अमीर मीनाई की रचनाएँ

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ 

उस की हसरत[1] है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ

डाल कर ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ

ज़ब्त[2] कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
के उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ

उस के पहलू[3]में जो ले जा के सुला दूँ दिल को
नींद ऐसी उसे आए के जगा भी न सकूँ

नक्श-ऐ-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सजदे
सर मेरा अर्श[4] नहीं है कि झुका भी न सकूँ

बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझ को
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ

इस तरह सोये हैं सर रख के मेरे जानों पर
अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें इच्छा-desire
  2. ऊपर जायेंसहनशीलता-Forbearance
  3. ऊपर जायें गोद-Lap
  4. ऊपर जायें आसमान

तुन्द मै और ऐसे कमसिन के लिये 

तुन्द मय और ऐसे कमसिन के लिये
साक़िया हल्की-सी ला इन के लिये

मुझ से रुख़्सत हो मेरा अहद-ए-शबाब
या ख़ुदा रखना न उस दिन के लिये

है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार
सादगी गहना है इस सिन के लिये

सब हसीं हैं ज़ाहिदों को नापसन्द
अब कोई हूर आयेगी इन के लिये

वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिये

सारी दुनिया के हैं वो मेरे सिवा
मैंने दुनिया छोड़ दी जिन के लिये

लाश पर इबरत ये कहती है ‘अमीर’
आये थे दुनिया में इस दिन के लिये

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा
हया यकलख़त आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को अदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता

वो बेदर्दी से सर काटे ‘अमीर’ और मैं कहूँ उन से
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता

कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई 

कह रही है हश्र में वो आँख शर्माई हुई
हाय कैसे इस भरी महफ़िल में रुसवाई हुई

आईने में हर अदा को देख कर कहते हैं वो
आज देखा चाहिये किस किस की है आई हुई

कह तो ऐ गुलचीं असीरान-ए-क़फ़स के वास्ते
तोड़ लूँ दो चार कलियाँ मैं भी मुर्झाई हुई

मैं तो राज़-ए-दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे
जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई

ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा सब में हया का है लगाव

हाए रे बचपन की शोख़ी भी है शर्माई हुई

वस्ल में ख़ाली रक़ीबों से हुई महफ़िल तो क्या
शर्म भी जाये तो जानूँ के तन्हाई हुई

गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला के कहा
वाह सर चढ़ने लगी पाँओं की ठुकराई हुई

फुटकर शेर

1. उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो,
हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो।

2.इक फूल है गुलाब का आज उनके हाथ में,
धड़का मुझे है ये कि किसी का जिगर न हो।

3.अल्लाह रे सादगी, नहीं इतनी उन्हें ख़बर,
मय्यत पे आ के पूछते हैं इन को क्या हुआ।

4.किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र क्या है ‘अमीर’
ख़ुदा के घर भी न जाएंगे बिन बुलाये हुए।

5.ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उनको ख़बर न हो,
दिल में हज़ार दर्द उठे आंख ततर न हो।
मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब,
दो चार साल तक तो इलाही सहर न हो।

अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ

अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ
वो बुत वफ़ा पे न आया मैं बे-वफ़ा न हुआ।

सर-ए-नियाज़ को तेरा ही आस्ताना हुआ
शराब-ख़ाना हुआ या क़िमार-ख़ाना हुआ।

हुआ फ़रोग़ जो मुझ को ग़म-ए-ज़माना हुआ
पड़ा जो दाग़ जिगर में चराग़-ए-ख़ाना हुआ।

उम्मीद जा के नहीं उस गली से आने की
ब-रंग-ए-उम्र मिरा नामा-बर रवाना हुआ।

हज़ार शुक्र न ज़ाए हुई मिरी खेती
कि बर्क़ ओ सैल में तक़्सीम दाना दाना हुआ।

क़दम हुज़ूर के आए मिरे नसीब खुले
जवाब-ए-क़स्र-ए-सुलैमाँ ग़रीब-ख़ाना हुआ।

तिरे जमाल ने ज़ोहरा को दौर दिखलाया
तिरे जलाल से मिर्रीख़ का ज़माना हुआ।

कोई गया दर-ए-जानाँ पे हम हुए पामाल
हमारा सर न हुआ संग-ए-आस्ताना हुआ।

फ़रोग़-ए-दिल का सबब हो गई बुझी जो हवस
शरार-ए-कुश्ता से रौशन चराग़-ए-ख़ाना हुआ।

जब आई जोश पे मेरे करीम की रहमत
गिरा जो आँख से आँसू दुर-ए-यगाना हुआ।

हसद से ज़हर तन-ए-आसमाँ में फैल गया
जो अपनी किश्त में सरसब्ज़ कोई दाना हुआ।

चुने महीनों ही तिनके ग़रीब बुलबुल ने
मगर नसीब न दो रोज़ आशियाना हुआ।

ख़याल-ए-ज़ुल्फ़ में छाई ये तीरगी शब-ए-हिज्र
कि ख़ाल-ए-चेहरा-ए-ज़ख़्मी चराग़-ए-ख़ाना हुआ।

