अमरेन्द्र की रचनाएँ

जन्म खण्ड / गेना

जों बसन्त मेँ गाछी के ठारी सेँ निकलै टूसा
चतुरदशी के बाद सरँग मेँ विहँसै चान समूचा
बितला शैशव पर जों आबै मारलेॅ जोर जुआनी
जेठोॅ के सुखलोॅ चानन मेँ जों भादोॅ के पानी

जिना जुआनी के ऐला पर आबै लाज-शरम छै
लाज-उमिर के ऐथैं युवतीं पाबै पिया परम छै
पिया परम के पैथें जेना सुध-बुध खोय छै नारी
ढोतेॅ बनै नै केन्हौँ ओकरा सुख के बोझोॅ भारी

जेना सौनोॅ मेँ पछिया के उठथैं चलै झकासोॅ
बेली के खिलथैं गंधोॅ रोॅ ठाँव-ठाँव पर बासोॅ
जों समाधि के लगथैं अजगुत सुख केॅ पाबै तपसी
तपला धरती के बादोॅ मेँ जेना आबै झकसी
आय वहेॅ रँ कादर-पट्टी झूमै झन-झन बाजै
डलिया-सुपती-मौनी-थरिया किसिम-किसिम के साजै
बरस-बरस के बितला पर लपकी बनलोॅ छै माय
सौंसे पट्टी रोॅ मौगी सब गेलोॅ छै उधियाय

करका, कच्चा माँटी रोॅ बुतरू रँ बुतरू भेलै
भोज-पात के नेतोॅ-पानी द्वारे-द्वार बिल्हैलै
गोबर केॅ पानी मेँ घोरी द्वार-भीत पर लीपै
कोय ऐंगन के मिट्टी के धुरमुस सेँ लै केॅ पीटै

छपरी के छौनी होलीॅ छै नया डमोलोॅ लै केॅ
लपकी रोॅ मरदाना खुश छै बाप पूत रोॅ भै केॅ
करिया-करिया छौड़ी-छौड़ा कादर रोॅ हुलसै छै
देखी केॅ लपकी रोॅ मरदाना के दुख झुलसै छै

गीत-नाद के कंठोॅ पर की टन-टन टीन टनक्का
काँसा के थरिया पर बाजै झन-झन-झनक झनक्का
बहुत दिनोॅ के बाद कदरसी अजगुत करै छै खेल
टोला भर रोॅ मौगी के माथा पर देखलौं तेल

देखी-देखी गोद रोॅ बच्चा लपकी हेनोॅ विभोर
आशिष दै छै खनै-खनै मेँ; इस्थिर रहै नै ठोर
मूँ केॅ चूमै, गाल केॅ चूमे, माथा चूमै लपकी
सुतलोॅ ममता हिरदय के हेनोॅ उठलोॅ छै भभकी

देखै तेॅ देखै मेँ पिपनी सुय्यो भरी हिलै नै
देर-देर तांय पोॅल बेचारा अलगे रहै, मिलै नै
छूवै छै गुदगुदोॅ तरत्थी, दह-तलवा केॅ छूवै
बुतरू बदला मय्ये केॅ गुदगुदी बदन मेँ हूवै

आरो कभी झुकी केॅ अपनोॅ सीना मेँ लै-लै छै
पोखरी पर जों सांझ झुकी केॅ कमल हृदय मेँ राखै
जत्तेॅ कि लेरुआ देखी नै गय्यो कभी पन्हाय छै
दूध बही केॅ साड़ी केॅ सरगद्दो करलेॅ जाय छै

घर-घर पीछू लपकी रोॅ बस भाग सर्हैलोॅ गेलै
कारोॅ पत्थर के पुतला रँ गेना गोद मेँ खेलै
कत्तेॅ दिन ताँय गीत-नाद के भेलै धूम-तमाशा
लपकी रोॅ दरवाजा सब रोॅ बनले रहलै बासा
बहुत दिनोॅ ताँय बुतरू-उतरू चुनमुन शोर मचैलकै
कोय बोकटोॅ कोय कोबोँ भर लै धुरदा मिली उड़ैलकै
रात-रात भर लपकी रोॅ घर होतेॅ रल्है इंजोर
दीखै दम्पत्ति केॅ दुनियाँ एकदम हरा कचोर

बाप बनै छै घोड़ा, बैठी गेना टिकटिक बोलै
माय रोॅ गोड़ोॅ के झुलवा पर ऊपर-नीचेॅ झूलै
बढ़लोॅ गेलै माय-बाप रोॅ हँसी-खुशी संग गेना
बीस बरस रोॅ भेलै कहिया, केकरौ ज्ञात नै केना।

 

विपद खंड / गेना

धरती पर के कवि जनमलै? केकरा साहस पास
बड़ा कठिन छै सबटा लिखना गेना रोॅ इतिहास
गिनना की केकरौ सेँ सम्भव छै चानन के बालू
गेना रोॅ दुख कहला सेँ पहिले सट्टै छै तालू
कलम उठैथैं कानेॅ लागै पापहरणी के पानी
दरकेॅ लागै भुइयाँ-भुइयाँ सुनथैं करुण कहानी
हुहुआबेॅ लागै छै दुख सेँ हवौ तुरत उनचास
कपसी-कपसी कानेॅ लागै धरती संग आकाश
गेना रोॅ दुख हेन्हे छै कि सुनथैं धर्य छुटै छै
माय रोॅ छाती की फटलै, मंदारो जाय फटै छै
सृष्टि बड़ी हेरैलोॅ लागै, चेहरा करुण उदास
बड़ा कठिन छै सबटा लिखना गेना रोॅ इतिहास
बीस बरस रोॅ होथैं गेना हेनोॅ ओझरैलै कि
सूतो नै ओझराबै। सोचै-जिनगी भेलै ई की!
इक्कीसो नै गेलोॅ होतै, गेलै सुख सब मौज
गेना रोॅ जिनगी के गढ़ केॅ तोड़ै दुख रोॅ फौज
जेठ-दुपहरिया के दिन छेलै जंगल मेँ जखनी कि
बाबू लकड़ी काटै छेलै, बाघें लेलकै लपकी
गूंजै छै कानोॅ मेँ अभियो बाबू-माय रोॅ शोर
गेना रोॅ जिनगी मेँ ढुकलै विपद बनी केॅ चोर
जगह-जगह मेँ सेंध लगैनें दुख सब ढुकले गेलै
मिली-जुली दुख गेना केॅ छै गेंद बनाय केॅ खेलै
बाबू के मरथैं मय्यो रोॅ हालत बड़ी विचित्र
घंटा-घंटा भर भीती पर लिखलोॅ लागै चित्र
कभी कहै छै, ‘दौड़ें बेटा, बाघ उतरलोॅ छौ रे
जो-जो रे बीजुवन बेटा, बाप गेलोॅ छौ भोरे
‘तोहरोॅ बाबू रे बेटा नेहोॅ सेँ अजगुत खान
हमरोॅ सुख नै देखलोॅ गेलै, दुष्ट भेलौ भगवान“
कुछ सेँ-कुछ फदकै, बोलै छै, हालत बड़ी विचित्र
घंटा-घंटा भर भीती पर लिखलोॅ लागै चित्र
ठाँय-ठाँय ठोकै चोखटी सेँ घुरी-घुरी माथोॅ केॅ
लपकीं छाती पर पटकै छै पीटनैं रँ हाथोॅ केँ
दौड़ी केॅ गेना रोॅ गल्ला सेँ लिपटै छै माय
दुख सेँ चीखै रही-रही केॅ; जों, रम्भाबै गाय
गुदड़ी-गुदड़ी करी लेलेॅ छै चेथरी-चेथरी साड़ी
चूल नोची केॅ धामिन लागै; आँख निरासै फाड़ी
सौ विधवा रँ असकल्ले ही माय कानै छै, कुहरै
गेना रोॅ आँसू ई देखी-देखी छलछल टघरै
कभी कहै छै, ”प्राण जरै रे, बेटा सुलगौ देह!“
कटलोॅ पाठा रँ तड़पै छै, करै दर्द सेँ ”एह!“
”सुन्नोॅ-सुन्नोॅ लागै रे संसार वृथा श्मशान
सारा दही सजाय रे हमरोॅ कोखी के सन्तान
”हमरे पाप विषैलौ बेटा, बाघें खैलकौ बाबू
जहर खिलाय केॅ मारी दे रे, जीत्तोॅ हम्मेँ आभू!“
टोला भर रोॅ जोॅर जनानी कस्सी पकड़ै माय
लेकिन कसलोॅ मुठ्ठी सेँ मछली रँ छिलकी जाय
पाँच बरस तक हेनै बितलै, कब ताँय आखिर जीतयै?
चेथरी-चेथरी चुनरी केॅ सूय्याँ सेँ बैठी सितयै?
भोर उठी रहलोॅ छेलै, लपकी रोॅ साँझ उतरलै
गेना-जिनगी मेँ जेठोॅ के धूप दुपहरिया भरलै
पाँच बरिस के जैथैं आरो बचलो सुख टा गेलै
मिली-जुली दुख गेना केॅ छै गेंद बनाय केॅ खेलै
माय-बाबू रोॅ मरथैं गोतियां चरकठिया लै लेलकै
जनम-जनम लेॅ वनवासी रामे रँ ओकरा कैलकै
दाना-दाना लेली बिलठै, हट्टो-हट्टो हूवै
अन्तर जेना-जेना धधकै, बाहर आँखो चूवै
कोय दुआरी पर नै आबै दै-अछूत जानी केॅ
जरो छुवैला पर लागै दू हाथ बड़ा हानी केॅ
बहुत विधाता निष्ठुर होय छै-जल्लादे रँ क्रूर
जे निर्दोष, करै छै ओकरै थोकची-थोकची चूर
एक साथ टूअर पर विधि रोॅ विपदा-भूख पियास
बड़ा कठिन छै सबटा लिखना गेना रोॅ इतिहास
हरदम लागै छै ओकरा बस आबेॅ हेने जेना
कंठोॅ मेँ लसकी गेलोॅ छै प्राण; गुजरतै गेना
कभी-कभी खुट्टा के बकरी जोरलोॅ बाघ दिखाबै
खनै-खनै लागै छै ओकरा ‘बाबू-मांय’ बुलाबै
कपसै छै भीती सेँ सट्टी, कोन्टा मेँ छै कानै
जिनगी के नद्दी सेँ दुक्खे-दुख रोॅ बोचोॅ छानै
छुटलै साथ स्नेहोॅ के तेॅ साथी-संग भी छुटलै
एक ‘दुलारी’ छेलै ऊ भी केकरो सेँ जाय जुटलै
दुख रोॅ एक अकेल्लोॅ साथी वहू आँख सेँ दूर
पर्वत सेँ पत्थर पर गिरलोॅ मन छै चकनाचूर
टुक-टुक ताकै दिन-दिन भर छै, रात-रात भर हेरै
यै पर डोरी मिरतूं-जिनगीं फेरा-फेरी फेरै
साल-साल भर देतेॅ रहलै सोच-फिकिर के हूल
जिनगी सालै गेना केॅ जेहनोॅ कुन्ती रोॅ भूल
साल-साल भर दुख सेँ होलै ओकरोॅ आँखमिचौनी
साल-साल भर देह-दंश नें कैलकै ओकरोॅ दौनी
आँख भी दुक्खै, कमर भी दुक्खै, गोड़-हाथ सब दुक्खै
लोर आँख सेँ जत्तेॅ टघरै, ओतनै ठोर छै सुक्खै
बैठलोॅ-बैठलोॅ देहरी पर घन्टा-घन्टा भर सोचै
चिन्ता सेँ अँगुरी देहोॅ मेँ गालोॅ मेँ छै कोचै
सोचै छै, ”जिनगी रोॅ बाकी समय केना केँ कटतै
की कादोॅ-कीचड़ के हरलै पर हमरो दुख हटतै
”कर्मे के की दोष सही मेँ? की समाज के खेला
की कूड़े-कर्कट मेँ छिपलोॅ हमरों भाग अधेला
”जों हेने छै, तेॅ दुख की छै।“ गेना मन मेँ सोचै
आपनोॅ तीस बरस रोॅ वय केॅ गाली दै-दै कोसै
की जानै छै जिनगी मेँ गेना-की छेकै सुक्ख
तीस बरस रोॅ ऊ जों छै, तेॅ साठ बरस रोॅ दुक्ख
बाहर-भीतर सेँ चललोॅ छै यै पर ऐतनैं चक्र
छेलै नै, पर बनी गेलॉ छै छिनमान अष्टावक्र।

