुस्कावै
पिया बोलावै।

20.

प्राण दै वाली
शरद छै अधीर
आकुल पीर।

21.

शरद रात
सुगंध सें भरलोॅ
मदमातलोॅ।

22.

रूपोॅ के रानी
लदली छै फूलोॅ सें
खोपा गजरा।

23.

खंजन हँस
सारस औ चातकी
गावै छै गीत।

24.

पीरोॅ धूप छै
बाजरा के खेतोॅ में
शरद घूमै।

25.

मनोॅ के मोहै
सुन्दर मुँह वाली
गोरी शरद।

26.

शरद मेघ
जेनां रुई के फाहा
सुन्दर आहा।

27.

धुंध कोहरा
लाजोॅ सें भरलोॅ मुँह
लाल टू-टूह।

28.

रुकोॅ शरद
कपड़ा पहनी लेॅ
ठंडा लागथौं।

29.

पावस कैंचुल
उतारी देल्होॅ कहाँ
शरद प्यारी।

30.

पहनलोॅ छोॅ
कुसुमोॅ केॅ आयुध
जगमोहिनी।

31.

बरसावै छै
झकझक इंजोर
शरद पूनो।

32.

दीप साजै लेॅ
अर्ध्य दै लेॅ छठोॅ केॅ
ऐलै शरद।

33.

पानी छै पानी
बचिये के रहियोॅ
शिशु शरद।

34.

कत्तेॅ छै मिठ्ठोॅ
अगहनों के धूप
लागै छै प्यारोॅ।

35.

माघी फूल छै
धरा के अँचरा में
नाचोॅ शरद।

36.

मुग्धा षोडसी
पीरोॅ वस्त्र पीन्ही केॅ
कहाँ जाय छोॅ।

37.

माघ छै माघ
बर्फ भरलोॅ बॉव
बचोॅ शरद।

38.

मनभावनी
शरद के चाँदनी
रात सुहानी।

39.

शारदी भोर
इंजोर ही इंजोर
ओर नै छोर।

40.

पानी में देखोॅ
मस्त नाचै छै चाँन
देखै छै तारा।

41.

शरद रानी
नहाबै गंगा पानी
बड़ी सयानी।

42.

रास रचावै
शरद साथें तारा
नाचै छै चाँन।

43.

पिया के बिना
कुहासा लिपटलोॅ
कानै शरद।

44.

तारा बाराती
दुलहा बनै चाँन
वधू शरद।

45.

आदमी नांकी
शरद नै होय छै
धोखा नै दै छै।

 

हेमंत / ऋतुराग 

1.

आबै छै देखोॅ
हिमरथी हेमंत
हिम उड़ैनेॅ।

2.

ऐलै हेमंत
लागै छै कोय संत
हाय रे कंत।

3.

देखी हेमंत
खरहा रोॅ कुलाँच
मुस्कै-हाँसै छै।

4.

ऐल्हेॅ हेमंत
स्वागत ई कवि केॅ
स्वीकार करोॅ।

5.

थरथरी छै
गजबेॅ हेमंत में
डूबोॅ कंत में।

6.

प्रीत जगाबै
मोहै जें मुस्कानोॅ सें
हेमन्त छेकै।

7.

सौम्य शालीन
तोरे नांकि हेमंत
ऐलौ छै पिया।

8.

ढकमोरै छै
नया कोमल पत्ता
आमोॅ गाछी में।

9.

छितरैलौ छै
छपरी पर देखोॅ
कद्दू के लोॅत।

10.

लोॅत ससरै
लागै छौड़ी जुआन
खोजै मचान।

11.

लत्तड़ शोभै
हेमंतोॅ के झोपड़ी
हाँसै पझड़ी।

12.

हेमंतोॅ के जुल्फी
झूलै छै फूल कली
जूही-चमेली।

13.

मधुमालती
रात-रानी गंध सें
झूमै हेमंत।

14.

तन-बदन
थर थर काँपै छै
हों, हेमंतेॅ छै।

15.

हेमंत ऐतैं
पकै लागै छै धान
दानी किसान।

16.

सखि सहवै
पिया के मनमानी
घूंघट तानी।

17.

