अम्बर रंजना पाण्डेय की रचनाएँ

ठाकुर बिजोय गोसाईं का विषपान 

नुआपारे पर मूमुर्षू भवन में छबिमान बिजोय गोसाईं से
पंडित ने कहा, अविलंब प्रसाद ग्रहण करना सदैव शास्त्र का
वचन है। पालन न करना सर्वथा वेदवाक्य से विपरीत।’
खाजा- मठरी लाया था संखिया मिलाकर
विष उसमें ऐसे दिखता था जैसे दर्पन में छबि
बिजोय रहे देखते कुछ बेला
फिर उठाकर पुरुषोत्तम जगन्नाथ का लक्ष्मी की रसोईघर में
सिद्ध आहार मान मस्तक से छुवा खाने लगे
पण्डित उन्हें अनुराग से देखता था
जननी पुत्री को विष देने के पश्चात देखती है
इस भाँति प्रेम से और वेदना से
विष वेद और वेदांत में बँधकर कितना मोहक
जिह्वा को प्रतीत होता था
‘भालोबासा’ खाने के पश्चात् पण्डित ने कहा
अप्रत्याशित, कोमल राग से भर आई आँखें
रोने लगा पादपद्मों में
भूमि पर ठोंकने लगा माथा रक्त आ गया
बिजोय गोसाईं ने असंख्य आशीष दिए
कहा जाने को गृह
और सो गए एक ओर जहाँ सूर्य आता था
पुनः न जागने को
धूप प्रचण्ड थी जल खारा था दिन कठिन
इस भाँति निर्धन को जो धर्म की अफीम
वेद-वेदान्त की पुड़िया में बेचा करता था
क्षमा कर दिया निर्धन था अपमानित था
मेरे गुरु कुलानंद ब्रह्मचारी के गुरु बिजोय गोसाईं ने
जैसे प्रेम के कारण विषपान कर लिया
ऐसा गृहस्थ जीवन में मैं चाहती थी
क्षेमेन्द्र ठाकुर मेरे हाथों से पी लेंगे विष
ऋषभ ब्रह्मो मेरे हाथों से पी लेंगे विष
अपूरब गोस्वामी मेरे हाथों से पी लेंगे विष
मैं उनके हाथों से पी लूँगी विष
भिन्न भिन्न भाँति के विष सब प्रकार के
प्रेम की प्रयोगशाला थे।

अपूरब गोस्वामी के प्रेत से भेंट 

उखरामठ में भगवान के विग्रह से उतार मारी कण्ठ पर
तुलसी दल की माला महन्त ने
जैसे स्वामी स्त्री की ताड़ना करता है लीला। लीला में
रात्रिभर तुलसीपत्र की माला पहने जागती रही

अपूरब गोस्वामी ने कमल के फूलों से एक दोपहरी
मेरे अबसन नितम्बों का प्रहर भर ताड़न किया था
पद्म जानो खिल गए थे नितम्बों पर ऐसे रक्ताभ
वह हो गए थे, हाथ फेरने पर भी पीड़ित होते थे
उखरामठ में आकर निम्बार्क प्रभु

यह कैसी ताड़ना की इच्छावती मैं कीच में गिरती हूँ
रात्रि रास की बेला अपूरब गोस्वामी आ बैठ गए मेरे निकट
माँगने लगे कौर का प्रसाद
‘कहाँ रही इतने दिन मेरी दुलारी तोता बाला ठाकुर?’

‘तुम कहाँ चले गए थे अपूरब गोस्वामी, कोलाहल से भरे भुवन में अपनी तोता को त्याग ?’
दोनों ने दिया नहीं कोई उत्तर खिला दिया भोग का
पेड़ा और संदेश

जाने लगे जब — मैं रोई । तब बोले अपूरब गोस्वामी
‘यह सालिग्राम, यह रासमण्डल, यह नक्षत्र, यह सुवर्णरेखा
ये तुम्हारे अब तक पुष्ट नितम्ब और जोगिया से झाँकती
कदली के खम्भ की भाँति जँघाएँ
यह युगलछबि से उतरे कमलकुसुम और कर्पूरगन्ध
सब उसकी छाया है
भिन्न भिन्न प्रकट हो रही है क्योंकि
ब्रह्मतत्त्व इनमें अल्प-अधिक है’

