अमृता भारती की रचनाएँ

एक सत्य

मेरे जीवन की बर्फ़ पर
लिख जाते कुछ नाम
कुछ स्वप्न
कुछ इन्द्रधनुष
बार-बार —

फिर टूटते बर्फ़ में सब पुँछ जाता
या गल जाता —

अपनी छूटी हुई असंख्यता में
खड़ी मैं
खोजती एक सत्य
अन्दर की
कन्दरा में बड़ा हुआ
एक सत्य
अपना
सबसे जुड़ा हुआ ।

 

जन्म

मैं हरे पेड़ों के नीचे खड़ी थी
सिर पर पुआल ले कर
पेड़ मेरे नहीं थे
पर पुआल मेरी थी —
शीत के लम्बे मौसम में
मैं आग जला सकती थी
या
एक नर्म बिछौना बना सकती थी ।

जीवन की उर्वर भूमियों पर
लगातार
हरे बीज बोने के बाद
ये पेड़ मेरे नहीं थे
पर ‘पशुशाला’ की
माँद की
यह पुआल मेरी थी ।

मैंने
जन्म को
वरदान की तरह सँजोया था
और स्वर्गिक शब्द को
सत्य की तरह चलते हुए देखा था

असि-धार की तरह पैने
चमकते पथ पर ।

 

अब मैं लौट रही हूँ 

अब
कोई फूल नहीं रहा
न वे फूल ही
जो अपने अर्थों को अलग रख कर भी
एक डोरी में गुँथ जाते थे
छोटे-से क्षण की
लम्बी डोरी में ।

अब मौसम बदल गया है
और टहनियों की नम्रता
कभी की झर गई है —

मैं अनुभव करती हूँ
बिजली का संचरण
बादलों में दरारें डालता
और उनकी सींवन में
अपलक लुप्त होता —

मैंने अपने को समेटना शुरू कर दिया है
बाहर केवल एक दिया रख कर
उसके प्रति
जो पहले अन्दर था
प्रकाशित मन के केन्द्र में
और अब बाहर रह सकताहै
उस दीये के नीचे के
अँधेरे में

अब मैंअपने को अलग कर रही हूँ
समय के गुँथे हुए अर्थों से
और लौट रही हूँ
अपने ‘शब्द-गृह’ में

जहाँ
अभी पिछले क्षण
टूट कर गिरा था आकाश
और अब एक छोटी-सी
ठण्डी चारदीवारी है ।

 

अपनी ही अन्यत्रता

मैं भाग रही हूँ ।

बाहर
अँधेरा हो गया
मेरे रास्तों पर
पर अन्दर अब तक
रोशनी नहीं हुई ।

स्मृति में
दबी हुई आग को
अलग कर रही हैं
टूटी हुई टहनियों की तरह
उँगलियाँ —

और
ठण्डी राख पर से पोंछ रही हैं
हर चिह्न
हर आहट…

मैं भाग रही हूँ
अपने को उढ़का कर
अपने अन्दर ही —

जन्म मुझे दे रहा है
मृत्यु मुझे ले रही है
और जीवन

मानों यह मेरी
अपनी ही अन्यत्रता है ।

 

तुम कहाँ हो

तुम कहाँ हो ?

यहाँ नहीं
वहाँ नहीं

शायद अन्दर हो
पर हर कन्दरा के मुख पर
भारी शिला का बोझ है —

मैं भी
यहाँ नहीं
वहाँ नहीं
शायद अन्दर हूँ

पर यह जो बाहर है
मेरा यह ‘मैं’
यह स्वयं एक शिला है
अन्दर के मार्ग पर रखा
एक कठिन अवरोध —

और यों मेरा
स्वयं तक न पहुँच पाना
एक ऐसी दूरी है
जो सदा एक प्रश्न की तरह
ध्वनित होती रहती है

तुम कहाँ हो ?

 

गुम आकाश से 

मैंने
आदमी के गुम आकाश से

                  टँगे हुए
सूर्योदय उतारे थे

उसके अन्धेरों को इकट्ठा करते हुए
मैं नहीं जानती थी
कि अपना मर्म चीर कर
मुझे ही उगना होगा

 

देश और दरगाह 

जब वह
मुझे लेकर चला —
मैं देश थी

जब उसने मुझे
ज़मीन पर उतार दिया —
मैं दरग़ाह बन गई ।

 

पिता और सूर्य

हम यहाँ अकेले रह गए
हम सब
या सिर्फ़ मैं —

और वे चले गए
यह कहकर
हम ‘नई सृष्टि’ में आएँगे

पिता और सूर्य
चले गए
इतने बड़े अन्धेरे में
एक छोटा-सा दिया रखकर ।

 