ठंड छै ठंड
काँपै कोमल काया
आबी जा पिया।

18.

खेतोॅ के आरी
किसान बनी घूमै
प्यारोॅ हेमंत।

19.

मुरेठा बान्ही
बैठलोॅ छै हेमंत
जोताबै खेत।

20.

तोरा देखतेॅ
मन कहाँ भरै छै
आँखेॅ ढरै छै।

21.

सुहानोॅ लागै
हेमंतोॅ के प्रभात
जों पिया साथ।

22.

हिम हेमंत
सौंदर्य सें सनलोॅ
प्रेम भरलोॅ।

23.

कन्नी भरलोॅ
महुआ महादेव
सुगंध देव।

24.

र्ढुअे हेमंत
लै केॅ धानोॅ रो बोझोॅ
कनियां साझोॅ।

25.

टप सें चुवेॅ
कुहासोॅ भरी बून
भींगै हेमंत।

26.

मोर पिन्हलेॅ
तीसी, गोटा फूलोॅ के
झूमै हेमंत।

27.

हेमंत मेघ
गरजै, बरसै नै
ठंड बढ़ावै।

28.

कंठ लगावै
पिया केॅ तन वारी
बारी कुमारी।

29.

मोहै शोभै छै
नील कमल के माला
हेमंत गला।

30.

सुखोॅ के दिन
देखावै छै हेमंत
मिलै छै कंत।

31.

क्रौंचोॅ के जोड़ा
करै छै रति क्रीड़ा
हेमंत रास।

32.

चिचियावै छै
कैन्हेॅ क्रौंच बेचारा
के मारलकै?

33.

चाँद पगला
हेमंतेॅ साथें हाँसै
मुस्कै रहसै।

34.

चूसै केतारी
रसिया छै हेमंत
लाँघै छै आरी।

35.

खोपा में शोभै
गजरा गम-गम
पिया जे ऐतै।

36.

ओस पड़ै छै
भींजलै नामी केश
फाटै करेजोॅ।

पकलै धान
गम-गम गमकै
खेत खमार।

38.

कत्तेॅ सुन्नर
लागै छै हमरोॅ गाँव
गाछी के छाँव।

39.

लहारी बारी
बैठलोॅ छै हेमंत
झूठे रोॅ संत।

 

शिशिर / ऋतुराग 

1.

बंद भै गेलै
खरहा केॅ कुलाँच
शिशिर ऐतैं।

2.

पत्ता झरै छै
शिशिर में गाछोॅ के
आह भरै छै।

3.

सब केॅ लागै
एक रंङ सुन्दर
शिशिर ऋतु।

4.

गेहूँ, चना सें
भरलोॅ सौसे धरा
छै हरा-हरा।

5.

सुसुत वरै
पावी हवा रोॅ झौंका
सुतै के मोॅन।

6.

सुखलै देखोॅ
शिशिर में पोखर
बगुला भागें।

7.

मछली चुनै
पोखरी में बगुला
ट, टपा-टप।

8.

शिशिर कृपा
नै जाड़ा छै, नै गर्मी
हवा छै प्यारोॅ।

9.

अच्छा लागै छै
चाँदनी में चलवोॅ
धूप सेंकवोॅ।

10.

शिशिर लोरें
भींजलोॅ तितलोॅ छै
नदी रोॅ बालू।

11.

नांगटोॅ गाछ
फूल-पत्ता के बिना
सून्नोॅ निहंगा।

12.

शिशिर राती
प्रेमोॅ के रस घोलै
पड़ोकी बोलै।

13.

गिरी गेलोॅ छै
फूल कली केशर
शिशिर ऐतें।

14.

टटका नया
सौंदर्य के चरम
शिशिर ऋतु।

15.

सारस जोड़ा
बोलै बतियाबै छै
प्रेम करै छै।

16.

रातोॅ में ठंडा
दिन में धूप प्यारोॅ
बड्डी दुलारोॅ।

17.

रातोॅ में डँसै
नागिन ठंडी बॉव
होॅ-होॅ पूरवा।

18.

शिशिर बॉव
जेनां जुआनी तॉव
धारोॅ में नाव।

19.

ताकै छै रास्ता
शिशिरें वसंतॉे के
कौआ नै बोलै।

20.