अन्तर्धान हो गए रह गया छबि का संस्मरण
कर्पूर की गन्ध की भाँति कथा सुनने के पश्चात
दुख की भाँति जो ह्रदय भरता है किन्तु दूर होता है
ढोल सुनकर रोने लगी तब आचार्य बोले —
‘संस्कार है ये ऐसी ही धुलता है ।

बुढ़ापे का आगमन

अष्टमी का अपराह्न जोमुना में स्नान को
उतरी जो निर्वस्त्र
बलि के महिषों के रक्त से भर गया मुख
पके बेरफल के रंग की भाँति
दीप्त था उस भिक्खु का रंग, बलिष्ठ वदन
ब्रह्मपुत्र के पाट जितना वक्षस्थल
साण्ड की भाँति कन्धे और अण्डकोश

‘आनन्दभैरव है जा उसके निकट जा जल ही जल में’
एक तान्त्रिक ब्राह्मणी रक्त का तर्पण करते बोली
जल के भीतर ही भीतर श्वास साध पहुँची
उसके निकट

शीतल जल में भी उसके शरीर का ताप अनुभव हुआ
बहते जल में भी उसके शरीर की गन्ध
जो गर्भ की गन्ध से भरी थी
जो जननी के स्तनों की गन्ध से भरी थी
जो उसकी स्त्री के रज की गन्ध से भरी थी
जो चन्दन चर्चित थी

कण्ठ पकड़ पुतुल की भाँति उठा लिया उसने
प्राण का प्रवाह अवरुद्ध हो गया
नाभि भर गई प्राणों के कोलाहल से
पश्चात् पुनः पटक जल में, किसी उतारी
कुसुम माला की भाँति, चलता बना

निर्वस्त्र मैं पीछे गई
‘आह्लादस्वरूपिनी है स्त्री जान ले तू’
थूककर मुख पर पलटा, तैरा, लँगोट कसी
अपना अन्तिम वस्त्र किसी शव पर डाल
हो गया अन्तर्धान

जान गई अब जरा आ गई
दिन जो प्रतिदिन और जर्जर कर के जाता है
फिर भी दूसरा दिन देखने का हम मानुषगण
सदैव लालच करते है
गलितदेह के किसी कामिनी के लिए लालच की भाँति
नाग के किसी दादुर के लिए लालच की भाँति

दूसरी स्त्री बिष्णुप्रिया का प्रसंग

स्वामी कोई हरि बोलता कहीं तो मूर्च्छित हो जाते
हरिबोल-हरिबोल कान में कहने पर ही चेतन होते
पहली स्त्री बासुकिदँस के कारण गई पाताल
तब सनातन मिश्र की पुत्री बिष्णुप्रिया के प्रेम में
पड़ गए महाप्रभु चैतन्य

शाँखकाँकन, सेंदूर और रजतनोपूर, एक ताँत
केवल यहीं दिया लग्नरात्रि और उसी में काट दी आयु

कण्ठ से कण्ठ लगना, दाँत से दाँत बजाकर चुम्बन
रतिकाल मोटी चोटी हाथ से खींच
कपाल-करतल से रगड़ना और कुँकुम का
मस्तक पर फैल जाना, नीबि का बन्ध झटकके तोड़ना
सब कर भगवान ने सप्ताह भर पश्चात
संन्यास ग्रहण किया

बदले में बिष्णुप्रिया को दे दिया सदैव
स्मृति में रखने का वचन
इसबार बिष्णुप्रिया मूर्च्छित, जागी तब पाया
गोद में अपना सिला विग्रह डाल चले गए है प्रभु
श्रीविष्णुप्रिया प्राणधन मान जीवन भर इसीकी की सेवा

कण्ठ से कण्ठ केवल लग पाती थी
पुनः कभी केलि कर नष्ट नहीं किया शरीर
पुनः कभी तोड़ न दी कटि काट न दिए कन्धे

गुड़हल के रक्त कुसुमों से भरी डाल
लगी की लगी रह गई अस्पर्शित, किसीने
इसे झँझोड़के तोड़ नहीं लिए इसके सब फूल
किसीने प्रेम में आकर कर नहीं दिया इसका नाश

