अपूर्व शुक्ल की रचनाएँ

तीन बार कहना विदा

भोर के जामुनी एकांत मे
जब रात का थका-हारा उनींदा शुक्रतारा
टूट कर गिरने को होगा अपनी नींद की भंवर मे
और सुबह की पहली ट्रेन की सीटी के बीच
शहर की नींद आखिरी अँगड़ाइयाँ ले रही होगी

मै छोड़ रहा होऊँगा
तुम्हारा शहर आखिरी बार, निःशब्द
जैसे नवंबर की ओसभीगी सुबह
चाय को छोड़ रही होती है भाप
बिना पदचाप के चुपचाप

शहर छोड़ती हुई गाड़ी का पीछा
सिर्फ़ सड़क की आवारा धूल करती है
कुछ दूर, हाँफ कर बैठ जाने तलक

और यह जानते हुए
कि हमारी यह मुलाकात
काफ़ी पी कर औंधा कर रख दिये गये
कप जैसी आखिरी है
मै इस बचे पल को काफ़ी के आखिरी घूँट की तरह
हमेशा के लिये घुलते रहने देना चाहता हूँ
जैसे कि भोर का अलार्म बजने से ठीक पहले के
स्वप्निल कामनाओं से भरे पवित्र पल
सहेज लेते हैं आखिरी मीठी नींद,

मै तुमसे कहूँगा विदा
वैसे नही जैसे कि पेड़ परिंदो को विदा कहते हैं हर सुबह
और ऋतुएँ पेड़ को कहती है विदा
बल्कि ऐसे जैसे हरापन पत्तों को कहता है
और कातर पत्ता पेड़ को कहता हैं विदा
टूट कर झरने से पहले
हाँ तुम कहना विदा
कि तीन बार कहने मे ’विदा’
दो बार का वापस लौटना भी शामिल होता है

हर रात
धो कर रख दिये जाते हैं काफ़ी के कप
बदलते रहते हैं फ़्लेवर्स हर बार, चुस्कियाँ लेते होठ
कुछ भी तो नही रहता है कप का अपना
एक ठंडी विवशता के अतिरिक्त

मै समेटूँगा शहर से अपने होने के अवशेष
खोलते हुए अपनी आवाज की स्ट्रिंग्स
तह करूँगा अपनी बची उम्र,
जलता रहेगा सपने मे लकड़ी का एक पुराना पुल
देर रात तक

चला जाऊँगा इतनी दूर
जहाँ एकांत के पत्थर पर
मौन की तरह झरती है बर्फ़
रात की काई-सनी पसलियों मे
बर्फ़ के खंजर की तरह धँसती हैं धारदार हवाएँ
जहाँ जोगी सरीखे वीतरागी ओक के वृक्ष प्रार्थनारत
धैर्यपूर्वक करते हैं अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा
और जहाँ बारिशों का बदन पसीने से नही
ओस से बना होता है

ऊँची उठती है हवा मे अकेली पतंग
टूटता है अकार्डियन की करुण धुन का माझा
आकाश की स्मृति मे कभी कुछ शेष नही रहता

तुम्हारे शहर मे
होती रहेंगी अब भी हर शाम बेतहाशा बारिशें
फूल कर झरते रहेंगे सुर्ख गुलमोहर अथाह
हवाएं तुम्हारे कालर से
उड़ा ले जायेंगी
फाड़ देंगी मेरी महक का आखिरी पुर्जा
बादल रगड़ कर धो देंगे
तुम्हारे कदमों के संग बने मेरे पाँवों के निशान
हमारी साझी सड़कों के याद्‍दाश्त से
एकाकी रह जायेंगे तुम्हारे पद-चिह्न

यहाँ बौने होते जायेंगे मेरे दिन
और रातें परछाइयों सी लम्बी होती रहेंगी
मै भटकता फिरूँगा
लाल ईंटों बनी भीड़ भरी तंग गलियों मे
शोरगुल भरी बसों, व्यस्त ट्रेन-प्लेटफ़ार्मों पर, पार्क की ठंडी भीगी बेंचो पर
मै तलाशा करूँगा तुमसे मिलती जुलती सूरतें
अतीत से बने उजड़े भग्न खंडहरों मे
वार्धक्य के एकांत से सूने पड़े चर्चों मे
करूँगा प्रतीक्षा
और रात खत्म होने से पहले खत्म हो जायेंगी सड़कें

फिर घंटियाँ बजाता गुजरेगा नवंबर तुम्हारे शहर से
थरथरायेंगे गुलमोहर
और त्याग देंगे अपने सूखे पीले पत्ते
चीखेंगे और उड़ते फिरेंगे शहर की हर गली मे दर-बदर लावारिस
अपने आँचल मे समेट लेंगी उनको विधवा हवायेँ
उन्हे आग और पानी के हवाले कर आयेंगीं

