अनुराग वत्स की रचनाएँ

निगाह की पहनाई क्या सिर्फ़ तुम्हें आती है 

तो तुम सिगरेट इसलिए पीते रहे?
हाँ, बिलकुल ।
हद है !, तब पूरे पागल थे क्या?
फ़र्क कर लो ।
और तुम्हें क्या लगा कि मैं तुम्हें मना ही करुँगी । क्या होता गर मैं भी पीती ?
कुछ नहीं । मैं छोड़ देता ।
उफ्फ़ । एक बात बताओ, मेरे इतने डिटेल्स कैसे याद रख सके, जबकि कितना कम देखना होता था हमारा ।
आसान रहा यह मेरे लिए ।
कैसे ?
मैं तुम्हारी निगाह पहन लेता था ।
हाहाहा…लोग टोकते नहीं थे ?
हाँ, पर उनकी परवाह कौन करे । तुम अपनी फेवरेट ख़ुद को बताती रही करीना की तरह, तो मुझे लगा, अपनी निगाह से तुम्हें देखना कम देखना होगा ।

तुम्हें पता है, मुझे यह फ्लर्ट कितनी अच्छी लगती थी ।
ओहो! पता होता तो कम करता ।
एक लड़की के लिए जो यह बहुत नहीं सोच पाती कि उसे कोई देखने लायक भी मानता है, तुम क्या-क्या नहीं कहते रहे। यह मेरे लिए सबसे कम फ़िल्मी था क्योंकि तुम्हारी आवाज़ किसी परदे से नहीं निकलती थी । उसे मैं अपने रोओं पर रेंगता हुआ महसूस कर सकती थी ।
तुम आज मुकाबले में हो ।
मैंने भी पहली दफ़ा तब अपने लिबास से ज़्यादा तुम्हारी निगाह पहनना ज़रूरी समझा ।
अच्छा, फिर तुम्हारे साथ तो बड़ी छेड़-छाड़ हुई होगी ?
नाह, तुम क्या समझे, निगाह की पहनाई सिर्फ़ तुम्हें आती है ?
अरे नहीं ।
मेरा कभी न कहना मानने वाले बालों को मैंने अपने कन्धों पर ‘हलके खुले बाल’ की तरह उससे पहले कभी नहीं देखा था ।

एक बात बताओ, क्या तुम इस तरह शुरू हुई ?
शायद इससे पहले ।
कब से ?
जब से तुम्हारी आवाज़ के लिए जगह बनाना शुरू किया तब से ।
तुम्हें पहला वाक्य याद है ?
हाँ, वह तुम्हारा दनदनाता हुआ-सा मेल जिसका सब्जेक्ट रोमन में लिखा ‘तुम’ था और टेक्स्ट : मुझे एक भूली हुई भाषा की तरह मिली जिसे खोना नहीं चाहता \
अजब है, तुम इसे सुन सकी ?
हाँ, मेरे कान तुम्हारी आवाज़ चख चुके थे । इसलिए तुमने जो लिखा उसे बाद के दिनों में पढ़ा कम, सुना ज़्यादा ।

कोई खिड़की नहीं 

(उर्फ़ कैब में प्‍यार)

उसके आने से वह जगह घर बन जाती

घर बनना शिकायत से शुरू होता और हँसी पर ख़त्म
शिकायत यह कि ‘बाहर की तेज़ हवाओं से मेरे बाल बिखर जाते हैं’
और हँसी इस बात पर कि ‘इतना भी नहीं समझते’

हँसी की ओट में लड़के को शिकायत समझ में आती
और यह भी कि लड़की की तरफ़ से यह दुनिया से की गई
सबसे जेनुइन शिकायत क्यों है

फिर शिकायत के दो तरफ़ शीशे की दीवार उठ जाती
और हालाँकि दीवार में तो एक खिड़की का रहना बताया जाता है,
१२ किलोमीटर के असंभव फैलाव और अकल्पनीय विन्यास में
उसके आ जाने भर से रोज़-रोज़ आबाद
घर की दीवार में कोई खिड़की नहीं रहती

बाहर रात, सड़क, आसमाँ और चाँद-तारे रहे होंगे,
भीड़, जाम, लाल या हरी बत्तियाँ भी,
इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आँखों में शरीफ़ काजल ही रहा ।

बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग ।

एक यह भी सही

देख कर तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि तुम्हारी उजली हँसी पर प्रेम की वह छाया भी पड़ती है जो तुम्हें चुप और उदास बनाती है और मुझे उन सब अभिनेय भूमिकाओं के लिए धीरे से तैयार, जो अक्सर त्रिकोण उभरने पर कुछ कम हीरो के हिस्से बदी होती है । एक तो अभिनय के इस अच्छेपन में मेरा यकीन नहीं दूसरे मैं इस नियति को बहुत शक्की निगाह से देखता हूँ । देखने के इस सयाने, बचकाने या बेढंग ने ‘जो पसंद है सो पसंद है’ की दलील पर मेरा ऐतबार ही बढ़ाया और इससे कुछ हो न हो कहानी के दो एकांत नहीं रह गए । तीसरा एकांत मेरे मन का अहाता है जिसकी चौहद्दी पर तुम्हारा यह अफ़सोस फ़िलहाल ठिठक गया है कि ‘हम अक्सर उसे क्यों चाहने लगते हैं जो पहले से किसी और के प्यार में मुब्तिला रहता है’. मैं इसमें प्रेजेंट इम्परफेक्ट टेंस का एक वाक्य घटित होने से ज़्यादा कुछ देख नहीं पाता और इसी कमनज़री से अपने कोने में आबाद हूँ । जैसे त्रिकोण में कहीं तुम हो. जैसे दुनिया में हर शै है । वह भैया होगा जिसके साथ तुम भाग जाना चाहती हो । अब इतना कुछ अजीबोगरीब ढंग से पैबस्त है जीवन में तो एक यह भी सही ।

कोई भाषा नहीं 

तुम्हारे होठों पर सर्जरी के बाद छूट गई खरोंच का तर्ज़ुमा मैं ‘दाग़ अच्छे हैं’
करता था जैसे बहुत ख़ुश को तुम ‘कुछ मीठा हो जाए’ कहा करती थी ।
विज्ञापनी भाषा की सारी चातुरी की ऐसी-तैसी कर हम वस्तुओं की जगह
ख़ुद को कितनी आसानी से नत्थी कर लेते थे और हमारी ख़ुशी ने उस बेहोश वक़्त में
‘प्रेम न हाट बिकाय’ कभी हम पर ज़ाहिर नहीं होने दिया ।
जबकि तुम जिन वज़हों से सुन्दर और क़रीबतर थीं उन वजहों की कोई भाषा नहीं ।

डिठौना

एक तिल है बाईं आँख की सरहद पर तुम्हारी
जो मेरी निगाह से रार ठाने रहता है ।
उसे समझाओ न…!… या थोड़ा काजल बढ़ा कर छिपा ही दो ।
डिठौना करीब २८ में ठीक नहीं ।
इसे हमारे बच्चों के लिए रख छोड़ो ।

गुदगुदी

तुम्हारी हँसी की अलगनी पर मेरी नींद सूख रही है ।
तुम उसे दिन ढले ले आओगी कमरे में, तहा कर रखोगी सपने में ।
मैं उसे पहन कर कल काम पर जाऊँगा और मुझे दिन भर होगी गुदगुदी ।

गिनती

अब जब कहीं कुछ नहीं की साखी है तो तुम्हारा
जानबूझकर मेरे पास भूल गया क्लचर है ।
मैं उससे आदतन खेलता हूँ, मगर एहतिहात से
कि कहीं तुम्हारी आवाज़ बरज ना दे ।
और टूट गया तो तुम्हारी तरह वैसा ही मिलना नामुमकिन ।

हुमायूँ’ज टॉम्ब, शाकुंतलम थियेटर और पराँठे वाली गली
तुम साथ ले गई । अब वे मेरी याद के नक़्शे में हैं, शहर दिल्ली में कहीं नहीं ।

यूथ भी ।
उसे अकेले पढ़ना असंभव होगा मेरे लिए ।

मेरा हरा कुर्ता हैंगर का होकर रह गया है ।
मानो उसे तुम्हारे हाथों ने दुलारा ही नहीं ।

आसमानी अदालत में मुझे मुज़रिम करार दिया गया है ।
सज़ा बरसात की सुनाई गई है…हद है !
…आगे कोई अपील नहीं…

सच पूछो तो तुम्हारा एसारके मुझे चिढ़ाता है ।
हालाँकि मैं रोमन हॉलीडे चाव से देख सकता हूँ ।

फिर भी मैं आजिजी में नहीं, बहुत इत्मिनान में फ्लोरेंतिनो अरिज़ा के
५३ साल, ७ महीने और ११ दिन-रात को अपना मुकम्मल ठिकाना बना रहा हूँ ।
पर इतनी उम्र मिलेगी फरमीना ?

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