ऋषभ ब्रह्मो का विक्षिप्तावस्था में मिलना 

उत्तर कलकत्ते में चोखरागिनी सिनेमाघर था
सात वर्ष पूर्व, उसी के सम्मुख दिखाई पड़े ऋषभ ब्रह्मो
पाँयचला पथ पर पड़े थे अर्धनग्न
दीर्घ दाढ़ी, दाढ़ें मैली, दृष्टि धूमिल
बंकिम कनीनिका से देखने लगे अनिमेष
फिर, कूदे और मेरे भगवे में हाथ डाल झँझोड़ डाला
मेरा कण्ठ और मेरा ह्रदय

उस वानर की भाँति जो झँझोड़ देता है आम्रतरु
फल की कामना में
ऋषभ ब्रह्मो अब किसी के वश के न थे

कोजागर सेठ की धर्मशाला से अर्धरात्रि के पश्चात
ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व मैं पहुँची उनके निकट
एक कागोज में बासी लूचियाँ और चोरचोरी लेकर

‘कितने निर्बल हो गए हो ऋषभ ब्रह्मो,
मार्ग पर विवस्त्र पड़े रहते हो, यह क्या हो गया है तुम्हें घरबार छोड़ दिया नौकरी चली गई
जबा काज़िम भी लौट गई ढाका’

नहलाना चाहती थी उन्हें निर्वस्त्र करके
उनके अँगों पर, अस्थियों पर, मन पर
जो संसार की धूल जम गई थी, धो देना चाहती थी
अपनी कविताओं से, अपने स्वेद और रक्त से

किन्तु उठे वह और छीन लिया मेरे हाथ से
लूचियों और चोरचोरी का पूड़ा, पाषाण दे मारा मेरे
माथे पर और भाग गए पूर्व की ओर
भागते काल उनकी दृष्टि किसी पशु की भाँति
भयभीत और करुण टिकी रही मुझपर देर तक
पलट-पलट के देखते, भागते जाते थे ऋषभ ब्रह्मो

पूर्व की ओर जहाँ बालारून प्रकट होने को था
रक्तचम्पा के फूल की भाँति

हम सब मानुष आलोक के पीछे ही भागते है
चाहे ह्रदय के स्थान पर हो हमारी पसलियों में
ह्रदय बराबर तिमिर का टुकड़ा ।

सनातन मोशाय के संग ट्रामयात्रा 

सनातन सान्याल बहुत मधुर बजाते भटियार
फिर बमबम अड्डाघर में फुचका गटक
दो-दो कप चाय पीकर ट्राम यात्रा करते थे
कलकत्ते की वर्षा में दोपहर में भी ऐसी
हो जाती थी तिमिरकान्ति जैसे ग्रहणकाल हो
सनातन मोशाय ने कभी अँगुली का पोर तक
छुवाया नहीं मेरी अँगुली के नख से
कहते थे —  ‘उनकी घनिष्ठता अफ़लातूनी है’

खिचड़ी केश धूप में भस्म मुख था उनका
दूर किसी ग्राम में मास्टरी करते थे
कभी-कभी आते थे कलकत्ता
पत्र पूर्व नहीं भेजा कभी — वर्षा की भाँति
केवल अचानक आते और हिन्दू महाविद्यालय के
बाहर प्रतीक्षा करते रहते
बुशर्ट में खोंसे रहते बेनू
चरबाहे वाली बेनू थी उनके निकट
बहुत राग नहीं बजते थे उसपर

एक दिन अख़बार में लगा था उनकी लाश की चित्र
जीप से कुचला गया उनका शव
कभी देखा नहीं था उन्हें निर्वस्त्र
किन्तु उनकी ध्वस्त जँघाएँ देख तुम यह मत मान लेना
मित्रों, कि नपुंसक होने के पश्चात वह मरे थे ।

मणिकर्णिका घाट पर दाहोत्सव

सौ वर्ष की बालविधवा का बांसभर रह गया था
जो कलेवर चटचट जलता है मनिकर्णिका घाट पर
डोम किनारे बैठ चाय पी रहा है

कौन है और, केवल शुष्कचक्षु विधवाएँ
बाल्यावस्था में आई थी काशी, बारह वर्ष की वय
सन १९०० में जन्मी, नाम रखा दादी ने चन्द्रघण्टा
सात वयस में ब्याही, नौ में विधवा

पुरातन काल की कथा है किन्तु क्या नहीं सुनोगे
सिद्धान्त कौमुदी को जो कण्ठ पर धारण करता था
चन्दन की भाँति स्फटिकमणि की भाँति
जो अपने श्लोकों से करता रुद्राभिषेक विश्वनाथ का
उसने एक दोपहर आकर छिन्नभिन्न कर दिया सबकुछ

