अरुण कमल की रचनाएँ

उम्मीद

आज तक मैं यह समझ नहीं पाया
कि हर साल बाढ़ में पड़ने के बाद भी
लोग दियारा छोड़कर कोई दूसरी जगह क्यों नहीं जाते ?

समुद्र में आता है तूफान
तटवर्त्ती सारी बस्तियों को पोंछता
वापस लौट जाता है
और दूसरे ही दिन तट पर फिर
बस जाते हैं गाँव-
क्यों नहीं चले जाते ये लोग कहीं और ?

हर साल पड़ता है मुआर
हरियरी की खोज में चलते हुए गौवों के खुर
धरती की फाँट में फँस-फँस जाते हैं
फिर भी कौन इंतजार में आदमी
बैठा रहता है द्वार पर ?

कल भी आयेगी बाढ़
कल भी आयेगा तूफान
कल भी पड़ेगा अकाल

आज तक मैं समझ नहीं पाया
कि जब वृक्ष पर एक भी पत्ता नहीं होता
झड़ चुके होते हैं सारे पत्ते
तो सूर्य डूबते-डूबते
बहुत दूर से चीत्कार करता
पंख पटकता
लौटता है पक्षियों का एक दल
उसी ठूँठ वृक्ष के घोंसलों में
क्यों ? आज तक मैं समझ नहीं पाया।

लगातार 

लगातार बारिश हो रही है लगातार तार-तार
कहीं घन नहीं न गगन बस बारिश एक धार
भींग रहे तरुवर तट धान के खेत मिट्टी दीवार
बाँस के पुल लकश मीनार स्तूप
बारिश लगातार भुवन में भरी ज्यों हवा ज्यों धूप

कोई बरामदे में बैठी चाय पी रही है पाँव पर पाँव धर
सोखती है हवा अदरक की गंध
मेरी भींगी बरौनियाँ उठती हैं और सोचता हूँ
देखूँ और कितना जल सोखता है मेरा शरीर
तुम इंद्रधनुष हो|

धरती और भार

भौजी, डोल हाथ में टाँगे
मत जाओ नल पर पानी भरने
तुम्हारा डोलता है पेट
झूलता है अन्दर बँधा हुआ बच्चा
गली बहुत रुखड़ी है
गड़े हैं कंकड़-पत्थर
दोनों हाथों से लटके हुए डोल
अब और तुम्हें खींचेंगे धरती पर
झोर देंगे देह की नसें
उकस जाएँगी हड्डियाँ
ऊपर-नीचे दोलेगा पेट
और थक जाएगा बउआ
भैया से बोलो बैठा दें कहीं से
घर के आँगन में नल
तुम कैसे नहाओगी सड़क के किनारे
लोगों के बीच
कैसे किस पाँव पर खड़ी रह पाओगी
तुम देर-देर तक

तुम कितना झुकोगी
देह को कितना मरोड़ोगी
घर के छोटे दरवाज़े में
तुम फिर गिर जाओगी
कितनी कमज़ोर हो गई हो तुम
जामुन की डाल-सी

भौजी, हाथ में डोल लिए
मत जाना नल पर पानी भरने
तुम गिर जाओगी
और बउआ…

प्रधान की अनिद्रा 

जब अपने प्रधान विदेश गए
तो एक राजधानी के महापौर ने
एक भव्य समारोह में उन्हें नगर-कोष की
स्वर्ण-कुंजी भेंट की सम्मान में

अपने प्रधान रात भर सो नहीं पाए
यही सोचें यही सोचें कि कुंजी तो दी
पर यह तो बताया ही नहीं कि
खजाना है कहाँ?

रिश्ता

वह समझ नहीं पाती क्या करे
रिश्ते में बड़ी पर हैसियत छोटी
यहाँ इतने नौकर-चाकर और वह ख़ुद
एक सेठ के घर महराजिन

अब आरम्भ होगी विधि
जो बड़े हैं उनकी पैरपुजाई
और वह खड़ी है वहीं मंडप के बाहर
बेमौसम के फल-सी

सबसे पहले उसी की है बारी
सबसे बड़ी फूआ गृहस्थ की।

कोई

कोई भी तो नहीं
पर कोई है ज़रूर
जो मेरे बोलते चुप हो जाता है
पानी में घड़ा डुबोते जो आवाज़ हो रही है
वो आख़िर कहाँ से आ रही है
एक रोशनी जो मेरे ताकते धूर बन जाती है
कहीं कोई न था कोई भी
एक चिड़िया ढेले-सी गिरी आ रही थी
आसमान का पूरा बोझ लिए
हवा डोर की तरह लिपटती लटाई पर
पेड़ जैसे कोई गरारा रेशम का
लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर
पर धूप थी इतनी
कि पुतलियाँ सिकुड़ गईं।