 

बसन्त-खण्ड

बहै छै हवा रेशमी गुदगुदाबै
कली केॅ दै किलकारी-चुटकी खिलाबै
खिली गेलोॅ फूलोॅ केॅ चूमै-हँसाबै
बिना झूला के ही दै धक्का झुलाबै
हिलाबै छै झोली केॅ आमोॅ रोॅ ठारी
कभी देखी आबै छै सरसों रोॅ क्यारी
छुवै फूल हौले बड़ी डरलोॅ-डरलोॅ
कहीं हरदियानोॅ रँ बिरनी ही अड़लोॅ

डरी केॅ उड़ै, तेॅ ऊ तितली तक पहुँचै
बड़ी गुदगुदो देह पाबी केॅ हुमचै
कहीं जोगबारिन रोॅ आँचल केॅ छूवी
कभी ओकरोॅ गालोॅ रोॅ गड्ढा मेँ डूबी
बढ़ावै छै विरहा रोॅ आगिन केॅ आरू
‘पिया पंथ ऐसे मेँ कब तक निहारू’

वहाँ सेँ जाय पहुँचेॅ छै आमोॅ के वन मेँ
कहाँ छै छनै मेँ, कहाँ फेनू छन मेँ
कभी मंजरी के रस नीचेॅ चुआबै
कभी छेड़ी कोयल केॅ हेन्है चिढ़ाबै
घड़ी देर ठारी पर बैठी केॅ झूलै
ई देखी केॅ गेना कदम्बे रँ फूलै

बड़ी देर सेँ देखी रहलोॅ छै खेला
मनारोॅ के ऐंगन मेँ फागुन रोॅ मेला
जरा भी नै चिन्ता कि बीमारो ऊ छै
तपै देह, साँसो बहै जेना लू छै
उपासोॅ सेँ लरपच रँ बत्ती छै भेलोॅ
बहै देखै-देखै मेँ कुव्वत कमैलोॅ
नै हाथोॅ मेँ शक्ति, नै देहोॅ मेँ ताकत
हुएॅ लागै छै साँसो लै मेँ भी धतपत

लगै झुर्री, तांतोॅ रोॅ नोचलेॅ रँ साड़ी
की चारो तरफ सेँ छै काँटोॅ रोॅ बाड़ी
उठै, तेॅ ऊ पीपर रोॅ पत्ता रँ डोलै
बसन्ती हवौं ओकरा बरियोॅ रँ झोलै
मतुर कुछ नै चिन्ता छै गेना केॅ जरियो
की सेवा सेँ सब्भे के कम ऊ छै बरियो

लुभाभै छै गेना केॅ फूलोॅ रोॅ खिलबोॅ
लता-फूल दोनों रोॅ लिपटी केॅ मिलबोॅ
कहीं फूल गोरोॅ, कहीं लाल रत-रत
बहै छै हवा दक्खिनी चाल धतपत

कि झाँकै छै ठारी सेँ टूसा के पाँती
उतारी केॅ गल्ला सेँ जाड़ा रोॅ गाँती
कहीं फूल खिललोॅ सेँ जीरी छै निकलै
कहीं पीत पाखी एक गेना केॅ दिखलै
बड़ी शोख, चंचल; बसन्ती हवा रँ
कि मरता पर जेना मकरध्वज दवा रँ
हिलाबै छै गरदन, कहै टी-वी टुट-टुट
सुनी जेकरोॅ बोली छै बेचैन झुरमुट

कि जन्नेॅ भी गेना छै मूड़ी हिलाबै
वहीं रास गोकुल रोॅ सिमटै-सुहाबै
सुहाबै गोबरधन रँ ठामे मनारो
कि जै पर बसन्तें मचाबै धूम आरो
बिछैलेॅ छै फूलोॅ रोॅ कोनें बिछौना
कि के ऐतै? फागुन मेँ केकरोॅ ई गौना
किनारी-किनारी मेँ पत्ता रोॅ झालर
की फूलोॅ रँ मुखड़ा के नीचेॅ मेँ कालर

गिरै छै, बहै मोॅद फूलोॅ सेँ चूवी
कि दोना लै घूमै छै भौरा के जोगी
बजाबै छै मुँह सेँ जे शंृगी सुरोॅ सेँ
सुनी केॅ ई तितली उड़ै छै डरोॅ सेँ
सुगन्धित छै धरती की; सरंगो तक गमगम
पन्नी रोॅ धूप चमकै, ज्यादा न कमकम

निहारी-निहारी केॅ गेना छै बेसुध
मतैलोॅ रँ लागै, हेरैलोॅ रँ सुधबुध
मने-मन विचारै छै बौंसी लेॅ गेना
”सिरिष्टी पर सजलोॅ छै सरंगे ही जेना
बड़ा धन्य हम्मेँ, यहाँ जन्म लेलौं
कि मिट्टी रोॅ ई तन ई मिट्टी पर पैलौं

जहाँ देव-दानव भी आबै लेॅ तरसै
जहाँ मोक्ष हेनै केॅ बरखा रँ बरसै
जहाँ चीर, चानन, सुखनियाँ बहै छै
किनारी-किनारी मेँ पर्वत रहै छै
जे देखै मेँ लागै छै; बौंसी ने मूड़ी
बनैलोॅ छै कत्तेॅ नी ब्रह्मा सेँ कूढ़ी

”सुहाबै छै पाँती मेँ पर्वत पर फूलोॅ
पिन्हैलेॅ छै गल्ला मेँ माला की? एहो
कहीं कोन रँ के, कहीं कौन रँ के
मिलै फूल ढूँढ़ोॅ जहाँ जोन रँ के
हवा जों छुवै छै तेॅ अनचोके सिहरै
नवेली दुल्हैनी के लट्टोॅ रँ लहरै’

”पहाड़ोॅ के नीचेॅ मेँ चारो तरफ सेँ
सरोवर सुहाबै; गिरै मीन छप सेँ
वही बीच खिललोॅ छै ढेरे कमल भी
कमल पर टिकुलिये रँ भौंरा रेाॅ दल भी
बड़ी साफ-सुथरा दिखाबै पापहरणी
कुमारियो के गालोॅ सेँ चिकनोॅ, सुवरणी
सरोवर मेँ पर्वत मनारोॅ के छाँही
की दूसरोॅ कोय पर्वत छै पकड़ी केॅ बाँही
की उठलोॅ छै धरती सेँ आधोॅ ही पर्वत”
विचारोॅ पर गेना रोॅ पड़लोॅ छै आफत

”पहाड़ोॅ के माथा पर विष्णु रोॅ मन्दिर
वहीं से बही रहलोॅ छै पानी झिर-झिर
बुझाबै छै गंगा जटा शिव सेँ निकली
बही रहलोॅ छै नीचेॅ एकदम सम्हली
की राधा ही चल्ली छै घेॅरोॅ सेँ निकली
पिया के विरह मेँ बड़ी खीन-दुबली
बऔली छै पर्वत पर, पोखर मेँ, वन मेँ
जरी रहलोॅ आगिन छै सौंसे बदन मेँ!