तुम्हारे चेहरे की पेंचदार गलियों मे
रास्ता भटक जायेगी उम्र
आजन्म वसंत के लिये अभिशप्त होगी तुम
तुम्हारे शहर के माथे से सूरज कभी नही ढलेगा
बदलती रहोगी तुम शहर की तरह हर दिन-साल
बदलता जायेगा शहर
हर नवागंतुक क्षण के साथ
मगर कहीं
शहर के गर्भ मे दबे रहेंगे मेरे पहचान के बीज
छुपा रहेगा हमारा जरा सा साझा अतीत
तुम्हारी विस्मृतियों के तलघर मे
ट्राय के घोड़े के तरह

और थोड़ा सा शहर
जो चु्पके से बाँध लाया मै
अपनी स्मृति के पोटली मे
बना रहेगा हमेशा वैसा का वैसा/ अपरिवर्तित
गुलमोहर का एक पत्ता
सहेजा हुआ है मेरी उम्र की किताब के सफ़हों के बीच
उम्मीद जैसा थोड़ा सा हरापन बाकी रहेगा उसमे हमेशा

टूटे हुए कप के कोरों पर
अंकित रह जाता है हमेशा
गर्म होठों का आखिरी स्वाद

वो कौन सा सपना था भगत?

वह भी मार्च का कोई आज सा ही वक्त रहा होगा
जब पेड़ पलाश के सुर्ख फ़ूलों से लद रहे होंगे
गेहूँ की पकती बालियाँ
पछुआ हवाओं से सरगोशी कर रही होंगी
और चैत्र का चमकीला चांद
उनींदी हरी वादियों को
चांदनी की शुभ्र चादर से ढक रहा होगा
जब कोयल की प्यासी कूक
रात के दिल मे
किसी मीठे दर्द सी आहिस्ता उतर रही होगी

और ऐसे बावरे बसंत मे
तुमने शहादत की उँगली मे
अपने नाम की अंगूठी पहना दी भगत?
तुम शहीद हो गये?
मैं हैरान होता हूँ
मुझे समझ नही आता है भगत!
जलियावाले बाग की जाफ़रानी मिट्टी मे ऐसा क्या था भगत
जिसने सारे मुल्क मे सरफ़रोशों के फ़स्ल उगा दी?

तुममे पढ़ने की कितनी लगन थी
मगर तुम्हे आइ सी एस पास कर
हाथों मे हुकूमत का डंडा घुमाना गवारा न हुआ
तुम अपने शब्दों को जादुई छड़ी की तरह
जनता के सर पर घुमा सकते थे
मगर तुमने सफ़ेद, लाल, काली टोपियों की सियासत नही की
तुमने मिनिस्टर बनने का इंतजार भी नही किया
हाँ, तुमने जिंदगी से इतनी मुहब्बत की
कि जिंदगी को मुल्क के ऊपर निसार कर दिया !

भगत
तुम एक नये मुल्क का ख्वाब देखते थे
जिसमे चिड़ियों की मासूम परवाज को
क्रूर बाज की नजर ना लगे
जहाँ भूख किसी को भेड़िया न बनाये
और जहाँ पानी शेर और बकरी की प्यास मे फ़र्क न करे
तुमने एक सपने के लिये शहादत दी थी, भगत!

और आज,
तुम्हारी शहादत के अस्सी बरस बाद भी
मुल्क उसी कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काट रहा है
जहाँ लगाम पकड़ने वाले हाथ भर बदल गये हैं

आज
जब नेताओं की गरदन पर पड़े नोटों के एक हार की कीमत
उसे वोट देने वाले मजदूर की
सात सौ सालों की कमाई से भी ज्यादा होती है
और जब क्रिकेट-फ़ील्ड पर उद्योगपतियों के मुर्गों की लड़ाई के तमाशे
टीवी पर बहुराष्ट्रीय चिप्स और शीतल पेयों के साथ
सर्व किये जा रहे होते हैं,
तब तुम्हारा मुल्क मुँह-अंधेरे उठ कर
थके कंधों पर उम्मीदों का हल लिये
बंजर खेतों मे भूख की फ़स्ल उगाने निकल जाता है
तब किसी लेबर चौराहे की सुबह
चमचम कारों के शोर के बीच
तुम्हारे मुल्क की आँखों मे रोटी का सपना
एक उधड़े इश्तहार की तरह चिपका होता है
और शहर की जगमग फ़्लडलाइटों तले अंधेरे मे
उसी मुल्क के खाली पेट से उसकी तंद्रिल आँखें
सारी रात भूखी बिल्लियों की तरह लड़ती रहती हैं !