हार की जीत 

नहीं, मुझे अपनी परवाह नहीं
परवाह नहीं हारें कि जीतें
हारते तो रहे ही हैं शुरू से
लेकिन हार कर भी माथा उठ रहा
और आत्मा रही जयी यवांकुर-सी हर बार

सो, मुझे हार-जीत की परवाह नहीं
लेकिन आज ऎसा क्यों लग रहा है जैसे मैं खड़ा हूँ और
मेरा माथा झुक रहा है
लगता है आत्मा रिस रही है तन से
रक्त फट रहा है
और मेरे कंधे लाश के बोझ से झुक रहे हैं

नहीं, यह बात किसी को मत बताना खड्ग सिंह
नहीं तो लोग ग़रीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे।

जीभ की गाथा 

दाँतों ने जीभ से कहा– ढीठ, सम्भल कर रह
हम बत्तीस हैं और तू अकेली
चबा जाएंगे

जीभ उसी तरह रहती थी इस लोकतांत्रिक मुँह में
जैसे बाबा आदम के ज़माने से
बत्तीस दाँतों के बीच बेचारी इकली जीभ

बोली, मालिक आप सब झड़ जाओगे एक दिन
फिर भी मैं रहूंगी
जब तक यह चोला है।

कथावाचक

हो जो कोई भरे हुँकारी
फिर तो कथा सुनाता जाऊँ
रात-रात भर
कभी न सोऊँ

चाह नहीं कुछ
गाँव नगर में घूम-घूम कर
कथा सुनाता जाऊँ
कहीं पेड़ के नीचे या ओटे पर
विद्यालय में
जहाँ कभी भी जुट जाएँ दस लोग
वहीं पर चित्रकूट हो-
कहना सब को सब को लाना
बच्चे बूढ़े नारी सभी को
बीच-बीच में अर्थ

भी थोड़ा कर दूँगा मैं
हाँ हाँ बेटे…शंख बजेगा, आना

हारमोनियम लिए घूमता देस-देस मैं
कहीं अभी तक जम नहीं सका हूँ
नहीं रही पहिले जैसी उत्सुकता मन में
भक्तों के भी
बदला समय भाव भी बदले
एक जून भोजन भी भारी
भक्तों के घर
उत्तर कांड समाप्त
अचानक होगा कहीं
किसी अज्ञात गाँव में
कभी अचानक स्वर अँटकेगा कथा सुनाते
कहीं बीच से टूटेगी जीवन चौपाई
अर्थ शेष रह जाएगा

जिसने ख़ून होते देखा

नहीं, मैंने कुछ नहीं देखा
मैं अन्दर थी। बेसन घोल रही थी
नहीं मैंने किसी को…

समीर को बुला देंगी
समीर, मैंने पुकारा
और वह दौड़ता हुआ आया जैसे बीच में खेल छोड़
कुछ हाँफता
नहीं, नहीं, मैं चुप रहूंगी, मेरे भी बच्चे हैं, घर है

वह बहुत छोटा था अभी
एकदम शहतूत जब सोता
बहुत कोमल शिरीष के फूल-सा
अभी भी उसके मु~म्ह से दूध की गन्ध आती थी
ओह, मैंने क्यों पुकारा
क्यों मेरे ही मार्फ़त यह मौत, मैं ही क्यों कसाई का ठीहा, नहीं, नहीं, मैं कुछ नहीं जानती, मैंने कुछ नहिं देखा
मैंने किसी को…

वे दो थे। एक तो वही…। उन्होंने मुझे बहन जी कहा या आंटी
रोशनी भी थी और बहुत अंधेरा भी, बहुत फतिंगे थे बल्ब पर
मैं पीछे मुड़ रही थी
कि अचानक
समीर, मैं दौड़ी, समीर
दूध और ख़ून
ख़ून
नहीं नहीं नहीं कुछ नहीं

मैं सब जानती हूँ
मैं उन सब को जानती हूँ
जो धांगते गए हैं ख़ून
मैं एक-एक जूते का तल्ला पहचानती हूँ
धीरे-धीरे वो बन्दूक घूम रही है मेरी तरफ़