बजै छै पहाड़ोॅ रोॅ भीतर मेँ बाजा
महादेव के डमरू? की मुरली मेँ आ जा

बसन्तोॅ के भारोॅ सेँ धरती छै लदबद
गिरै छै आकासोॅ सेँ सुषमा की हदहद!
कहै छै-कभी भारती वन जे छेलै
वही आज आँखी मेँ बरबक्ती हेलै
फिरू सेँ फुललै की मालूर कानन?
खुली गेलै केना केॅ सुषमा रोॅ बान्हन!”
बड़ी याद आबै छै गेना केॅ ऊ सब
”इस्कूली के पीछू सेँ निकली केॅ झबझब
यहीं आबै देखै लेॅ फूलोॅ पर तितली
मतैली रसोॅ सें, ओंघैली रँ तितली
कभी बाँसबिट्टी सेँ तोड़ै बँसबिट्टोॅ
झड़ाबै पहाड़ी लतामोॅ केॅ मीट्ठोॅ”
बड़ी याद आबै छै गेना केॅ ऊ सब
इस्कूली के पीछू सेँ निकली केॅ झबझब

”ऊ भादोॅ रोॅ दिन मेँ सुखनिया रोॅ बोहोॅ
मिलै अच्छा-अच्छा केॅ जै मेॅ नै थाहोॅ
कुदेॅ -धौंस मारै ऊ हेना-मेँ-हेना
कि डाँड़ी मेँ कूदै कोय बड़का ही जेना
बहै नाव नाँखी।कभी तोॅर हेनोॅ;
मछलिये रँ। उपलै कभी सोंस जेहनोॅ
हँकाबै, मतुर के सुनै माय केरोॅ
खड़ा देखै टुक-टुक सब साथी के जेरोॅ
बड़ी याद आबै छै गेना केॅ ऊ सब
ऊ भादोॅ के चानन मेँ पानी रोॅ लबलब

”ऊ आसिन मेँ कासोॅ रोॅ फुलबोॅ-फुलैबोॅ
इस्कूली सेँ भागी वहीं मेँ नुकैबोॅ
वहीं बैठी घरघोट खेला रोॅ मंगल
कभी जोड़िये मेँ की कुस्ती रोॅ दंगल

‘यही पापहरणी किनारी मेँ अइयै
गुलेलोॅ सेँ गोली की गनगन चलय्यै
कभी अट्ठागोटी, कभी नुक्काचोरी
कभी घघ्घो रानी, तेॅ झुनझुन कटोरी
कबड्डी मेँ लँघी सेँ हम्में नै डरियै
जरो सा नै खेलोॅ मेँ बेमानी करियै

”ऊ जेठोॅ के लू खोललोॅ, कड़कड़ैलोॅ
अभी ताँय नै भुललोॅ छी देह पड़पड़ैलोॅ
”यही ठुठ्ठा पीपर रोॅ गाछी तरोॅ मेँ
नुकाय केॅ रहौं; जबकि सब्भे घरोॅ मेँ
यहाँ आबी साथी संग बकरी चरय्यै
कभी दू केॅ सींगे धरी केॅ लड़य्यै
अभी ताँय नै भुललोॅ छी बकरी रोॅ मेँ-मेँ
ई पीपर रोॅ ठारी पर सुग्गा के टें-टें

”तेॅ ढकमोरलोॅ कत्तेॅ रहै तखनी पीपर
बसन्ते सेँ अखनी छै कुछ पत्ता जै पर
यहीं आबी शुकरां की छोड़ै उदासी
यही ठहरै सब्भे सवासिन पियासी
दुलारी रोॅ डोली यहीं रुकलोॅ छेलै
अभी भी ऊ सूरत ई आँखी मेँ हेलै
जमुनिया रँ। पानी मेँ केकरौ सेँ ऊपर
सुशीलोॅ -सुभावोॅ मेँ सब्भे सेँ सुन्नर
भरी दिन अकेली यही खिलखिलाबै
कभी बेर, जामुन केॅ तोड़ै-झड़ाबै
कभी हेन्हैं ढेपोॅ सरोवर मेँ मारै
कभी पापहरणी मेँ मूँ केॅ निहारै
गुँजाबै पहाड़ोॅ केॅ बोली ‘दुलारी’
पहाड़ो भी बोलै वही रँ ‘दुलारी’

”बसन्तोॅ सेँ मोजरै जे आमोॅ रोॅ ठारी
टिकोलौं बुलाबै पुकारी-पुकारी
लगाबै बिछी जे टिकोला के कूरी
कभी फेनू ऐलै नै नैहर ऊ घूरी

”दुलारी रोॅ डोली यही रुकलोॅ छेलै
अभी भी ऊ सूरत ई आँखी मेँ हेलै
बड़ी कपसी-कपसी केॅ डोली सेँ झाँकी
ई छाती मेँ सुइया सै गेलोॅ छै गाँथी

”कहै छेलै-जामुन रोॅ गाछी मेँ राती
जरै छै बिलारोॅ रोॅ आँखी रँ बाती
डरोॅ सेँ नै हिन्नेॅ तेॅ कोय्यो भी आबै
दुपहरियाँ भी आबै मेँ बड़का भोआबै
दुलारी के गेला पर हम्में अकेलोॅ
यही आबी राती की खोजियै? हेरैलोॅ

भरी दिन दुलारी रोॅ यादोॅ मेँ गुमसुम
कभी अपनोॅ ऐड़ी रँगय्यै मतरसुन
हँकय्यै, बुलैय्यै बताहा रँ केकरा
की सोची केॅ करियै हर चीजोॅ मेँ बखरा
कभी तोड़ी लय्यै पलाशोॅ रोॅ झुक्का
मतुर होश ऐला पर सपना सब फुक्का”

भरी ऐलै गना रोॅ आँखी मेॅ आँसू
बड़ी पीर चोखोॅ, बड़ी पीर धाँसू

”बहैलोॅ छै अय्यो बसन्तोॅ रोॅ बोहीॅ
गिरै छै अकाशोॅ सुषमा की होॅ-होॅ
करै मोॅन कोयल रोॅ बोली मेँ बोली
चिढ़ाबौं भरी दग; अघैलोॅ, जी खोली

”पलाशेॅ रोॅ फुल्लोॅ छै की फूल पावन!
हथेली रँगेलोॅ? की लट्ठी रोॅ कंगन?
की कानी केॅ भेलोॅ छ आँखे ही रत-रत
बड़ी लाल; प्यारी दुलारी के? की सत?

”करै मोॅन सबटा पलाशे लै आनौं
जों बच्चो मेँ; होनै केॅ बाल केॅ खानौं
बनाबौं वही मेँ बड़ा घोॅर सुन्नर
सजाबौं दुआरी सेँ देहरी लै छप्पर”

निहारै छै गेना पलाशोॅ केॅ टक-टक
कभी प्राण हुलसै कभी प्राण हक-हक

थकी रहलै कोयल पुकारी-पुकारी
‘कुहू तों कहाँ छोॅ ‘दुलारी’ दुलारी?’
सुनी केॅ बड़ी प्राण गेना रोॅ हहरै
कलेजा कलेजा तक केन्हौ नै ठहरै
तभी बोली केकरो सुनी केॅ संभल्लै
पुजारी केॅ ऐतेॅ देखी केॅ बदललै

कहाँ सेँ बुझैलै हौ ताकत बदन मेँ
उठी केॅ झुकी गेलै हुनकोॅ चरन मेँ
भरी गेलै भावोॅ सेँ; गदगद भै गेलै
पुजारी रोॅ आँखी मेँ गंगा समैलै
उठै छै हृदय मेँ ऊ ममता के धूनी
भरी पाँजोॅ गेना केॅ लै लेलकै हुनी
समैलै आकाशोॅ मेँ; जेनां हिमालै
समय दुख केॅ हलकोरी चलनी सेँ चालै

गिरै छै पुजारी रोॅ आँसू पीठी पर
भिंजै छै मतुर गेना भीतर-ही-भीतर
कहाँ गेलै हौ रँ बीमारी के आगिन
कहाँ गेलै उस्सठ रँ जिनगी रोॅ धामिन
बुझाबै छै गेना केॅ हेनोॅ; नसोॅ मेँ
बहै नै लहू; जेनां, चन्दन-रसोॅ मेँ
कड़क मारी बिजली कोय देहोॅ मेँ फेलै
शरीरोॅ मेँ सृष्टि के सुषमा समैलै
बुझाबै पुजारी रोॅ बोली भ्रमर रँ
लहर मारै गेना रोॅ सौंसे ठो अंग-अंग

”सुनी केॅ बीमारी के बेचैन भेलौं
खँड़ामो नै पिन्हलौं कि झबझब छी ऐलौं
खबर फैली गेलोॅ छै बोहोॅ रँ एकरोॅ
सुनी केॅ ई फाटै छै छाती नै केकरोॅ!
सुफल करलौ जिनगी मनुक्खोॅ रोॅ। आशीष!
कि तोरे ही जय-जय विराजै सभै दिश
यही धर्म देवोॅ रोॅ, मानव रोॅ, सबके
कही गेलै हमरोॅ सब पुरखें। आय? कब के

”यही धर्मवाला महाकाल रोॅ भी
सरोॅ पर चढ़ी हाँसै-‘दुनियाँ रोॅ सेवी’
करी गेलौ कलयुग केॅ तोहें छोॅ फीका
सुहाबौं ललाटोॅ पर विजयी रोॅ टीका
प्रभापूर्ण करलोॅ छी सौंसे जगत केॅ
कनक मेँ मणि कूटी आरो रजत केॅ
कभी की प्रभा ई खतम होतै-जैतै
यही पर चढ़ी फेनू सतयुग नी ऐतै
समाजोॅ रोॅ, सब्भे रोॅ सेवा जे करलौ
बनी केॅ तों विषहर जे विषधर केॅ हरलौ
सिखैलेॅ छौ मानव केॅ मानव रोॅ करतब
वहेॅ देखौ चललोॅ सब आबै छै झब-झब”

बढ़ी रहलोॅ फूलोॅ के बोहोॅ रँ जन छै
शरद-चान हेनोॅ ही गेना मगन छै
बहै छै पवन प्रेम रोॅ मन मेँ हू-हू
उठी गेलै दोनों ही अनचोके बाहू
उड़ी रहलोॅ अम्बर तक फूलोॅ रोॅ रंग छै
अजब आय धरती रोॅ दुल्हन के ढंग छै

खिली गेलै गेना रोॅ सौंसे बदन मेँ
करोड़ों कमल कखनी, केना केॅ क्षण मेँ!
खुली गेलोॅ मुन्हन छै अमरित कलश रोॅ
चलै झटकवा चारो दिश सेँ छै रस रोॅ
कि बरसो नै बरसै है रँ के हद-हद
भिंगी गेलोॅ गेना छै अनहद तांय सरगद

कुहू रोॅ मचै शोर मन रोॅ वनोॅ मेँ
पिकी के, भ्रमर के रव, एक्के क्षणोॅ मेँ
बजाबै छै कौने ई वीणा केॅ गाबी
अभी राग दीपक तेॅ मल्हार आभी?
सुनै, बंद कोषोॅ मेँ भौंरा रँ, गेना
कन्हैया रोॅ वंशी केॅ राधा ही जेनां
दिखाबै छै दुख-दाख कन्हौं नै काँही!
बहारोॅ के सुषमा सब मन के ही छाँहीं!