और तरक्की के जिस चाँद की खातिर तुमने
कालकोठरी की अँधेरों को हमेशा के लिये गले से लगा लिया था
वह चाँद अब भी मुल्क के बहुत छोटे से हिस्से मे निकलता है
जबकि बाकी वतन की किस्मत के आस्माँ पे पसरी
अमावस की रात कभी खत्म नही होती.

आज जब तुम्हारा मुल्क
भूख मे अपना ही बदन बेदर्दी से चबा रहा है
तुम्हारे वतन के हर हिस्से से खून टपक रहा है भगत !

मै नही जानता
कि वतनपरस्ती का वह कौन सा सपना था
जिसने तुम्हारी आँखों से
हुस्नो-इश्क, शौको-शोहरत के सपनों को
घर-बदर कर दिया
और बदले मे तुमने अपनी नींद
आजादी के नाम गिरवी रख दी थी.
मुझे समझ नही आता भगत
क्योंकि हमारी नींदों पर अब
ई-एम-आइ की किश्तों का कब्जा है
और अपने क्षणिक सुखों का भाड़ा चुकाने के लिये
हम अपनी सोचों का गिरवी रख चुके हैं.

मगर आज फिर उसी मौसम मे
जब कि पेड़ों पर सुर्ख पलाशों की आग लगी हुई है
गेहूँ की पकी बालियाँ खेतों मे अपने सर कटा देने को तैयार खड़ी हैं
और वादियों के हरे ज़ख़्मों पर
चाँदनी सफ़ेद कफ़न सी बिछ रही है
बावरा बसंत फिर शहादत माँगता है
मगर महीने की तीस तारीख का इंतजार करते हुए
मुझे तेइस तारीख याद नही रहती है
मुझे तुम्हारी शहादत नही याद रहती है
क्योंकि हम अपने मुल्क के सबसे नालायक बेटे हैं
क्योंकि हम भागांवाला नही हैं, भगत !

पुराने जूतों को पता है

नये जूते
शोरूम की चमचमाती विंडो मे बेचैन
उचकते हैं
उछलते हैं
आतुर देख लेने को
शीशे के पार की फ़ंतासी सी दुनिया।
नये जूते
दौड़ना चाहते हैं धड़-पड़
सूँघना चाहते हैं
सड़क के काले कोलतार की महक
वे नाप लेना चाहते हैं दुनिया
छोड़ देना चाहते हैं अपनी छाप
जमीं के हर अछूते कोने पर ।

बगावती हैं नये जूते
काट खाते हैं पैरों को भी
अगर पसंद ना आये तो
वे राजगद्दी पे सोना चाहते हैं
वो राजा के चेहरे को चखना चाहते हैं ।
नये जूतों को नही पसंद
भाषण, उबाऊ बहसें, बदसूरती,
उम्र की थकान
वे हिकारत से देखते हैं
कोने मे पड़े उधड़े, बदरंग
पुराने जूतों को

पुराने जूते
उधड़े, बदरंग
पड़े हुए कोने मे परित्यक्त किसी जोगी सरीखे
घिसे तलों, फटे चमड़े की बीच
देखते हैं नये जूतों की बेचैनी, हिकारत
मुँह घुमा लेते हैं
पुराने जूतों को मालूम है
शीशे के पार की दुनिया की फ़ंतासी की हकीकत
पुराने जूतों ने कदम-दर-कदम
नापी है पूरी दुनिया
उन्हे मालूम है समंदर की लहरों का खारापन
वो रेगिस्तान की तपती रेत संग झुलसे हैं
पहाड़ के उद्दंड पत्थरों से रगड़े हैं कंधे
भीगे हैं बारिश के मूसलाधार जंगल मे कितनी रात
तमाम रास्तों-दर्रों का भूगोल
नक्श है जूतों के जिस्म की झुर्रियों मे।
पुराने जूतों ने चखा है पैरों का नमकीन स्वाद
सफर का तमाम पसीना
अभी भी उधड़े अस्तरों मे दफ़्न है
पुराने जूते
हर मौसम मे पैरों के बदन पर
लिबास बन कर रहे हैं ।