चारों तरफ़

अमरता की खोज

अमरता की खोज में एक कवि अपनी गली से चला
और चलते-चलते आलोचक की चौखट पर पहुँचा
आलोचक अंकुरित चना और मुनक्का खा रहा था
बोला, ठीक है, सो जाओ सोफ़े पर देखेंगे।

रात में जब कवि को अभ्यासवश खाँसी आई तो आलोचक हड़बड़ा कर उठा,
‘चुप, चुप कहीं अकादमी अध्यक्ष न सुन लें’
तब कवि ने सोचा लगता है आलोचक से बड़ा अकादमी अध्यक्ष है
उसी से मिलूँ।

अध्यक्ष एक फ़िल्मी गीतकार की ग़ज़ल गुनगुनाता गदगद था
उसने कवि को दुशाला उढ़ाया, यहीं जम जाओ।
रात में इस बार फिर कवि को खाँसी आ गई, सो अध्यक्ष दौड़ा-दौड़ा आय,
‘चुप,चुप कहीं मंत्री न सुन ले’
तब कवि ने सोचा, लगता है मंत्री अकादमी अध्यक्ष से ऊपर है, चलें वहीं।

मंत्री शीर्षासन में व्यस्त था
उसने कवि को तत्काल वृत्ति और बंगला आबंटित किया और कपालभाँति करने लगा।
किन्तु कालगति ने इस बार फिर कवि को खाँसी ला दी
और मंत्री अंगरक्षकों के साथ भागा-भागा आया
‘चुप,चुप। कहीं प्रधान जी न सुन लें।’
और तब कवि ने सीधे प्रधान से मिलने की ठानी

प्रधानमंत्री अभी-अभी अमरीका से लौटा नीम का दतवन कर रहा था
उसने फ़ौरन कवि को राजकवि घोषित किया
और अतिथि-कक्ष में ठहराया।
कवि ने तय किया आज वह खाँसेगा नहीं, अब वह कभी नहीं खाँसेगा
उसने अपने को सात-सात कम्बलों में लपेटा
पर रात हुई, चांद उगा, पुरवा बही और दबाते-दबाते भी कवि को
ज़ोर से खाँसी उखड़ी जैसे कोई उसे भीतर से कोड़ रहा हो
और प्रधानमंत्री मय लावलश्कर भागाभागाभागा आया
‘हे कविराज, मेरा कुछ तो ख़याल करो, जनता सुन लेगी तो क्या होगा’।

और तब कवि को लगा
चलो फिर वहीं उसी गली के टूटे घर में
यह जीवन जो नरक है वही अमरता है।

किसकी ओर से

मैं किसकी ओर से बोल रहा हूँ

उन असंख्य जीवों वनस्पतियों पर्वतों नदियों नक्षत्र तारे,
उन सबकी ओर से जो अब इस पृथ्वी पर नहीं हैं
पर जो कभी थे या होंगे?

नहीं, केवल मनुष्य योनि की ओर से, बस उन्हीं के लिए
जो अभी मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवित हैं मर्त्यलोक में।

तो क्या मैं सभी महादेशों द्वीपों समुद्रों की ओर से बोल सकता हूँ?

नहीं, केवल एशिया की ओर से।

तो मैं पाकिस्तान चीन नेपाल वियतनाम की ओर से बोल सकता हूँ?

नहीं, तुम केवल भारत के नागरिक हो।

अखंड भारत का नागरिक अखंड भारत की ओर से?

नहीं, तुम्हें केवल बिहार आबंटित है।

…जिसकी देह अभी-अभी काटी गई दो हिस्सों में?
ख़ैर इतना भी कम नहीं कम से कम छह करोड़ लोगों की ओर…?

नहीं, छह करोड़ नहीं, केवल अपने धर्मवालों की बात करो।

तो क्या मैं अपने दोस्त इम्तू को छोड़कर बोलूंगा?

नहीं, उतना भी नहीं, केवल अपनी जाति, नहीं उपजाति की ओर से और केवल पुरुषों की
ओर से जो धन में तुमसे न ऊपर हैं न नीचे और यह तो तुम जानते ही हो तुम सबसे दरिद्र
हो सबसे कमज़ोर
महज एक कवि मनुष्यता का फटा हुआ दूध
इसलिए तुम्हें चेतावनी दी जाती है कि तुम किसी की ओर से
नहीं बोलोगे, अपनी ओर से भी नहीं-
उसके लिए राष्ट्र की संसद काफ़ी है।

भाग्य-फल 

मैंने आज ज्योतिषि को देखा
बीच बाज़ार में
मैंने आज शहर के सबसे बड़े ज्योतिषि को
कुँजड़िन से मोल-भाव करते देखा
दो कौड़ी की मामूली कुँजड़िन से
बस दस पैसे के वास्ते मुँह लगाते देखा
और कुँजड़िन भी कितनी मुँहफट थी
एक न छोड़ी
सरे बाज़ार लूट ली लंग

बेचारा ज्योतिषि
आज यही लिखा था भाग्य में !

