अनु जसरोटिया की रचनाएँ

एक भी गुल पर कहीं नाम-ओ-निशाँ मेरा नहीं

एक भी गुल पर कहीं नाम-ओ-निशाँ मेरा नहीं
ये चमन मेरा नहीं ये गुलिस्ताँ मेरा नहीं।

एक क़तरे की इजाज़त भी नहीं मुझ को यहाँ
ये नदी मेरी नहीं आबे-रवाँ मेरा नहीं।

जाऊँ भी तो दोस्तों जाऊँ कहाँ मैं किस नगर
इस भरी दुनिया में कोई भी मकाँ मेरा नहीं।

इस के कण कण को किया करती हूँ मैं झुक कर सलाम
कौन कहता है कि ये हिन्दोस्ताँ मेरा नहीं।

आदमी दुश्मन बना है आदमी का हर जगह
ये गया गुज़रा ज़माना ये जहाँ मेरा नहीं।

चल रही हूँ साथ सब के और हूँ सब से अलग
मैं शरीके-कारवाँ हूँ कारवाँ मेरा नही

क्या रात सुहानी है क्या ख़ूब नज़ारा है 

क्या रात सुहानी है क्या ख़ूब नज़ारा है
आ जाओ तुम्हें दिल ने ऐसे में पुकारा है।

ये झील की नीलाहट, ये पेड़, ये गुल बूटे
आ जाओ कहीं से तुम क़ुदरत का इशारा है।

इक जिस का सहारा था वो भी न मिला उस को
जाए तो कहाँ जाए तक़दीर का मारा है।

ये किस का तसव्वुर है, है किस का ख़याल आख़िर
इन बन्द दरीचों से ये कौन पधारा है।

जो शब भी गुज़र जाए ऐसे ही तो अच्छा हो
बस याद में तेरी ही दिन आज गुज़ारा है।

पीते हैं लहू दिल का, सो जाते हैं भूखे ही
बिन माँ के दुलारों का फ़ाक़ों पे गुज़ारा है।

ये हिन्द की धरती है, आकाश है भारत का
हर फूल है इक गुलशन हर ज़र्रा सितारा है।

मैंने ख़ाकों में कई रंग भरे हैं अब तक 

मैं ने ख़ाकों में कई रंग भरे हैं अब तक
मेरी आँखों ने कई ख्वाब बुने हैं अब तक

कितने ख़त मैं ने तिरे नाम लिखे हैं अब तक
कितने दिन उन के जवाबों में कटे हैं अब तक

मुस्कुराहट के न क्या फूल बिखेरोगे कभी
हम को तो राह में काँटे ही मिले हैं अब तक

गो भलाई को नहीं रास हवा दुनिया की
फिर भी कुछ लोग ज़माने में भले हैं अब तक

कोई हँसता हुआ चिह्न भी मिलेगा शायद
सहमे-सहमे से बहुत लोग मिले हैं अब तक

ज़िँदगी तू ने फ़क़त एक हँसी की ख़ातिर
ज़हां के छलके हुए जाम पिये हैं अब तक

हँसना चाहा है तो देखा है ‘अनु’ ये मैं ने
मेरे नग़्मात भी अश्कों में ढले हैं अब तक।

आहों की कहानी है अश्कों का फ़साना है

आहों की कहानी है अश्कों का फ़साना है
हस्ती जो हमारी है क्या उस का ठिकाना है

तुम झूट की नगरी में रहते हो ज़माने से
बरसों में कहीं जा कर हम ने तुम्हे जाना है

उतरा है कोई पंछी फिर दिल की मुंडेरों पर
फिर याद मुझे आया इक गीत पुराना है

शो’लों में भी झुलसे हैं अश्कों में भी भीगे हैं
इक अपने लहू में भी अब हम को नहाना है

तुम अपनी निगाहों से जिस को भी गिरा दो हो
फिर ऐसे अभागे का किस देस ठिकाना है

ये भीगी हुई रतियाँ, ख़ुशबू में बसी शामें
इस मौसमे-रंगीं से इक लम्हा चुराना है

क्या दाल गले अपनी, चोरों की है जब चाँदी
युग आया है ये कैसा, ये कैसा ज़माना है

रहने नहीं देंगे हम, धरती पे कोई रावण
हर झूट की नगरी को अब हम ने जलाना है

क्यों ध्यान भटकता है अब भी उन्हीं राहों में
जिन राहों में अब अपना आना है न जाना है

क्यों दाद न देंगे सब, शे’रों पे ‘अनु’ तुझ को
हर शे’र में जब बाँधा मज़मून सुहाना है।