घोॅर-ऐंगना
फुदकै छै बगरोॅ
शोभै सगरोॅ।

21.

छै अनमोल
ई बगरोॅ के लोल
प्यार जतावै।

22.

आस्ते-आस्ते सें
ससरै छै शिशिर
वसंतोॅ हिन्नेॅ।

23.

मनझमान
कैन्हेॅ शिशिर रानी
वसंत ऐतै

24.

हठयोगिनी
शिशिरें, करै तप
वसंतोॅ लेली।

25.

करै किलोल
दै केॅ लोलोॅ में लोल
बगरो रानी।

26.

शिशरें छोडै़
विष बुझलोॅ वाण
काम रागोॅ के।

27.

भंख लोटै छै
सौसे बाग-बगीचा
टिटही टें-टें।

28.

नया कपड़ा
पिन्है लेॅ धड़फड़
शिशिर रानी।

29.

संझौती वेरा
छै लोरैलोॅ नजर
ताकौं डगर।

30.

खेतोॅ के आरी
सुन्नोॅ बहियारोॅ में
हाँसै शिशिर।

31.

कनियैनी रं
चुकुमुकु बैठली
शिशिर मुस्कै।

32.

बारी केॅ दीया
चौखटी पेॅ राखी केॅ
खाड़ी शिशिर।

33.

थकचुरुऑे
सौसे दिन शिशिर
केकरा खोजै?

34.

शिशिर साँझ
छै कुहासा भरलोॅ
पिया जौं ऐलौ।

35.

सुखलोॅ ठोर
लाजोॅ सें सरगद
कैन्हेॅ शिशिर?

 

स्मृति-डंक

जब तांय
तोंय नै ऐभौ
हम्में चाँद केॅ डूबेॅ नै देबै!

हमरा याद छै
कि हम्में भूलेॅ भी ने पारौं
ऊ सँझौती बेरा
प्रतीक्षा में भींजलॅ आँखी के कोर
निराश देखथैं,
आबी जाय छेलौ तोंय
पुकारलेॅ हमरॅ नाम।

आरो तोरा देखथैं हम्में खिली जाय छेलियै
अमलतास नांकी
महकी जाय छेलियै रात-रानी नांकी
भूली जाय छेलियै दुनियां के सब दुख
आरो निकली जाय छेलियै तोरा साथें
-चानन नदी के किनार पर।

नजर भर दूर-दूर तांय बिछलॅ
ऊ चाँदी के बालू
देर तांय वही चांदी के बालू पर चलला के बाद
थक्की के बैठी गेला पर
तोहें हमरा निरयासी के देखॅे लागौ
आरो बस एक्के बात पूछै छेलौ
कि सही-सही बतावॅ हमरॅ प्राणॉ के गंध
ई बालू के ढेरो पर
उजरॅ दकदक साड़ी पीन्ही केॅ
तोहीं पटैली छॅ
कि पटेली छै चाँदनी?

आरो फेरू
हमरॅ मुँहॅ केॅ अपना दोनों तरोथॅ में थामी
देर तांय नै जानौं की देखै छेलौं तोंय?
प्रीतम! ऐकरॅ मानें
तोहरॅ आँखी के ऊ भाव
हम्में आय समझी रहलॅ छिपै
आबेॅ केना केॅ बतैय्यौं तोरा
कि तखनी की होय गेलॅ छेलै हमरा
के छेलै ऊ?
केकरॅ छेलै ऊ छुवन
जें बनाय देलकै हमरा अदलाही
हों तोहरॅ प्यार ने तेॅ!
तोहरॅ प्यार ने तेॅ!
तोरॅ प्यार ने तेॅ!

 

असमंजस 

आबेॅ तोहीं बताबॅ मीत!
हे हमरॅ परानॅ के परान!
कोन मुँह लैकेॅ
वही रास्ता सें होयकेॅ
निराश लौटी केॅ जैबै हम्में?
पूछतै तेॅ की बतैबे हम्में?

