अमीर हम्ज़ा साक़िब की रचनाएँ

बदन के लुक़मा-ए-तर को हराम कर लिया है 

बदन के लुक़मा-ए-तर को हराम कर लिया है
के ख़्वान-ए-रूह पे जब से तआम कर लिया है

बताओ उड़ती है बाज़ार-ए-जाँ में ख़ाक बहुत
बताओ क्या हमें अपना ग़ुलाम कर लिया है

ये आस्ताना-ए-हसरत है हम भी जानते हैं
दिया जला दिया है और सलाम कर लिया है

मकाँ उजाड़ था और ला-मकाँ की ख़्वाहिश थी
सो अपने आप से बाहर क़याम कर लिया है

बस अब तमाम हो ये वहम ओ ऐतबार का खेल
बिसात उलट दी सभी सारा काम कर लिया है

किसी से ख़्वाहिश-ए-गुफ़्तार थी मगर ‘साक़िब’
वफ़ूर-ए-शौक़ में ख़ुद से कलाम कर लिया है

दश्त-ए-बला-ए-शौक़ में ख़ेमे लगाए हैं 

दश्त-ए-बला-ए-शौक़ में ख़ेमे लगाए हैं
इब्न-ए-ज़ियाद-ए-वक़्त से कह दो हम आए हैं

इक कहकशाँ ही तन्हा नहीं वजह-ए-दिल-कशी
आँचल पे तेरे हम ने भी मोती लुटाए हैं

तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़-गार
तब ख़ानक़ाह-ए-इश्क़-ओ-मोहब्बत में आए हैं

तुम ही नहीं इलाज-ए-मोहब्बत से बे-नियाज़
हम ने भी एहतियात के पुर्ज़े उड़ाए हैं

लगता यही हे नूर के रथ पर सवार हूँ
आँखों ने तेरी मुझ को वो बरसते सुझाते हैं

वहशत सारा-ए-दहर में भी शाद-काम हैं
‘साक़िब’ ये लोग कौन से जंगल से आए हैं

गर्द-बाद-ए-शरार हैं हम लोग

गर्द-बाद-ए-शरार हैं हम लोग
किस के जी का ग़ुबार हैं हम लोग

आ के हासिल हो नाज़-ए-इज़्ज़-ओ-शरफ़
आ तेरी रह-गुज़ार हैं हम लोग

बे-कजावा है नाक़ा-ए-दुनिया
और ज़ख़्मी सवार हैं हम लोग

जब्र जे बाब में फ़िरोज़ाँ है
हासिल-ए-इख़्तियार हैं हम लोग

फिर बदन में थकन की गर्द लिए
फिर लब-ए-जू-ए-बार हैं हम लोग

बाद-ए-सर-सर कभी तो बाद-ए-सुमूम
मौज़-ए-ख़ाक-सार हैं हम लोग

चस्म-ए-नर्गिस मगर अलील भी है
किस लिए बे-किनार हैं हम लोग

तेरी इनायतों का अजब रंग ढंग था

तेरी इनायतों का अजब रंग ढंग था
तेरे हुज़ूर पा-ए-काएनात में लंग था

सहरा को रौंदने की हवस पा ब-गिल है अब
यूँ था कभी के दामन-ए-आफ़ाफ़ तंग था

दामन को तेरे थाम के राहत बड़ी मिली
अब तक मैं अपने आप से मसरूफ़-ए-जंग था

हँगाम-ए-याद दिल में न आहट न दस्तकें
शोरिश-कदे में रात ख़ामोशी का रंग था

तू आया लौट आया है गुज़रे दिनों का नूर
चेहरों पे अपने वरना तो बरसों का जंग था

रक़्स-ए-जुनून में भी था तारीक-ए-हुनर का ढब
सूफ़ी-ए-बा-सफ़ा था कोई या मलंग था

क्या आसमाँ उठाते मोहब्बत में जब के दिल
तार-ए-निगह में उलझी हुई इक पतंग था

ताब खो बैठा हर इक जौहर-ए-ख़ाकी मेरा

ताब खो बैठा हर इक जौहर-ए-ख़ाकी मेरा
जाने किस रंग में होगा गुल-ए-ख़ूबी मेरा

ज़ब्त-ए-गिर्या में है मश्शाक़ तमन्ना तू भी
क़तरा क़तरा सही दामन तो भिगोती मेरा

चाक-ए-वहशत से उतारता तो करम भी फ़रमा
यूँही कब से है धरा कूज़ा-ए-हस्ती मेरा

तेरी ख़ुश-बू तेरा पैकर है मेरे शेरों में
जान यूँही नहीं ये तर्ज़-ए-मिसाली मेरा

मेरी दुनिया इसी दुनिया में कहीं रहती है
वर्ना ये दुनिया कहाँ हुस्न-ए-तलब थी मेरा

न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज्र-ए-तलब रहा 

न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज्र-ए-तलब रहा
तेरे बाद बहर-ए-ख़याल में न ख़रोश उठा न ग़ज़ब रहा

मेरे सामने से गुज़र गया वो ग़ज़ाल दश्त-ए-मुराद का
मैं खड़ा रहा यूँही बे-सदा मुझे पास-ए-हद-ए-अदब रहा