हरगीतिका छन्द

अजगुत दिरिश सब लोग देखै आय की ई रही-रही
झूमै लता-फल-फूल-कोढ़ी बांही सब रोॅ गही-गही
एक असकललोॅ विरिछ पर अरबौं फुललौ छै फूल-फल
मकरन्द सनलो भौरा लागै, सूर्य। खिललोॅ, नभ, कमल

ढेरे किसिम के नीड़ सेँ शावक चिरै के हेरै छै
बीजू वनोॅ सेँ पी-कहाँ के टेर पपिहो टेरै छै
की रँ उमड़लोॅ खसलोॅ छै ई भीड़ देखबैय्या केरोॅ
गिरि-वन केॅ लाँधी-लाँधी कम्मोॅ छै की लंघबय्या केरोॅ

सधरोॅ सब केॅ भी फानलेॅ नँगचावै जे; ऊ आय की?
देखै जों बाधा-विपद, मारै रोर छै। अनठाय की?
सब डैन-जोगिन देखी ई सब डर्है सें थर-थर करै
कृश काय गेना केरोॅ निरखी लोर आँखी सेँ झरै

लेकिन दुखोॅ रोॅ कोय छाया गेना मुख पर नै दिखै
जेना दिखै छै शांत गेना; भाग सब रोॅ विधि लिखै
सब लोग खाड़ोॅ भक्ति भरी-भरी सब्भे रही-रही जै करै
गेना कहै, ”सब लोग मिली-जुली सृष्टि मंगलमय करै“

गीतिका छन्द

”सब हँसेॅ दुसरौ केॅ हक दौ-खिलखिलाबेॅ, ऊ हँसेॅ
सब हुएॅ ठाढ़ो, जों दुष्टें एक केॅ भूलो डँसेॅ
जे जहाँ छै सब बरोबर; पशु हुएॅ या नर-त्रिया
देवता या दनुज जों कोय छै तेॅ बस लै केॅ क्रिया

”ऊ जे लोभें या डरोॅ सेँ सच नै बोलै, गुम रहै
आकि स्वारथवश ही खल केॅ साथ दै, ओकरे कहै
जे कि समता-समता कही-कही बस विषमता बाँचै छै
जे प्रवंचक, आत्मछलि जे, ऊ की जन केॅ जाँचै छै

”भेद-बुद्धि बढ़ला सेँ छै भेदो, कल्होॅ-कचकचोॅ
तोंय तरत्थी केॅ रँगोॅ आगिन सेँ नै। मेंहदी रचोॅ
स्वर्गो सेँ सुन्नर ीाुवन ई; वेदो तक है गाबै छै
हम्मी नै पुरखौं पुरातन युग सेँ कहलेॅ आबै छै

”आपनोॅ माँटी लेॅ, जन लेॅ, जान-जी सब धूले रँ
एतनै नेँ सौंसे भुवन रोॅ लोग लागेॅ फूलै रँ
आरो जे ससौदा करै ई फूल रोॅ; दुश्मन वही
जे सँहारेॅ हेनोॅ दुश्मन-नर वही, पावन वही

”मनुष सेवा सेँ बढ़ी केॅ धरमो नै, दरशन नै छै
की? कहाँ छै धर्म-दर्शन? देवतौं? जों जन नै छै
आदमी अमृत-विभासुत, देवता कलि कल्प रोॅ
आदमी जागेॅ तेॅ की तक्षक? की गेहुअन? अधसरोॅ?

”आदमी रोॅ मैल धोवेॅ-धरम ई गंगा हुएॅ
ठेलोॅ नै नर केॅ नरक मेँ; स्वर्ग केॅ आबेॅ छुएॅ

आदमी छै पहलेॅ तभिये धर्म रोॅ खाता-बही
जों मनुष हो जाय एक तेॅ धर्म दू रहतै ई की?

”जों मिलै मेँ धर्म बाधा; धरम की? ई जात की?
जे मनुष मानै छै सब मेँ भेद केॅ-ऊ पातकी
देवते नी आदमी रोॅ रूप धरी-धरी आबै छै
आरो नर रोॅ दुश्मनोॅ केॅ देवतौ नै भावै छै

”पाप रोॅ व्यापार-सौदा सब क्षणिक छै, बुलबुला
आदमी छोड़ेॅ नै श्रम केॅ, न्याय छै हाकिम तुला
शुद्ध ज्ञानोॅ सेँ, धरम सेँ, राजा रोॅ चित शुद्ध सेँ
ई सिरिष्टी बनतै फेनू स्वर्ग नानक-बुद्ध सेँ“

ई कही चुप भेलै गेना; स्वर मतुर सगरो फिरै
वायु रोॅ चंचल लहर पर वाणी रोॅ हंसनी तिरै
जेनोॅ कि मणि-खंभ पर माणिक जड़ित, छै सब रोॅ मुख
दुख हटी गेलोॅ छै सबसेॅ भींगै पोरे पोर सुख
सब रोॅ बीचोॅ मेँ होनै केॅ आय गेना शोभै छै
झीर-नद-मंदार, गंग-अजगैवी जेनोॅ भाबै छै।

 

पतझड़-खण्ड

जे तरह सन्यासी तेजै गद्दी या धनधाम
आरो जोगीं तृष्णा-माया-लोभो-रागो-काम
जों पति-परदेश पर तिरियां तजै सिंगार
तेहने तेजै पीरोँ पत्ता केॅ निपत्तोॅ डार

नागा हेनोॅ धारा-पाँती मेँ खड़ा छै गाछ
खोली केॅ सौंसे बदन कान्हा सेँ लैकेॅ काछ
रात मेँ ई ठूँठ लागै नँग धडंग रँ भूत
दिन मेँ लागै खाड़ोॅ छै श्मशान मेँ अवधूत

सामना मेँ ठूँठ पीपर रोॅ सहस्त्रो डार
जों बुझाबै छै सहसबाहु के ही अवतार
आकि पत्तावाला डाली भेलै धरती तोॅर
आरो जेना भै गेलोॅ छै उल्टै ऊपर जोॅड़
बोहोॅ पत्ता रोॅ बहै छै; दै हवां छै जोर
लड़खड़ावै, खड़खड़ावै छै, करै छै शोर
हरहराय केॅ खड्ड-खाई केॅ करै छै सोॅर
जे जहाँ छेलै वहीं पर भै गेलोॅ छै तोॅर

एक सन्नाटा उदासी छै परोसलोॅ शांत
गूंजै छै जों, खड़खड़ाहट सेँ समुच्चे प्रांत
हलहलाबै एक अभियो पर बनोॅ रोॅ गाछ
दूर सबसेँ, रीतु पतझर केॅ नचैतेॅ नाच

जोॅड़ निकली केॅ तना सेँ भै गेलोॅ छै तोॅर
के उजाड़ेॅ? देखथैं लागै हवा केॅ जोॅर
सब जगह के पंछी आबी केॅ लेलेॅ छै ठाँव
गूंजी रहलोॅ छै टी-वी-टू, कुहू आरो काँव

ताही नीचेॅ बैठलोॅ गेनां निरासै ठूँठ
सोचै, सचमुच जिन्दगी की व्यर्थ? बिल्कुल झूठ?
बाँचै रही-रही पत्र झुनिया रोॅ; ऐलोॅ छै आज
एक आखर पढ़थैं जेकरोॅ छै गिराबै गाज

छै लिखै कि ‘बड़ंका बाबू, की लिखौं सब हाल
खाट पर पड़लोॅ होलोॅ छै माय रोॅ कंकाल
आठ बरसोॅ रोॅ समय रोॅ आबी गेलै अंत
बीच मेँ आबी केॅ कहियो भी नै लेलौ तंत

”तों कमाबै मेँ सभै लेॅ छौ वहाँ मशगूल
माय रोॅ मूँ पर यहाँ उड़तेॅ रहै छै धूल
की पता तोरा वहाँ छौं, बौंसी रोॅ सब हाल
अबकि अगहन खेत मे ट कत्तेॅ रहै बेहाल

”एक दिन पड़लोॅ छेलै भादो फिरू सब शांत
पड़लै की! कानलोॅ छेलै देखी धधकलोॅ प्रांत
कौआ-कुत्ता कानतै रहलै अघन के बाद
देह दै-दै खेत केॅ लोगैं बनाबै खाद

”लोग दाना लेॅ मरै छै, गिद्ध रोॅ छै मौज
आठ बत्तिस रोॅ कन्हा पर गुजरै एक दिन? रोज
हर कहो जी! हर कहो जी! राम ही एक सत्त
गूंजै सद्धोखिन, घुमै छै मिरतु निर्भय-मत्त

”छोॅ दिनोॅ रोॅ भुखली रधिया के भेलै कल मौत
भाग्य सबके साथ घूमै छै बनी केॅ सौत

”जखनी रधियाँ दम तोड़लकै तखनी ओकरोॅ माय
की तरह सेँ छाती पीटै, रुदन करतें हाय
जों कबूतर लोटनी ही; आँखी में लै लोर
कै दिनोॅ तक रात-संझा आरो करतेॅ भोर

”आखिरी मेँ भूख नेँ मय्यो रोॅ लेलकै जान
रधिया पहिने; माय पीछू सेँ गेलै श्मशान’

‘लोग दुबड़ी-घास नोची केॅ मिटाबै भूख
गांग सेँ जयादा पवित्तर होय गेलोॅ छै थूक

आबेॅ पतझर जे भेलै, पत्ती नै; केन्होॅ हाल
बुतरूओ थोथोॅ मुँहोॅ सेँ छै चबाबै छाल

”छा बिन केन्होॅ लगै छै गाछ! सब रोॅ धोॅड़
आदमी हपकी गेलोॅ छै नीम तक के जोॅड़

”घर रोॅ पिछुवाड़ी मेँ तोहरे ही लगैलोॅ बेल
जै पेॅ झुलवा तोंय लगाय हमरा खेलाबौ खेल
आरो पत्ता केॅ चढ़ाबोॅ शिव केॅ भोरे-भोर
छाती फटतौं देखी केॅ रुकतौं जरो नै लोर

”छाल ओकरे नी उबाली कटलै दिन तेॅ रात
आबेॅ ऊ भी नै दिखै छै; मृत्यु लै छै घात
हमरा की? हम्में तेॅ लै छी माँटियो भी खाय
भूख सेँ बनलोॅ बिछौना खाट पर छै माय!