केवल एक धोती में आए निर्बल बटुक में
क्या इतना सामर्थ्य था कि उसके जाने के पश्चात्
चन्द्रघण्टा रह जाती किसी अरथी के पीछे छूट गए
भग्न कलश की भाँति

बहुत काल तक आश्रम की अट्टालिका पर खड़ी
गँगा में प्राण देने का सोचती थी, उसके गँजे मस्तक में
अपार था क्लेश

जब बटुक चढ़ गया था उसके ऊपर भरी वाराणसी के
बीच, मध्याह्न काल, आश्रम के एकान्त में
अपमान नहीं लगा उसे ग्लानि नहीं हुई
केवल रक्त और सुख हुआ था उस काल

निर्बल दिखते बटुक ने जब हाथ उसका पूरा मरोर दिया
तब उसे बटुक की बलिष्ठता से भय और प्रेम दोनों हुए
उसका ह्रदय हुआ बटुक को खिला दें
किशमिश से भरी मावे की कचौरी
उसके पश्चात् जीवन बीत गया एकादशी का व्रत
और प्रदोष की पूजा करते

उसके पश्चात उस बालविधवा की आयु में
कोई कलँक नहीं है रक्त के एक कलँक को छोड़
बटुक को मावे की कचौरी खिलाने का स्वप्न
चटचट जलता है डालडा भरे उसके कपाल के सँग ।

परमहंस रामकृष्ण और माँ शारदा का शारीरिक सम्बन्ध

बिना देह का आधार लिए कोई
सम्बन्ध नहीं होता बन्धुमणि, रक्त के सूत्र में
पिरोए जाते है ह्रदय
नाड़ीतन्त्र में विष की भाँति घुलते है प्राण
तब किसी दूसरे प्राण से एक होते है

माँमोनी का गदाई से गाढ़ दैहिक बन्ध था
जब नवबधू होकर आई तब स्तन भर आए थे दूध से
माछेरभात त्यागके गदाई माँ के स्तनों के भरोसे
करते रहे मासों भरन अपना

तिथिभर पूरे दक्षिणेश्वर में हल्ला मचाने के पश्चात्
सन्ध्या होते ही शारदामाँ के कक्ष की दिशा दौड़ते
अपनी स्त्री की गोद में था उन्हें विश्राम
अनुराग से भरकर कहते,
‘बामाचरन काली का गर्भ है यह गोद,
सब सुख यहीं है’

कण्ठ का रोग हुआ जब खा नहीं पाते थे भात का
एक कौर भी जल का घूँट नहीं उतरता था नीचे
तब बूढ़ वयस में भी माँ को आ गया अपने गदाई के
लिए धारों दूध
गदाई लजाते, व्रत साधते और माँ से दूर-दूर भागते

तब माँमोनी पकड़ लेती उन्हें जहाँ-तहाँ
ताँत हटा कर हठ करती, पिला देती दूध
कहती, ‘स्तन में दुःख होगा दूध नहीं पिओगे यदि तुम’

गदाई की समाधि के पश्चात
माँ को पड़ गई थी दूध की गाँठें स्तनों में ।

आगँतुक पण्डित पागल क्यों था

मेरी माँ का नाम शाम्भवी, जिन्हें मैं प्रेम से सती या सती शाम्भवी भी कहती थी। मेरे पिता का नाम श्रीमान रासशिरोमणि राय था। मेरी माँ आगन्तुक पण्डित को उनकी विक्षिप्तावस्था में हमारे घर ले आई थी।)

देवदास की भाँति प्रेम में सबकी नियति
मरना तो नहीं होती न सबकी नियति पार्वती की
भाँति अपने स्वामी का विचार त्याग अपने प्रियतम के
पीछे दौड़ते मर जाने की होती है

बहुत अभागे विक्षिप्त हो जाते है प्रेम में
आगन्तुक पण्डित की भाँति, उन्नीस वर्ष की वय
उस पर रासबाबू की स्त्री से तीक्ष्ण आसक्ति
तारकेश्वरी के खड्ग की भाँति जिसने भेद दिया था
अन्तर शाम्भवी का

