अनुज ‘अब्र’ की रचनाएँ

क्या करेंगे आप मेरे दिल का मंजर देखकर

क्या करेंगे आप मेरे दिल का मंजर देखकर ख़ामुखा हैरान होंगे इक समंदर देखकर

ये अमीरों की है बस्ती, है अलग इसका चलन लोग मिलते हैं गले लोगों का पैकर देखकर

साथ चलने का किया था आपने जब फ़ैसला रुक गए फिर क्यूँ भला राहों में पत्थर देखकर

जान पाया यूँ भी होती है इबादत या ख़ुदा रक़्स करते तितलियों को कुछ गुलों पर देखकर

आप बेशक ढेर सारे दोस्त रखिये ठीक है पर भरोसा कीजिये थोड़ा सँभल कर देखकर

गर चराग़ों ने है की हर हाल में जलने की ज़िद आँधियों ने पाँव भी खींचे है तेवर देखकर

मुझसे कोई राब्ता महसूस कर ये ‘अब्र’ भी ख़ुद बरसते जा रहे हैं मुझको भी तर देखकर

हमारा कल मिलेगा आप को तुलसी के मानस में

हमारा कल मिलेगा आप को तुलसी के मानस में सुनहरा पल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में

अगर दुविधा है कोई,, आपके जीवन में तो पढ़िये सभी का हल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में

भिगो कर आपकी जो आत्मा को शुद्ध कर डाले वो गंगा जल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में

पराजित सत्य जब होता नजर आए तो पढ़ियेगा बहुत सम्बल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में

जिसे हम देखते ही अपने माथे पर लगाते हैं वो तुलसी दल मिलेगा आपको तुलसी के मानस में

इसी उसूल पे उसका निज़ाम चलता है

इसी उसूल पे उसका निज़ाम चलता है कि कांटा पांव का कांटे से ही निकलता है

हम उस चराग को अपना लहू भी दे देंगे वो जो ख़िलाफ़ अंधेरे के रोज जलता है

जमीं तवाफ़ किये जा रही है इसका और समझते हम हैं कि ये आफ़ताब चलता है

मेरी ये बात हमेशा दिमाग में रखना हज़ार वक्त बुरा हो मगर बदलता है

ये कौन बात अकेले में करता है मुझ से ये कौन छत पे मेरे साथ साथ चलता है

गए हो आग लगा कर न जाने ये कैसी कि दिल में आज तलक इक अलाव जलता है

अनुज यकीन कभी उस पे तुम नहीं करना हर एक बार जो अपना कहा बदलता है

हुआ है थक के बेदम जिस्म फिर भी साँस जारी है

हुआ है थक के बेदम जिस्म फिर भी साँस जारी है । न जाने और कितनी ज़ीस्त पर मेरी उधारी है ।।

सुकूं के वास्ते यारो जमाने भर में भटका हूँ । किसी सूरत नही जाती ये कैसी बेकरारी है ।।

कभी आकर मेरे घर की दरो-दीवार से पूछो । तुम्हारे बाद मैंने जिंदगी कैसे गुजारी है ।।

नमक ज़ख्मों पे मलने का हुनर सीखे कोई उनसे । ग़ज़ब ग़म ख़्वार है मेरे ग़ज़ब की ग़म गुसारी है ।।

परों को नोंच कर मेरे क़फस में डाल दो फिर तो । मुझे बरबाद करने की अगर नीयत तुम्हारी है ।।

यूँ मेरी शख्सियत पर आप क्यों उंगली उठाते हो । सभी से बा -अदब मिलना तो मेरी इन्किसारी है ।।

करे वो बेवफाई और अपनी जान तुम दे दो । अनुज तुम ही बताओ ये कहाँ की होशियारी है ।।

गर हो सके तो टूटे हुए दिल को जोड़ दे

गर हो सके तो टूटे हुए दिल को जोड़ दे वरना तू मेरे हाल पे ही मुझको छोड़ दे

मुझको क़फ़स मे क़ैद न कर ऐ मेरे अज़ीज़ या तो रिहाई बख़्श या गर्दन मरोड़ दे

सच को ही सच कहूँगा मुझे कुछ गरज नहीं मै आइना हूँ तेरा मुझे रख या तोड़ दे

सदियों से दुनिया ताक में बैठी है एकदिन मौका मिले और इश्क़ की वो आँख फोड़ दे

यूँ अश्क़ जल रहे हैं शबे हिज्र में मेरे जैसे कि कोई आँख में नींबू निचोड़ दे

पूरी ग़ज़ल में एक तो ऐसा भी शेर हो तेरा दिलोदिमाग अनुज जो झिझोड़ दे

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