चाँद पर जा के अगर रहने लगेगी दुनिया

चाँद पर जा के अगर रहने लगेगी दुनिया
उस की धरती को भी नापाक करेगी दुनिया

पाँव रखने को भी बाक़ी न बची जो धरती
क्या समंदर के तले जा के रहेगी दुनिया

उम्र भर साथ किसी के न चली ये ज़ालिम
उम्र भर साथ किसी के न चलेगी दुनिया

एक ऐटम ने मिटा डाला था नागासाकी
उस को दुहराओगे तो कैसे बचेगी दुनिया

ज़ुल्म की हद से गुज़र जायेगा जब भी कोई
क़ह्र बन बन के न क्या टूट पड़ेगी दुनिया

अम्न की फ़ाख्ता पर खोलेगी इक दिन अपने
अम्न का गीत भी इक रोज़ सुनेगी दुनिया

चैन से जीने की तो बात बड़ी दूर की है
चैन से हम को तो मरने भी न देगी दुनिया।

महफ़िल में हैं तेरी यादें तन्हाई में तेरी सोचें

महफ़िल में हैं तेरी यादें तन्हाई में तेरी सोचें
आ जा हम को रहने लगी हैं हर दिन हर पल गहरी सोचें

शाम ढले बेटी का घर से बाहर जाना ठीक नहीं है
बाप की बूढ़ी आंखों में हैं जाने कैसी कैसी सोचें

ये तुलसी का विरवा इक दिन और किसी आंगन में होगा
जूँ जूँ बेटी का क़द बढ़ता बढ़ती जातीं माँ की सोचें

आँगन आँगन, कुटिया कुटिया, पहुँची महल चौबारों में
बँद दरीचों में भी जाने कैसे आती जाती सोचें

बाँट दिए हैं अम्मा-बाबा अब इस घर के बटवारे ने
बदली दुनिया बदले तेवर बच्चों की भी बदली सोचें

कोई पंछी चहचहाया क्यूँ नहीं

कोई पंछी चहचहाया क्यूँ नहीं
वन में कोई गीत गूँजा क्यूँ नहीं

कर के वादा फिर निभाया क्यूँ नहीं
अब्र छाया था तो बरसा क्यूँ नहीं

कोई बिजली क्यों नहीं अब कौंधती
कोई जुगनू अब चमकता क्यूँ नहीं

कौन सी सोचों में थे खोए हुए
आज तुम ने हम को सोचा क्यूँ नहीं

बेनियाज़ाना गुज़र जाता है अब
देख कर हम को वो रुकता क्यूँ नहीं

बोझ बस्ते का है बच्चे से सवा
और कहते हैं ये हँसता क्यूँ नहीं

जो नज़र आता है ख़ाबों में मुझे
मेरी क़िस्मत में वो लिक्खा क्यूँ नहीं

अब कहाँ रिश्तों का बाक़ी एतबार
अब कोई करता भरोसा क्यूँ नहीं

पेड़ पौधों से है जीवन में बहार
पेड़ पौधे तू लगाता क्यूँ नहीं

दिन कोई ऐसा हो दुख के बोझ हल्के हो सकें 

दिन कोई ऐसा हो दुख के बोझ हल्के हो सकें
रात ऐसी हो कोई जब चैन से हम सो सकें

रात ही वो नेक दिल माँ है कि जिस की गोद में
हम सराहनों के तले मुँह को छुपा कर सो सकें

ऐ ख़ुदा दर से तिरे तौफ़ीक़ ये हम को मिले
ज़िंदगी का बोझ हम आसानियों से ढो सकें

नेक बँदे हम बनें, हम माँगते हैं ये दुआ
बीज हम दुनिया में आ कर नेकियों के बो सकें

ये नहीं मंज़ूर था शायद ख़ुदा की ज़ात को
तुम हमारे हो सको, और हम तुम्हारे हो सकें

हो कोई दीवार जिस को, हम सुनायें हाले-दिल
हो कोई दरवाज़ा ऐसा, जिस से लग कर रो सकें

