अनुज कुमार की रचनाएँ

कोई पूछता

चावल,
बोरे में बचा था कुछ चावल,
चावल — जिससे मिटाते हैं भूख,
चावल बस एक समय का ।

इन्तज़ार,
रात का इन्तज़ार,
स्याह होने का इन्तज़ार,
इन्तज़ार-तारों का नहीं, सिगरेट के टुकड़ों का ।

उम्र,
मोमबत्ती-सी पिघलती उम्र,
उम्र के जाने के साथ जाती नौकरियाँ,
उम्र की क़ैद में सिमटी नौकरियाँ ।

उम्मीदें,
कूड़े के हवाले हैं उम्मीदें
उम्मीदें — जिन पर खड़ा है आदमी,
उम्मीदें — जिन पर लगे हैं संशय के जाले ।

सवाल,
सब पूछते सवाल दर सवाल,
सवाल — जिसके लच्छे छोड़ चटखारे लेते आदमी,
सवाल — पढ़ाई ख़ूब, नौकरी छोटी-मोटी ?

पूछता,
मुझसे कोई तो पूछता —
पूछता — कैसा लगता है
अर्जियों के जवाब में बन्द, सपनों का इन्तज़ार ?
पूछता — कैसे कर सकता है
सपनों से थका आदमी किसी भी ग़ुलामी का इन्तज़ार ?
पूछता — मुझ युवा पर दंभ भर्ती सरकार
कैसे कर सकती है योग्यताओं को तार-तार ?
कैसे दे सकती है क्रूर दिलासों का व्यापार ?
कि कोई तो जाए, गुहार दे, चीख़े-चिल्लाए,
कि हमारे वोट पर ऐंठती सरकार !
टूट-फूट गए हैं हम, अब और न होता इन्तज़ार ।

ख़्वाहिशें 

बस इतनी ख़्वाहिश है कि,
कविताओं में ऐ दोस्त,
शाख हो, उससे जुड़ा-साँस लेता पत्ता हो,
ऊँचाइयाँ हो, वहाँ मकबूल एक छत्ता हो
हो खेतों में बहे पसीने की महक,
और बच्चियों की आँखों में बची रहे टिमटिमाते सपनों की चहक,
कि काग़ज़ों पर जोता जाए जीवन का धान,
अर्थों में सूरज की गर्माहट हो,
शब्दों में बीजों की अकुलाहट हो,
क्योंकि ये कविताएँ ही हैं, जो बन के पेड़ छतनार,
अपने फलों से कर देती हैं पोर-पोर तिक्त,
मिठा देती हैं कडुवाहट से भरे शहरी मन,

कुछ ऐसा हो कि मैं खेत हो जाऊँ ,
ताकि समा सकूँ सूरज का ताप,
पाल सकूँ अपने गर्भ में भी जीवन का सार,
उगा सकूँ शब्दों का मीठा छतनार.
खेतों तुमसे एक आख़िरी अरज है,
दानों से भरे हाथ दुआओं के लिए उठाओ.
मेरी कविताओं की साँस बन जाओ ।

 

धरती उनकी भी है 

जिनके सर पर छत हो,
उनके लिए धरती घर होती है,
जिनके हाथ में रोटी हो,
उनके लिए धरती शहद का छत्ता होती है,
जिनके देह पर शॉल हो,
उनके लिए धरती गर्म होती है,
जिनके बगल में माशूक हो,
उनके लिए धरती रूमानी होती है,
जिनके हाथ में प्याला हो,
उनके लिए धरती सपना होती है ।

धरती के लाखों रंग उनके भी होते हैं,
जिनके सर शम्बूक के हैं,
हाथ एकलव्य के और दिल कबीर का,
जो बिरसा हैं, जाबली सत्यकाम हैं,
जो मनुष्य से हैं, मनुष्य नहीं,
जिनके ज़मीं का हिस्सा किसी का बकाया है ।

जिनने अपने आकाश, चाँद सूरज ख़ातिर बहुत चुकाया है,
जिनके बगल में कोई नहीं,
केवल ये हैं, इनके मवेशी, इनका घर.
जिनकी कोई माँग नहीं, केवल जबरन माँगा है,
जिन्होंने अपना बचपन धरती को जन्नत मानने में गुज़ारा है
और अपनी जवानी आकाश तक चीख़ें,
और धरती के गर्भ में अपनी आहें पहुँचाने में गुज़ारी है,
जो आज भी दो बाँह धरती के मोह में
सदियों से दधीची की हड्डियाँ ढूँढ़ रहे थे,
और आज भी ढूँढ़ रहे हैं ।

 

उपेक्षित

उसकी आँखों में बर्फ़ जमा है,
जो झपकती नहीं पलकें
कि इतने में तो…
बच्चियाँ औरत हो जाती हैं
माएँ विधवा,
और गाँवों से नाम गुम ।

उसका चेहरा सख़्त है,
और उम्र का तकाज़ा मुश्किल,
उसके चेहरे पर,
हमउम्रों के नाम गुदे हैं,
वह पढ़ने को जाता है दिल्ली,
दिल्ली उसे पढ़ नहीं पाती,