निराशा से भरलॅ हमरॅ लटकलॅ मुँह देखी केॅ
की सोचतै वें
केना केॅ की उत्तर देबै हम्में?
केना केॅ पार उतरबै हम्में?
केना केॅ कहबै…
कि जेकरा लेली मरली-हफसलो
दुलहिन नांकी सजली ऐली छेलियै
ऊ मीत हमरॅ नै ऐलै।

केकरा कहिये
आपनॅ ई दुख
केकरा सुनैइयै
आपनॅ मनॅ के बात
के सुनतै
केकरा फुरसत छै
हों, सखी चानन ने पूछतै जरूर
हेना में आबी केॅ तोहीं बताबॅ प्रीतम
हम्में की कहबै?

 

अन्तिम निराशा 

(कागा की संदेश उचारै)

आय कै रोजॅ सें साँवरी
सेजॅ परखनैखन
चित्त पट्ट हाथ-गोड़ होनै केॅ फेकै छै
जेना कि चानन कछारी पर फेकलॅ बुआरी
छिनमान होनै केॅ साँवरी कुमारी
घन्टा घन्टा पर आँख तनि खोलै छै
रहि-रहि की-की अनर्गल रं बोलै छै
‘भोजी देखॅ कागा की संदेश उचारै
उड़ी गेलै उड़ी गेलै पिंजरा रॅ सुगा रे
हम्मीं तेॅ कागा रे
हमरै देॅ दूध-भात
भौजी उड़ाय देॅ हमरा
बिठाय देॅ छपरी पर
देखॅ घुरी ऐलै सुगा रे


 

हमरॅ पोसलॅ, पोखरी पर कागा पुकारै“
यहेॅ रं फदकै छै रातॅ में दिनॅ में
जगला में नीनॅ में
बोलै छै

”घॅर-द्वार, टोला-पड़ोसा सब
कागा रॅ बासॅ छेकै
करै छै-कांव-कांव, कांव-कांव
भौजी कन्नें जांव?
आँखी रॅ रंस जाय खोचा में गिरलै
दौड़ी केॅ गेलौं, शिवाला में, देखै छी
शिवॅ रॅ जग्घा में कागा ही बैठलॅ छै
तबेॅ कौवे के नी सिमरपूजा भी होलै?“

फदकै छै हेने हेने
होश में आबै जेन्है।
माय-बाबू कानै छै, ऐंगना ओसारा पर
की होलॅ बेटी केॅ
कोन ओझा डायनी के छेकै करतूत?
भौजी सहलाबै छै माथॅ सें गोड़ तांय
दाँती पर दाँती मतुर साँवरी केॅ लाग छै
दुआरी पर चिन्ता में भाय-बाबा जागै छै
सखी कोय पूछै छै, तेॅ बोलै छै

”जेनै होलै बीजूवन में कागा-उचार
दौड़लौं कि रात कहीं बीतेॅ नै
पकड़ै लेॅ चाँद केॅ
कि चाँद केॅ डूबेॅ नै देबै।
कल्हो भोरे तांय
बीजूवन में बोललै कागा
सखी, तोड़ी देबै हम्में
…ओकरॅ सोना रॅ लोल
बोलै छै-
कि हांसबॅ, गाल फुलैबॅ
नै साथ-साथ हुवै छै
सखी, कागा रॅ बोल तेॅ
शहदे रं चुवै छै
नै तोड़बै लोल“
आरेा ई बोली-बोली साँवरी फुलाबै छै गाल
हांसै छै पगली रं भौजी-गल्ला सें लिपटी
”देखैं रे कागा,
दोनों साथ-साथ करलियै कि नै
झूठ होलौ कि नै तोरॅ बोल
नीमी के ठारी पर बैठी पिंजयाबै छैं की लोल“
साँवरी रॅ देखी केॅ हाल
पितयैनी रॅ छूटै छै आंखी सें लोर
भिंगले रहै छै आँचर के छोर
कानतै होय छै भोर
पूछै छै कुछकृू तेॅ साँवरी आरो कुछ बोलै छै
”चानन के रूइया भरलॅ नांकी नरम बालू पर
जुड़लॅ छै हंसिनी रॅ महारास
नांच छै मिली-जुली सभ्भे सें काग
चाची, तोहीं बोलॅ केकरॅ सराहै लायक भाग?
मतुर एक हंसिनी सिंगार करी कानै छै
चानन के कोंटा में“
कि तखनिये चिहाय उठलै साँवरी
”दौड़ें दौड़ें गे माय
देखैं कागा जेठौरॅ के पहाड़ बनी
नोचै लेॅ हमरा उड़लॅ आबै, बचाबॅ हे भौजी“
भौजी-माय निरयासी केॅ देखै छै साँवरी
पूछै छै की होय गेलॅ छौं तोरा
तेॅ आँखी पर हाथ धरी केॅ बोलै छै साँवरी