पुराने जूतों ने लांघा है सारा हिमालय
अंटार्टिका की बर्फ़ के सीने को चूमा है।
पुराने जूतों ने लड़ी हैं तमाम जंगें
अफ़गानिस्तान, फ़िलिस्तीन, श्रीलंका, सूडान
अपने लिये नहीं
(दो बालिश्त जमीं काफ़ी थी उनके लिये)
पर उनका नाम किसी किताब मे नही लिखा गया
उन जूतों ने जीती हैं अनगिनत दौड़ें
जिनका खिताब पैरों के सर पे गया है
मंदिरों से बाहर ही रह गये हैं पुराने जूते हर बार।
वो जूते खड़े रहे हैं सियाचीन की हड्डी-गलाऊ सर्दी मे मुस्तैद
ताकि बरकरार रहे मुल्क के पाँवों की गर्मी
पुराने जूतों ने बनाये हैं राजमार्ग, अट्टालिकाएँ, मेट्रो-पथ
बसाये हैं शहर
उगायी हैं फ़सलें
पुराने जूतों ने पाँवों का पेट भरा है।
उन जूतों ने लाइब्रेरी की खुशबूदार
रंगीन किताबों से ज्यादा देखी है दुनिया
पुराने जूते खुद इतिहास हैं
बावजूद इसके कभी नही रखा जायेगा उनको
इतिहास की बुक-शेल्फ़ मे।

पुराने जूतों के लिये
आदमी एक जोड़ी पैर था
जिसके रास्ते की हर ठोकर को
उन्होने अपने सर लिया है
पुराने जूते भी नये थे कभी
बगावती
मगर अधीनता स्वीकार की पैरों की
भागते रहे ताउम्र
पैरों को सर पर उठाये।

पुराने जूते
देखते हैं नये जूतों की अधीरता, जुनून
मुस्कराते हैं
हो जाते हैं उदास
पता है उनको
कि नये जूते भी बिठा लेंगे पैरों से तालमेल
तुड़ा कर दाँत
सीख लेंगे पैरों के लिये जीना
फिर एक दिन
फेंक दिये जायेंगे
बदल देंगे पैर उन्हे
और नये जूतों के साथ।

और वक्त के साथ

हाँ
वह भी कोई वक्त ही हुआ करता था
जब तुम्हारे इंतजार की राह पर दौड़ती
मेरी मासूम बेसब्री के
नाजुक पाँवों मे चुभ जाते थे
घड़ी की सुइयों के नुकीले काँटे
और जब
पाँव के छालों की थकान से रिसते
नमकीन आँसू हमारी रातों को जगाये रखते थे

वह भी कोई रातें हुआ करती थीं
जब कि हम
एक जोड़ी खाली हाँथों को
एक जोड़ी खाली जेबों के हवाले कर
अपने पैरों की जवाँ थकान
आवारा सड़कों के नसीब मे लिख देते थे
और
रात के काँपते गीले होठों पर
फ़ड़फ़ड़ा कर बैठ जाता था
कोई नाम

वह भी कोई शामें हुआ करती थीं
कि न हो कर भी
तुम मेरे इतने करीब हुआ करते थे
कि वक्त एक शरारती मुस्कान दाँतो तले दबाते हुए
’एक्स्क्यूज़ मी’ कह कर
कमरे से बाहर निकल जाता था
दबे पाँव

हाँ
वह भी कोई मौसम हुआ करता था
जब दिल की जेबें तुम्हारी यादों से
हमेशा भरी रहती थीं
और तुम्हारे अनलिखे खतों की खुशबू
हमारी रातों को रातरानी बना देती थी

और
जब किसी को प्यार करना
हमें दुनिया का सबसे जरूरी काम लगता था

मगर तब से
कितना पानी बह गया
मेरे पुल के साये को छू कर

और दुनिया की भरी-पूरी भीड़ मे
उसी गिरहकट वक्त ने काट ली
तुम्हारी यादों से भरी मेरे दिल की जेब
और मैं अपना चेहरा
किन्ही आइने जैसी शफ़्फ़ाक दो आँखों मे
रख कर भूल गया हूँ

अब
रात-दर-रात
मेरी पैनी होती जरूरतें
मेरे पराजित ख्वाबों का शिकार करती जाती हैं
और सुबह-दर-सुबह
मेरे पेट की आग जलाती जाती है
तुम्हारे अनलिखे खुशबूदार खत

और अब
जबकि जिंदगी के शर्तनामे पर
मैने अपनी पराजय के दस्तख़त कर दिये हैं
मैं तुम को हार गया हूँ
और अपने कन्धों पर
जिंदगी का जुँआ ढोने के बाद
मेरी थकी हुई शामें
भूलती जाती हैं
तुम्हारा नाम
हर्फ़-दर-हर्फ़

और घड़ी के नुकीले काँटे
जो कभी तुम्हारे इंतजार की राह पर दौड़ती
मेरी मासूम बेसब्री के
नाजुक पाँवों मे चुभ जाते थे
अब मेरी जरूरतों के पाँच-साला ’टाइमटेबल’ को
’पिन’ करने के काम आते हैं.
….
और खुदगर्ज वक्त
’विलेन’ सा हँसता रहता है.

