अर्चना पंडा की रचनाएँ

मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

सीता हूँ मैं राम तुम्हीं हो मीरा मैं घनश्याम तुम्हीं हो
कोई पूछे, यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

जग में मेरे अपने बनकर
जब-जब साथ निभाते हो तुम
सच कहती हूँ मेरी खातिर
‘जगन्नाथ’ बन जाते हो तुम
मेरी उन्नति और प्रगति के रथ की गति अविराम तुम्हीं हो
कोई पूछे, यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

मेरा मन मंदिर बन जाता
जब मैं गाती गीत प्यार का
जहाँ तुम्हारे दर्शन होते
मुझको लगती वही ‘द्वारिका’
धर्म तुम्हीं हो अर्थ तुम्हीं हो मोक्ष तुम्हीं हो काम तुम्हीं हो
कोई पूछे, यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

मेरा मन धरती जैसा है
जिस पर छाये तुम अम्बर हो
रोम-रोम में तुम्हीं रमे हो
मेरे मन के ‘रामेश्वर’ हो
इस जीवन की भोर तुम्हीं हो इस जीवन की शाम तुम्हीं हो
कोई पूछे, यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

जब तुम मेरे सिर पर रखते
आशीषों का हाथ तुम्हारा
रूप दिखाई देता मुझको
बिल्कुल ‘बद्रीनाथ’ तुम्हारा
मेरे सारे सत्कर्मों का मंगलमय परिणाम तुम्हीं हो
कोई पूछे, यही कहूँगी-मेरे चारों धाम तुम्हीं हो

वो बोला आकाश लिखो

मैं बोली-क्या लिखूँ बताओ, वो बोला-आकाश लिखो
गीतों मे हर ख़्वाहिश गाओ तुम गजलों में प्यास लिखो

लिखो कभी क्यों दिल की धडकन
बिना बात रुक जाती है
टकराती जब नजर नजर से
क्यों-कैसे झुक जाती है
कभी हलक में आकर कैसे फँस जाती है साँस लिखो
मैं बोली-क्या लिखूँ बताओ

क्यों बैठी हो किसी परिधि में
तोड़ क्यों नहीं देती हो
मन के भाव कलम से सीधे
जोड़ क्यों नहीं देती हो
खुद को मत सीमा में बाँधो जो होता आभास लिखो
मैं बोली-क्या लिखूँ बताओ

पर मैं कैसे लिखूँ और कुछ
मेरा तो बस ख़ास वही
साँस वही है आस वही है
धरती वो आकाश वही !
कहूँ कलम से-कभी न टूटे मेरा यह विश्वास लिखो
मैं बोली-क्या लिखूँ बताओ

लड़ते-लड़ते प्यार हो गया 

गिला-शिकायत-शिकवा-चुप्पी-गुस्सा सब बेकार हो गया
इतना लड़ती थी मैं उससे लड़ते-लड़ते प्यार हो गया

ऐंठी मैं तो ऐंठा वो भी
बात-बात पर कितने ताने
कहना-“कभी नहीं मिलना अब”
पर मिलने को किये बहाने
खिजाँ देखती रही मगर अब ये गुलशन गुलज़ार हो गया
इतना लड़ती थी मैं उससे लड़ते-लड़ते प्यार हो गया

क्या-कैसे-कब हुआ बताओ
पूछ रहा कितने सवाल था
मेरे आँसू टपके ही थे
लेकिन उसका बुरा हाल था
गुस्सा-गिला, शिकायत-शिकवा पानी आखिरकार हो गया
इतना लड़ती थी मैं उससे लड़ते-लड़ते प्यार हो गया

जितना दिल में प्यार भरा हो
उतना ही गुस्सा भी आये
दिल तो इसे समझ ले लेकिन
जब दिमाग सोचे, चकराये
पर दिमाग को हरा दिया तो दिल का हर त्यौहार हो गया
इतना लड़ती थी मैं उससे लड़ते-लड़ते प्यार हो गया

बाल्मीकि ने “मरा-मरा” कह
जैसे अपना राम पा लिया
उसी तरह उल्टा-पुल्टा कर
मैंने भी घनश्याम पा लिया
जिसे समझती थी मैं बाधा वो मेरी रफ़्तार हो गया
इतना लड़ती थी मैं उससे लड़ते-लड़ते प्यार हो गया

सजनवा

मूक नयन की हूक करे जो कूक न जाना चूक सजनवा
नेह न जाए सूख कहूँ दो-टूक, मिटा दे भूख सजनवा

अभी भी ख़ास जो मेरे पास तेरा एहसास
वो बारो-मास रहे
मिलन की आस जगाये प्यास तेरा वो रास,
मधुर आभास रहे
चमक उठे दो नैन खुला जब यादों का संदूक सजनवा
मूक नयन की हूक, करे जो कूक, न जाना चूक, सजनवा

सुबह से शाम कलेजा थाम तेरा ही नाम,
है मेरा जाम हुआ
हुयी बदनाम, लुटा आराम, ओ मेरे राम !
ये क्या अंजाम हुआ
आज बाँध कर बाँहों में दो प्राण देह में फूँक सजनवा
मूक नयन की हूक, करे जो कूक, न जाना चूक, सजनवा

बनी मैं हीर उठी है पीर दिल रही चीर
न इक तस्वीर दिखी
नदी के तीर नयन में नीर मैं हूँ दिलगीर
है क्या तक़दीर लिखी
मैं तेरी अल्हड़ माशूका तू पागल माशूक सजनवा
मूक नयन की हूक, करे जो कूक, न जाना चूक, सजनवा

नेह का सार गीत का हार मधुर झंकार,
स्वप्न साकार है तू
है मेरा प्यार मेरा सिंगार, मेरा त्यौहार
मेरा संसार है तू
मेरी भूलें भूल हमेशा करना सही सलूक सजनवा
मूक नयन की हूक, करे जो कूक, न जाना चूक, सजनवा

मेरी मुश्किल को ना समझे पूछे देर से आई क्यों 

मेरी मुश्किल को ना समझे पूछे-“देर से आई क्यों?”
खींच लगा ले सीने से फिर बोले वो-“शरमाई क्यों?”

