अनिल अनलहातु की रचनाएँ

मानवीय पीड़ा का ज़िगुरत

हमारे बहुत पहले उठने के
बहुत पहले उठ जाती है,
ताकि खलल न पड़े
हमारे आराम देह सपने रहें
सुरक्षित।

आधी नींद व विच्छिन्न स्वप्नों की
कातरता लिए,
पानी के सूखे नल, हैण्डपम्प
और जूठे बर्तनों से
उसने कर ली है गहरी पहचान।

उसकी उदास भाव हीन आँखें पीछा करतीं
व्यस्ततम क्षणों में भी,
मानवीय पीड़ा का इतिहास
ज्यों फूली हुई लाश
रिगोबेर्टा मेंचू (2) की
फैली हो ग्वाटेमाला से एंडीज तक,
दुमका-गोड्डा के आदिम जंगलों से
हमारे घरों के शयन-कक्ष तक।

रोने और न रोने के बीच का
पथराया आर्तरूदन पसरा है


लू
मूर्मू ।

अपने बोझील एकाकीपन और
निरीह तन्हाईयों में
वह एक ख़ामोशी से चलकर
दूसरी ख़ामोशी तक पहुँचती।

उसके त्रासद सपनों में
कोई राजकुमार नहीं आता।

सिले हुए होंठों, खौफजदा बरौनियों
उदास लम्बोतरे चेहरे पर चिपकी
अवश बेबसी व बेकली के बीच भी
ज़िन्दगी जीने की एक गहरी ललक
(हम विस्मित थें) ।

वह भाषा मतलब आदेश
और
शब्दों को
कुत्तों का कटखनापन समझती।

उसके होठों पर हँसी देखना
एक लंबा और उबाऊ इंतज़ार है।


 

 
सन्दर्भ (1) ज़िगुरत: 2100 ईसा पूर्व (B.C.) में मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) के “उर” शहर में राजा ‘उर-नाम्मु’ द्वारा निर्मित “सिन” (चन्द्रमा) देवता का मंदिर। हज़ारों वर्षों तक पुराने मंदिर के मलबे पर नए मंदिरों का निर्माण होता रहा । इस तरह हर नया निर्माण पुराने के विध्वंस पर खड़ा होता रहा ।यह भी नोट करने लायक है कि इस मंदिर में पुजारिन राजा की बेटी होती थी।
 (2) रिगोबेर्टा मेंचू: नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त लैटिन अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्त्री।

 

खुद के विरोध में 

क्यों होता है ऐसा
जब आदमी उठ खड़ा होता है
खुद के ही विरोध में,
 
जब उसे अपनी ही सोच
बेहद बेतुकी और भौंडी
लगने लगती है?

क्यों होता है ऐसा
जब आदमी
सुबह की स्वच्छ और ताजी हवा में
घूमने के बजाए
कमरे के घुटे हुए, बदबूदार सीलन में,
चादर में मुँह औंधा किए
पड़ा रहता है?

क्यों होता है ऐसा
जब आदमी साँपों की हिश-हिश
सुनना पसंद करने लगता है?

आखिर वह कौन-सी
प्रक्रिया है
जो उगलवा लेती है
शब्द उससे
खुद के ही खिलाफ़?

क्यों वह विवश हो जाता है
साँप की तरह
अपना केंचुल छोड़ने पर?

आदमी की आखिरी छटपटाहट
कसमसाकर
आखिर क्यों तोड़ती है
अपने ही बनाए
मर्यादा-तट को,

भागता है वह
अपने-आप से ही
गोरख (1) की हताशा लिए ।
आ क्यू (2) की उझंख
नीरवता में।

                    •  


 
सन्दर्भ:
(1) हिन्दी कवि गोरख पांडे संदर्भित है।
(2) चीनी कथाकार लु शुन की कहानी “आ क्यू की सच्ची कहानी” का नायक।

 

अजान के पहले

मेरे भीतर से चलकर
वह मुझ तक आया
और एक जोर का
तमाचा लगाकर
चलता बना।

मैं अवाक्, हतबुद्धि, फ़ालिज सन्नाटे में था,
कि मेरी आस्थाओं की नग्नता देख
वह रुका
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
औ’ आशंका और संभावनाओं
के चंद टुकड़े
उछालकर मेरी ओर
चला गया।

स्मृतियों के जंगलाती महकमें से
निकल तब
एक-एक कर चले आते
और बैठते जाते,
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ो पर पंक्तिबद्ध
यहां से वहाँ
जंगल से लेकर गाँव के सिवान तक।

और शुरू हो जाती अंतहीन बहसें
सुबह से रात और रात से सुबह तक।

तबतक जबतक मंदिर की दरकी दीवारों के पार
गर्भ-गृह के सूनेपन में सिहरता ईश्वर
कूच न कर जाता
और मस्जिद से आती
अज़ान की आवाजों में
खुदा ठहर-सा जाता।

 

एक गुमनाम चिट्ठी 

एक गुमनाम चिट्ठी बहुत दिनों से भूले एक मित्र के नाम

प्रिय भाई सात्यायन
आज अचानक ही वह भड़ुआ दिखा
पूरे दस सालों के बाद
(आई एस एम के कैम्पस में)
जो हमें
मार्क्सिस्ट इकोनोमी के
बरक्स कैपीटलिस्ट इकोनोमी को
बेहतर बताता
आहिस्ता–आहिस्ता
न जाने क्यों
पर अवश्य ही
मार्क्स के पक्ष में चला जाता।