गगनचुम्बी इमारतों से
उसे अपनी पहाड़ियाँ बड़ी होती नहीं दिखती,
घाटियाँ गहरी और संकरी होती दिखती हैं,
जहाँ कंकाल बन जाने को दफ़न कर दी गई
सैंकड़ों बुलन्द आवाज़ें ।

ख़ौफ़ बन रगों में ख़ून बहता है बदस्तूर,
जहाँ गैरमुल्क की निग़ाहों से देखते हैं,
मुल्क के बाशिन्दे,
वहाँ मुल्क से वफ़ाई की उलझन ताउम्र कायम रहती है.
वह सख़्त चेहरा जब उठा लेता है हथियार,
तो मासूमों को बरगलाने का बहाना दे
पड़ोसी मूल्क की तरफ़ हो जाती है उँगली ।

दो मजहबों, दो सीमाओं, दो सोच में बँट जाता है चेहरा,
जिसकी शिनाख़्त से कतराते हैं ज़िम्मेदार,
कि जैसे बनाई जाती है औरत
वैसे ही तैयार किए जाते हैं सख़्त चेहरे.
जो तालीम को जाते हैं दिल्ली ।

और दिल्ली
अपनी धूनी
रमाए रहती है ।

 

नवउदारवाद 

ये लियो !!
ई ससुरी क्या चीज़ है, भाई ?
ई कौन सा ‘वाद’ है, भाई?
साम्यवाद सुने थे, समाजवाद सुने थे,
ससुरी दलाली पूँजीवाद के बारे में जाने रहे,
यहाँ तक कि उदारवाद भी देखे रहें
अब ई कौन नयका नटखट नासी पैदा हो गया ?

का तो बोलते हैं ? हाँ ! नवउदारवाद !!
साला प्रेम से घच्च चबा जाए
जर-ज़मीन-जोरू सबे निगल जाए
ससुरी चमड़ी को दमड़ी में बिकवाए
आदमी का ईमान तक खा जाए

बहुत कमीनी-कुत्ती चीज़ है भईया
हबसी है पूरा हबसी
गप्प कर जाए और चुपा भी दे
— हैं !! अउर तो और…
हमसे अपनी कीर्तनिया भी गवाए

हमनी के कबूतर, महल, झूला के सपने दिखाए
— हैं!! अउर तो और…
हमनी के सरकार एहसान तले पिट्ठुआ बन जाए
हमनी सबके बहलाए, नारे लगवाए..
बोलो ज़िन्दाबाद,
नव्य उदारवाद

हम भी एक जून रोटी खातिर,
ई ससुर के नाती को अपनी मौसी बनाए,
— कि देख गंधिया की पीली पत्ती,
जिया धड़क-धड़क जाए,
अउर अँखियन भौंचक्क रह जाए !!

हमहूँ खूब चिल्लाए,
हमनी संग सबे कण्ठ फाड़ भर्राए,
वाह! प्रभु वाह !
किए खूब उपाय,
अपनी मैय्य्त पर खुदे ही आए,
जिया धड़क-धड़क जाए,
बोलो ज़िन्दाबाद,
ससुरी नवउदारवाद ।

 

पढ़बा-लिखबा न त डोम-चमार बनबा !! 

मैं डोम-चमार नहीं,
मैं मदेसिया हलवाई हूँ, कानू हूँ,
गनीनाथ मेरे देवता हैं,
गोविन्द भी ।

मैं डोम-चमार होता,
तो छट से दो रोज़ पहले
बूढ़ी गण्डक की नाक-भौं सजा रहा होता,
ताकि कोई झा अपने मन्त्रों के एक्सक्ल्यूसिव दिमागी पोटली के साथ,
अपनी जनाना को जग-जहान से बचाते हुए,
बच्चों को मवेशी की तरह किनारे ला सके,
ताकि रे-बैन चढ़ाए मूँछों पर ताव देते, कोई सिंह,
अपनी लिपी-पुती बीवियों के साथ आराध्या को अरग चढ़ा सके,
ताकि कोई साह टोकरे में कम हो रहे प्रसादी के लिए फल-तेल-चीनी की दुहाई दे सके,
ताकि कायस्थों के मसखरे, मुसहर, दुसाध, कलवार या पासी की कन्याओं की जवानी नाप सकें,
ताकि हर कोई ख़ुद को बेहतर भक्त जता सके,
अच्छे होने-दिखने की आजमाइश कर सके ।

मैं डोम-चमार होता,
तो छटी मईया मेरी बपौती होती,
मैं ही नाव में बच्चों को खेता,
गुब्बारे बेचता, आइसक्रीम दिखा सब को मोहता,
मैं ही छट-पर्व का इवेण्ट-मैनेजर होता ।

पर मैं डोम-चमार नहीं,
मैं कानू हूँ, गुप्ता हूँ,
और हम जैसे, हमसे ऊपरवाले जैसे थोड़ा बहुत पढ़-पाढ़ लेते हैं,
सेकरेटेरियट, वकीली, डाक्टरी, प्रोफ़ेसरी या सरकारी मुलाजिम हो लेते हैं
हाँ, मूँह छूटते ही कहते हैं —
“अऊर का ! पढ़बा-लिखबा न त डोम-चमार बनबा !!

 

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