मेरी यह तपस्या

अब नहीं रहूँगी मैं
शाम के सन्दर्भों में
किसी रुकी हुईआहट
या स्पर्श के
किसी भी कम्पन में —

धूप या चाँदनी की तरह
मैं नहीं होऊँगी अभिव्यक्त
किसी आदमीके अन्दर
या किसी
आदमी के बाहर

इन छायाओं से अलग
कहीं और ही रहूँगी मैं

किसी स्पन्दित दृश्य में
प्रतिस्पन्दित हो रहे
अनेक दृश्यों में
अपने अन्दर
या
अपने बाहर
सुख और दुख के
सर्वव्यापी आलोक में

कहीं और ही रहूँगी मैं

मैं
और मेरी
यह तपस्या

 

और ‘मैं’ 

देह
एक कामना है अर्पण की
मन
टूटकर गिरे फूलों का ढेर
हृदय
एक प्रार्थना
प्रकाश और छाया की

और ‘मैं’
एक ऐसा ‘एकान्त’
जो इन सबसे गुज़र कर भी
अक्षुण्ण बना रहता है
सदा एक
सिर्फ़ एक ।

 

मेरा ‘अपनापन’ 

मैंने
अपनी उपस्थिति का अर्थ
इन दरख़्तों के बीच
कितनी देर में जाना
जो कटकर भी लकड़ी नहीं बनते
और जमे रहकर भी वृक्ष नहीं —
कितनी देर में आई वह आवाज़
उस घर से
जहाँ मेरा न होना
ख़ुद मुझे ही मालूम नहीं था ।

एकान्त अपना कैसे हो सकता था
जबकि आसपास इतने लोग थे
बातें करते हुए
इधर से उधर, उधर से इधर
मुझे उठाते रखते हुए —

एकान्त अपना कैसे हो सकता था
जबकि
पैरों के व्रण
और हृदय की आग में
लम्बा फ़ासला था —

दरख़्त
जो कटकर भी लकड़ी नहीं बनते
और जमे रहकर भी वृक्ष नहीं
न घर हैं
न जंगल …

पर अब लगता है
कहीं कोई काट रहा है
मुझे
मेरे अन्दर
अपने एकाकी मौन में

शायद वह —
जिसने एकत्रित किया था
आकाश की थाली में
मेरा ‘अपनापन’।

 

पुरुष-सूक्त : अँधेरे की ऋचा 

वह एक समय था।
मैं पहाड़ों से चाँदनी की तरह उतरा करती थी
और मैंदानों में नदी की तरह फैल जाती थी
मेरे अन्दर हिम-संस्कृति की गरिमा थी
और हरे दृश्यों की पवित्रता ।

मैं प्रेम करना चाहती थी
और रास्ते के
उस किसी भी पेड़, टेकरी या पहाड़ को
गिरा देना चाहती थी
जो मेरी रुकावट बनता था ।
वह पेड़ भाई हो सकता था
वह टेकरी बहिन
और वह पहाड़ पिता हो सकता था ।

मैं उन्हें याद करती हूँ
व्यक्तिगत अंक से कटे हुए शून्यों की तरह-अपने
प्रेमी या प्रेमपात्रों को,
वे एक या दो या तीन या
असंख्य भी हो सकते हैं ।
उनके शरीर पर कवच थे
और पैर घुटनों तक जूते में बँधे थे
उनके सिर पर लोहे के टोप थे
और उनकी तलवारें अपशब्दों की तरह थीं—
जिन्हें वे हवा में उछालते हुए चलते थे ।

वे अपने और अपनों के हितों के बारे में
आशंकित रहने वाले लोग थे ।
जब कभी
उनकी रोटी, शराब या औरत में
कोई चीज़ कम हो जाती थी
तो वे छाती कूट कर रोते थे
वे अपने मरे हुए पुरखों की उन रातों के लिए भी रोते थे
जो उन्होंने घरेलू कलह के दौरान
औरतों के बिना गुज़ारी थीं
और उनके वंशजों के लिए भी
जिनके पास रोटी तो थी
पर जो अभी शराब और औरत नहीं जुटा पाए थे ।

वे शामों और समुद्रों की
तटवर्ती आसक्तियों में प्रवृद्ध हुए लोग थे
गुलाबों और रजनीगन्धा की झालरों में
बार-बार मूर्च्छित होने वाले लोग ।

दौड़कर आई हुई नदी के किनारे
उन्होंने अपनी छतरियाँ तानी थीं
ताकि ठण्डी हवा के झोंकों के बीच
अपना घरेलू चन्दन घिस सकें
और मलबा फेंकने के लिए भी
उन्हें दूर न जाना पड़े ।