ये जोश-ए-गिर्या हुआ मेरे सैद होने पर
कि चश्म-ए-दाम के आँसू से सब्ज़ दाना हुआ।

न पूछ नाज़-ओ-नियाज़ उस के मेरे कब से हैं
ये हुस्न ओ इश्क़ तो अब है उसे ज़माना हुआ।

उठाए सदमे पे सदमे तो आबरू पाई
अमीर टूट के दिल गौहर-ए-यगाना हुआ।

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का
नाज़ुक बहुत है फूल चराग़-ए-मज़ार का

फिर बैठे-बैठे वाद-ए-वस्ल उस ने कर लिया
फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इन्तज़ार का

शाख़ों से बर्ग-ए-गुल नहीं झड़ते हैं बाग़ में
ज़ेवर उतार रहा है उरूस-ए-बहार का

हर गुल से लालाज़ार में ये पूछता हूँ मैं
तू ही पता बता दे दिल-ए-दाग़दार का

इस प्यार से फ़िशार दिया गोर-ए-तंग ने
याद आ गया मज़ा मुझे आग़ोश-ए-यार का

हिलती नहीं हवा से चमन में ये डालियाँ
मूँह चूमते हैं फूल उरूस-ए-बहार का

उठता है नज़अ में वो सरहाने से ऐ ‘अमीर’
मिटता है आसरा दिल-ए-उम्मीदवार का

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो 

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो
दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो।

मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब
दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो।

इक फूल है गुलाब का आज उन के हाथ में
धड़का मुझे ये है कि किसी का जिगर न हो।

ढूँडे से भी न मअ’नी-ए-बारीक जब मिला
धोका हुआ ये मुझ को कि उस की कमर न हो।

उल्फ़त की क्या उम्मीद वो ऐसा है बेवफ़ा
सोहबत हज़ार साल रहे कुछ असर न हो।

तूल-ए-शब-ए-विसाल हो मिस्ल-ए-शब-ए-फ़िराक़
निकले न आफ़्ताब इलाही सहर न हो।

क़ैदी जो था वो दिल से ख़रीदार हो गया

क़ैदी जो था वो दिल से ख़रीदार हो गया
यूसुफ़ को क़ैदख़ाना भी बाज़ार हो गया

उल्टा वो मेरी रुह से बेज़ार हो गया
मैं नामे-हूर ले के गुनहगार हो गया

ख़्वाहिश जो रोशनी की हुई मुझको हिज्र में
जुगनु चमक के शम्ए शबे-तार हो गया

एहसाँ किसी का इस तने-लागिर से क्या उठे
सो मन का बोझ साया -ए-दीवार हो गया

बे-हीला इस मसीह तलक था गुज़र महाल,
क़ासिद समझ कि राह में बीमार हो गया.

जिस राहरव ने राह में देखा तेरा जमाल
आईनादार पुश्ते-ब-दिवार हो गया.

क्योंकर मैं तर्क़े-उल्फ़ते-मिज़्गाँ करुँ अमीर
मंसूर चढ़ के दार पे सरदार हो गया.

हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी

हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
क्यों तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी

बाद मरने के भी छोड़ी न रफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

मैंने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी

आईना सुबह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी

यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यों दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी

हुस्न और इश्क़ हमआग़ोश नज़र आ जाते
तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी

किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं ‘अमीर’
वो मेरा घर है रहे जिस में मुहब्बत मेरी

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले

आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल
आप आते ही रहे मर गये मरने वाले

उठ्ठे और कूच-ए-महबूब में पहुँचे आशिक़
ये मुसाफ़िर नहीं रस्ते में ठहरने वाले

जान देने का कहा मैंने तो हँसकर बोले
तुम सलामत रहो हर रोज़ के मरने वाले

आस्माँ पे जो सितारे नज़र आये ‘आमीर’
याद आये मुझे दाग़ अपने उभरने वाले

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