कभी नहीं लिए
जिसके नोट्स हमने,
और जिसके ऐनक के ठीक नीचे
वाल्टर मोंडेल की पुस्तक से
जिंदगी की नकल की।

क्या वाकई उसके ऐनक
का नंबर इतना ज़्यादा था?
या नामालूम किस दुख में
मुब्तिला वह
जिंदगी को देखने से करता रहा
इंकार।

पूरे एक दशक बाद
आज वह
अधेड़ और बूढ़े के बीच का
कामरेड दिखा,
ठीक पोस्ट ऑफिस के सामने
उन्हीं थके कदमों,
बढ़ी हुई बेतरतीब दाढ़ी
और झुर्रीदार वजूद को घसीटते।

जिससे पहले पहल हमने
ठीक एक दशक पहले
पढ़ी थी
जिंदगी की किताब
 “मदर” और “हिस्टोरिकल मैटीरियलिज़्म” ,
वह हँसा …और “लेट मी डाइ नेचुरल डेथ”
मार्क्स के पन्नों से
उसकी ज़िन्दगी तक पसर गया।

दिखता है मुझे
इस शहर का ‘तीसरा आदमी’
एक माफिया लेखक,
जिसकी बेलौस हंसी
हमेशा की तरह मुझे
आदमी के आदमियत के प्रति
सदा आश्वस्त
करती रही है,

और
जो मुझे आदमियों के जंगल में
न आने की सलाह देता हुआ
खुद न जाने किस जंगल में
गुम गया था।

अब मैं मिलना चाहता हूँ
इस शहर के एकमात्र कवि से
जिसके चेहरे की मुर्दनी और बासी उबासी
खासा कुख्यात रही है,
चर्चे में जिसके ‘विग’ और ‘थर्टी प्लस’ भी
प्राय: छाए रहते।

और अब मैं खड़ा हूँ
इस शहर के मुख्य चौराहे पर
गांधी की मूर्ति के ठीक सामने
दीवार की ओट लेकर
मूत रहा हूँ और
अपने पेशाब के पीले पड़ते जाने पर
बिल्कुल भी चिन्तित नहीं हूँ
एम्मानुएल ओर्तीज़ (1) की तरह।


 


सन्दर्भ: (1) एम्मानुएल ओर्तीज़–मशहूर कविता “कविता पाठ से पहले एक मिनट का मौन” के मेक्सिको-पुएर्तो रीको मूल के युवा अमरीकी कवि। इस कविता का हिन्दी अनुवाद असद जैदी द्वारा किया गया है।

 

खोई हुई औरत 

रात के उस हल्के सांवलेपन में
वहाँ उधर, बेगमपेट काजीवे के
बस अड्डे के कोने में
एक औरत
गुडमुड़ियाई लेटी है,
और कुछ कुविचार उछल रहे हैं
हवा में लहराते हुए.
इस नंगे हमाम में
मैं अपने ही बारे में सोचता
अपनी विकृत सोचों पर
मूत रहा होता हूँ।

बहुत पहले रात्रि की गहन कालिमा में
एक रात
उठती है वह औरत हौले–से
और चिर निद्रा में डूबे गावों से
बहिरागत, किसी दूर के
शहर–शहरात में निकल जाती है।

किसी उजाड़ टीले पर लगे
बबूल की झाड़ियों से
एक फूल सूखकर गिर पड़ता है,
और मैं अपने दुःस्वप्नों के
मकड़जाल में उलझा
शहर की मुधि तक
जाकर लौट पड़ता हूँ।

वह औरत जो गाँव से
बाहर
किसी शहर–शहरात की ओर
निकल पड़ती है,
दिखती है मुझे
बेगमपेट काजीवे के किसी
वीराने बस स्टेशन के कोने में
गुडमुड़िया कर सोई हुई है।

लैम्प-पोस्टों के नीम अंधेरे में
मैं जाता हूँ दूर…
किसी नखलिस्तान की तरफ
और एक सूने, वीरान पड़े
बौद्ध मठ में
एक शिशु को
रोता हुआ पाता हूँ।

वह औरत
सुबह होने की यंत्रणा में
घुटती हुई
उठती है और
शहर की घुमावदार
भूल–भुलैया गलियों की
भीड़ में
खो जाती है।

दिन के तीसरे पहर तब
थका–मांदा, लड़खड़ाता
लौटता हूँ मैं
और अपनी ही बनाई
घृणा की ज़मीन पर
अपनी लाश बिछाकर
सो जाता हूँ।

 

चीख के पहले

और इसके पहले कि
सबकुछ खत्म हो जाए
सदा के लिए,
और तुम्हारे भीतर के
अंधेरे में डूब जाए.
मैं तुम्हारे अंदर के
आक्रोश को सुरक्षित
रख लेना चाहता हूँ
शीशे के चमकते जार, मर्तबान में
या किसी संग्रहालय की
अंधेरी दराज़ में।
ताकि देख सकें
आनेवाली पीढ़ियाँ
कि गुस्सेवर आदमी की
आखिरी चीख
कितनी सतही, खोखली और
हास्यास्पद होती है।

 

शब्दों की बाज़ीगरी

वे शब्दों की जो बाज़ीगरी
दिखा रहे थे,
वो मैं समझता था ।

शब्दों को
झूठ के माँजे से रगड़कर
उन्होने एक कविता नाँधी
और छोड़ दिया उसे अनन्त में
एक पतंग की तरह ।

