अनुभूति गुप्ता की रचनाएँ

कतरा भर धूप

मेरे हिस्से की
कतरा भर धूप
वो भी
मित्र छीन ले गया
आत्मीय सहयात्री
हितैषी मेरा था
जो पहले
धूर्त अकुलीन हो गया

समन्दर के किनारे पर
खड़ी मैं
विक्षोभित लहरों को
मायूसी से देखती हूँ
और सोच में
पड़ जाती हूँ मैं

कि:
सफलता के शिखर पर
पहुँची तो सही
पर
इतनी ऊँचाई से मकान में
रहने वालों के दिल भी
दरिद्र हो गये

रिश्तों का मर्म समझना
वाक़ई आसान काम नहीं
स्नेह-नेत्रों में विश्वास नहीं
सन्धि की कोई आस नहीं
मेरे ही अन्तःस्थित संवेदन
मुझपर ही
गरजते हैं
बरसते हैं
कड़कते हैं
कहते हैं कि,
अब यह…मित्र
मौलिक रूप से
तुम्हारे होकर भी
तुम्हारे नहीं।

अन्धकार का गहराना

गहराता जाता है
मन में अन्धकार
दिन-ब-दिन
जब
चीखतीं हैं नदियाँ
बरगलाती हैं वादियाँ
अनसुनी कहावतें
बेवक्त घटी आहटें
बरबस पुकार देती हैं
सुलगती चिमनियों से….

तम की मार
एक लम्बे समय से
अनायास ही सहते हुए
सोचती हैं
कि:
शायद एक दिन
कोई तो आयेगा
उनकी उन्मुक्त हँसी
लौटाने को…

झुरमुटों पर चाँदनी

कोमल हवाएँ
जब
झुरमुटों पर चाँदनी से
मन्द-मन्द
टकराती हैं।

तो
डालियाँ
आनन्द से
नवपल्लवों को
झूला
झूलाती हैं।

शरद की पूनम में
कलियों का
स्वर्णिम तन
और ही ज़्यादा
खिलता है।

माटी की
भीनी-भीनी गन्ध में
लेप
चन्दन का
जब
मिलता है।

अँधियारे एकान्त में

अँधियारे एकान्त में
सुनसान चैराहे के
बीचों-बीच
खड़ा आदमी
मद्धिम चाँदनी को
विलुब्ध नेत्रों से देखता है

घड़ी के काँटों की
टिक-टिक
रह-रहकर उसे सताती है,
डराती है, बरगलाती है, धमकाती है
और
एकाएक बोल पड़ती है

कि:
तुम्हें तो
वक्त ने भी
अपना मित्र बनाने से
निषिद्ध कर दिया है
तुम उसके हाथों की
महज कठपुतली हो
दुःख की आँधी में
तुम तो
एक बार में ही सहम जाओगे
थर-थर काँपोगे
आँखें मूंदकर
मन ही मन यह मनाओगे
कि-
काश
यह सिर्फ़
एक बुरा सपना ही हो।

मकानों की छतें 

कुछ मकानों की
छतें पुरानी ही सही
पर
वहाँ
मनोज्ञ पावन प्रकाश
बिखरा हुआ नजर आया,
अनुभवी शाखाएँ
उन मकानों की
निगरानी
करती हैं
बाहरी शत्रुओं से,
अड़चनें घात लगाये
बैठी हैं
कि-
कब इन मकानों में
रहने वालों के
आपसी रिश्तों में
दीमक लगनी शुरू होगी
मन निरुत्साहित होगा
शंकाओं
निराशाओं
उलझनों से घिरेगा
चिन्ता में अकुलायेगा

तब वो,
एकान्त क्षणों में
घोर सन्नाटों को
चीरते हुए
छलपूर्वक प्रहार करेगीं
और
उनके जीवन में
ग़लतफ़हमी का
दर्दनाक झंझावात
ले आयेगीं।