”हमरॅ आँखी में बैठलॅ छै कागा
झुठ्ठे नै कहै छियौ
हम्में नै गेलॅ छेलियै चानन किनारा में
यही नें गगली केॅ जेठॅ में बोलैलेॅ छेलै
चैतॅ में यही नें हमरा दौड़ैलेॅ छेलै
खेतॅ के आरी बारी
सौनॅ में करिया मेघ बनी गे माय।
कहै छेलै-ऋतु-ऋतु में घुमला सें
मन बहलै छै
मतुर हम्में तेॅ ठिक्के छियै माय
सुनॅ सुनॅ भौजी
हमरॅ केशॅ के तरॅ में नुकलॅ छै कागा
बोलै छै-
यही चाह, यही तड़प हुन्नो छै
केकरा में माय?“

समझेॅ नै पारै छै मांय
ताकै छै टुकटुक भौजांय मूं साँवरी रॅ
मतुर, साँवरी केॅ एक्के तेॅ रट छै
”माय सुनैं
कागा की सन्देश उचारै
बोलै छै-चानन के पार पीपरॅ गाछी तॅर
जोगी एक ऐलै छै
दै लेॅ आशीष हमरा, चलैं लै चलैं
अहे हे हे भौजाय-
हम्में ठहुना भर पानी में उतरलो नै छी
देखो कागा भांस छै भासैलेॅ दौ
अगे दादी, देखैं देखैं
ऊ करिया मेघॅ में करका कागा
केकरॅ पटारी लेलेॅ उउ़लॅ आबै छै
कांव-कांव -की सनेश सुनाबै छै
दादी देखैं दोनों गोड़ॅ में लेलेॅ छै
केतारी के गोल गोल गुल्ला आरो टिकौला
केकरा लेॅ“
बूढ़ी बेचारी दादी आँखी रॅ कमजोर
बैठलो कनमुँही अकासॅ दिस डरॅ से देखै छ
कहीं कुछ कुछुवे नै छै, खाली सरंग छै
सरंगॅ में असकल्लॅ सुरूज दपदप दमकै छै
सेजॅ पर साँवरी असकल्ली रहि रहि चमकै छै
पूछै छै हरिघुरी भौजी सें लिपटी
”की बोलै कागा-देखैनी जाड़ा सें ठिठुरी
वर्षा रानी आखिर मरी गेलै
देखैलेॅ ऐलॅ छै आम पल्लव के मौर पिन्हीं

घोड़ी चढ़ी हफसलॅ हफसलॅ बसन्त।
पीपरॅ के गाछी पर सटलॅ छै बिहौती पटौरी
खोड़री में पड़लॅ छै चूड़ी
देखॅ हे भौजी कागा की राजा रॅ कानॅ में उचारै छै
झरकाहा, मरबो नै करै छै
देखॅ भौजी, घोड़ी चढ़ी बसन्त गेलै चानन पार चुनरी लै
कागा गेलै बीजूवन चूड़ी लै
हम्में गुलेल लैकेॅ दौड़लॅ जाय छी बीजूवन
कांव कांव कांव
भौजी हे कागा की बोलै
बोलै छै चुनरी दे लानीं तबेॅ देबौ हम्में चूड़ी


 

भौजी हे भोरे से कौआ असगुनिया
बाबा रॅ फुलवारी पर बैठी केॅ
कत्तेॅ रं बोलै छै
मुँझरका, आदमी रं कैन्ह नी बोलै छै“

साँवरी आबेॅ साँसॅ के तारॅ पर झूलै छै
माय कत्तेॅ कबुलती सब देवॅ केॅ करी ऐलॅ छै
ओझा के कहला पर
पिंजरा में पकड़ी केॅ कौआ एक
साँवरी रॅ सामना में चौखटी सें टाँगलॅ छै
साँवरी के मॅन तॅन, जिनगी सब भाँगलॅ छै
पचास बरसॅ के पोसाखी पटोरी साड़ी केॅ
जेना धोवै में धोबिया में फाड़ी देलेॅ रहेॅ
राखलो नै जाय जेनां फेकलो ने जाय।

 

हेमन्त की तोंही छेका प्रीतम?

