अरुण चन्द्र रॉय की रचनाएँ

ईश्वर और इन्टरनेट 

बाज़ार
है सजा
ईश्वर और इन्टरनेट
दोनों का ।

ईश्वर
और इन्टरनेट
इक जैसे हैं

ईश्वर विश्वव्यापी है
इन्टरनेट भी

कण-कण में
समाए हुए हैं दोनों
हर ज्ञानी-अज्ञानी के
रोम-रोम में
रचे-बसे हैं
दोनों ।

जितने पत्थर
उतने ईश्वर
मंदिरों से
मज़ारों तक
गिरजा से
गुरूद्वारे तक
गली-गली
हर चौबारे पर
मिल जाएगा
ईश्वर का रूप
निराकार
साकार
सनातन
चिरंतन ।
इन्टरनेट के भी !

आस्तिक
नास्तिक
सगुन
निर्गुण
अद्वैत
द्वैत
इन्टरनेट के रूप हैं
ईश्वर के भी ।

सुबह से
देर रात तक
ईश्वर
और इन्टरनेट
दोनों के दरबार
भरे रहते हैं ।

दोनों
विर्तुअल हैं ।।
आभासी
इन्हें महसूस किया जा सकता है…
छुआ नहीं जा सकता ।

दोनों की
दुकानें सजी हैं
बाज़ार सजा है
पण्डे और पुरोहित हैं
प्रचारक और
पी0 आर0 कंपनिया है
अजेंट्स हैं

ईश्वर को
नहीं देखा मैंने
भूख मिटाते
रोग भागते
हाँ
ज़रूर देखा है
अपने प्राँगण में पैदा
करते भिखारी

इन्टरनेट भी
भूख नहीं मिटाता
रोग नहीं भागता

ईश्वर युवाओं कि
पसंद है
और इन्टरनेट भी
बुज़ुर्गों का
टाइमपास है
ईश्वर
और इन्टरनेट।

पोर्न
सेक्स
उन्माद
जेहाद
व्याभिचार
दोनों हैं यहाँ

अंतर
इतना भर है कि
ईश्वर को पाने का
माध्यम बनता जा रहा है
इन्टरनेट ।

आस्था का
दूसरा नाम
ना बन जाए
इन्टरनेट…

विश्वव्यापी जाल
ईश्वर और इन्टरनेट ।

तुम्हारा अंक 

तालिकाओं में
खोए
आँकड़ों के जाल में
उलझे-उलझे
हम

मानो अंक
अंक ना हो…

तुम्हारा अंक हो !

पीढ़ियों से सड़े हुए दाँत

हुज़ूर
पीढ़ियों से
सड़े हुए हैं
हमारे दाँत

हमारे बाबा के
बाबा थे
‘बलेल’
बुरबक कहे जाते थे
वे
सो
वे बलेल थे

ए़क साँस में
घंटो तक शहनाई
बजा लेते थे
लेकिन
कहते हैं
उनके भी दाँत
सड़े हुए थे

सड़ा हुआ दाँत
हुज़ूर
ख़राब कर देता
चेहरा
और
ठंडा-गरम
की कौन पूछे
रोटी-भात तक
खा नहीं सकते

पीढ़ियों तक
होता रहा
ऐसा ही
हमारे साथ

मेरे बाबा
थे मिश्री
नाम तो
मिश्री था
लेकिन
हुज़ूर
नसीब नहीं हुई थी
उन्हें
चीनी तक
और
बिना मीठा खाए
सड़ गए थे
उनके दाँत

कहते हैं
वो समय ही ऐसा था
जो
हमारी पीढ़ी में
किसी को
नहीं आई थी
अकल दाढ़

आप ही
बताइए
हुज़ूर
बिना अक्ल दाढ़ के
कैसे आएगी
अक्ल
सो नहीं आई
हमारी किसी पीढ़ी को
अकल
और
ना ही बंद हुआ
हमारी दाँतों का
सड़ना

हवेली वाले
कहते थे
हमारी देह से
आती है
बदबू
लेकिन
हुज़ूर देखते रहे
पीढ़ियों तक
हम
अपने पसीनों से
जगमगाती
हवेलियाँ
खेत-खलिहान
और
फिर भी
सड़े हुए थे
हमारे दाँत

दाँत को
बस दाँत मत
समझिएगा हुज़ूर
क्योंकि
सड़े हुए
दाँत के बहाने
विकृत किया जा चुका था
हमारी सोच
हमारी अस्मिता
हमारा स्व

