अबरार अहमद की रचनाएँ

गुरेज़ाँ था मगर ऐसा नहीं था

गुरेज़ाँ था मगर ऐसा नहीं था
ये मेरा हम-सफ़र ऐसा नहीं था

यहाँ मेहमाँ भी आते थे हवा भी
बहुत पहले ये घर ऐसा नहीं था

यहाँ कुछ लोग थे उन की महक थी
कभी ये रहगुज़र ऐसा नहीं था

रहा करता था जब वो इस मकाँ में
तो रंग-ए-बाम-ओ-दर ऐसा नहीं था

बस इक धुन थी निभा जाने की उस को
गँवाने में ज़रर ऐसा नहीं था

मुझे तो ख़्वाब ही लगता है अब तक
वो क्या था वो अगर ऐसा नहीं था

पड़ेगी देखनी दीवार भी अब
कि ये सौदा-ए-सर ऐसा नहीं था

ख़बर लूँ जा के इस ईसा-नफ़स की
वो मुझ से बे-ख़बर ऐसा नहीं था

न जाने क्या हुआ है कुछ दिनों से
कि मैं ऐ चश्म-ए-तर ऐसा नहीं था

यूँ ही निमटा दिया है जिस को तू ने
वो क़िस्सा मुख़्तसर ऐसा नहीं था

हम ने रक्खा था जिसे अपनी कहानी में कहीं

हम ने रक्खा था जिसे अपनी कहानी में कहीं
अब वो तहरीर है औराक़-ए-खिज़ानी में कहीं

बस ये इक साअत-ए-हिज्राँ है कि जाती ही नहीं
कोई ठहरा भी है इस आलम-ए-फ़ानी में कहीं

जितना सामाँ भी इकट्ठा किया इस घर के लिए
भूल जाएँगे उसे नक़्ल-ए-मकानी में कहीं

ख़ैर औरों का तो क्या जिक्र कि अब लगता है
तू भी शामिल है मिरे रंज-ए-ज़मानी में कहीं

चश्म-ए-नमनाक को इस दर्जा हक़ारत से न देख
तुझ को मिल जाना है इक दिन इसी पानी में कहीं

मरकज़-ए-जाँ तो वही तू है मगर तेरे सिवा
लोग हैं और भी इस याद पुरानी में कहीं

जश्न-ए-मातम भी है रौनक़ सी तमाशाई को
कोई नग़्मा भी है इस मर्सिया-ख़्वानी में कहीं

आज के दिन में किसी और ही दिन की है झलक
शाम है और ही इस शाम सुहानी में कहीं

क्या समझ आए किसी को मुझ मालूम भी है
बात कर जाता हूँ मैं अपनी रवानी में कहीं

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है
हमेशा शाद हो आबाद हो जहाँ कोई है

जगह न छोड़े कि सैल-ए-बला है तेज़ बहुत
उड़ा पड़ा ही रहे अब जहाँ तहाँ कोई है

फ़िशार-ए-गिर्या किसी तौर बे-मक़ाम नहीं
दयार-ए-ग़म है कहीं पर पस-ए-फ़ुगाँ कोई है

वो कोई ख़दशा है या वहम ख़्वाब है कि ख़याल
कि हो न हो मिरे दिल अपने दरमियाँ कोई है

कभी तो ऐसा है जैसे कहीं पे कुछ भी नहीं
कभी ये लगता है जैसे यहाँ वहाँ कोई है

कभी कभी तो ये लगता है फ़र्द फ़र्द हैं हम
ये और बात हमारा भी कारवाँ कोई है

कहीं पहुँचना नहीं है उसे मगर फिर भी
मिसाल-ए-बाद-ए-बहाराँ रवाँ-दवाँ कोई है

हुआ है अपने सफ़र से हज़र से बेगाना
वहीं वहीं पे नहीं है जहाँ जहाँ कोई है

छलक जो उठती है ये आँख फ़र्त-ए-वस्ल में भी
तो सरख़ुशी में अभी रंज-ए-राएगाँ कोई है

शिकस्त-ए-दिल है तो क्या राह-ए-इश्क़ तर्क न कर
ये देख क्या कहीं परवर्दा-ए-ज़ियाँ कोई है

