अनुराग अन्वेषी की रचनाएँ

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद
उठा है कोई शोर
कि आदमी भूल जाना चाहता है
अपनी वर्जनाओं को
जीतना चाहता है
नियति की लड़ाई

इसलिए, ओ कृष्ण
पूछता हूँ सच बताना
कब तक मोहिनी मुस्कान से
छलते रहोगे तुम ?
कब तक युधिष्ठिर
शब्दजाल रचते रहेंगे ?
अब कोई भीष्म
क्यों पैदा नहीं होता ?
क्यों नहीं बन पाता
कोई सुदामा
अब तुम्हारा मित्र ?
क्यों काट लिए जाते हैं
एकलव्य के अँगूठे ?
कभी जाति के नाम पर
तो कभी दान के नाम पर
कोई कर्ण
छला जाता है बार-बार ?
आज भी
उसकी शक्ति का
अवमूल्यन होता रहा है
पर तय है कि
सत्ता के लोभ में
जातीय संघर्ष को आँच देना
धर्म की परिभाषा नहीं बन सकता ।

सचमुच कृष्ण,
बेहद मुश्किल है अब चुप रहना ।
माना,
कि अपने देश में
धृतराष्ट्रों की परंपरा रही है,
दुर्योधनों की कोई कमी नहीं ।
फिर भी
इस बेमियादी यातना का अंत
कहीं तो होगा ?

सोचो कृष्ण,
जब सत्ता पाने के लिए ही
लड़ी जाती हों लड़ाइयाँ,
फैलाए जा रहे हों
तरह-तरह के विद्वेष।
तीन रंगों के झंडे का सिर
मवादों से भर गया हो,
इसके चक्र के अर्थ
राजनीति के गलियारे में
भटकने लगे हों ।
तो क्या
मुमकिन है
कि आदमी की आस्था
बरकरार रहे ?

स्वागत नए वर्ष का

साथियो,
शुभकामनाओं से पहले
एक सवाल
तमाम कौशल के बाद भी
कब तक होते रहोगे हलाल ?

छोड़ो यह मलाल
कि जो बजाते रहे
सालों भर गाल
उनके हाथ में क्यों है
रेशमी रुमाल ?

हाँ साथियो,
सच्चे मन से जलाओ मशाल
जिसकी रोशनी बयाँ कर सके
तुम्हारा हाल
तभी तुम बन सकोगे मिसाल
देखो, दहलीज पर खड़ा है
उम्मीदों का नया साल ।

दर्द से दवा तक 

जब कँटीली झाड़ियों में
उग आता है
अचानक कोई फूल
मुझे लगने लगता है कि
ज़िंदगी की यातनाएँ
कम हुई हैं

पिता के फटे हुए कुर्ते
और बहन की
अतृप्त इच्छाओं से
आहत मन
जब सुनता है
मंदिर और मसज़िद के टूटने की बात
तो बेचैनियाँ बढ़ जाती हैं

आज की तारीख़ में
प्रासंगिक नहीं रह गया
कि सोचूँ
प्रेमिका के काले घुँघराले केश
कितने सुंदर हैं
और एक दूसरे के बिना
हम कितने अकेले

लेकिन इन सब के बावजूद
जब मेरे लगातार हँसते रहने से
दादी की मोतियाबिंदी आँखों में चमक
बढ़ जाती है
तो मेरा दर्द
ख़ुद-ब-ख़ुद
कम हो जाता है ।

बदलता पर्यावरण

ओ साहेब,
इन जंगलों को मत काटो
क्योंकि
जब हम हताश होते हैं
इनका संगीत हममें
जीवन डाल देता है
जब हम भूखे होते हैं
यही जंगल
हमारे साथ होता है
तुम महसूस कर सकते हो साहेब ?
कि इनका रोना
हमारे भीतर
कैसा उबाल पैदा करता होगा !

तुम ठहरे बड़े शहर के
बड़े शहराती
हम तो जाहिल, गवाँर और देहाती
पर साहेब,
कर रहे हैं प्रार्थना
तुम इन जंगलों में
जहाँ चाहो घूम आओ
पर हमारी आँखों में
काँटे न उगाओ ।

साहेब!
हम पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं
पर शांति
हमें भी पसंद है
तुम क्यों चाहते हो दंगा
जंगल और पहाड़ों को कर नंगा ।

देखना साहेब!
जब जंगल ख़त्म हो जाएँगे
हम तुम्हारे शहर आएँगे
और तुम्हारा जीना
दूभर हो जाएगा ।

आशा और आत्मवंचना

ओ बाबू,
जब भी सुनती हूँ
तुम्हारी बाँसुरी पर
अपना नाम
मदमस्त हो जाती हूँ मैं ।
यक़ीन मानो
उस समय मुश्किल नहीं होता
बीच की नदी को
फलाँग कर
तुम्हारे पास पहुँचना ।

मानती हूँ
कि जीने का सलीका
तुमने सिखाया
पर बाबू
इतनी मज़बूत नहीं
कि झेल सकूँ
इतना मानसिक तनाव
इस कस्बे के लोग
तुम्हें बद मानते हैं
लेकिन तुम जानते हो
तुम्हारे बाहर
मेरी कोई दुनिया नहीं ।

बदलते रहेंगे नक्षत्र
बदलेगा मौसम
बदलेंगे लोग
बदलेगा परिवेश
पर मुझे भरोसा है
कि ख़िलाफ़ हवाओं के बीच भी
हम साथ रहेंगे
इसीलिए इस बदरंग मौसम में भी
नाचती हूँ मैं ।

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