अबू मोहम्मद सहर की रचनाएँ

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके
इक उम्र में भी हुस्न को अपना न कर सके

थी एक रस्म-ए-इश्क़ सो हम ने भी की अदा
दुनिया में कोई काम अनोखा न कर सके

कल रात दिल के साथ बुझे इस तरह चराग़
यादों के सिलसिले भी उजाला न कर सके

अब इस से क्या ग़रज़ है कि अंजाम क्या हुआ
ये तो नहीं कि तेरी तमन्ना न कर सके

ख़ुद इश्क़ ही को दे गए रूस्वाइयों के दाग़
वो राज़-ए-हुस्न हम जिन्हें इफ़शा न कर सके

ज़ौक़-ए-जुनूँ को रास नहीं तंग बस्तियाँ
सहरा न हो तो क्या कोई दीवारा कर सके

हर इम्तियाज़ उस के लिए हेच है ‘सहर’
जो अपनी ज़िंदगी को तमाशा न कर सके

इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके 

इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके
हम तिरी चश्म-ए-इनायत से उतर भी न सके

तू न मिलता मगर अल्लाह रे महरूमी-ए-शौक़
जीने वाले तिरी उम्मीद में मर भी न सके

बर्क़ से खेलने तूफ़ान पे हँसने वाले
ऐसे डूबे तिरे ग़म में कि उभर भी न सके

हुस्न ख़ुद हुस्न-ए-मुजस्सम से पशीमाँ उट्ठा
आईना ले के वो बैठे तो सँवर भी न सके

तिश्ना-लब बैठे हैं मय ख़ाना-ए-हस्ती में ‘सहर’
दिल वो टूटा हुआ पैमाना कि भर भी न सके

जब ये दावे थे कि हर दुख का मुदावा हो गए

जब ये दावे थे कि हर दुख का मुदावा हो गए
किस लिए तुम बाइस-ए-ख़ून-ए-तमन्ना हो गए

शौक़ का अंजाम निकला हसरत-ए-आग़ाज़-ए-शौक़
राज़ बन जाने से पहले राज़ इफ़शा हो गए

इक निगाह-ए-आश्ना का आसरा जाता रहा
आज हम तन्हाइयों में और तन्हा हो गए

तेरा मिलना और बिछड़ना क्या कहें किस से कहें
एक जान-ए-ना-तवाँ पर ज़ुल्म क्या क्या हो गए

माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे

माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे
अहल-ए-जुनूँ ख़ुद क्या समझे हैं नासेह क्या समझाँएगे

शायद अश्क ओ आह से ही अब बार-ए-अलम कुछ हल्का हो
हम भी करेंगे शोला-फ़िशानी हम भी लहू बरसाएँगे

जी न सकेंगे जीने वाले तर्क-ए-तअल्लुक़ कर के मगर
आप को भी कुछ वहशत होगी आप भी कुछ पछताएँगे

मिलना तेरा मुश्किल था तो जी लेते इस मुश्किल पर
पा कर तुझ को खोने वाले क्यूँकर जी बहलाएँगे

फूलों की तलब में थोड़ा सा आज़ार नहीं तो कुछ भी नहीं 

फूलों की तलब में थोड़ा सा आज़ार नहीं तो कुछ भी नहीं
ख़ुद आ के जो उलझे दामन से वो ख़ार नहीं तो कुछ भी नहीं

हो दिन की फ़ज़ाओं का सरगम या भीगती रातों का आलम
कितना ही सुहाना हो मौसम दिलदार नहीं तो कुछ भी नहीं

क्यूँ अहल-ए-सितम का दिल तोड़ें फिर शहर में चल कर सर फोड़ें
सहरा-ए-जुनूँ को अब छोड़ें दीवार नहीं तो कुछ भी नहीं

हर मौज-ए-बला इक साहिल है गिर्दाब ही अपना हासिल है
ये कश्ती-ए-दिल वो क़ातिल है मझंदार नहीं तो कुछ भी नहीं

क्या मीठे बोल सुनाते हो क्या गीत अनोखे गाते हो
क्या नग़मों पर इतराते हो झंकार नहीं तो कुछ भी नहीं

ये नाम ओ नुमूद की ख़्वाहिश क्या ये इल्म ओ फ़न की नुमाइश क्या
अपना तो अक़ीदा है ये ‘सहर’ मेयार नहीं तो कुछ भी नहीं

वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें

वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें
कुछ न कुछ सई-ए-इलाज-ए-दिल-ए-नाशाद करें

इश्क़ को हुस्न के अतवार से क्या निस्बत है
वो हमें भूल गए हम तो उन्हें याद करें

बस्तियाँ कर चुके वीरान तिरे दीवाने
अब ये लाज़िम है ख़राबा कोई आबाद करें

तह में गो हिकमत-ए-परवेज़ है रक़्साँ लेकिन
काम हर एक ब-नाम-ए-ग़म-ए-फ़रहाद करें

हुज्जत-ओ-इल्लत-ए-मालूल है यारों में ‘सहर’
बे-सबब शय का भी कोई सबब ईजाद करें

ये तो नहीं कि बादिया-पैमा न आएगा

ये तो नहीं कि बादिया-पैमा न आएगा
ये दश्त-ए-आरज़ू कोई हम सा न आएगा

चलना नसीब-ए-ज़ीस्त है यूँ ही चले चलो
इस रास्ते में शहर-ए-तमन्ना न आएगा

राह-ए-वफ़ा में क़तरा-ए-शबनम भी है बहुत
जिस से बुझेगी प्यास वो दरिया न आएगा

ख़ुद हो सके तो अपने अंधेरे उजाल लो
अब कोई साहब-ए-यद-ए-बैज़ा न आएगा

ऐ अहल-ए-दिल-ख़ामोश कि ये जा-ए-सब्र है
दुख तो यूँही रहेंगे मसीना न आएगा

गाहे वुफ़ूर-ए-शौक़ तो गाहे हुजूम-ए-यास
सब कुछ तो आएगा हमें जीना न आएगा

बैठे रहें ‘सहर’ यूँही दीवार ओ दर लिए
अपना जिसे कहें कोई ऐसा न आएगा

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