वे फिर वापस आए
और शब्दों का टोटा पड़ जाने का
रोना लेकर बैठ गए ,
हाथ मलते हुए उन्होने
पछताते हुए से
कुछ तिस्कृत शब्दों को
तीन नीम्बुओं या पाँच टोपियों की तरह
नचाते हुए
जादू दिखाने लगे ।

शब्द जो कभी ‘पाश’ की
ऊबड़-खाबड़ कविताओं से
चले थे,
आकर एक रेशमी मसहरी में
क़ैद हो गए हैं
एक छद्म बौद्धिक व्यक्ति के
पीठ की खुजलाहट
मिटाने वास्ते ।
                                                                                                                                                   जहां शब्द
अपने ही अर्थ से
व्यर्थ हो जाते हैं ,
उन्हीं शब्दों की तस्करी कर
वे आज पूजनीय बने हुए हैं
और इस अकड़ में
गर्दन टेढ़ी कर
भाषा को किसी ‘कीप” की तरह
इस्तेमाल करते हैं,
 
भाषा जो उनके
भावी सुसज्जीत कमरे मे
पोंछा मारती दाई है ,
शब्द जो उनके फेंके
जूठन खाते
आवारा बच्चे हैं ,
उन्हें वे बड़ी होशियारी से,
सावधानी से चुनते हैं
कुछ इस तरह से
कि उन्हें कविता की बिछावन पर
सजा तो सकें
पर धूल गर्द से भी
बच जाएँ ,

और फिर
यह साबित करने के लिए
कि वे भी खेले हैं
धूल और गर्द में,
वे राह चलते
किसी फटीचर शब्द से
माँग लेते हैं एक बीड़ी,

और फिर
अपनी ही दृष्टि में आत्मविमुग्ध हो
हुचुक-हुचुक कर हंसते हैं,
और ‘धूमिल’ की भाषा मे
‘तिक है – तिक है ‘ कहते हैं ।

शब्दो का यह जो नेटुआपन
आप खेल रहे हैं,
यह आपको महँगा पड़ेगा
क्योंकि आजकल कुछ
विद्रोही शब्द भी चलन मे आ गए हैं ,
जो आव न ताव देखते हैं
और किसी मँचासीन भाषा के दलाल के
मुंह पर पिच्च से
थूक देते हैं ।

 

कुहरे-कुहासों का देश

क्या आपको नहीं लगता कि
यह पूरा देश कुहरे
और कुहासों से भरा है ?

यहाँ हर चीज़
अस्पष्ट और धुन्धली
दिख पड़ती है,
क्या आपको नहीं लगता कि
यहाँ के लोग इसी धुन्धलेपन के ‘शिकार’
अभ्यस्त हैं,
यहाँ हर चीज़
एक पारभासक शीशे में
क़ैद है ?

क्या आपको नहीं लगता कि
यह भैंगी चिपचिपी आँखों वाले
लोगों का देश है,
कि यहाँ के लोग
आधी-अधूरी चीज़ों को
देखने के अभ्यस्त हैं ।

क्या आपको नहीं लगता कि
चीड़ और देवदार के ये
लम्बे और चिकने पेड़
और सुन्दर, अच्छे लगते
यदि यह कुहरा-कुहासा हट जाता ।

क्या आपको नहीं लगता कि
आप अन्धों के संसार में आने वाले
नुनेज़[1] हैं
कि उजाले की दुनिया के बारे में बताना
एक निहायत ही बेतुकी और बेहूदी बात थी
कि आपकी भी
आँखें निकालने का सुझाव था
ताकि आप भी इनकी ही तरह
कुहरे और कुहासे को
अपनी ज़िन्दगी में उतार लें ।

 

भूल-ग़लती

मेरे भीतर से चलकर
वह मुझ तक आया
और एक ज़ोर का
तमाचा लगाकर
चलता बना ।

मैं अवाक्, हतबुद्धि, फ़ाजिल सन्नाटे में था,
कि मेरी आस्थाओं की नग्नता देख
वह रुका
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
औ’ आशंका और सम्भावनाओं
के चन्द टुकड़े
उछालकर मेरी ओर
चला गया ।

स्मृतियों के जँगलाती महकमे से
निकल तब
एक-एक कर चले आते
और बैठते जाते
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ों पर पँक्तिबद्ध
यहाँ से वहाँ
जँगल से लेकर गाँव के सिवान तक,
और शुरू हो जाती अन्तहीन बहसें ।

सुबह से रात और रात से सुबह तक
तब तक, जब तक
मन्दिर की दरकी दीवारों के पार
गर्भ-गृह के सूनेपन मे सिहरता ईश्वर
कूच कर जाता है और मस्जिद से आती
अज़ान की आवाज़ों में
ख़ुदा ठहर-सा जाता है ।

 

भारत छोड़ो आन्दोलन 

यह उस समय की बात है
जब लोगबाग अपने चेहरे को
गर्दन से हटाकर
अपनी हथेलियों में रख
भय और आश्चर्य से
घूरा करते थे ।

एक आदमी
जो दो शून्यों को जोड़ कर
अनन्त (00) बनाया करता था,
अचानक ही उन शून्यों को
एक के ऊपर दूसरा रख
एक खोखला ड्रम बना
उसके भीतर बैठ
लुढ़कने लगा ।

यह वह वक़्त था
जब लोगबाग
आपस में बातें करते
एक-दूसरे के पैर नहीं देखा करते थे,
यह वह शानदार और बहादुर वक़्त था
जब कुछ सनकी और कूढ़मगज नौकरशाह
जनतन्त्र की कमोड पर
नैतिकता से फ़रागत हो रहे थे
एक आदमी अचानक ही कहीं से
चीख़ता हुआ आया
और ’मुक्तिबोध’[1] की खड़ी पाई की
सूली पर लटक गया ।