एक मध्याह्न नहीं आ पाई शाम्भवी तो
तारकेश्वरी को करने लगा चुम्बन, भरने लगा विग्रह को
बारम्बार आलिंगन में
माँ को नहला दिया अपने ह्रदय के रक्त से,
उसे घोषित कर दिया विक्षिप्त उसके ही पिता ने

भुवन भरा है जो असँख्य जन से
सबसे मान लिया आगन्तुक पण्डित को क्षुब्धमन
किन्तु जिसके पीछे पागल हुआ उस शाम्भवी ने
उसे नहीं माना पागल, सदैव कहती,
‘आगन्तुकदा, विकृतमस्तिष्क नहीं कवि है
उनके ह्रदय को गूँथ दिया किसी ने माला में
सुई से छिन्न बिन्धे ह्रदय की यन्त्रणा कम न होती
यदि प्रेम छोड़ उसकी मृत्यु हुई होती’

क्या अपनी प्रिया के स्वामी की हत्या करना
कौर तोड़ने जितना स्वाभाविक नहीं है, बन्धु !

वहीं किया भाद्रमास की एक रात्रि
घोंट दिया कण्ठ, आज भी जाओगे यदि नबागतपाड़े
बोईबाड़ी तो तुम्हें सुनाई पड़ेगा
सती शाम्भवी का क्रन्दन अपने मृत स्वामी और भाग चुके
क्षुब्धमन प्रियतम के लिए
जिसके लिए वह नष्ट हुई थी
वर्षा में मिट्टी के ढेले की भाँति ।

क्षमा याचना 

जो कह न सकी उसके लिए क्षमा और जो कहा
उसके लिए भी क्षमा

स्त्री की कोई कथा नहीं होती
केवल दृष्टान्त होता है तब उस दृष्टान्त के लिया क्षमा

और क्षमा कि यन्त्रणा केवल सहकर मैं चली नहीं गई
उसे कहने के दुस्साहस के लिए क्षमा

जिस प्रसव में जन्म लिया और जिन प्रसवों में जन्म दिया
सबके लिए क्षमा

असंख्य पुरुषों स्त्रियों से अतीव अनुराग के लिए क्षमा ।

रामकृष्ण के अनुकूलप्रिय दोईमाछ की विधि

रज नहीं, केश, स्वेद, बरौनी की धूल
स्वामी को वश में करने के लिए
यह सब नहीं चाहिए किंचित भी
केवल अतीव अनुराग माँमोनी शारदा का
स्वामी को बालक बना लेता है जो

धोनेपाता डालके झालमूड़ी दे देती तो परमहंस
भक्तों से ब्रह्मचिंतन छोड़ केवल झालमूड़ी पर
ज्ञान होता

कोई-कोई तिथि बनाती दोईमाछ
श्यामल गाभी के दुग्ध का दोई करती
और पद्मवाले पुकुर की भेटकी माछ
सरसों तैल तरल स्वर्ण की भाँति आलोकित करता था
माँमोनी के मत्स्यनयन

अद्भुत सुबास उठता दस दिश में

रसोईघर के द्वार पर देवता आ लगते लुक-झुक करते
परमहंस भी वातायन से झाँकते, पूछते बारम्बार माँमोनी से
‘क्या देर है ? क्या देर है ? शीघ्र करो न माँ’

जो भवसमुद्र से पार हो गया उसे एक मरी
मछली ने बाँध लिया अपने जाल में ।

क्या मृत्यु के पश्चात् जीवन है? 

‘प्रिय नलिनीकान्त, द्रुत चले आओ
नहीं, मत आओ, मुझे सन्निपात हुआ है
प्रलाप करती हूँ, भीषण ज्वर पाँखभर से नहीं उतरा
रक्त जाता है प्रतिदिन किन्तु तुम व्यथित मत होना
मैं शीघ्र ही स्वस्थ होकर नवीन बालुचर धोती पहनूँगी
तुम्हारी दासी’

केवल इतना कहा था पत्र में और रात्रि
खाटोलि के निकट खड़ी दिखाई दी थी सुबकती
दूसरे दिनाँक नलिनीकान्त लौट आया क़ुतुबपुर
‘सुधांशुबाला चली गई’

उसके पश्चात् नलिनीकान्त यन्त्री मोशाय जिन्होंने
मरन तक जीवन माना था अब तक
जाना था कि मरकर मानुष भस्म की पोटली रह जाता है
उन्हें सुधांशुबाला यत्र-तत्र दे जाती थी दर्शन
कभी उसके केशों की जबाकुसुम के तैल की गन्ध से
भर जाते नासापुट आते-जाते

