अनुपमा पाठक की रचनाएँ

इंसानियत का आत्मकथ्य

गुज़रती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आए
कितने ही दलदल
पर झेल सब कुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

अट्टालिकाएँ करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूँ
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

जब-जब हारा तुम्हारा विवेक
आए राह में रोड़े अनेक
तब-तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

तुम तक 

सजल आँखों से जलाया
देहरी पर एक दीप…

मन का आँगन
लिया पहले ही था लीप…

बड़े स्नेह से बुला रहे हैं
ज़िन्दगी ! आओ न समीप…

हम भी तुम तक ही तो आ रहे हैं
चुनते हुए भावों के मोती सीप… !!

अंततोगत्वा सब माटी है

आना है
आकर फिर
चल देने की परिपाटी है…
माटी का दिया
माटी के इंसान
अंततोगत्वा सब माटी है…

कहते हैं, चलते रहने से
गंतव्य तक की दूरी
कम हो जाती है…
अंतिम बेला दिवस की
अवसान समीप है
खुद से दूरियां भी कहाँ गयीं पाटी हैं…

निभ रही बस
आने और चल देने की परिपाटी है… !!

जिस तरह प्रकृति में हवा बहती है

जिस तरह प्रकृति में
हवा बहती है
वैसे ही
कवि के अंतर में
कविता बहनी चाहिए!

प्रेरणा से ही
सृजन संभव है
जब न लिख सकें
तो कह सकें कि गति रुक गयी है
कम से कम
ये ईमानदारी…तो रहनी चाहिए!

विचारों की लौ से
करो रौशन
जहां को
ये क्या बेतुकी जिद लिए बैठे हो
कि, उजाला बिखेरने के लिए
वह्नि चाहिए!

एक जागरूक
सुनने वाला बैठा हो, तो-
तमाम लेखनकार्य छोड़
तुम्हें उससे
एक कविता
कहनी चाहिए!

जिस तरह प्रकृति में
हवा बहती है
वैसे ही
कवि के अंतर में
कविता बहनी चाहिए!

ओ पेड़… क्या कहूँ 

ओ पेड़… क्या कहूँ

ट्रेन की खिड़की से
बाहर झाँक रही हूँ
यात्रा में हूँ… अब तक के
पड़ावों को आँक रही हूँ
कितना कुछ है जो
छूट रहा है हर पल
बीतते वक़्त की कमीज़ पर
कुछ भाव टाँक रही हूँ

ओ पेड़… तुम मुझे
भागते हुए लग रहे हो
ये क्या, क्यूँ मेरी दृष्टि को
यूँ ठग रहे हो
जबकि ये मैं ही हूँ
जो भाग रही हूँ, लेकिन सच कहूँ-
एक स्थान पर स्थित होते हुए भी
कितनी ही यात्राओं में तुम मेरा पग रहे हो

मुझे ऐसा लगता है
मानों तुम ही यात्रारत हो
एक ही स्थान पर अडिग खड़े
कर्म में निरत हो
यह जानते हुए भी कि
कोई उदास रागिनी मेरे भीतर ही है बज रही
मुझे ऐसा लगता है
जैसे उदास तुम्हारी भी सूरत हो

तुम्हारी डालियों को
लहलहाते देखा है
समय लिखता नित
भाग्य का नया लेखा है
यह जानकर भी कि
पथिक के साथ नहीं चलते तुम
नेह का धागा बाँध
जीवन के विविध तापों को हमने संग संग सेंका है

रिश्ता है ज़रूर
अकारण नहीं ये बातें होती थी
मुझे याद है
तेरी छाँव में बैठ मैं अक्सर रोती थी
परिस्थितिजन्य कष्टों की
सारी वेदना
तेरी निकटता में
आंसुओं में पिरोती थी

आज जब दिख रहे हैं
यात्रा में ये छूटते पेड़ सारे
याद आ रहे हो तुम
जो छूट गए विश्वनाथ मंदिर किनारे
छूट कर भी नहीं छूटते
कुछ विम्ब जीवन में
भले ले जाएँ कहीं भी
किस्मत के सितारे

ओ पेड़…
क्या कहूँ
सदा तेरी ख़ुशी के लिए
मैं प्रार्थनारत रहूँ
और मिले जो
अभीष्ट तुम्हे
बन कर ख़ुशी के आंसू
तेरे नयनों से बहूँ

ओ पेड़… क्या कहूँ

ऐसा हो…!!! 

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