हुज़ूर
आप ही बताइए
कब तक
रहेंगे हम
सड़े हुए
दाँतों के साथ

अब
जब हम
काट रहे हैं
आपको दाँत
हुज़ूर
तो क्यों
शोर मचा हुआ है
चारो ओर

धान रोपती औरतों का प्यार

खेतों के बीच
घुटने भर कीच में
धान रोपती औरतों से पूछो
क्या होता है प्यार
मुस्कुराकर वे देखेंगी
आसमान में छाये बदरा की ओर
जो अभी बरसने वाला ही है
और प्रार्थना में
उठा देंगी हाथ

धान रोपती औरतों का प्यार
होता है अलग
क्योंकि होते हैं अलग
उनके सरोकार
उन्हें पता है
बरसेंगे जो बदरा
मोती बन जाएँगे
धान के गर्भ में समाकर
और मिटाएँगे भूख
उन्हें कतई फ़िक्र नहीं है
अपनी टूटी मड़ैया में
भीग जाने वाले
चूल्हे, लकड़ी और उपलों की
हाँ , उन्हें
फ़िक्र जरूर है
जो ना बरसे बदरा
सूख जाएँगी आशाएँ

जब प्रेमी की याद आती है उन्हें
ज़ोर-ज़ोर से गाती हैं
बारहमासा
और हंसती हैं बैठ
खेत की मेढ़ पर
गुंजित हो उठता है
आसमान
ताल-तलैया
इमली
खजूर
और पीपल
दूर ऊँघता बरगद भी
जाता है जाग
उनकी बेफ़िक्र हंसी से

फ़िक्र भरी आँखों
और बेफ़िक्र हंसी के
द्वन्द में जीता है
धान रोपती औरतों का प्यार

बँटवारा 

चलो भाई
बड़े हो गए हैं
हम
अब कर लेते हैं
बँटवारा

माँ के दूध का
हिसाब लगा लेते हैं
बड़े ने कितना पिया
मँझले ने कितना पिया
और छुटकी को
कितना पिलाया माँ ने दूध
ज़रूरी है इसका हिसाब
अगर कोई
कमी-बेसी हो तो कह लेना
लगा लेना कीमत

पिता के
खेत-खलिहान तो हैं नहीं
सो बाँटने के लिए बस है
उनका प्यार
परवरिश
दिए हुए संस्कार
साथ ही परवरिश में किया गया फ़र्क
ठीक से हिसाब लगा लेना
कुछ छूट ना जाए
रात-रात जो जाग कर
अपने कंधे पर झुला कर जो रखा था
उसकी कीमत लगा लेना
उन्हें भी बाँट लेंगे

याद है तुम्हे
ये दालान
जिस पर चौकड़ी जमा
हम सब सूना करते थे
क्रिकेट का आँखों देखा हाल
बी0 बी0 सी0 के समाचार
बतकही और
बहसबाजी
बाँट लो उन पलों को
हँसी के ठहाकों को
उनसे उपजी ख़ुशी को

ये दो कमरे हैं
किसने कितना पसीना बहाया
किसने कितनी ईटें ढोई
लगा लो इसका भी हिसाब
बहुत आसान हो जाएगी
ज़िंदगी

अंतिम क्षणों में
बहुत रोए थे पिताजी
सब बेटो और बहुओं के लिए
कुछ आँसुओं के बूँदें
मोती बन गिरी थीं
मेरे गमछे में
बस, मैं नहीं बाँट सकता हूँ इन्हें

मटर छीलते हुए

छीलते हुए मटर
गृहणियाँ बनाती हैं
योजनाएँ
कुछ छोटी, कुछ लम्बी
कुछ आज ही की तो कुछ वर्षों बाद की
पीढ़ी दर पीढ़ी घूम आती हैं
इस दौरान ।

सोचती हैं
गृहस्थी के सीमित संसाधनों के
इष्टतम उपयोग के उपाय
पति से साथ
कई बार करती हैं
वाद-परिवाद
रखती हैं अपनी बात

छीलते हुए मटर
फ़ुर्सत में होती हैं
गृहणियाँ
कई छूटे काम
याद आ जाते हैं उन्हें
जैसे मँगवानी है शर्ट के बटन
ख़त्म होने वाला है खाने वाला सोडा
कई और भी कभी-कभी वाले काम
स्मृतियों में आते हैं

धूप में जब
छीला जाता है मटर
अलसा जाती है
दोपहर
फिर याद आती है
ससुराल गई बेटी
जो होती तो बाँध देती केश
और बेटी से मिल आने की
बना ली जाती है योजना
इसी समय ।