मद्रास गया मृत स्त्री से बात करने
एक बार प्राण से प्राण का आलिंगन करने
एक बार सुधांशुबाला के पुकारने पर
सही काल उस तक पहुँचने को
कभी मिलती भी थी सुधांशुबाला, बात करती आधी-अधूरी
पुनः अन्तर्धान

एक योगी ने वचन दिया साक्षात मिलवाने का
पल बेला को प्रकट हुई पुनः अन्तर्धान
बीत गई तरुण वय, केश श्वेत होने को आए

मृत स्त्री को ढूँढता नलिनीकान्त चट्टोपाध्याय
परमहंस निगमानन्द सरस्वती हो गया
किन्तु पुनः कभी भेंट नहीं हुई सुधांशुबाला से

मरनेवाले लौट कर नहीं आते कभी न मरकर
हम मिल पाएँगे कभी उनसे
मरन केवल अन्धकार है जहाँ प्रेम का दीपक
नहीं करता कोई आलोक
कोई आशा नहीं दिखती । हम सब कितने अकेले हैं, बन्धु !

केश धोना 

शिशिर दिवस केश धो रही थी वह, जब मैंने
उसे पहली बार देखा था भरे कूप पर ।
आम पर बैठे शुक-सारिकाएँ मेघदूत
के छंद रटते-रटते सूर के संयोगों
भरे पद गाने लगे अचानक । केश निचोड़
और बाएँ हाथ से थोड़े से ऊँचे कर
उसने देखा और फटी धोती के टुकड़े
से पोंछ जलफूल उठी नील लता-सी । चली ।
दो चरण धीमे धरे ऐसे जैसे कोई
उलटता पलटता हो कमल के ढेर में दो
कमल । कमल, कमल, कमल थे खिल
रहें दसों दिसियों । कमल के भीतर भी कमल ।

सिन्दूर लगाना 

छोटे छोटे आगे को गिरे आते चपल
घूँघरों में डाली तेल की आधी शीशी ,
भर लिया उसके मध्य सिन्दूर और ललाट
पर फिर अँगुली घुमा-घुमा कर बनाया उसने
गोल तिलक । पोर लगा रह गया सिन्दूर
शीश पर थोड़ा पीछे; जहाँ से चोटी का
कसा गुंथन आरम्भ होता हैं, वहाँ पोंछ
दिया । उसे कहा था मैंने ‘इससे तो बाल
जल्दी सफ़ेद हो जाते हैं ।’ हँसी वह । मानी
न उसने मेरी बात । ‘हो जाएँ बाल जल्दी
सफ़ेद । चिंता नहीं कल के होते आज हो
जाएँ । मैं तो भरूँगी ख़ूब सिन्दूर मांग
में । तुम सदा मुझ भोली से झूठ कहते हो ।
कैसे पति हो पत्नी को छलते रहते हो
हमेशा । बाल हो जाएँगे मेरे सफ़ेद
तो क्या? मेरा तो ब्याह हो गया हैं तुमसे ।
तुम कैसे छोड़ोगे मुझे मेरे बाल जब
सफ़ेद हो जाएँगे । तब देखूँगी बालम ।’

केश काढ़ना

श्यामा भूतनाथ की; केश काढ़ती रहती
हैं । नील नदियों से लम्बे-लम्बे केश
उलझ गए थे गई रात्रि जब भूतनाथ ने
खोल उन्हें; खोसीं थी आम्र-मंजरियाँ
काढते-काढते कहती हैं ‘ठीक नहीं यों
पीठ पर बाल बिथोल-बिथोल फँसा-फँसा अपनी
कठोर अँगुलियाँ उलझा देना एक-एक
बाल में एक-एक बाल । मारूँगी मैं
तुम्हें, फिर ऐसा किया तुमने कभी ।
देखो कंघा भी धँसता नहीं
गाँठों में’। ‘सुलझा देता हूँ मैं’, कह
कर उसने नाक शीश में घुसा
सूंघी शिकाकाई फलियों की गँध ।
‘हटो, उलझाने वाले बालों,
जाओ मुझे न बतियाना ।’ भूतनाथ ने
अँगुली में लपेट ली फिर एक लट