अब उस निगाह-ए-फ़ुसूँ-कार का क़ुसूर है क्या
हमें दिखाओ अगर ज़ख्म का निशाँ कोई है

कहीं पे आज भी वो घर है हँसता बस्ता हुआ
ये वहम सा है तिरे दिल को या गुमाँ कोई है

जवार क़र्या-ए-याराँ में जा निकलता हूँ
कि जैसे अब भी वहीं मेरा मेहरबाँ कोई है

तुझ से वाबस्तगी रहेगी अभी 

तुझ से वाबस्तगी रहेगी अभी
दिल को ये बेकली रहेगी अभी

सर को दीवार ही नहीं मिलती
सो ये दीवानगी रहेगी अभी

कोई दिन फ़ुर्सत-ए-तमन्ना है
कोई दिन सर ख़ुशी रहेगी अभी

कासा-ए-उम्र भी चुका फिर भी
कहीं कोई कमी रहेगी अभी

शब वही है जमाल-ए-ख़्वाब वही
आँख अपनी लगी रहेगी अभी

जिस क़यामत की आमद आमद है
वो क़यामत टली रहेगी अभी

हम यक़ीनन यहाँ नहीं होंगे
ग़ालिबन ज़िंदगी रहेगी अभी

कुछ अभी रंज-ए-आरज़ू है हमें
आँख में कुछ नमी रहेगी अभी

तू अभी मुब्तला-ए-दुनिया नहीं
तुझ में ये सादगी रहेगी अभी

ला-तअल्लुक़ हूँ उस तअल्लुक़ से
और ये दोस्ती रहेगी अभी

जी उचटता नहीं है लगता नहीं
सो ये बेगानगी रहेगी अभी

कहीं कोई चराग़ जलता है
कुछ न कुछ रौशनी रहेगी अभी

इक फ़रामोश कहानी में रहा

इक फ़रामोश कहानी में रहा
मैं जो उस आँख के पानी में रहा

रुख़ से उड़ता हुआ वो रंग-ए-बहार
एक तस्वीर पुरानी में रहा

मैं कि मादूम रहा सूरत-ए-ख़्वाब
फिर किसी याद-दहानी में रहा

ढँग के एक ठिकाने के लिए
घर-का-घर नक़्ल-ए-मकानी में रहा

मैं ठहरता गया रफ़्ता रफ़्ता
और ये दिल अपनी रवानी में रहा

वो मिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा-ए-तलब
अहद-ए-रफ़्ता की निशानी में रहा

मैं कि हँगामा-ए-यक-ख़्वाब लिए
कोई दिन आलम-ए-फ़ानी में रहा

क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा

क़िस्से से तिरे मेरी कहानी से ज़ियादा
पानी में है क्या और भी पानी से ज़ियादा

इस ख़ाक में पिन्हाँ है कोई ख़्वाब-ए-मुसलसल
है जिस में कशिश आलम-ए-फ़ानी से ज़ियादा

नख़्ल-ए-गुल-ए-हस्ती के गुल-ओ-बर्ग अजब हैं
उड़ते हैं ये औराक़-ए-ख़िज़ानी से ज़ियादा

