‘अमीर’ क़ज़लबाश की रचनाएँ

आँखें खुली हुई है तो मंज़र भी

आँखें खुली हुई है तो मंज़र भी आएगा
काँधों पे तेरे सर है तो पत्थर भी आएगा

हर शाम एक मसअला घर भर के वास्ते
बच्चा बज़िद है चाँद को छू कर भी आएगा

इक दिन सुनूँगा अपनी समाअत पे आहटें
चुपके से मेरे दिल में कोई डर भी आएगा

तहरीर कर रहा है अभी हाल-ए-तिश्नगाँ
फिर इस के बाद वो सर-ए-मिंबर भी आएगा

हाथों में मेरे परचम-ए-आग़ाज़-ए-कार-ए-ख़ैर
मेरी हथेलियों पे मेरा सर भी आएगा

मैं कब से मुंतज़िर हूँ सर-ए-रहगुज़ार-ए-शब
जैसे के कोई नूर का पैकर भी आएगा

अपने हम-राह ख़ुद चला करना

अपने हम-राह ख़ुद चला करना
कौन आएगा मत रुका करना

ख़ुद को पहचानने की कोशिश में
देर तक आईना तका करना

रुख़ अगर बस्तियों की जानिब है
हर तरफ़ देख कर चला करना

वो पयम्बर था भूल जाता था
सिर्फ़ अपने लिए दुआ करना

यार क्या ज़िंदगी है सूरज की
सुब्ह से शाम तक जला करना

कुछ तो अपनी ख़बर मिले मुझ को
मेरे बारे में कुछ कहा करना

मैं तुम्हें आज़माऊँगा अब के
तुम मोहब्बत की इंतिहा करना

उस ने सच बोल कर भी देखा है
जिस की आदत है चुप रहा करना

बंद आँखों से वो मंज़र देखूँ 

बंद आँखों से वो मंज़र देखूँ
रेग-ए-सहरा को समंदर देखूँ

क्या गुज़रती है मेरे बाद उस पर
आज मैं उस से बिछड़ कर देखूँ

शहर का शहर हुआ पत्थर का
मैं ने चाहा था के मुड़ कर देखूँ

ख़ौफ़ तंहाई घुटन सन्नाटा
क्या नहीं मुझ में जो बाहर देखूँ

है हर इक शख़्स का दिल पत्थर का
मैं जिधर जाऊँ ये पत्थर देखूँ

कुछ तो अंदाज़-ए-तूफ़ाँ हो ‘अमीर’
नाव काग़ज़ की चला कर देखूँ

दामन पे लहू हाथ में ख़ंजर

दामन पे लहू हाथ में ख़ंजर न मिलेगा
मिल जाएगा फिर भी वो सितम-गर न मिलेगा

पत्थर लिए हाथों में जिसे ढूँढ रहा है
वो तुझ को तेरी ज़ात से बाहर न मिलेगा

आँखों में बसा लो ये उभरता हुआ सूरज
दिन ढलने लगेगा तो ये मंज़र न मिलेगा

मैं अपने ही घर में हूँ मगर सोच रहा हूँ
क्या मुझ को मेरे घर में मेरा घर न मिलेगा

गुज़रो किसी बस्ती से ज़रा भेस बदल कर
नक़्शे में तुम्हें शहर-ए-सितम-गर न मिलेगा

हाँ ये तौफ़ीक़ कभी मुझ को

हाँ ये तौफ़ीक़ कभी मुझ को ख़ुदा देता था
नेकियाँ कर के मैं दरिया में बहा देता था

था उसी भीड़ में वो मेरा शनासा था बहुत
जो मुझे मुझ से बिछड़ने की दुआ देता था

उस की नज़रों में था जलता हुआ मंज़र कैसा
ख़ुद जलाई हुई शम्मों को बुझा देता था

आग में लिपटा हुआ हद्द-ए-नज़र तक साहिल
हौसला डूबने वालों का बढ़ा देता था

याद रहता था निगाहों को हर इक ख़्वाब मगर
ज़ेहन हर ख़्वाब की ताबीर भुला देता था

क्यूँ परिंदों ने दरख़्तों पे बसेरा न किया
कौन गुज़रे हुए मौसम का पता देता था

यकुम जनवरी है नया साल है 

यकुम जनवरी है नया साल है
दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है

बचाए ख़ुदा शर की ज़द से उसे
बे-चारा बहुत नेक-आमाल है

बताने लगा रात बूढ़ा फ़क़ीर
ये दुनिया हमेशा से कंगाल है

है दरिया में कच्चा घड़ा सोहनी
किनारे पे गुमसुम महिवाल है

मैं रहता हूँ हर शाम शिकवा-ब-लब
मेरे पास दीवान-ए-‘इक़बाल’ है

मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा

मेरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा

गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा

उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा

यक़ीं न आए तो इक बात पूछ कर देखो
जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा

उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले
उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा

इक परिंदा अभी उड़ान में है 

इक परिंदा अभी उड़ान में है
तीर हर शख़्स की कमान में है

जिस को देखो वही है चुप-चुप सा
जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है

खो चुके हम यक़ीन जैसी शय
तू अभी तक किसी गुमान में है

ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन
आईना भी इसी चटान में है

सर-बुलंदी नसीब हो कैसे
सर-निगूँ है के साए-बान में है

ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते
कोई आसेब इस मकान में है

आसरा दिल को इक उम्मीद का है
ये हवा कब से बाद-बान में है

ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने
कौन है जो हमारे ध्यान में है

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