मेरे चेहरे पर बालों की लट जब-जब भी लहराये,
हँसकर ज़ुल्फ हटा वो बोले-“चाँद पे बदली छाई क्यों?”

यों तो मैं कितना कुछ कहती पर अक्सर वो यों छेड़े-
मेरे होंठों पर उँगली रख पूछे-“चुप्पी छाई क्यों?”

वो मासूम दिखे पर मुझसे पूछे वो कैसी बातें-
“भोर पहर जब हम जागें तो देख हँसे भौजाई क्यों?”

मेरे कपडे या जेवर की फरमाइश पर कहता है-
“प्यार की दुनिया में आई है अब इतनी महंगाई क्यों?”

“ऐसी-वैसी बात न की जब मैंने अब तक कोई भी, ”
वो पूछे-“फिर मैंने ली है यों मादक अँगड़ाई क्यों?”

इश्क का दरिया गहरा होता इसका था अंदाज मुझे,
पर मैं जितना डूबूँ उतनी ही बढती गहराई क्यों?

उसके आने से क्यों रौशन हो जाती काली रातें,
कानों में फिर बजने लगती है मीठी शहनाई क्यों?

मैं गीत गाना चाहती हूँ

संग तुम्हारे आज फिर मैं गीत गाना चाहती हूँ,
हार कर ख़ुद को तुम्हें मैं जीत जाना चाहती हूँ,

प्यार कुछ खट्टा कभी, मीठा कभी, खारा कभी हो,
छेड़ कर, नाराज़ कर, तुमको मनाना चाहती हूँ,

लो सम्भालो नाव मेरी, तुम चलो पतवार थामो,
मैं नदी की धार के संग खिलखिलाना चाहती हूँ,

नेह की पावन नदी का आचमन सुख दे रहा है,
इस नदी में मैं सरापा डूब जाना चाहती हूँ,

देह के संगीत का आनंद है क्षण मात्र भर का,
नेह का मैं नाद अनहद गुनगुनाना चाहती हूँ,

पढ़ सकूँ मन को तुम्हारे और मन की कह सकूँ मैं,
कोई यूँ नज़दीक रहने का बहाना चाहती हूँ

गीत ग़ज़लों से कहूँ या कुछ इशारों से कहूँ पर,
बात अपने दिल की मैं हर इक बताना चाहती हूँ,

जिस जगह मिलती धरा से आसमां की प्रीती पावन,
उस क्षितिज तक संग तुम्हारे मीत जाना चाहती हूँ

हर कविता के दिल में एक कहानी होती है 

अनुभव या अनुभूति क़लम को गानी होती है
हर कविता के दिल में एक कहानी होती है

पागलपन की अगर न हद हो
क्या स्याही गाये
बिन उन्माद गीत भी कैसे
कोई मुस्काये
ग़ज़ल सजे जब सोच जरा दीवानी होती है
हर कविता के दिल में एक कहानी होती है

बिन सोचे कह देते तुमसे
हम दिल की बातें
उनसे मिलतीं गीतों-गजलों
वाली सौगातें
तुम छूते हो रचना तभी सयानी होती है
हर कविता के दिल में

मन करता है मन की सारी
लहरें मैं गाऊँ
तुम जैसे ही शब्द उन्हें दे
तुम तक पहुँचाऊँ
हर कविता पर दाद तुम्हारी पानी होती है
हर कविता के दिल में अर्चना

प्यार सुना क्या 

साँस सरगमी, होंठ शबनमी सँग बाँहों का हार सुना क्या?
प्यार सुना क्या?
इश्क़ में कमी, आँख में नमी, दिल होता बीमार सुना क्या?
प्यार सुना क्या?

इंतजार के लम्हों को जब
धड़कन लय-सुर में गाती है
क़दमों की आहट जब दिल में
पल-पल शोर मचा जाती है
उस तड़पन उस पागलपन का कोई है आकार सुना क्या?
प्यार सुना क्या?

मेरा नाम कभी हौले से
वो जब कानों में दुहराये
तब मेरा दिल कितना धड़के
कहा नहीं शब्दों में जाये
दर्द की अदा, अनकही सदा, दिल ऐसा लाचार सुना क्या?
प्यार सुना क्या?

कहते-सुनते रहते हैं हम
पर कितना कुछ कह-सुन पाते
फिर भी मन ही मन हम हर पल
कितने सपने बुनते जाते
बिन शब्दों के जुड़ जाते हैं दिल से दिल के तार सुना क्या?
प्यार सुना क्या?

लगती आज पतंग पिया

डोर हो तुम मैं तुमसे जुड़कर लगती आज पतंग पिया
हिचकोले खाते देखूँ आकाश तुम्हारे संग पिया

तुम बिन प्राणों के बिन होकर धरती से तकती अम्बर
संग तुम्हारा पाते ही खिल जाते मेरे अंग पिया

ऊँचा खूब उड़ाते मुझको गिरने पर तुम ही थामो
यों ही साथ रहे तो कोई हारे कभी ना जंग पिया

होश नहीं रहता है मुझको साथ तुम्हारे जब होती
मैं पगली-दीवानी डोलूँ जैसे पी हो भंग पिया

तेरा सँग जो छूटा तो मैं जाने कहाँ खो जाऊँगी
एक जनम क्या जनम-जनम तक रहना मेरे संग पिया

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