प्यार के दो बोल हैं क़ीमत हमारी ऐ ‘अनु’
काश ये क़ीमत जहाँ वाले अदा कर तो सकें

तेरी दरगाह से मिलती जो इजाज़त तेरी

तेरी दरगाह से मिलती जो इजाज़त तेरी
हम भी कर जाते किसी रोज़ ज़ियारत तेरी

राख का ढेर है, बुझती हुई चिंगारी है
इस से बढ़ कर तो नहीं कुछ भी हक़ीक़त तेरी

रोता रहता है ग़रीबी का तू रोना हर दम
कुछ सुदामा से तो बढ़ कर नहीं ग़ुरबत तेरी

अब सिवा तेरे दिखाई नहीं देता कुछ भी
दिल को किस मोड़ पे ले आई मुहब्बत तेरी

दौड़ता है तू लहू बन के हमारे दिल में
हम किसी तौर न बन पाये ज़रूरत तेरी

बँद दरवाज़े भी क्या रोक सकेंगे इस को
चोर दरवाज़ों से आ जाये गी चाहत तेरी

उठ के तू चल भी दिया ऐसी भी क्या जल्दी थी
हम ने देखी भी न थी ग़ौर से सूरत तेरी

जब बनाये गा कोई रेत का घर साहिल पर
हम को याद आये गी बचपन की शरारत तेरी

किसी मेले किसी महफ़िल में नहीं दिल लगता
रास आती है फ़क़त हम को तो सँगत तेरी

जोगिया पैरहन में रहते हैं

जोगिया पैरहन में रहते हैं
हम प्रभु की लगन में रहते हैं

जिस तरह ‘राम’ वन में रहते थे
हम भी वैसे ही छन में रहते हैं

हैं ग़रीबी में बरकतें लाखों
सैंकड़ों ऐब धन में रहते हैं

इस तरफ़ भी निगाह करता जा
हम भी तेरे वतन में रहते हैं

कुछ तो देखे गये हैं धरती पर
कुछ सितारे गगन में रहते हैं

मुल्के-गँगो जमन हमारा है
मुल्के-गँगो जमन में रहते हैं

अनगिनत ख़ुशबुएँ, हज़ारों रंग
फूल के बाँकपन में रहते हैं

दौड़ते हैं लहू से रग रग में
जान से वो बदन में रहते हैं

हम अकेले भी हों तो लगता है
जैसे इक अंजुमन में रहते हैं

हम को क्या काम अहले-दुनिया से
मस्त हम अपने फ़न में रहते हैं

हम हैं ऊँची उड़ान के पंछी
शायरी के गगन में रहते हैं

तुम्हारी बात चले, गुलस्तिान ख़ुशबू दे

तुम्हारी बात चले, गुलस्तिान ख़ुशबू दे
तुम्हारे ज़िक्र से मेरी ज़ुबान ख़ुशबू दे

कभी कभी बहँा जाते हैं सजदा रेज़ी को
जहाँ बुज़ुर्ग रहें वो मकान ख़ुशबू दे

ये ख़ास बात ‘बनारस’ की सर-ज़मीं की है
जहान भर में ‘बनारस का पान’ ख़ुशबू दे

चली है बात कहीं जब भी अम्ने-आलम की
बहाँ बहाँ मेरा हिन्दोस्तान ख़ुशबू दे

बर्हाँ झुकाते हैं हम अपना सर अक़ीदत से
जहाँ कहीं हमें विद्या का दान ख़ुशबू दे

ब-वक़्ते शाम भी गूंजे भजन हर इक जानिब
सह्र के वक़्त भी मीरा की तान ख़ुशबू दे

नगर में गूंजती हो राम नाम की धुन भी
और उसके साथ मुक़द्दस आज़ान ख़ुशबू दे

मेरे दिल ने जिसे पुकारा है 

मेरे दिल ने जिसे पुकारा है
वो कोई चांद है सितारा है

ये हसीं रात, ये चमन, ये चांद
किस क़दर दिलनशीं नज़ारा है

तुझ को पाना ही मुद्दआ ठहरा
कश्तिए-दिल का तू किनारा है

तेरी ख़ुशियां भी हैं क़बूल मुझे
तेरा ग़म भी मुझे गवारा है

जो भी चाहो सलूक फ़र्माओ
दिल हमारा नहीें तुम्हारा है

हम ने तेरे बग़ैर इक इक पल
इक सदी की तरह गुज़ारा है

तू तसव्वुर से जा नहीं सकता
तू हमारा था तू हमारा है

हम ने जीवन का एक इक लम्हा
दर्द के गीत से संवारा है

इक क़ियामत से कम नहीं था वो
बिन तुम्हारे जो दिन ग़ुज़ारा है

दिल को नापाक सियासत से बचाए रखिए 

दिल को नापाक सियासत से बचाए रखिए
इसको ज़िल्लत से ज़लालत से बचाए रखिए

अपना दिल इश्को मुहब्बत से बचाए रखिए
इस अमानत को ख़यानत से बचाए रखिए

लड़की बालों से तहाइफ का तक़ाज़ा न करो
रस्में शादी को तिजारत से बचाए रखिए

जो अदावत में बहुत दूर निकल जाते हैं
ख़ुद को ऐसों की अदावत से बचाए रखिए

उजले दामन को सियाह दाग़ न लग जाए कहीं
अपने दामन को ग़लाज़त से बचाए रखिए

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