यह कतई ’मुक्तिबोध’ की
ग़लती नहीं थी
क्योंकि पूरा देश ही
’पाई’ और ’खाई’[2] के नाम पर
बिदका हुआ था
बूढ़े बुड़बुड़ाते सुअरों की तरह
पास्कुआल दुआर्ते[3] के
छोटे अबोध भाइयों के
कान चबा रहे थे,

और बड़े चोली के पीछे छुपे[4]
सत्य को पकड़ लेने को बेताब थे
जबकि युवाओं की एक लम्बी कतार
’धूमिल’ के स्वप्नदोषों से लेकर
’गोरख पाण्डे’ की दालमण्डी[5] तक
पसरी पड़ी थी,
और मैं था कि
लगातार अपने आप से भागते हुए
फिर-फिर अपने तक ही
पहुँच रहा था ।

भागने और फिर भी
कहीं नहीं पहुँचने की यह लम्बी दास्ताँ
शायद
उधार मे मैंने
अपने बाप से ली थी
जो लगातार ग्रामोफ़ोन पर
उदास, तन्हा और ग़मगीन गाने सुनता रहा
और श्मशान को
शहर से बाहर कर देने का
सुझाव देता रहा
कुछ ’रघुवीर सहाय’ की कविता
की इस पँक्ति के तर्ज पर कि
’कल मैं फिर एक बात कहकर बैठ जाऊँगा’[6] ;

कहने और फिर बैठ जाने के बीच के
फासले को वह
’विनोद कुमार शुक्ल’ के
’बड़े बाबू’[7] की तरह
नौकर की फटी कमीज़ की भाँति
जतन से तहिया कर
रख दिया करता था,

यद्यपि वह अपनी उम्र के दस के पहाड़े
के उस पड़ाव पर ही था
जब हॉलीवुड की हीरोइनें
अपने जवान होने का ऐलान
करती हैं,
वह अपनी मौत से कई-कई बार
गुज़र चुका था
अपने कन्धों पर उसने
कई-कई लाशों के वजन
सहे थे;

वह टूटता जा रहा था
…………………
…………………
और मै ………..

कि ठीक इसी वक़्त मुझे
मेरे उस दोस्त ने
बचा लिया था
जो तब बम्बई मे था
और उस आदमी के बारे में
बताता रहता था
जो बाम्बे वी०टी० की भीड़ भरी सड़कों पर
कुहनियों एवं टखनों से
अपने लिए जगह बनता चलता था,

वह स्तब्ध था
और मैं…….
पटना के तारघर की मेज़ पर
किसी ’अजनबी’[8] द्वारा लिखित
अपनी सुईसाईड नोट का
टेलीग्रामी मज़मून
पढ़ रहा था

लेकिन ठहरें, क़िस्सा यहीं ख़त्म
नहीं होता
(जैसे ख़त्म नहीं होती कोई कविता)
अपार भीड़ के
उस निर्जन सूनेपन मे
वह कई-कई बार
अपनी मौत की सण्डास पर
जाकर मूत आया था
(यद्यपि यह तय है कि कुछ भी तय नहीं है )
फिर भी यह तय है कि वह बहुमूत्र रोगी नहीं था

यह तो उसने बाद में बताया
तब मैं
इतिहास की पुस्तकों में उलझा
’उपालि’ और ’आनन्द’[9] से
ज़िन्दगी का पता पूछ रहा था,
उस ज़िन्दगी का
जो किसी अमीर के ऐशगाह मे लेटी
जनतन्त्र और समाजवाद के
ख़्वाब देखा करती थी
और मैं था कि …….
…………………….
लगातार
लगातार
इतिहास की पुस्तकों
मे खोया………

और आज़ादी मिलने के
बयालिस साल बाद
मुझे यह पता चला है कि
दरअसल वह
’क्विट इण्डिया मूवमेण्ट’ था
जिसे मैं आज तक
’भारत छोड़ो आन्दोलन’
समझ रहा था

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें गजानन माधव मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता ’अन्धेरे में’ में उल्लिखित ’खड़े पाई की सूली’ के सन्दर्भ में
  2. ऊपर जायें मण्डल एवम् कमण्डल आन्दोलन के सन्दर्भ में
  3. ऊपर जायें महान स्पेनी उपन्यासकार ’कामीलो खोसे सेला’ के नोबेल पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ’पास्कुआल दुआर्ते’ के परिवार का मुख्य पात्र, जिसके छोटे भाई का कान सुअर चबा गया था।
  4. ऊपर जायें एक मशहूर तात्कालिक हिन्दी फ़िल्मी गीत
  5. ऊपर जायें बनारस का वेश्यालय
  6. ऊपर जायें रघुवीर सहाय की कविता की पँक्ति
  7. ऊपर जायें विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास “नौकर की कमीज़ “ का मुख्य पात्र
  8. ऊपर जायें अल्बैर कामु का उपन्यास “ल स्ट्रैंजर”
  9. ऊपर जायें बुद्ध के पट्ट शिष्य,आनन्द बुद्ध का भतीजा था एवम् उपालि कपिलवस्तु का एक नापित था, बुद्ध की मृत्यु के बाद प्रथम बौद्ध सँगिति मे आनन्द एवम् उपालि ने त्रिपिटक ग्रन्थों में से दो पिटकों क्रमशः “सुत्तपिटक” एवं “विनयपिटक” को संग्रहित किया।

 