अपना सामना 

तुम बिम्ब से मुझे चमत्कृत कर सकते हो,
तुम बीस-पच्चीस बिम्बों के एक कविता में अपव्यय से
मुझे अधिक चमत्कृत कर सकते हो
किन्तु पंसुलियों के बीच पड़ी
यह गाँठ नहीं खोल पाती तुम्हारी कविता

किसी असूर्यम्पश्या स्त्री-सी मैं
छू नहीं पाता जिसे तुम्हारी कविता का तत्व
किन्तु इस परकीया को चाहिए
तुम्हारे छन्द का स्पर्श
हल्दी की पानी में पड़ी गाँठ
जैसा गल जाए मन कि छेदकर
पोह लो देवी के लिए हार
किन्तु तुम तो नास्तिक हो तुम तो मार्क्सवादी हो
देवी तो तुम्हारे लिए महज़
एक सांस्कृतिक बिम्ब हैं ।

कभी किसी दिन, जब धूप निकली हो क्वाँर की
वर्षा के बाद फिर चढ़ी हो
धूल हवा के रथ पर
तब आना और करना
प्रतिबिम्ब की बात

बहुत हो चुकी तुम्हारी सच्ची कविता
बात करना झूठे प्रेम की
बात करना ऐसे जैसे अठ्ठारह सौ सत्तावन के बाद
लखनऊ के शायर इश्क़-इश्क़ की
कनबतियाँ फूँकते थे गालों पर
फूँकते थे सिगरेट की तरह

कभी बात भी करना या बात ही करना
लीला-लीला में मुस्कुराना
श्वेत-श्याम सिनेमा के नायकों की तरह
रूठ जाना बेवज़ह, उस दिन
तुम्हें क़सम हैं कोई और बात मत करना

कविता मत सुनाना । केवल बाँह
पकड़ लेना कसके, ज़ोर दिखाना
मत करना बात लातिन-अमरीकी फ़िक्शन की
रूसी फ़लसफ़े इस्पहानी फ़ोटोग्राफ़ी की
जानकारियों की जो तुमने उस कमबख़्त इण्टरनेट से
बीन-बीन कर जमा कर ली हैं

किसी दिन कवि नहीं कलाकार नहीं एक्टिविस्ट नहीं
शमशेर बहादुर सिंह को जो मुहाल था
वह इनसान बनकर आना
जिसे लगता हो चान्द हसीन न कि टेढ़े मुँह वाला ।

तुम्हारी कनपटियों पर आया स्वेद है मेरी कविता
तुम्हारी दुर्गन्ध, तुम जब गर्दन झुकाए देखते हो कुछ
तो तुम्हारे उघारी पीठ पर जो निकल आते हैं पँख
वह बहुत हैं मेरे संसार को लेकर उड़ जाने के लिए ।

असल में अम्बर रंजना पाण्डे
तुम जो कवि बने इतराए फिरते हो
तुम्हारी कविता मेरी सौत हैं
तुम्हारी कविता बेहद बेहद बुरी है
इससे बेहतर तो तुम जवाकुसुम लगाकर
बाँधते हो मेरी दो चोटियाँ ।

पीछा करना

बीतने दो कुछ वर्ष फिर उसके पीछे-पीछे भटकने
की बात याद कर तुम लजाओगे या हँसोगे ख़ूब ।
कैसे उसके पीछे मुड़ने पर सिनेमा के अभिनेताओं
की तरह तुम जूते के फ़ीते बाँधने लगते ।
पीछे
सौन्दर्य के नष्ट हो जाने में कितना सौन्दर्य है यह तुम
मन ही मन जानते हो पर किसी से कहोगे नहीं ।

तल्ला कई बार बदला है; उन्हीं जूतों में चल सको पर
फ़ीते धागा-धागा हो गए ।
धूप में तेज़ चलना अब
सम्भव नहीं । पीछे पलट वह देखे अचानक फ़्लमिंगो
की तरह तो तुम मुड़
नहीं पाते उतनी जल्दी न
नाटक कर पाते हो उसे न देखने का । पुतलियाँ फँस
रह जाती हैं सुन्दरता पर, डुलती नहीं,
अकड़ूँ
हो गई हैं । सौन्दर्य उसका
वैसा ही रहा जैसे कवियों के
मन में चन्द्र की उपमा
रह गई, अब भी नवीन,