‘आखिरी ये वक्ति जेनोॅ लै हमेशे साँस
चाहै छै बोलेॅ लेॅ कुछ; गल्ला मेँ फसलोॅ फाँस

‘आँख खोलै, खुल्ले ही घन्टो रहै छै आँख
भूलो सेँ नै बन्द होय छै पलक रोॅ दू पाँख
बन्द होय छै तेॅ जेना खुलबै नै करतै हाय
बड़का बाबू, आबेॅ नै बचती लगै छै माय

”सनसनाठी रँ भेलोॅ छै गोड़ आरो हाथ
ठीक सेँ साँसो कि जेना दै नै ओकरोॅ साथ
खुल्ला आँखी मेँ जलै श्मशान जेना हाय
बड़का बाबू, आबेॅ नै बचती लगै छै माय“

पढ़ी-पढ़ी फाटै चित्त कपड़ा घुनैलो रँ
लोर ढरै गेना रोॅ आँखी सेँ गिरै टपटप

जेकरा कि मूड़ी दायाँ-बायाँ करी पोछी लै छै
बाँही सेँ। नै देखेॅ कोय यही लेली झबझब
मोॅन करै बच्चे रँ भोक्कार पारी कानौ पर
रहै छै दोनों ही ठोर खाली करी कपकप
हुमड़ै छै बन्द मूँ मेँ कानबोॅ गेना रोॅ आरो
आँखी मेँ दिखाबै लोरोॅ केरोॅ मोती दपदप।

कानोॅ मेँ गूंजै छै बात केकरोॅ ई घुरी-घुरी
झुनियाँ रोॅ बाबू छेकेॅ कानी-कानी बोलै छै
‘तोहें डोलोॅ शहरोॅ के शौक-मौजे मेँ ही
मरै तुल झुनियाँ रोॅ माय हुन्नेॅ डोलै छै
बड़ोॅ-बड़ोॅ बात करै छेलौ, मरै तुल छेलाँ
आदमी तेॅ सूने मेँ ही मोॅन-धोॅन खोलै छै
आय जत्तेॅ झुनियाँ रोॅ दुख सेँ दुखित नै छी
तोहरोॅ विचार कहीं ज्यादा मोॅन झोलै छै।

दागी देलेॅ रहेॅ देह छोॅड़ धीपलोॅ सेँ जेना
जेना छेदी देलेॅ रहेॅ आर-पार तीरोॅ सेँ
धीपी कनपट्टी गेलै-लाल-लाल लोहोॅ लाल
रहेॅ पारलै नै गेना तनियो टा थीरोॅ सेँ
घामोॅ सेँ नहैलै हेने; जेना, सुनी-सुनी बात
कानै छै दुखित होय सौंसे ही शरीरोॅ सेँ
चिन्ता, असगुन, याद, सोच सेँ बन्हैलै हेनोॅ
जेना हिरनौटा बंधेॅ हाथी के जंजीरोॅ सेँ।

घूमै छै आँखी मेँ फगदोल झुनियाँ रोॅ माय के
‘राम नाम सत्त है’ गूंजै छै दोनो कानोॅ मेँ
गेना आगू-आगू फगदोल पीछू लोग सब
रही-रही घूमै छै दिरिश यही ध्यानोॅ मेँ
छाती पीटी-पीटी हकरै छै, लोटै, माथोॅ चूरै
झुनियाँ कानै छै; जेना, भाला गाँथै जानोॅ मेँ
हेनोॅ कुम्हलाय गेलै गेना रोॅ बदन सौंसे
जेना कि गहन लागी गेलोॅ रहेॅ चानोॅ मेँ।

उठै-गिरै, गिरै उठै मनोॅ मेँ विचार फेरू
देखै छै कि झुनियाँ रोॅ माय आँख मीचै छै
‘मरतै की जीते जी ही हमरोॅ ?’ ई सोचथैं ही
लागै जित्तोॅ गेना रोॅ ही खाल कोय खीचै छै

‘ई नै होतै! ई नै होतै! केन्हौं केॅ भी ई नै होतै!
पूरा ई विश्वास साथ गेना साँस घीचै छै
बहै छै आँखी सेँ लोर आकि जमलोॅ होलोॅ केॅ
जानी केॅ बेकार, बेसी, आँखी सेँ उलीचै छै।

एक बार झोली सौंसे देह केॅ सजग भेलै
आँख मीची कस्सी केॅ निहारै फेरू चारो दिश
मुट्ठी बान्है, मनोॅ मेँ विचार करै कत्तेॅ -कत्तेॅ
चलै छै अभीयो वही अन्धड़-पानी के ढीस
थमै छै मनोॅ रोॅ हौलदिल आबेॅ; जेना, साँप
मार खाय लोटै, झाड़ै आखरी समय रोॅ रीस
मुँहो पेॅ चमक आबी गेलै खिली गेलै मोॅन
जली-जली राख भेलै, गेलै कुम्हलाय टीस।

घूरै छै आँखी मेँ सौंसे गाँव, घोॅर, लोग, जोॅन
देखै छै गेना कि जेना सब्भे दिश दौड़े छै
केकरो जाँतै छै गोड़, केकरो दबाबै देह
केकरो लेॅ कंद-मूल बनोॅ मेँ जाय तोड़ै छै
केकरो खिलाबै छै, पिलाबै छै दबाय-दारू
सब्भै सें ही नेहोॅ रोॅ सम्बन्ध दौड़ी जोड़ै छै
छोड़ै छै नै जात, परजात, पोॅर-परिजन
जेना झुनियाँ रोॅ रोगी माय केॅ नै छोड़ै छै।

देखै छै कि भूखोॅ सेँ भुखैलोॅ लोग हेनोॅ लागै
जेना कोय बच्चा नेँ बनैलेॅ रहेॅ तस्वीर
हाथ गोड़ लम्बा-लम्बा, डगमग, पेट आरो
पीठी रोॅ पता नै रहेॅ; अँगुरी जों रहेॅ तीर
आँख रहेॅ खोड़र ही, डीम; जेना, जीभ रहेॅ
देखी केॅ भौआय गेलै, गेना भै गेलै अधीर
सोचै छै ई आदमी रोॅ हाथ, गोड़, देह छेकै?
काठी खासी-खोसी गढ़ी देलेॅ छै सौंसे शरीर।

देखै छै गेना कि गेना दौड़ी-दौड़ी पानी लानै
छानी लानै, चुरू-चुरू प्यासला पिलाबै छै
माँगी लानै केकरौ सेँ बाजरा या मडुआ केॅ
आरो खतकाय वहेॅ केकरो खिलाबै छैै
जड़ी केॅ उखाड़ी लानै, केकरो बाँही पेॅ बान्है
केकरो लेॅ कूटी छानै, मोॅद मेँ मिलाबै छै
कालें नेँ मारी दलेॅ छै जेकरा कि थोकची केॅ
ओंकरौ भी गेना छूवी छनै मेँ जिलाबै छै।

जेना मधुमास मेँ पलास वन लहकै छै
शोभै छै सरंग पनसोखा रंग पाबी केॅ
माय-मोॅन जेना भरी उठै मद-मोद सेँ छै
फूल हेनोॅ छाती मेँ सोना रोॅ लाल पाबी केॅ
होन्हे गेना रोॅ सेवा सेँ सब्भे छै सरस-सुखी
ओकरोॅ निस्वार्थ प्रेम, त्याग-धोॅन पाबी केॅ
जेना परदेश मेँ खुशी सेँ कोय झूमी उठै
आपनोॅ देशोॅ रोॅ चैता, गोदना केॅ गाबी केॅ।

देखै छै तबैलोॅ ताँबा हेनोॅ देह चमकै छै
रूप; आग मेँ गलैलोॅ चाँदी हेनोॅ चमकै
सब्भे रोॅ मुँहोॅ पेॅ वही पुरबी छै, समदौन
झूमर के बोल घुँघरूवे हेनोॅ छमके
सुनी-सुनी सेहर के सुर, सुन्दरी रोॅ पाँव
आगू नै बढ़ै छै रुकी-रुकी जाय, ठमकै
टोला-टोला मेँ चली रल्होॅ छै वही गीत-नाद
कानोॅ मेँ गेना रोॅ वही ढोल-झाल झमकै।
आरी देखै छै गेना कि दौड़ी-दौड़ी लोगोॅ पीछू
गेना पड़ी गेलोॅ छै बीमार बड़ी जोरोॅ सेँ
हाथ गोड़ झामे रँ झमैलोॅ, कँपकँपी छूटै
पटपरी पड़ी गेलोॅ लहू चुवै ठोरोॅ सेँ
रसेॅ-रसेॅ ऐंठन उठै छै, उठले ही जाय
दरद देहोॅ मेँ फैलै उगी पोरोॅ-पोरोॅ सेँ
तहियो छै सबरोॅ सुखोॅ सेँ सुखी, हा! हा! हाँसै
बान्है; नै बन्हाबै आधि डायन के डोरोॅ सेँ।

 