दिगम्बरा पाताचार 

तीन वर्ष की एक काली नंगी
“हो” लड़की खड़ी है,
घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच
उगे कुकुरमुत्ते जैसे
इस बस्ती के एक छोर पर,
हाथों में लिए / देखती
शाल (साल) के एक गिरे
बड़े पत्ते को।

शाल के लम्बे चुप डोलते पेड़
बिखरती पत्तियां,
उदासी बरसाता, वीरान माहौल
पुट्ठों तक कटी पूंछ
डुलाती अशक्त निरीह गाय।

अप्रैल के इस उजाड़ महीने में
दरकी दीवारों के पार
शाल वनों के झुरमुट में
रोता हुआ मैं।

पचरी नाले के उस पार
जीवन के कुछ आदिम अवशेष,
वह लड़की मेरी घनीभूत पीड़ा की
दारुण प्रतीक।

“सब्बं दु:खं” कहा उसने
और अनाथपिंडक उठकर
चला गया सदा के लिए
शाल वनों के पार।

मेरे पैरों के नीचे
चरमरा रहे
शाल के सूखे पत्ते,
उस ठूंठ पर बैठा
वह कौन?

अधूरी कविताओं के ढेर से निकला
नियनडरथल मानव तब चुपचाप
बेहिस्तून अभिलेख में पढ़ रहा
मानवीय पीड़ा का इतिहास।

ज़िगुरत के पश्चिम
नन्नार की पहाड़ी पर,

इक्कीसवीं की नियति
प्रोटो टिथीस के पथरीले प्रान्तर में
घुटनों के बल घसीटती
रेंगती है
अश्वत्थामा की तरह।

साँझ के झुटपुटे में
शाल वनों के झुरमुट में
कौन है वह
जो चला जा रहा सदा के लिए,
सारे संसार को
अमरता का पाठ पढ़ा
खुद निपट अकेला?

                •  


1 । दिगंबरा पताचारा-बुद्ध के समय की एक स्त्री जो दुर्घटना में अपने पति, दोनों बच्चों को खो देती है, श्रावस्ती में उसके माता पिता भाई भी जीवित नहीं रहते, घर भी टूट जाता है ऐसे समय जेतवन में बुद्ध उसे दीक्षा देते हैं।

 

वायरस 

“कहीं कछु आही की ना आही”—-कबीर
‘कहीं कुछ है या नहीं’ , पूछा उसने
ईश्वर से।
ईश्वर मौन रहा,
उसे बुद्ध याद आये
और उनका मौन याद आया।

वह शौपेनहावर की कुतिया तक गया
और पुछा, ‘आत्मा (1) कौन है?’
शौपेनहावर मौन है।
चीखता है अहूरमज़्दा (2)
की ईश्वर एक मौन है।

आँखों में उतर आये
मोतियाबिंद की पारभासक रोशनी में
पूछता है वह मोहम्मद से
नन्नार की पहाड़ियों पर
अल्लाह कौन है?
मोहम्मद मौन है।

स्टीफेन हाकिंग की
इलेक्ट्रो-यांत्रिक आवाज़ में
फुसफुसाता है तब डार्विन
कि ईश्वर एक वायरस (3) है।

प्रतिकुल परिस्थितियों में मृत पड़ा ईश्वर
वायरस की तरह
अचानक ही सक्रिय हो उठता है
हमारी शिराओं के खून की अनुकुलता में।

वक्र हँसी हँसता है मिखाइल गोर्ब्याचोव।
“ईश्वर के ताबूत में
ठोके गए उसके आखिरी कील को
निकाला किसने”–पूछता है नीत्शे।

और उसके पैंतालिस वर्षों बाद
दुनिया को बदल देने की ग्लासनोत्सी अवधारणाओं में कैद
एक पूर्व कम्युनिस्ट
ईश्वर को निकालता है ताबूत से
और वायरस की भाँति
छोड़ देता है मिडिल-ईस्ट में।

किसी भी किस्म की सत्ता द्वारा स्थापित
जीवन एवं ज़िंदगी की अनिश्चितता और
मृत्यु की अनिवार्यता के बीच
ज़िंदा है और रहेगा ईश्वर।


 


सन्दर्भ
(1) शॉपेनहावर ने अपनी पालतु कुतिया का नाम ‘आत्मा’ रखा था, यहाँ वही संदर्भित है।
(2) अहूरमज़्दा-चौथी-पाँचवीं शताब्दी पूर्व बेहिस्तून अभिलेख में उद्धृत जोरोस्ट्रियनिज़्म धर्म में अवेस्ता भाषा में ईश्वर या creator का नाम।
(3) जीवित और मृत के बीच की कड़ी है वाइरस। प्रतिकूल परिस्थिति में यह सालों मृत पड़ा रहता है किन्तु अनुकूल परिस्थिति के मिलते ही यह हज़ार वर्षों के बाद भी तुरंत जीवित हो उठता है।

 

बाघबहादुर

जीवन की अधखुली आँखों का
उथला स्वप्न,
जो एक धुंध भरे कोहरे से निकल
दूर कहीं
ख़ामोशी के अबूझ कुहासे में
लिपट रहा हो।
 
और ऐसे में
मस्तिष्क के किसी अज्ञात कोने में
चिलकती हों चिंता की
पारानोइयाँ, चीखती हों
सुदूर खड़े भाप इंजन की
सीटी की तरह।