भूसी की आग

जाड़े की रात थी
मिट्टी की बोरसी में धान की भूसी की
थोड़ी-सी आग थी
आग के ऊपर
एक दूसरे के तर-ऊपर
कई जोड़े हाथ थे
अपने को सेंकते,
तभी किसी बच्चे ने
लोहे की सींक से आग उकटेरी
और धाह फेंकती लाल आग
को देख कर सबने सोचा–
भूसी की आग भी बड़ी तेज़ होती है ।

अपील

हम देश के सबसे बड़े नेता को
अपने सबसे प्रिय नेता को
सबसे महत्त्वपूर्ण नागरिक को
देंगे सबसे बड़ा सम्मान
अजूबा अभूतपूर्व नागरिक सम्मान–
फूल से नहीं
सोने-चाँदी से नहीं
सिक्कों से नहीं
हम उन्हें ख़ून से
जी हाँ ख़ून से तोलेंगे

आइए आप भी आइए
आइए भाइयो बहनो
चाहिए हमें एक-एक आदमी का ख़ून
एक-एक आदमी का ख़ून
आदमी का ख़ून
ख़ून

जयहिन्द !

जाना है 

पहले भी देखा था यह फल
सूँघा था
चखा था बहुत बार
बचपन से ही

पर आज पहली बार जब देखा है
डाल पर पकते इस फल को
तभी जाना है असली रंग-स्वाद-गंध
इस छोटे-से फल के
धरती-आकाश तक फैले सम्बन्ध ।

होटल 

1

सब कुछ यही रहता
ऎसी ही थाली
ऎसी ही कटोरी, ऎसा ही गिलास
ऎसी ही रोटी और ऎसा ही पानी;
बस थाली के एक तरफ़
माँ ने रख दी होती एक सुडौल हरी मिर्च
और थोड़ा-सा नमक ।

2

जैसे ही कौर उठाया
हाथ रुक गया ।

सामने किवाड़ से लगकर
रो रहा था वह लड़का
जिसने मेरे सामने
रक्खी थी थाली ।

जिद्दी लतर

लतर थी कि मानती ही न थी
मैंने कई बार उसका रुख बदला
एक बार तागा बाँधकर खूँटी से टाँगा
फिर पर्दे की डोर पर चढ़ा दिया
कुछ देर तक तो उँगलियों से ठेलकर
बाहर भी रक्खा
लेकिन लतर थी कि मानती ही नहीं थी
एक झटके से कमरे के अन्दर

और बारिश बहुत तेज़
बिल्कुल बिछावन और तकिए तक
मारती झटास

लेकिन खिड़की बन्द हो तो कैसे
आदमी हो तो कोई कहे भी
आप मनी प्लांट की उस जिद्दी लतर को
क्या कहिएगा
जिसकी कोंपल अभी खुल ही रही हो ?

तुम चुप क्यों हो

क्या है गुप्त
क्या है व्यक्तिगत
जब गर्भ में बन्द बच्चा भी
इतना खुला है
इतना प्रत्यक्ष?

कोई अपनी पत्नी को पीट रहा है बेतहाशा
कहता है– मेरी औरत है
कोई अपने नौकर की नन्हीं पीठ जूते से
हुमच रहा है
कहता है– मेरा नौकर है
और कोई तानाशाह हज़ारों लोगों को
गोलियों से भून रहा है,
मुस्कराता हुआ कहता है– मेरी जनता है!

कैसा समय कि छुट्टा साँड़
गौवों की नांद में सींग मार रहा है
और कोई बोल नहीं सकता
कैसा समय के ख़ून के छीटों से भरा सफ़ेद घोड़ा
गाँवों को रौंदता जा रहा है
और कोई रोक नहीं सकता

चुप क्यों है सारा मौहल्ला
चुप क्यों है सारी दुनिया
तुम चुप्प क्यों हो?

जहाँ कहीं दुख में है आदमी
जहाँ कहीं मुक्ति के लिए लड़ता है आदमी
वहाँ कुछ भी नहीं है निजी
कुछ भी नहीं है गुप्त

फिर भी तुम चुप क्यों हो?

Share