शरत खण्ड

आसिन के माह बीती गेलै ऐलै आबेॅ कातिक
कैतकारोॅ हवा सौसें देह गुदगुदाबै छै
जेना छुवी देल रहेॅ मोरोॅ केरोॅ पखना सेँ
छिनमान होने हवा देहोॅ केॅ बुझाबै छै
रूई नाँखी उड़ै लेॅ चाहै छै मोॅन रहि-रहि
देहो केॅ बँधी केॅ रहबोॅ आय नै सुहाबै छै
फूल हेनोॅ दिनोॅ मेँ पराग नाँखी सौंसे रात
मनोॅ के बौराबेॅ लागेॅ -कातिक कहाबै छै।

धोलोॅ -धोलोॅ रात लागै, दिन भी नहैलोॅ हेनोॅ
साफ-साफ सरँगो भी कांचे रँ सुहाबै छै
गरदा के नाम नै कहीं पे जरियो टा भी छै
चुनी-चुनी बीछी लेलेॅ रेॅ हेॅ हेने लागै छै
रेशमी पटोरी रँ माँटी, मोॅन होने मोहै
मनोॅ सेँ विराग-जप-जोग केॅ भगावै छै
धोबी सेँ धुलैलोॅ दगदग धोती हेनोॅ दिन
जोगियो रोॅ निरमल मनोॅ केॅ लजाबै छै।

डाँड़े-डाँड़ गेना आबी रहलोॅ उदास खिन्न
टग्घै-झुक्कै, रुक्कै फेरू खुद केॅ सम्हारै लेॅ
साँझोॅ के संझबाती जरी चुकलोॅ छै घरेॅ-घरेॅ
पंडौ भी जुगाड़ोॅ मेँ छै आरती उतारै लेॅ
मनबिच्छा पाबै लेॅ मसूदन के द्वारी पर
ठाढ़ी छै जनानी-छौड़ी अँचरा पसारै लेॅ
झटकलोॅ-झटकलो गेनौ आबी रहलोॅ छै
बाबा केॅ कहै लेॅ कुछ, बाबा केॅ पुकारै लेॅ।

जोरोॅ सेँ, हौले सेँ बाजै-टुनटुनी मन्दिरोॅ मेँ छै
घंटा नाद सेँ मनार घन-घन करै छै
बाबा रोॅ पुजारी आरो भक्त रोॅ झुमै छै मोॅन
नाद सुनी पापी रोॅ करेजोॅ केन्होॅ डरै छै
बंशी जेना कृष्ण रोॅ गोपी रोॅ मोॅन हरै छेलै
भागवत-भजन होन्है केॅ मोॅन हरै छै
ठ्ट्ठ भीड़ लागलोॅ छै देवोॅ रोॅ दुआरी पर
जहाँ सुख बरसै छै, जहाँ पुन्य फरै छै।
पूर्णिमा रोॅ रात छै, आकासोॅ मेँ दूधिया चान्द
चाँदी रोॅ जलैलोॅ दीया-हेने ही दिखाबै छै
जेना बोहोॅ मेँ भाँसे छै कागज रोॅ नाव आरी
बच्चा सीनी देखी-देखी हाँसे, नाचै, गाबै छै
ओन्हे बोहोॅ चाँदनी रोॅ बहै छै धरती पर
भाँसे छै मंदार देखी चाँद मुस्काबै छै
ठाहाका इन्जोरिया के डरोॅ सेँ अन्हार आय
आपना केॅ घोॅर, लत्ती तोॅ र मेँ नकाबै छै।

धानोॅ सेँ जरी टा उच्चोॅ गेना, धानोॅ केॅ हटैनें
आबी गेलै मन्दिरोॅ के एकदम सामना
झपटी-झपटी चलै मेँ ऊ हाँफी रहलोॅ छै
रुकै छै केन्हौं केॅ नै शरीरोॅ केरोॅ घामना
पोछी केॅ हाथोॅ सेँ घाम, साँसोॅ केॅ जोरोॅ सेँ खींची
छोड़ी देलकै गेना नेँ बहुत आबी सामना
मतुर दुआरी पर गोड़ धरतेॅ ही हाय
रही गेलै मने मेँ मनोॅ रोॅ मनोकामना।

”केना जाँव भीतर मेँ बाबा रोॅ सूरत देखौं
लोगोॅ लेॅ हम्मेँ तेॅ होने, जेनाकि बच्चा लेॅ भूत
हम्मेँ नै बडोॅ बड़ोक्का, बड़ोॅ कुलोॅ रोॅ चिराग
आकि धरमोॅ के मालिक, टाका वाला केरोॅ पूत
हम्में ऊ जाति रोॅ छेकौं जेकरा कि काम एक
सब्मे रोॅ गूं साफ करौं आरो साफ करौं मूत
जेना आँख ऐला पर रोशनी आँखी केॅ गड़ै
सब्भे लोगोॅ के बीचोॅ मेँ होनै केॅ हम्में अछूत।

”ऊ दिनाँ पुरोहितो सेॅ बोलै छेलै यही नी कि
‘भगवान घट-घट मेँ निवास करै छै
एक्के ब्रह्म धरलेॅ छै यहाँ मेँ अनेक रूप
सब्भे मेँ बराबरे वही विलास करै छै
जबकि एक्के ही देव जीव दै छै, पालै-पोसै
आरो एक्के देव सब केॅ विनाश करै छै’
तबेॅ केना भेद भेलै आदमी-आदमी मेँ ही
एक-दूसरा के कहिनें उपहास करै छै।

”कभी-कभी तेॅ लागै छै हमरा यही कि प्रभु
ठिक्के कैहलोॅ छौ तोहें गीता मेँ हँकारी केॅ
तारा मेँ चन्द्रमा छेकौ, देवता मेँ इन्द्रदेव
पर्वतोॅ मेँ मेरू रूप आबौ तोहें धारी केॅ
सागरे जलाशय मेँ छौ, हाथी मेँ एरावत ही
कामधेनु गाय मेँ छोॅ -लघुता केॅ बारी केॅ
पशु मेँ होनै केॅ सिंह, ऋतु मेँ वसन्त छेका
तबेॅ छोटोॅ रोॅ के होतै? सोचलौ विचारी केॅ।

”यहेॅ तेॅ सुनै छियै कि पापी सेँ पापी केॅ तोहें
तारी देलौ! तरलै जरा-सा नाम लेथैं नी
बालमीकि तरलै तेॅ तरलै अजामिल भी
तरी गेलै गोड़ोॅ सेँ अहिल्या भी छुवैथैं नी
पातकी-पतित कत्तेॅ पापोॅ सेँ विमुक्त भेलै
याद तोरोॅ एक बार हिरदै मेँ ऐथैं नी
यही सब सुनी आबी गेलोॅ छियौं द्वारी पर
कहै छौं-हाथी के सुनलौ सूँढ़ के उठैथैं नी।

”हम्में नै चाहै छी प्रभु उच्चोॅ घोॅर, उच्चोॅ जात
मोक्ष भी हम्में नै चाहौं, हम्मेँ यही चाहै छी
काटी लियौं जाड़ा केन्हौं ऐतनै करी देॅ तोहें
आरो तेॅ केन्हौं केॅ सब्भे जेना होय छै साहै छी
लागै छै यही कि प्रभु काटेॅ पारबोॅ नै जाड़ा
जबेॅ-जबेॅ आपनोॅ ही सामरथ थाहै छी
आरो की कहौं तोरा सेँ, सब्भे बात जानथैं छोॅ
होनै निभी जाय आबेॅ जेनाकि निबाहै छी।“

एतना कही केॅ गेना मने-मन लौटी ऐलै
आरो चढ़ी गेलै फेरू खेतोॅ केरोॅ आरी पर
गाढ़ोॅ दूध नाँखी वहेॅ चाँदनी, उफनैलोॅ रँ
बहै छै छप्पर पर, छोॅत आरी-बारी पर
मेटकी चानोॅ रोॅ जेना फटी गेलोॅ रहेॅ आरो
दूध बही गेलोॅ रहेॅ सुखदा-कछारी पर
लूटै छै चाँदनी परी छत्तोॅ पर चढ़ी-चढ़ी
रधवा रोॅ रधियो भी आपनोॅ खमारी पर।

टकटकी लगाय केॅ गेना चाँद केॅ निरासेॅ लागलै
माथा पेॅ पिठाली सेँ ही टिकुली बनैलोॅ चाँद
सरंगोॅ रोॅ कल्पदु्रम आँखी रोॅ आगू मेँ रहेॅ
आरो जेकरा मेँ लागै फूलै रँ फुलैलोॅ चाँद
नीला-नीला सरँगोॅ के सागर मथैला सेँ ही
भीतर सेँ अनचोकै बाहर ज्यों ऐलोॅ चाँद
नीचेॅ छुपी गेलोॅ छै की बाँही सेँ छुटी केॅ प्रिया
ऊपर सेँ झाँकी-झाँकी देखै छै बिहैलोॅ चाँद

कत्तेॅ गोरोॅ-गोरोॅ बनी रहलोॅ छै बौंसी-देह
लागै छै कि मली-मली दूधोॅ सेँ नहैले रहेॅ
झुक्कोॅ-झुक्कोॅ फूल नै ई खिललोॅ छै; हेने लागै
आपने सेँ गूँथी-गूँथी खोपा मेँ सजैलेॅ रहेॅ
चललोॅ छै पूजै लेॅ ही मनकामना मन्दिर
मनोॅ मेँ पुरै के कोय कामना मनैलेॅ रहेॅ
मंदारोॅ के ऊपर मेँ चमकै छै चाँद हेने
हाथोॅ मेँ पूजा के थाली जेना कि उठैलेॅ रहेॅ।

देखी-देखी आचरज गेना केॅ हुऐ छै घोर
चाँद छेकै या कंतरी दही रोॅ जमैलोॅ छै
आकि उतपाती कोनो बच्चा नें गुलैलोॅ सेँ ही
आकासोॅ मेँ बड़ोॅ-बड़ोॅ छेद करी देलोॅ छै
नै-नै ई शकुन्तला रोॅ वने केरोॅ खरगोश
भूलोॅ सेँ मैदानोॅ मेँ जे हिन्नेॅ चली ऐलोॅ छै
रही-रही गेना-हाथ पकड़ै लेॅ उठी जाय
चिन्तै की जे लोगें कहै-गेना उमतैलोॅ छै।

जेनाकि करै छै कोय देखीॅ अजूबा चीज
होन्है ही कराय आय चान छै बेचारा केॅ
चान की? लागै छै जेना नीलम-परातोॅ मेँ ही
कल्हेॅ-कल्हेॅ घुड़कैतेॅ रहेॅ कोय पारा केॅ
आकि खाली मूड़ी देवदूत रोॅ दिखाय पड़ै
तैरै मेँ पानी रोॅ बीच-पाबै लेॅ किनारा केॅ
देखी-देखी गेना छै बौरैलोॅ जेना ओकरा केॅ
घोरी केॅ पिलैलेॅ रहेॅ भाँग मेँ धतूरा केॅ।

 

अपशगुन

हे गुरू, ऊ स्वप्न केन्होॅ घोर,
सच हुऐ नै पारेॅ, करिया भोर!