प्रेम उनके लिए
कभी खिड़की से देखा जानेवाला एक सुन्दर भू-दृश्य होता
कभी भागकर छिपने के लिए मिला
एक निभृत स्थान ।
वह नहीं था
धरती में रोपा जानेवाला कोई पौधा
या कोई लतर
जिसे श्रम के जल से सींचना ज़रूरी हो ।
जब भी हवा या आकाश की बात होती
वे उसे उस क्षण की अपेक्षा से काटकर
किसी सुदूरवर्ती स्वप्न में ले जाते ।

वे प्रकृति के निर्जन सन्नाटों में चल रहे
अभियानों की खबरों से भी जी चुराते थे
कि हस्तगत प्रेमिका की तरफ़ से, जीवन में
किसी भी साहसिक चेतावनी के ख़तरे को
आख़िर तक टाला जा सके ।

वे एक ही सम्प्रदाय के लोग थे ।
उनकी बातों और आदतों को शायद कहीं अलग किया जा सके
पर उनका स्मृति-प्रभाव
बिना किसी आश्चर्य के एक जैसा है ।

वे आज भी ज़िन्दा हैं
सबके भविष्य को
अपने वर्तमान में निचोड़नेवाले लोग
बहते हुए रक्त की यन्त्रणापूर्ण रोशनी से
अपनी नावें सजानेवाले लोग ।

वे हमेशा ज़िन्दा रहते हैं।

उन्होंने मुट्ठी भर रेत को रेगिस्तान कहा था
और कच्चे-से काँटे को सूली की संज्ञा दी थी ।

मैंने विश्वास की पवित्र शिला पर खड़े होकर
अपने जीवन की आग पर पानी डाला था

 

लोग उसे सोना-चाँदी देते हैं 

लोग उसे सोना-चांदी देते हैं :

वह चुपचाप उनके भूबन्द कमरों में जाता है
लोहे की दीवारों पर
आकाश का छोटा-सा टुकड़ा चिपकाता है
उसके पाँव डालने से
सोने का काला दरिया हिलता है
सर्प सबकी पी अग्नि को अगलता है,

सब अपनी सम्पत्ति उसे देने आते हैं :
किसान अपने खेत और
माली बग़ीचे रख जाते हैं
ग़रीब दे जाता है अपनी भूख
मज़दूर अपना पसीना रख जाता है
सैनिक रखता है अपनी तलवार
शूर अपना पराक्रम छोड़ जाता है
चोर लाते हैं चोरी का माल
वेश्या अपना भीगा हुआ अधोवस्त्र दे जाती है
कोढ़ी दे जाता है अपनी फफूंद
बीमार अपनी खाट छोड़ जाता है।

वह अपने वक्ष पर हाथ रख कहता है :
‘इधर केवल ईश्वर ही आता है।’

 

ऊँचे क़द वाले लोगों के लिए

ऊँचे कदवाले लोगों के लिए उसके बाहर एक सूचना है :

‘यहाँ केवल मिट्टी ही आती है
सब अपने जूते बाहर ही उतार दो
अन्दर लेकर आना मना है।’

 

मैंने सारे जगत की स्याही घोंट ली है

मैंने सारे जगत की स्याही घोंट ली है
मैंने कालवृक्ष की टहनी तोड़ ली है
उसका सद्यजात माथा नीचे झुकता है
मेरी अनामिका का सर्पदंश सहता है

 

मैं उसकी आँच में अपने को जलाती हूँ 

मैं उसकी आँच में अपने को जलाती हूँ।
जलने के लिए अपनी राख को बार-बार कोयला बनाती हूँ।

वह पर्वत के शिखर पर बैठा है
पर्वत एक नीला आकाश है
वह स्वयं एक नीला आकाश है

वह आकाश की नीलिमा लेकर नीचे उतरता है
छोटे-छोटे आकाशों में नीलता रखता है

वह अपना अर्धांग बाँट रहा है
आकाशों में नील, नील में नीलता रख रहा है

वह पर्वत के शिखर पर बैठा है
पर्वत पर एक नीला आकाश है
वह स्वयं नीला आकाश है

वह हर पल
अद्भुत रस की रचना करता है
मेरे हृदय के रोगों को
बढ़ाकर
मेरे शरीर पर सुइयों की तरह खड़ा रहता है।

मैं उसकी ईशता प्रकाशित करने के लिए
पुरातन दिये उठा रही हूँ
सूरज को नीचे और अग्नि को ऊपर जला रही हूँ
मैं सारे जगत की ओट में उसे देखती हूँ
अपनी आँखों में आँख–आँख में एक और आँख रखती हूँ।