अब भी कौंधनेवाली मन में । अन्धा करनेवाली उसकी
सुन्दरता, आँखें चौंधिया जाती और कुछ दिखाई न
देता । फ़्लमिंगो जैसे कभी भी उसका पीछे देखने लगना
वैसा का वैसा रहा और नहीं बदली चौराहों पर
बने फ़व्वारों का गन्दा पानी पीने की उसकी आदत, वैसी
ही रही प्यास, वैसी ही है ओक से पानी पीने की रीति ।

वसन्त की रातें

दर्शन पढ़ने से अच्छा है कि दर्शन हो तुम्हारे; वसन्त
की इन ऊष्ण होती रातों को । मन में लिए लिए सृष्टि
भटकना ही तुषारपात है । कवि वह कितना अकेला
है, जिसका मन कविता
हो गया है और विषय भी

भीतर है । बाहर न ब्रह्म न बन्धु कोई । तुम्हें देखकर
प्रथम बार मैंने जाना फाल्गुन पंचांग का अन्तिम
महीना नहीं, सच में आता है ।
दुनिया ढोते मन का भार
उतरा । पत्र पुरातन झड़ गए । कोंपलों से भर
गए पोर-पोर । एक से दो हुए । ख़ुद को बाँटकर दो में,
फिर-फिर एक होना ही वसन्त है, शहद का छत्ता
है; हाथ तक आता और है
भ्रमरों की भरमार आँखों के
आसपास । डंक मारेंगे ये, इसकी सम्भावना भी ।

अमरुद वृक्ष 

सहस्र दिन पुरातन मूत्र-गंध
से त्रस्त थे नासापुट महू
के रेलगाड़ी स्टेशन पर ।
उबकाई ले रही थी फिर
फिर प्रौढ़ाएँ । नकुट ढँके थे
चन्दन चर्चित मुनियों के दल ।
तब अचानक जैसे आकाश
में द्रोणमेघों का झुण्ड हो
उठता । उठी किसी विजयी की
ध्वजा-सी अमरूद की गंध ।
चौकोर गवाक्ष में छपरे
में तिरछौहे-तिरछौहे धर
अमरूद एक श्याम किशोर
खड़ा था । बाहर-बाहर हरे
भीतर आरक्त । एक योगी
ने परमहंस परंपरा के
चलाई प्रत्यग्र फल पर छुरी ।
ज्ञानी कहते जो आए हैं
कि बीज में वृक्ष हैं । प्रत्यक्ष
हो उठा अमरूद-तरु समक्ष ।
रंगों की प्रयोगशाला में
अपूर्व शोध अमरूद वृक्ष
ने किया हैं और तब जाकर
प्रकट हुए हैं हरे रंग के
विविध वर्ण । फुनगियों बाल-शुक
सा हरा । भीतर की टहनियों
का रंग वृद्ध कुटुरु के खीन-
जर्जर पंख सा गहरा । फलों
के हरे रंग के भी अनेक
छंद हैं । कोई-कोई वृक्ष
का फल जैसे चौपाई हो-
हरे से हरिद्ररंगी । ऊपर-ऊपर
अरुणिम । कोई फल तो
मानों किसी मानिनी के हो
स्तन, जो बाहर तनिक पिंगल
प्रतीत तो होते हैं, किंचित
कक्खट भी किन्तु दाँत लगते
लाल हो उठते हैं । बालिका
सा बढ़ता हैं अमरूद वृक्ष ।
वर्ष में फलता हैं दो बार

ऋतु-स्नान

चैत समाप्यप्राय है । आठ-दस हाथ दूर
आलते रचे, मैले पाँवों
को तौल-तौल धरती
उतरती प्रवाह
में । एक ही चीर से
ढँके सब शरीर ।
एक स्नान सूर्योदय से
पूर्व कर चुकी हैं वह । यहाँ
केश धोने आई हैं । पाँच
दिनों की ऋतुमती, थकी और
मंथर, अधोमुखी जैसे हो
आम्र-फलों की लता । नर्मदे
मेरे एकांत पर फूलना
लिखा था यों यह ब्रह्मकमल कि
मारता हूँ डुबकी, अचानक
उसके स्तनों पर जमे गाढ़
स्वेद, धूल और श्वासों से
सिंची फूल पड़ती हैं मुझपर
मोगरे की क्यारियाँ । वीर्य
और रज का मैं पुतला, मुझे
नदी के बीचोंबीच होना
था मुकुल शिव-पुत्र का कामोद ।

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