प्रीतम,
तोरे नांकी सुकुमार
सौम्य, शालीन आरो सुन्दर
शरद बीततैं, हेमन्त ऐलॅ छै
सच कहै छियौं पिया

लागै छै तोहीं ऐलॅ छॅ
आमॅ में आबेॅ लागेॅ लागलॅ छै
मंजर के कन्नी
नया-नया कोमल पत्ता
पिया! याद आबी गेलॅ छै

बसन्त पंचमी के ऊ दिन
बेलॅ के गाछी नीचेॅ में
तोरॅ चिट्ठी देबॅ
रहि-रहि मुस्कैबॅ
अबीर लैकेॅ हमरा गाली में घस्सी देबॅ
आय सब टा माथा में घूमै छै

प्रीतम!
तोरे नांकी सुकुमार
सौम्य, शालीन आरो सुन्दर
शरद बीततैं हेमन्त ऐलॅ छै
सच कहै छिहौं पिया
लागै छै तोहीं ऐलॅ छॅ
………………………….

कल रातीं
सपना में एक औघड़ देखलौं
सौंसे देहॅ में सिनूर पोतलॅ छेलै
कपारॅ पर त्रिपुंड लागलॅ
दोनों बड़ॅ-बड़ॅ आँख छेलै बन्द
ठोरॅ सें कुछकृू बुदबुदाबै छेलै
तप करतेॅ करतेॅ ओकरॅ देह हेने सुक्खी गेलॅ छेलै
जेनां काँटॅ
मतुर तहियो दमकै छेलै देह
कि हम्में ओकरा ठियाँ जाय लेली सजेॅ लागलियै
करेॅ लागलियै सिंगार कोन-कोन रं

-हेमन्त के हवा नें बहि-बहि
जोन ठोरॅ केॅ सुखाय देलेॅ रहै
ओकरा रसॅ में चुपड़ी-चुपड़ी
गुग्गुल अगरू के धूप हाथॅ में लै लेलियै
आरो जाब लागलियै
गोड़ बारी-बारी केॅ
कि तखनिये दिनकॅ गगललॅ कौआ
ई रात मंे भी गगली उठलै
बोलेॅ लागलै जोरॅ-जोरॅ सें

पूछला पर मुड़ी हिलाय केॅ ‘हों’ के उचारलकै सगुन
मतुर नीन टूटी गेलै
सोचै छियै,
ई हेमन्त आरो हेनॅ सपना?

 

नसीब

गरीबोॅ घरोॅ में लेलौं जनम गरीबिये में हम्में पललों
माई हे गरीबे घरो में होलोॅ ब्याह जनम बेरथ भेलोॅ

दिन भरी कुटौनी पिसौनी करौं तैहियो नै पेट भरी अन्न
माई हे सभ्भे दिन जल के फलार जनम बेरथ भेलोॅ

डयोढ़ी पर जाय छी आरो पहर रात वादे आबै छी
माई हे ओकरो में कोबोॅ भरी अन्न जनम बेरथ भेलोॅ

बाबू जी के डयोढ़ी पर भाोज भात हमरोॅ ऐंगनमा में हे
माई हे छोटोॅ छोटोॅ बुतरु बिलखै छै जनम बेरथ भेलोॅ

काँही पर धुपे धूप खांली काँही तेॅ छाया ही छाया
माई हे विधि के विधान की देखोॅ जनम बेरथ भेलोॅ।

 

साँझे सें तड़पतें भेलै भोर

साँझों सें तड़पतें भेलै भोर सुन हे सजनी
            साँझे सें तड़पतें भेलै भोर

सुनोॅ लागै छै दुनियाँ के कोना-कोना
पिया बिनां मुश्किल छै आबे हमरोॅ जीना
जेना कि मोर बिना मोरनी सुन हे सजनी

