अय्यूब ख़ावर की रचनाएँ

आ जाए न रात कश्तियों में 

आ जाए न रात कश्तियों में
फेंकूँ न चराग़ पानियों में

इक चादर-ए-ग़म बदने पे ले कर
दर-दर फिरता हूँ सर्दियों में

धागों की तरह उलझ गया है
इक शख़्स मेरी बुराइयों में

उस शख़्स से यूँ मिला हूँ जैसे
गिर जाए नदी समंदरों में

लोहार की भट्टी है ये दुनिया
बंदे हैं अज़ाब की रूतों में

अब उन के सिरे कहाँ मिलेंगे
टूटे हैं जो ख़्वाब ज़लज़लों में

मौसम पे ज़वाल आ रहा है
खिलते थे गुलाब खिड़कियों में

अंदर तो है राज रत-जगों का
बाहर की फ़ज़ा है आँधियों में

कोहरा सा भरा हुआ है ‘ख़ावर’
आँखों के उदास झोंपड़ों में

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया
क़तर-ए-ख़ूँ पानियों के साथ रूसवा हो गया

ख़ाक की चादर में जिस्म ओ जाँ सिमटते ही नहीं
और ज़मीं का रंग भी अब धुप जैसा हो गया

एक इक कर के मेरे सब लफ़्ज़ मिट्टी हो गए
और इस मिट्टी में धँस कर मैं ज़मीं का हो गया

तुझ से क्या बिछड़े कि आँखें रेज़ा रेज़ा हो गईं
आइना टूटा तो इक आईना-ख़ाना हो गया

ऐ हवा-ए-वस्ल चल फिर से गुल-ए-हिज्राँ खिला
सर उठा फिर ऐ निहाल-ए-ग़म सवेरा हो गया

ऐ जमाल-ए-फ़न उसे मत रो कि तन-आसान था
तेरी दुनियाओं का ‘ख़ावर’ सर्फ़-ए-दुनिया हो गया

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना
इतना आसाँ भी नहीं तुझ से मोहब्बत करना

तुझ से कहने की कोई बात न करना तुझ से
कुंज-ए-तन्हाई में बस ख़ुद को अलामत करना

इक बगूले की तरह ढूँढते फिरना तुझ को
रू-ब-रू हो तो न शिकवा न शिकायत करना

हम गदायान-ए-वफ़ा जानते हैं ऐ दर-ए-हुस्न
उम्र भर कार-ए-नदामत पे नदामत करना

ऐ असीर-ए-क़फ़स-ए-सहर-ए-अना देख आ कर
कितना मुश्किल है तेरे शहर से हिजरत करना

फिर वही ख़ार-ए-मुग़ीलाँ वही वीराना है
ऐ कफ़-ए-पा-ए-जुनूँ फिर वही ज़हमत करना

सूरत माह-ए-मुनीर अब के सर-ए-बाम आ कर
हम ग़रीबों को भी कुछ रंज-ए-इनायत करना

जमा करना तह-ए-मिज़्गाँ तुझे क़तरा क़तरा
रात भर फिर तुझे टुकड़ों में रिवायत करना

काम ऐसा कोई मुश्किल तो नहीं ‘ख़ावर’
मगर इक दस्त-ए-हिना-रंग पे बैअत करना

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम 

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम ।
हर सुर में है रंग झनकता तेरे नाम ।

जंगल-जंगल उड़ने वाले सब मौसम,
और हवा का सर्द दुपट्टा तेरे नाम ।

तेरे बिना जो उम्र बिताई, बीत गई,
अब इस उम्र का बाक़ी हिस्सा तेरे नाम ।

जितने ख़्वाब ख़ुदा ने मेरे नाम लिखे,
उन ख़्वाबों का रेशा-रेशा तेरे नाम ।

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