चिड़िया

चीं-चीं, चीं-चीं, चीं-चीं चीं-चीं,
चिड़िया हमसे कहती है,
अपने नीड़ सलोने में वो
बच्चों के सँग रहती है।
दाना-दुनका चुनकर चिड़िया,
पास हमारे आयेगी।
बड़े चाव से बच्चों को वह,
चुग्गा खूब खिलायेगी।

विहान की मोटरगाड़ी

मम्मी पापा लेकर आये,
रंग-बिरंगी मोटरगाड़ी।
छोटे-छोटे पहियों वाली
कितनी प्यारी मोटरगाड़ी।
खुश होता विहान है कितना,
पाकर अपनी मोटरगाड़ी।
पहिये उसके खूब घुमाता,
गाड़ी आँगन में टहलाता।
लाल रंग की है विहान की,
प्यारी-प्यारी मोटरगाड़ी।

कुकर की सीटी 

कुकर की है सीटी ऐसी,
बिल्कुल छुक-छुक गाड़ी जैसी।
बच्चे डर से सहमे जाते,
सीटी की ध्वनि से वो हैं घबराते।

ओ आलू कचालू 

ओ आलू कचालू,
तुम कहाँ गए थे?
क्या बगिया में
गुम हो गए थे?
बिल्ली मौसी के
साथ खेल रहे थे,
क्या मिट्टी में
लोटपोट हो गए थे?

ईश्वर

ईश्वर ने संसार बनाया,
प्यार से उसे सजाया।
अगर स्नेह से रहोगे सभी,
सुख-शांति मिलेगी तभी।
स्ंासार सभी के लिए बना,
एक बराबर पेड़ और तना।
बड़ों का करो सम्मान,
छोटों का रखो ध्यान।
आदर करो सभी का,
यही ज्ञान है अभी का।

घर 

एक सुन्दर-सा घर बनायेंगे,
फूलों की बेलों से उसको
बड़े चाव से हम सजायेंगे।

सभी प्यार से वहाँ रहेंगे,
खुशियों से घर के आँगन का
कोना-कोना खूब भरेंगे।

घर में दादा-दादी होंगे,
मम्मी होंगी पापा होंगे,
प्यार करेंगी हमें बुआ जी
भाई बहन भी संग-संग होंगे।

अपनों के सँग-साथ प्यार से
घर स्वर्ग-सा सुन्दर बन जाता है,
बिना बच्चों के घर-आँगन तो
सूना सा हो जाता है।

एक सुन्दर-सा घर बनायेंगे,
फूलों की बेलों से उसको
बड़े चाव से हम सजायेंगे।

मीठे-मीठे बोल

मीठे-मीठे बोल
बच्चों सदा बोलो,
हृदय का द्वार
दूसरों की मदद को
बच्चों सदा खोलो।

कड़वे शब्दों से
किसी के मन को
ठेस न पहुँचाना,
मन से खुश रहना
सदा मुस्कुराना।

मीठे-मीठे बोल
अमृत जैसे हैं ,
कड़वे शब्द विषैले हैं।
आओ, बच्चों हम सभी
मिलकर प्रतिज्ञा लंेगे,
जीवन में सदा ही
मीठे-मीठे बोल बोलेंगे।

चाँद की दादी

ओ चाँद की दादी,
ओ चाँद की दादी,
क्या तुम्हें कोई
लोरी नहीं आती?

ये गुपचुप-गुपचुप
क्या तुम हो गाती?
क्यों हम बच्चों को
लोरी नहीं सुनाती?

केले का छिलका 

बिटटू की जेब
से गिरा एक
केले का छिलका,

गोलू भालू का
पैर छिलके
पर फिसला।

दौड़ी-दौड़ी
आई गिलहरी
गोलू भालू को
उठाने गयी,

फिर से
फिसला पैर
चैरी गिलहरी
गोलू भालू के
नीचे दब गयी।

पतंग 

वो देखो,
नीले काले
हरे रंग की
पतंग उड़ रही
आकाश में,
जैसे पंछी
निकले हो
नए घर की
तलाश में।