कारोॅ मेघ सौनोॅ के छै राहि-रहि ठनकै
आगिन भेलै बुन्दरी अंग-अंग झरकै
झिंगुर मचावै बड़ी शोर सुन हे सजनी

देखैै खातिर हुनका छै आँखी हठ ठानै
इंजोरिया-अन्हरिया यें कुछुवेॅ नै मानै
भींजी-भींजै आँखी केरोॅ कोर सुन हे सजनी

हमरे दरद लै केॅ कुहकै कोयलिया
हमरे लोर लै केॅ बरसै बदरिया
सुखी-सुखी काठ भेलै ठोर सुन हे सजनी ।

 

दुनिया के हम्में मालिक छेकां

दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो,
हमरै उपजैला पर देखोॅ, ऐठैं केना जहान हो।
दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो ।

हम्मीं उपजैलेॅ छी गेहूँ, हमरै मिलै नै रोटी हो,
के छेकै जें उपरे-उपर लै छै सब टा सोटी हो ।
हमरै निमुंहा पर बनै छै रोजे नया विधान हो
दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो ।

तिनका-तिनका दाना-दाना, हम्में भरै छी कोठी हो,
महगाई डायन आबी केॅ, लै छै सभ्भे समेटी हो ।
हम्में धरती ऊ पनशोखा, हमरे एक नीनान हो
दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो ।

छरछर घाम पसीना चुवेॅ, उपजैतें कुरथी-मेथी हो,
साहू के करजा में बिकलै, हमरोॅ सब टा खेती हो,
शहर डुबलोॅ हँसी-खुशी में, हमरोॅ मुख अमलान हो
दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो ।

छुच्छोॅ भाषण रोज सुनै छी, कहिया मिलतै तरान हो,
ठोरोॅ पर टंगलोॅ छै देखोॅ, हमरोॅ विमल परान हो ।
सभ्भे सब के मुँह देखै छै, के करतै नव निर्माण हो,
दुनिया के हम्में मालिक छेकां, हमरे नाम किसान हो ।

 

दिल्ली जे सब गेलै हो भैया

दिल्ली जे सब गेलै हो भैया, ऐलै न घुरियो फेरु रे जान ।
जान भूलिये रे गेलै, देलोॅ वादा-किरियो सब्भे रे जान ।।

छुछ्छे भाषण बांचै हो भैया, छुटलै देशोॅ के सेवा रे जान ।
जान बिसरी रे गेलै, गाँधी जी रोॅ देखलोॅ सपना रे जान ।।

जोॅर-जमीन सें नाता टुटलै, सरंगे उड़ै सेवका रे जान ।
जान बदली रे गेलै, सेवा केरोॅ सब दरसनमो रे जान ।।

सुनें, सुनें, सुनें हो भैया, गलती हमरौ-तोरौ में रे जान ।
जान जनतोॅ रे गलती, जीतै ठगि हमरा रे जान ।।

जाति-धरम हित झगड़ै हो भैया, झगड़ै भाषा लेली रे जान ।
जान भगता रे सपना, मांटी-मांटी मिली कानै रे जान ।।

 

भगीरथ के पीर बड़ोॅ होत

भगीरथ के पीर बड़ोॅ होतै
तबेॅ धरती पर गंगा एैली होतै ।

ई जे बहै छै खलखल पानी
केकरो आंखी के लोर बहलोॅ होतै ।

युग धर्म आरो कर्म के पहचान गंगा
सफल धरती के तपस्या होलोॅ होतै ।

देखोॅ करी कल्पना भगीरथ पीर के
ई युग नांकी ऊ बेपीर नै रहलोॅ होतै ।

पानी-पानी होल गेलोॅ छै आय गंगा
हमरा तोरा ई समझ कहिया होतै ।

 

ऐ देश तोरा सें की कहियौं

ऐ देश तोरां सें की कहियौं कतना हमरा प्यार छै,
आजाद देखौं रे सोनमा तोराअतना टा इकरार छै ।

