अफ़ज़ल गौहर राव की रचनाएँ

आई थी उस तरफ़ जो हवा कौन ले गया 

आई थी उस तरफ़ जो हवा कौन ले गया
ख़ाली पड़ा है ताक़ दिया कौन ले गया

इस शहर में तो कोई सुलैमान भी नहीं
मैं क्या बताऊँ तख़्त-ए-सबा कौन ले गया

दुश्मन अक़ब में आ भी गया और अभी तलक
तुम को ख़बर नहीं है असा कौन ले गया

अपने बदन से लिपटा हुआ आदमी था मैं
मुझ से छुड़ा के मुझ को बता कौन ले गया

‘गौहर’ ये माजरा तो परिंदों से पूछना
पेड़ों को क्या पता है हवा कौन ले गया

अच्छा हुआ किनारा कटाव में आ गया 

अच्छा हुआ किनारा कटाव में आ गया
दरिया रूका हुआ था बहाओं में आ गया

करवट बदल के साँस लिया था ज़मीन ने
और आसमान यूँही तनाव में आ गया

हैरत है चंद बर्फ़ के फूलों के बोझ से
किस तरह ये पहाड़ झुकाव में आ गया

चौपाल की भड़कती कहानी के शौक़ में
क्या जाने कौन कौन अलाव में आ गया

सोचा था अब की बार किनारे पे जाऊँगा
दरिया भी मेरे साथ ही नाव में आ गया

हर आइने में तिरा ही धुआँ दिखाई दिया

हर आइने में तिरा ही धुआँ दिखाई दिया
मिरा वजूद ही मुझ को कहाँ दिखाई दिया

ये कैसी धूप के मौसम में घर से निकला हूँ
कि हर परिंदा मुझे साएबाँ दिखाई दिया

मैं अपनी लहर में लिपटा हुआ समुंदर हूँ
मैं क्या करूँ जो तिरा बादबाँ दिखाई दिया

कहा ही था कि सलाम ऐ इमाम-ए-आली-मक़ाम
हमारी प्यास को आब-ए-रवाँ दिखाई दिया

मिरी नज़र तो ख़लाओं ने बाँध रक्खी थी
मुझे ज़मीं से कहाँ आसमाँ दिखाई दिया

मैं अपनी ज़ात में जब से सितारा होने लगा

मैं अपनी ज़ात में जब से सितारा होने लगा
फिर इक चराग़ से मेरा गुज़ारा होने लगा

मिरी चमक के नज़ारे को चाहिए कुछ और
मैं आइने पे कहाँ आश्कारा होने लगा

ये कैसी बर्फ़ से उस ने भिगो दिया है मुझे
पहाड़ जैसा मिरा जिस्म गारा होने लगा

ज़मीं से मैं ने अभी एड़ियाँ उठाई थीं
कि आसमान का मुझ को नज़ारा होने लगा

अजीब सूर-ए-सराफ़िल उस ने फूँक दिया
पहाड़ अपनी जगह पारा पारा होने लगा

मैं एक इश्क़ में नाकाम क्या हुआ ‘गौहर’
हर एक काम में मुझ को ख़सारा होने लगा

सब को बता रहा हूँ यही साफ़ साफ़ मैं

सब को बता रहा हूँ यही साफ़ साफ़ मैं
जलते दिए से कैसे करूँ इंहिराफ़ में

मैं ने तो आसमान के रंगों की बात की
कहने लगी ज़मीन बदल दूँ ग़िलाफ़ में

गुमराह कब किया है किसी राह ने मुझे
चलने लगा हूँ आप ही अपने ख़िलाफ़ में

मिलता नहीं है फिर भी सिरा आसमान का
कर कर के थक चुका हूँ ज़मीं का तवाफ़ में

अब तू भी आइने की तरह बोलने लगा
पत्थर से भर न दूँ तिरे मुँह का शिगाफ़ में

ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले 

ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले
बर्फ़ से उठता हुआ एक धुआँ था पहले

मुझ से आबाद हुई है तिरी दुनिया वर्ना
इस ख़राबे में कोई और कहाँ था पहले

एक ही दाएरे में क़ैद हैं हम लोग यहाँ
अब जहाँ तुम हो कोई और वहाँ था पहले

उस को हम जैसे कई मिल गए मजनूँ वर्ना
इश्क़ लोगों के लिए कार-ए-ज़ियाँ था पहले

ये जो अब रेत नज़र आता है अफ़ज़ल ‘गौहर’
इसी दरिया में कभी आब-ए-रवाँ था पहले

ज़मीं से आगे भला जाना था कहाँ मैं ने
उठाए रक्खा यूँही सर पे आसमाँ मैं ने

किसी के हिज्र में शब से कलाम करते हुए
दिए की लौ को बनाया था हम-ज़बाँ मैं ने

शजर को आग किसी और ने लगाई थी
न जाने साँस में क्यूँ भर लिया धुआँ मैं ने

कभी तो आएँगे उस सम्त से गुलाब ओ चराग़
ये नहर यूँही निकाली नहीं यहाँ मैं ने

मिरी तो आँख मिरा ख़्वाब टूटने से खुली
न जाने पाँव धरा नींद में कहाँ मैं ने

ज़मीं से आगे भला जाना कहाँ मैं ने

ज़मीं से आगे भला जाना कहाँ मैं ने
उठाए रक्खा यूँही सर पे आसमाँ मैं ने

किसी कि हिज्र में शब से कलाम करते हुए
दिए की लौ को बनाया था हम-ज़बाँ मैं ने

शजर को आग किसी और ने लगाई थी
न जाने साँस में क्यूँ भर लिया धुआँ मैं ने

कभी तो आएँगे उस सम्त से गुलाब ओ चराग़
ये नहर यूँ ही निकाली नहीं यहाँ मैं ने

मिरी तो आँख मिरा ख़्वाब टूटने से खुली
न जाने पाँव धरा नींद में कहाँ मैं ने

तेरी दुनिया से ये दिल इस लिए घबराता है 

तेरी दुनिया से ये दिल इस लिए घबराता है
इस सराए में कोई आता कोई जाता है

तू ने क्या दिल की जगह रक्खा है पत्थर मुझ में
ग़म से भर जाऊँ भी तो रोना नहीं आता है

वो मिरे इश्क़ की गहराई समझता ही नहीं
रास्ता दूर तलक जाए तो बल खाता है

फिर भला किस के लिए इतनी चमकती है ये रेत
कोई दरिया भी नहीं है जो कहीं जाता है

उस के हाथों में वो परकार है जिस से ‘गौहर’
घूम जाती है ज़मीं आसमाँ चकराता है

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