सब दिशाहे घूरतें जों प्रेत,
आगिनोॅ केॅ छै उड़ैतेॅ रेत।

सुखलोॅ कुइयां पोखरो, घट-घाट,
छै रसातल में धसैलोॅ पाट।

टूटलोॅ छै वेदी रोॅ सब भोर,
डैनियो सेॅ क्रूर करिया भोर।

ब्रह्मबेला मेॅ कपसवोॅ-शोर,
की अघट लैये केॅ ऐतै भोर।

हे गुरू ई केन्होॅ करिया घोर,
आँख में पत्थर बनी छै लोर।

भोर के ई वक्तिये मेॅ
के विकट सम्वाद दै छै,

साधना के ही क्षणोॅ मेॅ
अस्त्र फेकी प्राण लै छै?

आकाशवाणी

कि तखनिये गूंजी उठलै
पूरे पम्पापुर-मतंगवन,
सातो सुर के एक लय मेॅ
गूंजी पड़लै झन-झनन-झन।

सब दिशा सेॅ एक बोली
”मत पुकारोॅ, कोय नै ऐथौं,
हे शबरबाला सुनी लेॅ
चाहवोॅ सब व्यर्थ जैथौं।

”जे बुझै छौ नी, गलत छै
ई सही छेकै, ई जानोॅ,
सच कहीं की झूठ होलोॅ
तों भला कत्तो नै मानोॅ।

”राम रोॅ आदेश छेलै
जे प्रजापति लोक केरोॅ
तोरोॅ शंका, भ्रम, व्यथा ई
व्यर्थ सब छौं; मोॅन फेरोॅ।

”कुछ तेॅ हेनोॅ बात होतै
ई निठुर निर्णय लियै मेॅ,
जे रहस बस राम जानै
बाकी तेॅ संशय जियै मेॅ।“

बोल भेलै बन्द औचक
पर गुंजैवोॅ बन्द नै छै,
सौन-भादो के दिनोॅ में
धूल रोॅ अन्धड़ चलै छै।

शबरी देखलकै दिशा दिश
कोय्यो नै छेलै वहाँ पर,
लोॅत-गाछोॅ-जंगलो-गिरि
काठ सब्भे जे जहाँ पर।

फूल उजरोॅ, नील, पीरोॅ
सब जरी केॅ खाक लागै,
ई हठासी की भेलै कि
नीचेॅ सबरोॅ थाक लागै।

सामने केरोॅ सरोवर
छै जमी केॅ पत्थरे रं,
लागै छै कुटियो ठो होन्हे
भूत-प्रेतोॅ के घरे रं।

 

ताड़ काटूँ, तरकुन काटूँ 

ताड़ काटूँ तरकुन काटूँ काटूँ रे वनखाजा
हाथी पर जों घुंघरू ठुमुक चले राजा

ठाठोॅ मेॅ चिरैया चहकै, मन मेॅ सौ-सौ फोड़ा टहकै
घोल्टू के जे बाबू गेलै, आबेॅॅ तेॅ दू बरखा भेलै
जब, सें शहरोॅ मेॅ गेलोॅॅ छै, चिट्ठी एक्को नै देलोॅॅ छै
हेनोॅ की निठुराई अच्छा, नौकरी सें तेॅ भलोॅ भिच्छा
सूनोॅ -सूनोॅ घोॅॅर लगै छै, मन मेॅ सौ फोड़ा टहकै छै
घर-धंधा मेॅ की मोॅन की लागतै, रात कटै छै हमरोॅ जागतै
खाली असगुन रही-रही आवै, केना नै ई मन घबरावै
अइये लिखवै चिट्ठी, कबतक सुनवै सबके ताना।

प्राणनाथ बस ई जानै छी, आशिख पावै लेॅॅ तरसै छी
चिंता नै तोहें कुछ करिहोॅ, ठिक्के छी, तोहें नै डरिहोॅॅ
घोल्टू नें इन्तहान जे देलकौं, दूसरी अबकी पास करलकौं
हाल-चाल सबके अच्छा छै, देवर झगड़े छौं; बच्चा छै
दादा परसू ही ऐलोॅ छौं, तोहें आवोॅ, ई कहलेॅ छौं
समझाना छै की केकरा केॅ, झगड़ा चलथौं बस लै दै केॅ
खेतोॅ के झगड़ा में अबकी, तोहें नै अइहोॅ कैन्हें कि
मंगवैलोॅ छौं लाठी-भाला, फरसा आरो गड़ासा ।

गाँमोॅ के पीरतिया खातिर, देवर रहै छौं बाहिर-बाहिर
गाँव-टोला में कानाफूसी, कहवै केकरा सें कहोॅॅ की
ललचनमाँ-कैलू के संग मेॅ, हिनियो रंगलोॅ छौं वही रंग मेॅ
डाँटोॅ तेॅॅ गलथोथरी करथौं, बचलोॅ इज्जत आबेॅॅ जैथौं
हीरोइन के की माने छै ? सबकेॅ ऊ यहा बोलै छै
मुश्किल छै लड़की के चलना, सीटी मारे छौं फुलचनमा
मनोॅ के ई बात कहै छी, हरदम्में डरलोॅ रहै छी
हाथ कभी पकड़ी केॅ छूथौं, हमरोॅ कान के पासा ।

गामोॅ के की हाल सुनैइयौं, केकरोॅ-केकरोॅॅ चाल सुनैइयौं
सिरचन दा, कैदू दा अबकी, दोनों ईलकसन के वक्ती
लड़लौं खून-खराबा भेलौं, गाँवोॅ मेॅ पाटीसन भेलौं
बिकवर्ड-फुरवर्ड, की बोलै छै, समझें मेॅ कुछ नै आवै छै
सबकेॅ सबसें डोॅॅर छै लागलोॅ, सबकेॅ देखभौ रातौ जागलोॅ
गाँमोॅ में की जी लागै छै, मन व्याकुल जेना दागै छै
लिक्खोॅ की कहिया आबै छोॅ, आरो हमरा लै जावै छोॅ
अबकी तेॅॅ हरगिज नै भुलयोॅ- लुंगा-चोली-साया ।

 

हिन्नें लोढ़ी हुन्नें पाटी 

हिन्नें लोढ़ी हुन्नें पाटी, सकर कन्न बीजू बन्न।

देखी अयलौं शहरो केॅ भी, गांवोॅ केॅ तेॅ देखले छै
के बचैतै दोनों केॅ ? संहार दोनों के लिखले छै
झुट्ठे हल्ला छेलै कि लोगोॅ केॅॅ चैन छै शहरोॅ मेॅ
प्राण उठै छै अमरित मेॅ भी, नै खाली ई जहरोॅ मेॅ
खून-खराबी, कोर्ट-कचहरी, मोॅर-मोकदमा रोजे-रोज
खून करै छै कौनें केकरोॅॅ, पुलिस करै छै केकरोॅ खोज
हरदम्मे छाती सें सटलोॅµ छूरा-बन्दूक की-की नै
कना रहै छै तौ पर भी सब ? काका, लोग वहाँ करोॅ धन्न ।

गाँवों में की सुख छै काका ? वहेॅ डकैती मारे-पीट
बड़का मैलकोॅॅ के हौ जूता, आरो हमरोॅ खुल्ला पीठ
शहरे हेनोॅ मारबोॅ-काटबोॅ, औरत के इज्जत सें खेल
बीच-बचाव करोॅ तेॅ काका, उल्टे जैभा थाना-जेल
पुजते रहोॅ जिनगी भर, फेरू ई सोॅर-सिपाही केॅ
के चाहै छै भोगै लेॅ ई नरक, कहोॅ नी । चाही केॅ ?
बोलोॅॅ माथा कहाँ बचाय लेॅ जैभा, कक्का ! शहरोॅॅ में ?
दोनों तरफें पथरे राखलोॅॅ, सोची केॅॅ हम्में छी सन्न ।

सब जग्घोॅ के एक्के रं लोग, सब जग्घोॅ के एक्के हाल
काँटोॅ गाछ मेॅ काँटे जादा होय छै, जोॅड़ रहेॅ या डाल
निकलोॅ नै गल्ली -कुच्ची मेॅ, निकलोॅ नै चैराहा पर
की काका विश्वास करै छोॅ, ई लोगोॅ बौराहा पर
नै बूझे छै प्रेम-दया कुछ, धोॅर-धरम के बातें की
जे साथी रास्ता में लूटेॅ, ऊ साथी के साथे की
मारी दै कि काटी दै, पर केॅॅहै लेॅ नै छोड़वै ई कि
आय सुरच्छा ओतनै महगोॅॅ-जतना की महगोॅ छै अन्न ।

 

केकरोॅ बीहा कन्नें 

कोसा कोसी भादोॅ मासी
हिरिया के बीहा कन्नें ?

जहाँ कर्ण रोॅ राज विराजै
बिहुला आरो बाला राजै
चन्दनबाला के भूमि जे
वासुपूज्य रोॅ वाणी बाजै
ऋषि ऋंगी रोॅ जन्मभूमि आ
तपोभूमि छै जन्नें,
हिरिया के बीहा हुन्नें ।

कोसा कोसी भादोॅ मासी
जिरिया के बीहा कन्नें ?