जब अपने ही बिस्तर पर
पड़ा आदमी
अपने से अनभिज्ञ हो रहा हो,
सब कुछ जैसे एकाएक
एक ही साथ ठहर
गया हो
परम विराम में
फ्रिज़्ड, स्टिल …जड़,
भयार्त खामोशी, सहमा सन्नाटा
स्तब्ध रोशनी।

कि एकाएक अचानक
फूट पड़ता है कहीं
मानस के किन्हीं भीतरी प्रकोष्ठ में
तेज़ रोशनी का एक धमाका,

सैलाब उमड़ पड़ता है,
और पड़ती है थाप ढोलक पर
फेंकना की उँगलियों की
ढम …ढमा …… ढम …
तेज़ से तेज़ और तेज़ … तेज़
होती ही जा रही


न … न…नहीं
एक झटके में मैं
अपने भीतर से बाहर आता हूँ
और चल पड़ता हूँ
अपनी तलाश में।

जिंदगी की ऊंची–नीची पगडंडियों
खलिहानों से गुजरता
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी
मेडों से होकर
जा पहुंचा वहाँ,
जहां चल रहा
जीवन-अस्मिता
का अंतिम संग्राम।

अपराह्न की बोझिल थकी
तिरछी किरणें,
निर्जन पठार का उदास सूनापन
कस रहा,
सबकुछ बिखरा–बिखरा-सा
छितराया सेमल के रुई की भांति
उफन रहे आदमियों का जनसमुद्र
कि दाखिल होता है “बाघबहादूर”
जीवन अस्मिता के
जंगल में आज।

उँगलियाँ थिरक उठतीं हैं
फेंकना की
और ढोलक की थाप
गूंज उठती है
दूर दूर तक
दूर जंगलों, पहाड़ों, पठारों के
रेतीले वन प्रांतर में।

साँझ से धूमिल पड़ी बस्तियों, गाँवों
झोपड़ियों के गिर्द
कसते सन्नाटे के बीच,
कालाहांडी के इस
निर्जन, जनशून्य
वन–प्रदेश मे,
एक आदमी के होने
उसकी अस्मिता
कि लड़ी जा रही अंतिम लड़ाई.

जहां कोई तुमुल-नाद नहीं,
कोई रणभेरी नहीं,
नगाड़े नहीं, चारण और भाट नहीं,
बस फेंकना है और
फेंकना के ढोलक की थाप है
जो गूँजती ही चली जा रही
वन-प्रांतर, प्रदेशों की सीमाएं लांघते
 (क्या क्षितिज तक?)

भुजाएँ फड़क रहीं हैं
ज़िंदगी साँसे थामे खड़ी है
 (मौत तो एक वहमों-गुमाँ है)
कि आज तो फैसला होना ही है।
जीवन अस्मिता कि खोज अंतिम
या मृत्यु (का वरण)
व सामने खड़ा है
आदिम बर्बरता
का अंतिम प्रतीक
रेड जगुआर!

अपनी खोई हुई अस्मिता को
तलाशता
अभी पहुंचा ही था,
कि घूमता है समय का
प्रार्थना–चक्र बड़ी तेजी से
वर्तमान की संकरी घूमावदार
गलियों से निकल
जा पहुंचता हूँ
सुदूर अतीत में।

‘चिक़ेन–इत्ज़ा’ के खंडहरों में,
भग्न आस्थाओं के ध्वंसावशेष
मलबों में,
बिखरे स्मृतियों के ईंट-पत्थरों में
में ढूँढता, कहीं कुछ मिल जाए कहीं
जो जोड़ सके मुझे,
अपनी पहचान दिला सके
कि दिखा मुझको…
वो… उधर… रेड जगुआर.

महान मयन सभ्यता
की उत्कट जिजीविषा का
प्रतीक वह
रेड जगुआर.

कि सुन पड़ती है
अस्पहानी घोड़ो की पदचाप,
सफ़ेद झकझक पंक्तिबद्ध घोड़ों की
प्रचंड हिनहिनाहट और
आदमियों की चित्कार।

जीवन को बचाने की
उसकी यह अंतिम कोशिश
कि यहीं कहीं होगा ज़रूर
बाघ बहादूर।

कि चल रहा हो जहां कहीं
जीवन को बचाने का संघर्ष
कि वहीं मिलेगा, मिलेगा वहीं
एक पौराणिक गाथा बन
लोगों के अवचेतन मे
बाघबहादूर, बाघबहादूर …

कि दिखा मुझको
निकल चिक़ेन–इत्ज़ा के खंडहरों से
मन-प्रदेश के बीहड़ जंगलों में
घूमता,

बैठा कहीं, जीवन संध्या के
गमगीन मटमैले में,
नदी के कछार पर,

कि संध्या-बाती करने आती
औरतों के उदास गीतों में
गाथा बन, प्रतीक बन
एक मिथ हो गया है
बाघबहादूर।
 
जब दुःस्वप्नों का पहाड़-सा टनों बोझ
छाती को दरकाता है,
चिलकाता है,
जब अपने को ही खोजता
भटकता जाता हूँ मैं,
साँची-भरहुत के स्तूपों से
अमरावती तक,

चिल्ला ही पड़ता हूँ
एकबारगी तब,
बड़े ज़ोर से
बाघबहादुर…हो… बाघबहादूर…
कहाँ हो तुम बाघबहादूर?

