अनुपम कुमार की रचनाएँ

हाँ! मैं कविता लिख देता हूँ! 

हाँ! मैं कविता लिख देता हूँ!
जब दिल में रखी कोई बात
बहुत दिनों के बाद
सुलगाने लगे मेरे जज़्बात
और दिल जलने लगता है
बात की धाह से
और उसकी बेचैन लपटें
मुंह को आने लगती हैं
और मुझे ज़ुबान खोलने में डर लगता है
अपनों के सामने
परायों के सामने
तब मैं दिल की भट्ठी से
अपनी जलती बातों को
कलम की चिमटी से
हौले से पकड़कर
उसे काग़ज़ की दरी पर
इत्मीनान से सुला देता हूँ
आराम से आराम के लिये
पर इसमें चिमटा गरम हो जाता है
दरी जल जाती है
और बात!
लाल से काली-उजली हो जाती है
पर दिल को ठंढक तो पड़ जाती है यार!

कुछ शेर

बरस बीस जो लगाये हैं इल्म की आज़माइश में मैंने
अब जाके मेरे हुनर के फूल खिलने को हो रहे तैयार

बेज़री में जो सर मेरा किसी के सामने न झुका अबतक
ज़रदारी हुई तो किसी का सर अपने आगे न झुकने दूंगा

ख्व़ाब अब भी हमारी आँखों में सजने को तो हैं तैयार
बच्चों के सपने मगर उन्हें आँखों में टिकने नहीं देते

कफ़स में रहके जो सैयाद के तलवे चाटे
उस परिंदे को आज़ादी का कोई हक़ नहीं

फ़रेब ख़ुद से ही कुछ ऐसा खा गया हूँ मैं
किसी और को दोष देने का जी नहीं करता

दशरथ बनके आपने जो तीर चलाया था मुझ श्रवण पर
मौत मुझे देकर वो कर्म आप को भी स्वर्ग ले ही गया

गणेशों की प्रथम पूजा कराने के लिये न जाने कबतक
कितने और कार्तिकेयों को भ्रमण पे लगाएगी ये दुनिया

सियासत के माहुर से जो मत्त हो गए थे बैल सब
उनमें से कुछ को दंगल में नाथ दिया है जनता ने

न जाने इस बगीचे में कुछ ऐसे पेड़ भी कैसे उग आये
जिनपे बिन पतझड़ के भी सदा हरियाली ही रहती है

बहुत चाहा पर बिन पतझड़ के हरियाली का फ़न न सीख सका
न जाने कौन-सी दक्षिणा देकर लोग इस विद्या को साध लेते हैं

हम तो पतझड़ का भी इसी खातिर इंतज़ार करते हैं
कि हरियाली का मज़ा कहीं कम न हो जाए या रब्बा

आईने के सामने खड़े होके ख़ुद से ही माफ़ी मांग ली मैंने
सबसे ज़्यादा अपना ही तो दिल दुखाया मैंने औरों के वास्ते

शहर में लोगों की दुम पर पटाखे और सामने मांस का टुकड़ा है
हज़ार किये समझौते हैं, पीड़ा है, और मुस्कुराता हुआ मुखड़ा है

शब्द बनना चाहता था पर अंक बन गया हूँ
राजा तो न बनना था पर रंक बन गया हूँ

चंद रुपयों के लिये माँ –बाप मेरे अब परेशान तो नहीं होते
पर मुझसे गले मिलने को न जाने कब से मरे जा रहे हैं

उग आये हैं अब फफोले तेरी यादों के दिल पर
गर्म आंसू तेरी आँखों से क्यूँकर बहाए थे मैंने

कोई जो आके कह दे कि उसने मुझे याद किया
मैं ख़ुद को देख के कई दिन रूठा क्यूँ रहता हूँ

दस्तक अब भी हौले से दिल पे देती तो है मुहब्बत मगर
इस बला को फिर इस दिल में लाने का दिल नहीं करता

जानता हूँ जो और जैसा लिखा कोई बड़ा काम नहीं
पर मैं जो मेरा क़िस्सा न लिखता तो कौन लिखता

मैं हूँ तेरा प्रिये तू है मेरी प्रिया

मैं हूँ तेरा प्रिये तू है मेरी प्रिया
न देखूं तुझे तो डर जाये जिया

चाँद चेहरा तेरा चांदनी तेरा नूर
रह पाऊं न मैं तुझसे तो दूर
हीरा मैं तेरा तू मेरी कोहिनूर
मैं सूरज हूँ तेरा तू मेरा दीया

जीवन हो मुश्किल तो समाधान तू
जीवन के सौंदर्य का परिधान तू
जीवन है कबला तो बलिदान तू
परिवार का फूल है तुमसे खिला

हंसी तेरी प्रेम के दीप जलाये
प्रेमदीप हमको तो राह दिखाए
दुःख-अँधेरा पास फटक न पाए
जीवन के अँधेरे को तुमने पीया

बहरूपिया 

मैं बहरूपिया हूँ
कई रूप है मेरे
हाँ! मैं बहरूपिया हूँ

मैं बहैरू ‘पिया’ हूँ
शादीशुदा हूँ
तो थोड़ा सा बहरा भी हूँ
बीवी की हर मांग सुन नहीं पाता
इसलिए बहैरू ‘पिया’ हूँ

मैं बह ‘रूपया’ हूँ
बाल-बच्चेदार हूँ
शौक़ न सही ज़रुरत पे उनके
थोडा सा रूपया बहाता भी हूँ
सो मैं बह ‘रूपया’ हूँ