जहाँ हिन्दी रोॅ पहिलोॅ आखर
लिखलेॅ छेलै ज्ञान दीपंकर
जहाँ बैठी सौ ग्रंथ लिखलकै
सरपाद, शबरपा धुरन्धर
विक्रमशील विश्वविद्यालय
कभी विराजै जन्नें,
जिरिया के बीहा हुन्नें ?

कोसा कोसी भादोॅ मासी
खखरी के बीहा कन्नें ?

जहाँ विष्णु जीं मधु हनलकै
रुद्रासन अभियो भी झलकै
जहाँ राम जीं मूर्ति विष्णु रोॅ
स्थापित करी पूजा कैलकै
चैदह रत्न दुहैवाला
मन्दार विराजै जन्नें,
खखरी के बीहा हुन्नें ।

कोसा कोसी भादोॅ मासी
खखरी के बीहा कन्नें ?

जहाँ उठै सब भोर-विहानै
एक्को बाँध नै कोशी मानै
भैरु काका भरी जाल में
किसिम-किसिम के मछली छानै
माय कताने बूली-बूली
लोरी गावै छै जन्नें,
खखरी के बीहा हुन्नें ।

 

चकय के चकधुम

चकय के चकधुम, मकय के लावा
केना केॅ कटतै समय हो बाबा ।

छुछुन्दर सर पर चमेली तेल
सन्यासी सर पर फुलै कठबेल
लते मोचारै, की होतै गाभा ।

मरै तरासोॅ सें रेत-घाट
सुखी केॅ सुइया नदी के पाट
लहू देहोॅ रोॅ दिखै छै रावा ।

अदरा-पुरबा छै मनझमाने
कहूँ नै पछियो केरोॅ ठिकाने
की जे बरसतै दखनाहा हावा ।

यहाँ-वहाँ छै बहै वैतरणी
के देतै आशीष फेरी सुमरनी
हाथोॅ मेॅ सब्भे के सुलगै छै आवा ।

 

करिया झुम्मर 

करिया झुम्मर खेलै छी
लीख पटापट मारै छी ।

देखलौं यहू राज गे हिरिया
खाली झुट्ठे-झुट्ठे किरिया
खाय छै, पूछबै अगली बेरिया
इखनी तेॅॅ हमें कानै छी ।

पहिला सें ई निक्के छै
केना कहै छैं-ठिक्के छै
हिरिया, यहू फिक्केॅ छै
एतन्हंै हम्मू जानै छी ।

की कहियौ कि एक्के ठय्यां
हम्में बैकबर्ड, फुरबर्ड सैय्यां
रोज मरौड़ै हमरोॅ बैहियां
लोर आँखी सेॅ गारै छी ।

जेकरोॅ गोड़ें ढलढल फोका
ओकरोॅॅ बास्तें की पनसोखा
तोहीं खेलें औका-बौका
दरदोॅ सें हम्में फाटै छी ।

 

सिल-सिलोटी

सिल-सिलोटी
अट्ठा गोटी
कुट-कुट बोलै
सुक्खा रोटी
चार मनोॅ के
एक्के कोठी
आँख छेकौ कि
ई कजरौटी
ना जी के
मोटका चोटी

 

झगडू़-तगडू़ 

जखनी झगड़ू-तगडू़ आबै
केकरौ कुछुवो कहाँ सुहाबै
बात-बात में खट-खट-खट
एक्के बात केॅ लै केॅ रट
हेकरोॅ अलगे घुघुआ-घू
मौका पैथें थप्पड़-थू
टोला भर छै नाको दम
झगडू-तगडू, बम-बम-बम।

 

मोॅर-मसाला

नाना जी रोॅ लम्बा दाढ़ी
धनियोॅ, जीरोॅ, लौंग, सुपाड़ी
मंगरैलोॅ नै बुझै अनाड़ी
धनियोॅ जीरोॅ लौंग, सुपाड़ी
मिरचां, मरिच जिहै दै फाड़ी
धनियोॅ, जीरोॅ, लौंग, सुपाड़ी
तेजपत्ता के भारी नाड़ी।
धनियोॅ, जीरोॅ लौंग, सुपाड़ी
सौंफ चिबाबंे झाड़ी-झाड़ी
धनियोॅ, जीरोॅ, लौंग, सुपाड़ी।

 

बिल्ली आरो मूसोॅ 

मूस मुछुन्दर घुर-घुर-घुर
कोण्टे-कोण्टा फुर-फुर-फुर
बिल्ली मौसी हुलकै छै
मूसोॅ देखी पुलकै छै
मूसां देलकै लगे उड़ौन
झुट्ठे मौसी मारै रौन
खाँसी-सूखी, सर्दी-छीक
कोय तरह सें ई नै ठीक।

 

बाजै बीन

बाजै बीन, बजावै तीन
बात बड़ोॅ ई, बड़ा महीन ।

नाँती वास्तें बात बरोबर
की तबला, की ढोलक.टीन
बाजै बीन, बजावै तीन ।

बात बुझै लेॅ बिचला मामा
दौड़लै-लंका, तिब्बत, चीन
बाजै बीन, बजावै तीन ।

नानी सें जों बात पुछलियै
हुनका आवी गेलै नीन
बाजै बीन, बजावै तीन ।

 

के की करै 

हवा करै साँय-साँय
सुगा करै टाँय-टाँय
बैलगाड़ी चर्र-चोंय
बेंग करै टर्र-टोंय
नाना खाँसै ढाँय-ढाँय
नानी करै झाँय-झाँय ।

 

नानी

अ सें अक्खज ऊ सें ऊन
नानी जैती देहरादून
क सें कौआ ख सें खाल
नानी केरोॅ गलै नै दाल
ग सें गुल्ली घ सें घूस
केना काटतै नानी पूस
च सें चुक्का छ सें छाल
चलतें रहै छै नानी गाल
ज सें जातोॅ झ सें झोंक
नाना भरगर नानी फोंक
ट सें टूसोॅ ठ सें ठूँठ
नानी सहै नै कटियो झूठ
ड सें डब्बू ढ सें ढोल
नानी रोॅ सब दाँते गोल
त सें तुमड़ी थ सें थान
नानी रोॅ नाँती जजमान
द सें दमड़ी ध सें धोॅन
नानी चूल-सनांठी सोॅन
न सें नाना प सें पान
नान्है पर नानी रोॅ ध्यान
फ सें फदकी ब सें बाँस
खनखन नानी सहै नै झाँस
भ सें भगतिन म सें माय
नानी हमरी सुद्धि गाय
य से युक्ति र सें रीत
नानी खैथौं गावै गीत
ल सें लट्ठी व सें वाह
नानी रोॅ चाय्ये पर चाह
स सें सुइया ह सें होॅर
नानी रहतें केकरोॅ डोॅर ।

 

मामा

जंगल-झाड़-पतार-कदीमा-कद्दू-आलू
जत्तेॅ नै छै मामा ओत्तेॅ मामी चालू
अगरो-बगरो, कौआ-मैना, पिपरी-खटमल-खोटा
दूध किनै लेॅ मामा गेलै भूली ऐलै लोटा
हाथी-गीदड़-भैंसा-चीता-केला-खरबुज-भुट्टा
भैंस कहीं तेॅ छोड़ै मामा, लै आनै छै खुट्टा
अड़गड़ मारै, बड़गड़ मारै, मारै कुत्ता-बकरी
खाय सें पहिलें यहेॅ हुवै छै मामा जाय छै ढकरी
आलू-बालू-छर्री-लोहोॅ, नानी-नाना, दादा
कोय परीक्षा हुवेॅ मामा कॉपी छोड़ै सादा
देह बढ़ै लेॅ खाय छै मामा किसमिस-कंद-पपीता
तीन फिटोॅ सें बढ़थैं नै छै, दिन भर नाँपै फीता ।

 

बुतरु आरो विनती

दू-दू गो रसगुल्ला दे
केला छिलका खुल्ला दे
लेमनचूस के गोली दे
पन्नी ओकरोॅ खोली दे
दूध-दही के कुल्ला छी
हम्में बुतरु फुल्ला छी ।

 

लल्लू लाल

लल्लू लाल
करै कमाल ।
देह-हाथ लकड़ी
सुखलोॅ डाल ।
छोॅ कीलोॅ के
छट्ठा साल ।
जरा-सा डाँटोॅ
मूँ-गाल लाल ।
भात मिलै तेॅ
दै छै ताल ।
नाक सिकौड़ै
देखथैं दाल ।
मूसोॅ देखथैं
हाल बेहाल ।
खोटा, चीटी
वास्तें काल ।
पढ़ै-लिखै में
अव्वल आल ।
यहेॅ कमाल
लल्लू लाल ।

 

विनती 

हे भगवान, हे भगवान
माँगौं तोरा सेॅ ई दान
पोथी पर सेॅ हटै नै ध्यान
सागर नाँखी उमड़ेॅ ज्ञान
गलत काम मेॅ पकड़ौं कान
बाबू-माय के राखौं मान
बनौं जगत के सूरज-चान
भारतमाय के राखौं शान ।

 

मंटू मामा पीबी ताड़ी

मंटू मामा पीबी ताड़ी
हाँकेॅ लागलै मोटर गाड़ी ।
दाँया-बाँया सब कुछ छोड़ी
बीचे बीच सेॅ किल्ला तोड़ी
हैंडिल रहि-रहि घूमै छै
मंटू मामा झूमै छै ।
हैंडिल गेलै बगदी केॅ
आरो गाड़ी कबदी केॅ
तनटा जे दाँया झुकलै
बीच गढ़ैया मेॅ ढुकलै ।
गाड़ी भेलै चित्तचितांग
टुटलै मामा के दू टांग
मूँ मेॅ घुसलै कीचड़-कादोॅ
भर-भर गोबर केरोॅ लादोॅ ।
मामा बोलै गों-गों-गों
हुन्नें मोटर पों-पों-पों
मोटर ऊपर बनलै गामा
पिचका होय केॅ कानै मामा ।

 

 

 

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