उसे जाँ-गुज़ारों से क्या शग़फ़ उसे ख़ाक-सारों से क्या शरफ़
वो फ़ज़ीलातों के दयार में ब-हुज़ूर पा-ए-नसब रहा

वही बैअत-ए-ग़म-ए-हिज्र थी वही कश्फ़-ए-हुजरा-ए-वस्ल था
मैं मुरीद-ए-हल्क़ा-ए-ख़्वाब था सो क़रीन-ए-मुर्शिद-ए-लब रहा

तेरी मुम्लकत के निसाब पर कोई तबसरा भी करे तो क्या
वही रौशनी का सफ़ीर है जो असीर-ए-ज़ुल्मत-ए-शब रहा

ख़याल-ए-यार का सिक्का उछालने में गया

ख़याल-ए-यार का सिक्का उछालने में गया
जुनूँ ख़रीता-ए-ज़र था सँभालने में गया

लहू जिगर का हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-दस्त-ए-हिना
जो सौदा सर में था सहरा खंगालने में गया

गुरेज़-पा था बहुत हुस्न-पारा-ए-हस्ती
सो अरसा उम्र का ज़ंजीर डालने में गय

निहाल यादों की चाँदी में शब तो दिल सहारा
किसी के ज़िक्र का सोना उछालने में गया

थी दस्त-गाह बयाँ पर मगर कमाल-ए-हुनर
ग़म-ए-हयात के क़िस्सों को टालने में गया

तेरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं

तेरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं
सुख़न के पाँव मेरे लड़खड़ाने लगते हैं

जो एक दस्त-बुरीदा सवाद-ए-शौक़ में है
अलम उठाए हुए उस के शाने लगते हैं

मैं दश्त-ए-हू की तरफ़ जब उड़ान भरता हूँ
तेरी सदा के शजर फिर बुलाने लगते हैं

ख़बर भी है तुझे उस दफ़्तर-ए-मोहब्बत को
जलाने जलने में क्या क्या ज़माने लगते हैं

ये गर्द है मेरी आँखों में किन ज़मानों की
नए लिबास भी अब तू पुराने लगते हैं

तुम्हारे मेवा-ए-लब को निगाह से छूटे ही
अजीब लज़्ज़त-ए-नायाब पाने लगते हैं

जो सनसनाता है कूफ़ा व नैनवा का ख़याल
गुलू-ए-जाँ की तरफ़ तीर आने आने लगते हैं

मीरास बे-बहा भी बचाई न जा सकी

मीरास बे-बहा भी बचाई न जा सकी
इक ज़िल्लत-ए-वफ़ा थी उठाई न जा सकी

वादों की रात ऐसी घनी थी सियाह थी
क़िंदील-ए-ऐतबार बुझाई न जा सकी

चाहा था तुम पे वारेंगे लफ़्ज़ों की काएनात
ये दौला-ए-सुख़न की कमाई न जा सकी

वो सहर था के रंग भी बे-रंग थे तमाम
तस्वीर-ए-यार हम से बनाई न जा सकी

हम मदरसान-ए-इश्क़ के वो होनहार तिफ़्ल
हम से किताब-ए-अक़्ल उठाई न जा सकी

वो थरथरी थी जान-ए-सुख़न तेरे रू-ब-रू
तुझ पर कही ग़ज़ल भी सुनाई न जा सकी

हैरान बहुत ताबिश-ए-हुस्न-दीगराँ थी 

हैरान बहुत ताबिश-ए-हुस्न-दीगराँ थी
तुझे लब की सिफ़त लाल-ए-बदख़शाँ में कहाँ थी

फैला किए दरिया-ए-मोहब्बत के किनारे
उन झील सी आँखों में कोई चीज़ निहाँ थी

हर जश्न-ए-तरब-नाक पे मजलिस का असर था
हर उड़ते हुए बोसे में गर्द-ए-ग़म-ए-जाँ थी

या अर्ज़-ए-यक़ीं पर थी बिछी बर्फ़ की चादर
या घेरे हुए फिर मुझे दुनिया-ए-गुमाँ थी

हर बार-गह-ए-वस्ल के ठुकराए हुए लोग
इक सोहबत-ए-अय्याम थी सो नज़र-ए-फुग़ाँ थी

हम ज़ब्त के मारों का अजब हाल था ‘साक़िब’
जो बात छुपानी थी वो चेहरों से अयाँ थी

सबा बनाते हैं ग़ुंचा-दहन बनाते हैं 

सबा बनाते हैं ग़ुंचा-दहन बनाते हैं
तुम्हारे वास्ते क्या क्या सुख़न बनाते हैं

सिनान ओ तीर की लज़्ज़त लहू में रम कर है
हम अपने आप को किस का हरन बनाते हैं

ये धज खिलाती है क्या गुल ज़रा पता तो चले
के ख़ाक-ए-पा को तेरी पैरहन बनाते हैं

वो गुल-अज़ार इधर से आएगा सौ दाग़ों से
हम अपने सीने को रश्क-ए-चमन बनाते हैं

शहीद-ए-नाज़ ग़ज़ब के हुनर-वराँ निकले
लहू की छींटों से अपना कफ़न बनाते हैं

तुम्हारी ज़ात हवाला है सुर्ख़-रूई का
तुम्हारे ज़िक्र को सब शर्त-ए-फ़न बनाते हैं

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