समय की अदालत में 

क्षमा कर देना हमको
ओ समय !
हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
हमारे अपराध के लिये
कि बस जी लेना चाहते थे हम
अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
कुछ पलों के लिये ही सही
कि हमने मुक्ति की कामना नही की
बचना चाहा हमेशा
न्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं से
भागना चाहा नग्न सत्य से.

कि हम अपने बूढे अतीत को
विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
बॉटम्स अप !
कि हम बस जी लेना चाहते थे
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की जमीन
अपने हिस्से की खुशी
नहीं बाँटना चाहते थे
अपने बच्चों से भी

कि हम बड़े निरंकुश युग मे पैदा हुए थे
ओ समय
उस मेरुहीन युग में
जहाँ हमें आँखें दी गयी थीं
झुकाये रखने के लिये
इश्तहारों पर चिपकाये जाने के लिये
हमें जुबान दी गयी थी
सत्ता के जूते चमकाने के लिये
विजेता के यशोगान गाने के लिये
और दी गयी थी एक पूँछ
हिलाने के लिये
टांगों के बीच दबाये रखने के लिये

कि जिंदगी की निर्लज्ज हवस मे हमने
चार पैरों पर जीना सीख लिया था
सीख लिया था जमीन पर रेंगना
बिना मेरु-रज्जु के
सलाखों के बीच रहना,
कि हमें अंधेरों मे जीना भाता था
क्योंकि सीख लिया था हमने
निरर्थक स्वप्न देख्नना
जो सिर्फ़ बंद आँखों से देखे जा सकते थे
हमें रोशनी से डर लगने लगा था
ओ समय !

जब हमारी असहाय खुशियाँ
पैरों मे पत्थर बाँध कर
खामोशी की झील मे
डुबोयी जाती थीं,
तब हम उसमे
अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे

ओ समय
ऐसा नही था
कि हमें दर्द नही होता था
कि दुःख नही था हमें
बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
और कला कह देते थे उसे
कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
ढूँढ लेते थे
पिकासो की गुएर्निक आर्ट
दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
और यातना के चरम क्षणों मे
ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
सुला दिया था हमने
हमारे आत्माभिमान ने खुद
अपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

हम भयभीत लोग थे
ओ समय !
इसलिये नही
कि हमें यातना का भय था,
हम डरते थे
अपनी नींद टूटने से
अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
अपनी कल्पनाओं का हवामहल
ध्वस्त होने से हम डरते थे,
उस निर्दयी युग मे
जब कि छूरे की धार पर
परखी जाती थी
प्रतिरोध की जुबान
हमें क्रांति से डर लगता था
क्योंकि, ओ समय
हमें जिंदगी से प्यार हो गया था
और आज
जब उसकी छाया भी नही है हमारे पास
हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है

हाँ
हमे अब भी उस बेवफ़ा से उतना ही प्यार है !

बसंत का गीत

कौन सा
अनजाना गीत है वह
जिसे
चैत्र की भीगी भोर में
चुपके से गा देती है
एक ठिगनी, बंजारन चिड़िया
विरही, पत्र-हीन, नग्न वृक्ष
के कानों मे
कि गुलाबी कोंपलों की
सुर्ख लाली दौड़ जाती है
उदास वृक्ष के
शीत से फटे हुए कपोलों पे
और शरमा कर
नये पत्तों का स्निग्ध हरापन
ओढ़ लेता है वृक्ष
खोंस लेता है जूड़े मे
लाल-पीले फूलों की स्मित हँसी
लचकती, पुनर्यौवना शाखाओं को
कंधों पर उठा कर
समुद्यत हो जाता है
उत्तप्त ग्रीष्म के दाह मे
जलने के लिये
क्रोधित सूर्य के कोप से आदग्ध
पथिकों को
आँचल मे शरण देने के लिये

सिर्फ़ बसंत मे जीना
बसंत को जीना
ही तो नही है जिंदगी
वरन्‌
क्रूर मौसमों के शीत-ताप
सह कर भी
बचाये रखना
थोड़ी सी सुगंध, थोड़ी हरीतिमा
थोड़ी सी आस्था
और
उतनी ही शिद्दत से
बसंत का इंतजार करना
भी तो जिंदगी है

हाँ यही तो गाती है
ठिगनी बंजारन चिड़िया
शायद!

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