संध्या ढल चुकी है,
मौत का स्याह-सन्नाटा
व्याप रहा है / बिचर रहा है हौले-हौले।
खून की एक मोटी धार
बर्बर पाशविकता के पंजों के पास से
बहती जा रही है
नीचे पठारी ढलानों पर…

बाघबहादूर मरा पड़ा है।

इस निर्जन
जनशून्य टीले पर,
और फेंकना की अंगुलियों की थाप
पड़ रही है
ढोलक पर लगातार,
एक विचित्र उन्माद में है
फेंकना आज।

आँखों में ललाई छाई हुई
ढम ढमा …ढम… ढम… ढम…ढम…ढम …
अंगुलियों की थाप

पड़ती ही जा रही है
पड़ती ही जा रही

ढोलक पर
आज फेंकना नहीं रुकेगा।

लोग बाग निकल पड़े हैं
अपने–अपने घरों से,
फेंकना आज नहीं रुकेगा
न रुकेगा
गूँजती ही जा रही है
उसके ढोलक की थाप निरंतर
गलियों, खेतों-खलिहानों,
गांवों को पार करती हुई
नदी–नालों, नगरों से
होती हुई …

देश और महादेश की सीमाओं का
अतिक्रमण करती

आदमी और पशुता की
इस लड़ाई में
क्या बाघबहादूर हार गया?
क्या सचमुच?

 

अफ़्रीका

हमारे समय के एक बहुत बड़े कवि का
यह कहना कितना खतरनाक है कि
“ वे पेड़-पौधों की भाँति चुपचाप
जीने वाले सीधे लोग हैं …
………………………..
………………………..।
यह
एक पूरी की पूरी जाति
मानवता, सभ्यता को
क्या जंगल में
तब्दील कर देना नहीं है ?

एक पूरे महादेश को,
जहाँ पर मानव (होमो-इरेक्टस) का
सर्वप्रथम विकास हुआ,
अन्ध महादेश घोषित
किया जाना कौन सी
सभ्यता है ??

एक समूचे महादेश को
उसकी भाषा से वँचित कर देना
क्या अपराध नहीं है ?

है न यह अजीब बात
कि दुनिया को सभ्यता का पाठ
पढ़ाने वाले महादेश को
चार सौ सालों से ग़ुलाम रहे देश
का एक अदना-सा कवि जुबान दे
 
उसे बताए कि भाषा की तमीज़
क्या होती है !
कि भाषा बुद्ध या ईसा का दाँत नहीं
कि उसपर तुम खड़ा कर सको
अपनी श्रेष्ठता का स्तूप ।

 

बाबरी मस्जिद-1

“रव्बना ज़ल्मना अन्फुसना वइन लम्नग फिलर्ना
वतरहम्ना वयग् फिलर्ना लतकूयनन्न मिनल्हनासिरैन!”
(हे मेरे स्रष्टा, हमने अपनी आत्मा पर अत्याचार किया है, और यदि तू हमारे प्रति क्षमादान में उदार न हुआ तो यह निश्चित है कि हमारी भे गणना अभिशप्तों में होगी)

— “बाबरनामा” , पृष्ठ-25, लेखक–ज़हीर-उद्दीन मुहम्मद बाबर।

मैंने अपने को आइने में देखा
न मालूम किस अव्यक्त दुःख से
दुखी हूँ मैं;
देख नहीं पाता हूँ
खुद को
कि दिमाग की नसें
तड़कती हैं…
मैं वर्षों आइना नहीं देखता।

मैं बुद्ध का सजल उर शिष्य
होना चाहता हूँ,
शालवनों के झुरमुट में
अंतिम प्रव्रज्या लेता “सुभद्र” (1) ।

मैं एकाएक की मौत चाहता हूँ
देखना चाहता हूँ ज़िन्दगी के पार
उस महाशून्य (2) को।

“सब्बम् दुक्खम् …” (3) कहा उसने
निग्रोध (4) उठकर चला गया,
मैं एक भिक्खु होना चाहता हूँ।

एक सूखे अशक्त “हो” (5) बच्चे को
पैरों पर उठ खड़े होने की लाचार कोशिश
करते देखता हूँ
और रो पड़ता हूँ ।

मैं एक करुणा में जीता हूँ
मैं एक करुणा को जीता हूँ;
मैं जीता नहीं हूँ, मैं हारता हूँ
हारते हुए भी हारता ही हूँ
और हारते हुए ही जिता हूँ।

चाहे सारी दुनिया
‘वेश्यायों का चकलाघर’ (6) ही क्यों न हो जाए
जीना तो यहीं पड़ेगा।
 
“वनलता सेन” (7) की चिड़िओं के घोसलों सरीखी
आँखों में डबडबा आए
आंसुओं के उजास में,
या “आम्रपाली” (8) की सघन अमराइयों में
मैं एक नष्ट और लुप्त हो चुकी
सभ्यता के भग्नावशेषों
एवं
उन अतृप्त आत्माओं के बीच
‘जीता’ हूँ
जिनका पिंडदान करनेवाला कोई नहीं बचा।
 
यह नायपाल का “एल डोराडो” (9) है
यह सिंध का “मोएन-जो-दड़ो” (10) है
यह नेरुदा का “माच्चू-पिच्चु” (11) है
यह बिरसा का “उलीहातू” (12) है
यह अभिशप्त भूमि का वह टुकडा है
जो एक देश कहलाता है।

और मैं ‘अब’ इसका बाशिंदा हूँ
क्योंकि “वे” (13) नहीं हैं
“वे” (14) नहीं रहें
“वे” (15) खत्म कर डाले गए
“वे” (16) अब भी मारे जा रहें हैं
और “वे” (17) आगे भी मारे जाते रहेंगे ।


 