वह अपने ही प्रकाश से मुझे छूता है
दियों को ओलट में और
अन्य सभी उपकरणों को स्वस्थान में रखता है

मैं अपनी लज्जा से आप ही मरती हूँ
अपने अंधेरों को और घना करती हूँ

वह मुझे मेरे बहुत पास मिलता है
मेरे ही अन्दर तिरछा खड़ा होता है
मैं अपनी वक्रता में उसकी बंकिमा छुपाती हूँ।
जगत के सारे रास्तों को ऋजु बनाती हूँ।

 

मैं उसके पास उसे रख रही हूँ

मैं उसके पास उसे रख रही हूँ
उसकी ही बातें उससे कर रही हूँ।

मैंने अपनी सब बाहें फैला ली हैं
उन पर दियों की पातें जला ली हैं

देवताओं की आँखों की तरह
मेरे दिये उठते हैं
नीचे के अंधेरों को
दीवट की तरह खड़ा करते हैं

अब सब जगह उसका चेहरा है
हर सर्प के माथे पर सूरज और
हर सूरज के नीचे
कृष्ण-व्रण गहरा है।

 

मन रुक गया वहाँ 

मन
रुक गया वहाँ
जहाँ वह था ।

नित्य और निरन्तर
गतिशील
लय की अनन्तता में

मन
रुक गया वहाँ
उसके अन्दर

जहाँ घर था ।

 

मेरे देश की तरह 

स्वतन्त्र हुए
देश की तरह था
वह-
उसका माथा
उसकी हँसी-

मेरे देश की तरह
दिव्य,
अविभाज्य
और
सम्पूर्ण ।

 

जब कोई क्षण टूटता 

वह
मेरी सर्वत्रता था
मैं
उसका एकान्त-
इस तरह हम
कहीं भी अन्यत्र नहीं थे ।

जब
कोई क्षण टूटता
वहाँ होता
एक अनन्तकालीन बोध
उसके समयान्तर होने का
मुझमें ।

जब
कोई क्षण टूटता
तब मेरा एकान्त
आकाश नहीं
एक छोटा-सा दिगन्त होता
उसके चारों ओर ।

 

नीले एकान्त में 

वह मेरा
हर पड़ाव उठा लेता था
और मैं- मानों
सिर्फ़ यात्रा रह गई थी-
एक संचरण ।

तब
एक दिन ऐसा हुआ
पैरों के नीचे से
ज़मीन ही नहीं
मैं हट गई थी ।

धरती से ऊपर
चलते हुए
मैंने नहीं जाना था
कि मैं
उसके
आकाश के अन्दर हूँ
और वह
मुझे
रेखांकित कर रहा है
अपने नीले एकान्त में ।

मैंने नहीं जाना था
कि मैं
उसकी
सांध्य
प्रार्थना के अन्दर हूँ ।

 

स्मरण

स्मरण-
तब कोई न रहता पास
बस वह
उसका अहसास ।

मैं बाहर आ जाती
अरण्य में
अचानक उग आए
चाँद की तरफ़
या
अन्दर चली जाती
जहाँ
पत्थर से उमग कर
बह रही होती
कोई छोटी-सी जलधार ।

स्मरण
कितना अकेला कर देता
मुझे
उसके साथ ।

 

और मैं भी

मेरा अंधेरा
खो गया था
उसकी आँखों में
और मैं भी-
चलते-चलते
उसके साथ
क्षितिज की सुनहरी पगडंडी पर ।

श्वेत दृष्टि
श्यामल हो उठी थी ।

मेरे
होने,
न होने को
वह विभक्त नहीं कर सका था
सूर्यास्त से
सूर्योदय के बीच ।

 

उत्तर शिशु 

टोकरी बुनते हुए
मैं नहीं जानती थी
कि मैं इसमें
फूल रखूँगी
या स्वप्न
या एक शिशु
जो वह मुझे देगा
समय की प्रार्थना के उत्तर में ।

टोकरी बुनते हुए
मैंने नहीं जाना था
कि मैं
अपना ही रक्त बुन रही हूँ ।

 

टोकरी बुनते हुए

टोकरी बुनते हुए
मैं नही जानती थी
कि मैं इसमें फल रखूँगी या स्वप्न

या एक शिशु
जो वह मुझे देगा
समय की प्रार्थना के उत्तर में
 
टोकरी बुनते हुए
मैंने नही जाना था कि मैं
अपना ही रक्त बुन रही हूँ ।

 

 

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