जब जब अकेली होती है स्त्री

स्त्री
जब-जब
घर के आँगन में
अकेली होती है
एकान्त से
बातें करती है
दिल में दर्द
भरती है
अश्कों को धुलकर
आईने की ओर
देखती है
एकटक निहारती है
अपने चेहरे पर पड़ी
अनगिनत रेखाओं को
मन्द-मन्द मुस्काते हुए
कहती है
कि…
कम से कम कोई तो है
साथ मेरे
मन को बाँधने को
मैं और मेरा प्रतिबिम्ब।

स्त्री और पुरूष 

स्त्री सहनशील है
धरती की तरह
पुरूष,
स्त्री पर निर्भर है
जल की तरह
स्त्री से इस संसार का
सृजन है
पुरूष जीता
सुखद जीवन है
अगर,
स्त्री का अस्तित्व
कटघरे में होगा
तो पुरूष का व्यक्तित्व
अँधेरे में होगा!

अपेक्षाओं की अलमारी

खामोशियों से
अनकही
बचकानी बातें
हो जायें,
तनहाइयाँ बतलाती हैं
कि-
शहर
बहुत अकेला है
लोगों के चेहरों पर
मुस्कान नकली है
दिलों मे खुशी
कहाँ टिकती हैं

घर है,
महँगी गाड़ी
फिर भी
उदास है
अपेक्षाओं की अलमारी।

जंगल मौन है

इंसान के
स्वार्थीपन को देखकर
जंगल मौन है-
कर रहा इंसान
अपनी मनमानी,
प्रकृति की वेदना को
न समझकर,
घने जंगल, बेहिसाब कट रहे हैं
इंसान के
लालची स्वभाव के चलते।
अब, क्या कहे
जंगल
शीतल हवा के झोंके भी
अपना रूख
बदलने लगे हैं
सब ताल-तलैया सूखने लगे हैं।
पशु-पक्षी भूखे-प्यासे
निर्जीव बेघर हैं
इंसान ने बेच डाले
उनके घर हैं।
हक्की-बक्की रह गयी है
एक नन्हीं-सी चिड़िया
कि, बताओ
जरा-सी मेरी आँख
क्या लगी
इंसान
पेड़ सहित
मेरा घोंसला भी
ले गये हैं।
तो बस-
बरबादी ही बरबादी
और
घटती हमारी आबादी
पीछे छोड़ गये हैं।
सूखे, पीले,
भूरे पत्तों जैसे
मरने को छोड़ गये हैं
देखो,
इंसानों की मूर्खता
हमें जंगलों से खदेड़कर
शहरों में बसने का
सह-परिवार
निमंत्रण दे गये हैं।

हँसमुख दम्पति

डूब जाता है
स्नेह का सूरज
पलभर में
इक सुनहरी किरण की
तलाश में,

बरसों तक…
जिन बच्चों को
धरा रूपी माता ने
अपनी गोद में ममता से
सहेजे रखा था
वही उसे बेसहारा
दर-बदर ठोकर खाने को
छोड़ देते हैं

वक्त के थपेड़े पड़ने पर
जिस पिता की
छाँव में रहा
जिन बच्चों का कोमल मन
अब-
वे ही परायेपन से देखते हैं
कैसे ’हँसमुख दम्पति’
अपनी लाचारी पर हँसते हैं
अकेलेपन की खिड़की से
उदासी सूरज की तकते हैं।

पथिक

आकाश में
काले-काले मेघ
उमड़ते हैं
घुमड़ते हैं
ज़ोर-ज़ोेर से
गरजते हंै
पथराते हैं
बीच रास्तांे पर,
ओले की बरसात
करते हंैं।
पथिक मुश्किल में है
कि
अपनी मंज़िल को
वह कैसे पाये,
अभी तो यात्रा आरम्भ हुई
घोर श्रम करके
यहाँ तक पहुँचा
कैसे वह,
उल्टे पाँव लौट जाये।
मन की दुर्बलता को
त्यागकर
संघर्ष की क़िताब के
पन्नों को टटोलकर
आखिर मंज़िल तो…
उसे पानी है
जीवन में बाधाएँ
क्या है-
यह
तो वह बरसात है
जो करती
अपनी मनमानी है।

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