सन्दर्भ: (1) “सुभद्र” -बुद्ध से प्रव्रज्या लेने वाला अंतिम शिष्य जिसने उनके महाप्रयाण के दिन
ही प्रव्रज्या ली थी।
 (2) “महाशून्य” -बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अंतर्गत नार्गाजुन प्रवर्तित शून्यवाद
यहाँ संदर्भित है।
 (3) बुद्ध का आप्तवाक्य।
 (4) ‘निग्रोध’ -अशोक को दीक्षित करनेवाला बौद्ध भिक्खु ।
 (5) ‘हो’ –चाईबासा, झारखण्ड के जंगलों में रहनेवाली एक आदिवासी जनजाति ।
 (6) आलोचक शिवदेव की प्रसिद्ध उक्ति।
 (7) ‘वनलता सेन’-बांग्ला कवि जीवनानंद दास की प्रसिद्द कविता ‘वनलता सेन’
यहाँ संदर्भित है।
 (8) ‘आम्रपाली’ -वैशाली की नगरवधू आम्रपाली यहाँ संदर्भित है जो बाद में बौद्ध धर्म में
दीक्षित हो जाती है।
 (9) ‘एल डोराडो’-विद्याधर सूरजपाल नायपाल का ऐतिहासिक उपन्यास ‘THE LOSS OF EL-DORADO’ संदर्भित है। (10) ‘मोएन-जो-दड़ो’–सिंध की स्थानीय भाषा में मोएन-जो-दड़ो का शाब्दिक अर्थ है–”मुर्दों का टीला” ।
 (11) माच्चू पिच्चू-यहाँ पाब्लो नेरुदा की प्रसिद्द कविता “Canto XII from The Heights of Macchu Picchu” संदर्भित है।
 (12) ‘उलिहातु’ –बिरसा भगवान के नाम से जाने जानेवाले बिरसा मुंडा के गाँव का नाम।
 (13) ‘वे’ -यहाँ मेक्सिको के आदिवासी ‘मय’ और ‘एज्टेक’ संदर्भित हैं।
 (14) ‘वे’ -यहाँ दक्षिण अमेरिकी “इंका” आदिवासी संदर्भित हैं।
 (15) ‘वे’ -बेबीलोनिया (आधुनिक इराक़) में अमेरिकी फोर्सेज द्वारा मारे जा रहे निरीह नागरिक संदर्भित हैं।
 (16) ‘वे’ -यहाँ अमेरिकी रेड इंडियंस संदर्भित हैं।
 (17) ‘वे’ -पूरे विश्व में हाशिये के बाहर ढकेली तथा खत्म की जा रही आदिम एवं आदिवासी जनजातियाँ संदर्भित हैं।

 

बाबरी मस्जिद-2

“हज़र कुन ज़दूदे दरुंहाय-रेश
कि रेशे दरूँ आक़बत सर कुनद!
बहम बर मकुन ता तवाने दिले
कि आहे ज़हाने बहम बर कुनद।”

(भीतरी घाव के धुएँ से बच
आक़बत नज्रे-आह होती है,
एक भी दिल न तोड़, आह न ले
एक दुनिया तबाह होती है)

— “बाबरनामा”, लेखक–ज़हीर-उद्दीन मुहम्मद बाबर

कि लोग मेरी कविताओं की पंक्तियों को पढेंगे
और एकदम से सन्न रह जाएँगे,
वे चौंक उठेंगे
और सहमे हुए से
अपने-अपने दड़बों में ढुक जाएँगे।

कि बाप जब पढ़ेगा
बेटे की
बेरोजगार दु: स्वप्नों से दागदार
ज़िन्दगी की किताब,
उसकी झुकी हुई कमर
और झुक जाएगी।

कि मेरी कविताएँ
जो अपने समय की नंगी साक्षी होंगी,
जला दी जाएँगी,
चूल्हों में झोंक दी जाएँगी।

कि लोग जब गुजरेंगे
मेरी कविताओं से होकर
वे भूल जाएँगे
अपने घर का रास्ता
कि ज़िन्दगी पहाड़ पर टंगी लालटेन नहीं है
जो इस घात लगाए समय को
ललकार सके
 
जहां अँधेरे में ही जीना
ज़्यादा सुविधाज़नक हो गया है,
जहां प्रकाश आँखों में
गड़ता है,
और एक कुत्ते-से
आदमी की बनिस्बत
ज़्यादा तमीज़ की
उम्मीद की जा सकती है।

कि पिछले पांच हज़ार सालों से
सिन्धु घाटी सभ्यता के
ग्रामीण किसान, मजदूर
इतिहास में अपनी
जगह मांग रहें हैं।

ऐसे में मेरी कविता
जब बातें करती है
मोएन-जो-दड़ो (1) में मिले
मुहरों (Seals) पर खुदे अक्षरों से
और काँप-काँप उठती है
एक समूचे विध्वंस (Holocaust) से।

कि एक सभ्यता के भग्नावशेष
पर खड़ी हुई
दूसरी सभ्यता
कब तक सुरक्षित रह पाएगी?

कि इतिहास (कौन-सा?)
एक सड़ा हुआ मुर्दा है
जिसकी जगह
शहरों और हरी-भरी आबादी से दूर
वीरान कब्रिस्तानों में है
इसे वहीं दफ्न रहने दो।

कि इस भारतवर्ष के लिए
एक ही “मोएन-जो-दड़ो” (1) काफी है।


 


सन्दर्भ:
(1) मोएन-जो-दड़ो–सिंध की स्थानीय भाषा में मोएन-जो-दड़ो का शाब्दिक अर्थ है–”मुर्दों का टीला”।

 

 

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