मटर छीलना
कई बार रासायनिक-प्रक्रिया की तरह
काम करता है
उत्प्रेरक बन जाता है
देता है जन्म नए विचारों को
दार्शनिक बना देता है
बुद्ध-सा चेहरा दिखता है
गृहणियों का शांत, क्लांत रहित
जबकि स्वयं को छिला-सा
करती हैं महसूस

कई बार तो
तनाव-मुक्त हो जाती हैं
गृहणियाँ
गुनगुनाती हैं
स्वयं में मुस्कुराती हैं
अपने आप से करती हैं बातें
छीलते-छीलते मटर
जब याद आ जाती है
माँ, बाबूजी, बहन

गृहणियाँ
समय से
चुरा लेती हैं
थोड़ा समय
छीलते हुए मटर
ख़ास अपने लिए ।

कच्ची सड़क

कच्ची सड़को को छोड़
जब चढ़ता हूँ
पक्की सड़क पर
पीछे छूट जाती है
मेरी पहचान
मेरी भाषा
मेरा स्वाभिमान !

कच्ची सड़क में बसी
मिटटी की गन्ध से
परिचय है वर्षो का
कँक्रीट की गन्ध
बासी लगती है
और अपरिचित भी

अपरिचितों के देश में
व्यर्थ मेरा श्रम
व्यर्थ मेरा उद्देश्य
लौट-लौट आता हूँ मैं हर बार
पीठ पर लिए चाबुक के निशान
मनाने ईद, तीज-त्यौहार

कहाँ मैं स्वतन्त्र
मैं हूँ अब भी ग़ुलाम
जो मुझे छोड़नी पड़ती है
कच्ची सड़क !

बाज़ार

मूर्तियाँ
जो बिक गई

ईश्वर हो गईं
पूजी गईं

जो बिक न सकी
मिट्टी रह गईं
मिट्टी में मिल गईं

बर्फ 

1

बर्फ़ बोलती नहीं
पत्थरों की तरह
वह पिघलती भी नहीं
इतनी आसानी से
वह फिर से जम जाती है
ज़िद्द की तरह ।

2

बर्फ़ का रँग
हमेशा सफ़ेद नहीं होता
जैसा कि दिखता है नँगी आँखों से
वह रोटी की तरह मटमैला होता है
बीच-बीच में जला हुआ सा
गुलमर्ग के खच्चर वाले के लिए
तो सोनमार्ग के पहाड़ी घोड़े के लिए
यह हरा होता है घास की तरह

3

बर्फ़ हटाने के काम पर लगा
बिहारी मज़दूर देखता है
अपनी माँ का चेहरा
जमे हुए हाथों से
बर्फ़ की चट्टानों को हटाते हुए

4

बर्फ़
प्रदर्शनी पर लगे हैं
इन दिनों
फ़ोटो उन लोगों के
जिनका सीना छलनी है
गोलियों के बौछार से
तो जिनका मस्तक लहूलुहान है
पत्थरबाज़ी से ।

तथास्तु 

ईश्वर ने
पत्थर बनाए और उनमें भर दी दृढ़ता
फिर उसने बनाईं नदियाँ और उनमे भर दी चंचलता
ईश्वर ने बनाया वृक्ष और उनके भीतर भर दिया हरापन
उसी ईश्वर ने बनाई मिटटी और धीरज भर दिया उसके कण-कण में
ईश्वर ने ही बनाया अग्नि को और उसमे भरा तेज़

फिर ईश्वर ने पत्थर से ली उधार दृढ़ता,
नदी से चंचलता,
वृक्ष से हरापन,
मिटटी से धीरज
और अग्नि से तेज़
और बनाया स्त्री को

ईश्वर ने
उसके रोम-रोम में भर दिए
करुणा और प्रेम
फिर ईश्वर
तथास्तु कहकर चला गया पृथ्वी से

स्त्री के बाद कुछ और शेष नहीं सृष्टि में !

किसान की व्यथा

ख़ाली मेरी थाली
भरा है तेरा पेट
अन्न उगाऊँ मैं
खाऊँ मैं सल्फ़ेट

मिटटी पानी से लड़ूँ
उसमे रोपूँ बीज
पसीना मेरा गन्धाए
महके तेरी कमीज़

ख़ूब जो उगे मेरी फ़सल
गिर जाए इसका मोल
कोल्ड-स्टोरेज में भरकर
पाओ तुम दाम अनमोल

जो व्यापारी बन गए
उनके खुले हैं भाग्य
जो बैठे धरती पकड़
रोए अपना दुर्भाग्य

गेहूँ न फैक्ट्री उपजे
कम्प्यूटर न बनाए धान
जिस दिन देश ये समझे
बढ़े किसान का मान

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