हर रुख़ है कहीं अपने ख़द-ओ-ख़ाल से बाहर
हर लफ़्ज़ है कुछ अपने मआनी से ज़ियादा

वो हुस्न है कुछ हुस्न के आज़ार से बढ़ कर
वो रंग है कुछ अपनी निशानी से ज़ियादा

हम पास से तेरे कहाँ उठ आए हैं ये देख
अब और हो क्या नक़्ल-ए-मकानी से ज़ियादा

इस शब में हो गिर्या कोई तारीकी से गहरा
हो कोई महक रात-की-रानी से ज़ियादा

हम कुँज-ए-तमन्ना में रहेंगे कि अभी तक
है याद तिरी याद-दहानी से ज़ियादा

अब ऐसा ज़ुबूँ भी तो नहीं हाल हमारा
है ज़ख़्म अयाँ दर्द-ए-निहानी से ज़ियादा

ज़मीं नहीं ये मिरी आसमाँ नहीं मेरा

ज़मीं नहीं ये मिरी आसमाँ नहीं मेरा
मताअ-ए-ख़्वाब ब-जुज़ कुछ यहाँ नहीं मेरा

ये ऊँट और किसी के हैं दश्त मेरा है
सवार मेरे नहीं सार-बाँ नहीं मेरा

मुझे तुम्हारे तयक़्क़ुन से ख़ौफ़ आता है
कि इस यक़ीन में शामिल गुमाँ नहीं मेरा

मैं हो गया हूँ ख़ुद अपने सफ़र से बेगाना
कि नींद मेरी है ख़्वाब-ए-रवाँ नहीं मेरा

तो आब ओ ख़ाक से बच कर किधर को जाता मैं
दवाम-ए-वस्ल है बाक़ी निशाँ नहीं मेरा

फिर एक दिन उसी मिट्टी को लौट जाऊँगा
गुरेज़ तुझ से रह-ए-रफ़्तगाँ नहीं मेरा

सदा-ए-शहर-ए-गुज़िश्ता अभी बुलाती है
गो अब अज़ीज़ कोई भी वहाँ नहीं मेरा

ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू

ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू
एक दीवार खड़ी होगी जिधर जाएगा तू

शोर-ए-दुनिया को तो सुन रंग-ए-रह-ए-यार तो देख
हम जहाँ ख़ाक उड़ाते हैं उधर जाएगा तू

दर-ब-दर है तो कहीं जी नहीं लगता होगा
वो भी दिन आएगा थक-हार के घर जाएगा तू

आज़िम-ए-हिज्र-ए-मुसलसल हुआ इस मिट्टी से
लौट आएगा यहीं और किधर जाएगा तू

जान जाएगा कि मँज़िल नहीं मौजूद कहीं
ख़ुश-गुमाँ है अभी सरगर्म-ए-सफ़र जाएगा तू

आरज़ू रख उसे पाने की कोई रोज़ अभी
फिर यहीं बाम-ए-तमन्ना से उतर जाएगा तू

ये जो तूफ़ान तिरे गिर्द है दीवानगी का
इक ज़रा तेज़ हुआ और बिखर जाएगा तू

कारवाँ रद हुआ और चुप हुई आवाज़-ए-जरस
क्या अब उस सम्त को ता-हद्द-ए-नज़र जाएगा तू

अब कहाँ ख़्वाब-ए-मोहब्बत कि वो शब दूर नहीं
जब कहीं ख़ाक-भरी नींद से भर जाएगा तू

गर्द-ए-बे नियाज़ी में 

करो जो जी में आए
तोड़कर रख दो
है जो कुछ भी मेरे
दिल में या घर में
जिससे भी
निस्बत है कुछ मेरी
उसे कूड़े में फेंको
बारिशों में
गन्दगी के ढेर पर डालो
मुझे करना भी क्या है अब
कि अपनी ही किसी आवाज़ में गुम हूँ
ये रिश्ते भी कभी
ख़ुश रंग कपड़े थे
सजा करते थे हम पर
और इन्हें मैला भी होना था
उधड़ जाना था आख़िर को
यहाँ जो हम-दमी का वाहिमा है
अस्ल में ज़ँजीर है
जब्र-ए-मशिय्यत की, मशिय्यत की
कि कब कोई भी दिल
जा कर कभी धड़का किया है और सीने में
कि कब अकड़ी हुई गर्दन को
सजदे नर्म करते हैं
रऊनत, तिलमिलाहट है
हंसी आती है
ऐसी बे ठिकाना तमकिनत पर
रहम आता है
तो बस ये इल्तिफ़ात-ए-दाइमी
कुछ भी नहीं
माथे पे
गहराई तलक जाते
निशाँ से बढ़ कर
मदार ए वक़्त में
तन्हा ही चक्कर काटना
आख़िर निकल जाता है इंसाँ
और खो जाता है
गर्द-ए-बे नियाज़ी में