मैं बहु ‘रूपिया’ हूँ
नौकरीशुदा हूँ
तो कई रूप हैं मेरे
मैं मालिक से कम
नौकर से ज़्यादा हूँ
कभी ऊंट घोड़ा हाथी
तो कभी पिद्दी प्यादा हूँ
मैं अपने रूप में नहीं हूँ
ग़लत हूँ या फिर सही हूँ
रूप बदलने की मेरी मज़बूरी है
ये मेरे लिये ज़रा ज़रूरी है
अपने असल रूप में मैं आ नहीं सकता
बाल-बच्चों को कटोरा थमा नहीं सकता
सरकार समाज और समय की ज़ोराज़ोरी है
लगता विधाता भाग्य जीवन की हेराफ़ेरी है
बहते-बहते समय के साथ बह गया हूँ
रूप कई ढो-ढो के अब ढह गया हूँ
आफ़त ये कि अब भी कोई पहचानता नहीं
बहरूपिया ही हूँ मैं पर कोई मानता ही नहीं

अपने-पराये

पराये अच्छे होते हैं
कि अपमान की सूई
ताने का तीर
इर्ष्या का चाकू
नफ़रत की शराब
लेकर चलते है

बेशक कोई चूक
नहीं होती इनसे
महीन मौके पे
वीभत्स वारदात को
अंजाम देने में

पर, अपने सालों पिजाते हैं
बैर के बल्लम
तंज़ के तलवार
भ्रम के भाले
अपनी मंद बुद्धि की शीला पर
अहंकार का पानी दे दे कर
पोसते हैं क्रोध के अजगर
खीझ के बिच्छू
कनफुसकी की लोमड़ी
छुपा के रखते हैं
अपमान के अणुबम
और इत्मीनान से इंतज़ार करते हैं
आपका अभिमन्यु होने तक
चतुर शिकारी की तरह
घातक मगरमच्छ की तरह
ऑंखें मूंदकर मानते है बातें
इक दिन वचन से
वध करने के लिये
और ज़नाब! ये कोई हादसा नहीं होता
एक व्यथित मन का
भ्रमित बुद्धि का
वाचिक तुष्टिकरण होता है
विचारों का बंध्याकरण होता है
बाद में सड़ा संस्मरण होता हैं
संबंधों का क्रमिक मरण होता है

अंक और शून्य

अंक और शून्य
के बड़े ही गुण
अंक के विस्तार में
इस बड़े संसार में
सब कुछ जैसे खो गया
थक हार जग सो गया
शून्य की किसको पड़ी
है ये पर अंक से बड़ी
धोखा अंक का खा गया
जग इसी में समा गया
शून्य से हम आये हैं
शून्य को ही हम जाये हैं
अंक मन का भाव है
सब मगर अभाव है
शून्य की ही बस परिधि है
अंक तो बस वारिधि ही है
भवसागर जो पार करना है
शून्य से तो न डरना है
अंक के ही सब खेल हैं
समझने में हम फ़ेल हैं
अंक को राम-सलाम है
पर शून्य को प्रणाम है

माँ! तुम्हारी गंध 

माँ! मुझसे आती है अब भी
तुम्हारी गंध कभी-कभी
जिसे मैं ही सूंघ पाता हूँ
मेरी बीवी मेरे बच्चे
इसे समझ नहीं पाते
भाई-बहन शायद जान जाएँ
पिता अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं
माँ! तुम्हारी मधुर हंसी
बरबस मेरे होंठो पे आती है
तुम्हारे युवाकाल की निर्मल हंसी
सबको मोहनेवाली
पर मेरी हंसी पे कोई लुभाता नहीं
भाई-बहन शायद पहचान लें
पिता जान जाते हैं
तुम्हारी वो हंसी मेरे होंटों पर

माँ! तुम्हारी मधुर आवाज़
तुम्हारा सुरीला गान
कोकिल कंठी तान
मेरे गले से बरबस
प्रस्फुटित कैसे हो जाती है !
मुझे कभी समझ नहीं आया
भाई-बहन चाहें तो सुन सकते हैं
पिता अवश्य जानते हैं
तुम मुझमें गाती हो

माँ! तुम्हारी गंध
तुम्हारी हंसी
तुम्हारी आवाज़
सुरक्षित है मुझमें
जब तक मैं ज़िन्दा हूँ माँ!
जब तक मैं ज़िन्दा हूँ माँ!

मेरे जाने के बाद 

मेरे जाने के बाद
जो बहुत कुछ रह जायेगा
पास तुम्हारे सुरक्षित
उसे भी चाहो तो प्यार कर सकती हो

मेरे जाने के बाद
जो थोड़ी मीठी कड़वाहट रह जाएगी
तुम्हारे ज़ेहन में अकड़ती हुई
उसी से तुम नफ़रत कर लेना तबतक

मेरे जाने के बाद
जो गंध रुठी रह जाएगी न
तुम्हारे जिस्म पर अलसाई हुई
उसे ही तुम आगोश में कस लेना

मेरे जाने के बाद
जो मेरी यादों की तन्हाई तुम्हें छेड़े
उससे ख़ूब जी भर लड़ लेना तुम
थोडा तो सुकूं मिले तुम्हें भी किसी तरह

मेरे जाने के बाद
जो गर आस का पंछी पालो तुम
उसे प्यार का दाना देना न भूलना
वरना वो मर जायेगा बेवकूफ़ कहीं का

मेरे जाने के बाद
जो थोड़ी-सी तुम मेरे साथ रहोगी
उसे ही सबकुछ मानता रहूँगा मैं
वरना मेरी मौत निश्चित है ऐसे में

मेरे जाने के बाद
मैं भी पूरा कहाँ जा पाउँगा
ढूँढना यहीं-कहीं इधर-उधर यहाँ-वहाँ
मैं शायद कहीं दिख जाऊं तुम्हें निहारता हुआ

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