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्खोॅ के निकलै एक्केॅ बोली ।
वाहे गुरु, अकबर, अली, या बजरंग बली ।
गली-गली, चैराहा सें, निकलै बांन्ही टोली ।
मित्र भाव सें मिलै वाला केॅ, देबै गुलाल मली ।
आय बताना छै हमरा, कहाँ कोनो तकरार छै ।
ऐ देश तोरा सें की कहियौं, कतना हमरा प्यार छै ।।

मरियम, सलमा या सुलतान कहोॅ, सुखबीर, कहोॅ या सीता,
गुरु ग्रंथ कहोॅ, कुरान कहोॅ, बाइबिल कहोॅ या गीता ।
भेद कहाँ तनियो केकरौं में, सबके एक्के सार छै,
ऐ देश तोरा सें की कहियौं, कतना हमरा प्यार छै ।।

 

अच्छा लागै छै 

रिमझिम-रिमझिम मेघ बरसबोॅ
अच्छा लागै छै।
झूमी-झूमी अपना में गाछोॅ के मिलबोॅ
अच्छा लागै छै।

कुंतल साजी छै मेघ गगन में,
जलतै नै कोय आय अगन में,
नाची रहलोॅ छै कृशक किशोरी
हर कोय छै आय मगन में।
कंुतल किसलय नांकी मेघोॅ के नाचवोॅ
अच्छा लागै छै।

दमक दामिनी के दमकवोॅ,
आपस में ओकरोॅ दाँत बजैवोॅ,
घन बीच धहरबोॅ आरू गरजबोॅ,
हरिहर धरती केॅ रौशन करी केॅ
मुसलधार शतधार बरसवोॅ
अच्छा लागै छै।

कखनूं लरजी केॅ, कखनूं थमकी केॅ
कखनूं झमकी केॅ, कखनू छहरी केॅ
लागै बरसा बरसी रहलोॅ छै,
ठुमकी-ठुमकी केॅ, छहरी-छहरी केॅ।
एैन्हां में पिय साथ रातभर जागी केॅ रहबोॅ
अच्छा लागै छै।

 

सोचै छै बुधना माय

की कहिये हो, केकरा वोट दियै
सोचै छै बुधना माय।
पैंसठ-साठ बरस बितलै
सबके सब लूटै में रहलै,
बात विकास के झूठे पिहानी
युग छाती पर धरलोॅ राजा-रानी,
मारै छै सांग धसाय
कानी-कानी सोचै छै बुधना माय।

झग्गड़ नांकी नै सुलझै वाला ई बात,
छुछ्छे भाशण सुनी-सुनी काटै छी दिन-रात।
मिंया-मोमिन, पंडित-मुल्ला सब ठो ओकरे राजी,
गेलोॅ छै ओकरे पीछू डलिया भर माला साजी।
माघोॅ के पाला गेलोॅ छै, हमरोॅ अंग समाय
कानी-कानी माथोॅ धुनै छै बुधना माय।

वोटोॅ नै देलियै तहियोॅ, धोछा जीती आवै छै
करम साँढ़ ई नागे जैसनों, आगू में फुफआवै छै।
कल चुनाव छै पैसा लैकेॅ ऊ घुरै छै आय,
छौड़ा सबकेॅ की होलोॅ छै ? गेलोॅ छै उधियाय
आगू नाथ नै, पीछू पगहा, टेवी मारौं छड़ी रिंगाय
महंगाई के मारोॅ सें, हँफसै छै बुधना माय ।

भाशण पर टिकलोॅ ई देश गजब छै,
पैसा पर बिकलोॅ देशोॅ के लोग अजब छै।
गैया भुखोॅ सें डिकरै, नै छै दाना पानी,
गली-गली छौड़ा घुमै, झूठेॅ के बबुआनी।
लागै नै छै ओकरा हमरी, गैया केरोॅ हाय
बुक्का फाड़ी, छाती पीटी, कानै बुधना माय।

बरस पाँच सरकार बनै छै
रोजे-रोज चुनाव,
राज-काज जनहित की करतै
खाली खेलै दाव।
लहुवोॅ सें लिखी ताकै छै, हम्में रोज सरंग
हाय शहीद के सपना टूटलै, रहलै कहाँ उमंग।
सब गुड़ गोबर, नै छै कोनोॅ उपाय
विवश बेचारी चौखट लागी, सोचै बुधना माय।

 

 

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