ये कालक क्यों नहीं जाती 

लिबास ए ज़र पहन रख्खा हो
चादर हो फ़क़ीरी की
बदन को ओढ़ रख्खा हो
कि दुबका हूँ लिहाफ़ों में
ये कालक, दाग़ है माथे का
दिल पर नक़्श है
इतराफ़ से उमड़ी हुई गाली है
गाली में छुपी तज़हीक है
इक ख़ौफ़ है
जो हर घड़ी गर्दिश में रहता है
नहूसत है
कहीं से काट देगी ज़िन्दगी का रास्ता
लहू में रोक है
कीचड़ है
उजले दिन के माथे पर
तबाही है
कोई बोहतान है
चुभता हुआ इक झूट है
बकवास है
नफ़रत का धारा है
उछलता है, मचलता है
कि पहनावे पे धब्बा है
बहुत मल-मल के धोता हूँ
ये कालक क्यों नहीं जाती
भला लगता है हर मलबूस मुझ को
चार सू रंगों का डेरा है
कई महताब हैं
जो तैरते हैं मेरी रातों में
चमक है ज़ाहिर ओ बातिन में
बहती है लहू बनकर
मगर फिर भी
कोई रंग ए मशिय्यत हो
कि नस्लों की रिआयत से
अता हो ज़िन्दगी के जब्र की
और ख़ून की निस्बत से हो
मक़्सूम इनसां का
वो कालक — क्यों नहीं जाती !

मुझे कोई नहीं रोकता 

चार सू फैली चान्दनी से मुँह मोड़ कर
बे-पनाह वीरानी में, रो देने को
जब रौशनी और उम्मीद की जानिब
खुलती खिड़कियों को बन्द करने लगता है
किसी दिल-नशीन मक़ाम से कूच कर के
ठीक तरह सांस लेने से
इनकार करने लगता हूँ
मुझे कोई नहीं रोकता
तर्क करने लगता हूँ, उन जगहों को
जिन से मेरी मिटटी, नमी लेती है
बन्द दरवाजों से टकराते हुए
किसी ना-मुमकिन ख़्वाब को
रवाना हो जाता हूँ
गाते हुए परिन्दों को उड़ाकर
दरख़्तों से लिपट जाने को
महकते लिबासों और चहलक़दमी की सरसराहट से
भागने लगता हूँ
दुखन की दहलीज़ पे ढह जाने के लिए
मँज़िलों से दूर
रास्तों में उड़ता चला जाता हूँ
ख़ामोशी की जानिब
अपना सफ़र तेज़ कर देता हूँ
और एक ख़राश को
जब तेज़ धार आले से गहरा करने लगता हूँ
कोई नहीं रोकता मुझे
धुन्द में खो जाने वाले
शायद — देख सकते हैं
और सिर्फ़ फैला सकते हैं
अपनी बाहें

गर्द-ए-बे नियाज़ी में 

करो जो जी में आए
तोड़कर रख दो
है जो कुछ भी मेरे
दिल में या घर में
जिससे भी
निस्बत है कुछ मेरी
उसे कूड़े में फेंको
बारिशों में
गन्दगी के ढेर पर डालो
मुझे करना भी क्या है अब
कि अपनी ही किसी आवाज़ में गुम हूँ
ये रिश्ते भी कभी
ख़ुश रंग कपड़े थे
सजा करते थे हम पर
और इन्हें मैला भी होना था
उधड़ जाना था आख़िर को
यहाँ जो हम-दमी का वाहिमा है
अस्ल में ज़ँजीर है
जब्र-ए-मशिय्यत की, मशिय्यत की
कि कब कोई भी दिल
जा कर कभी धड़का किया है और सीने में
कि कब अकड़ी हुई गर्दन को
सजदे नर्म करते हैं
रऊनत, तिलमिलाहट है
हंसी आती है
ऐसी बे ठिकाना तमकिनत पर
रहम आता है
तो बस ये इल्तिफ़ात-ए-दाइमी
कुछ भी नहीं
माथे पे
गहराई तलक जाते
निशाँ से बढ़ कर
मदार ए वक़्त में
तन्हा ही चक्कर काटना
आख़िर निकल जाता है इंसाँ
और खो जाता है
गर्द-ए-बे नियाज़ी में

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