अर्चना भैंसारे की रचनाएँ

पौधे की किलकारियाँ 

सारी रात पिछवाड़े की
ज़मीन कराहती रही
लेती रही करवटें

उसकी चिन्ता में
सोया नहीं घर
होता रहा अंदर-बाहर

और अगले ही दिन
पहले-पहल सूरज की किरणें
दौड़ पड़ी चिड़ियों के सहगान में
जच्चा गातीं

उसकी गोद में मचलते
पौधे की किलकारियाँ सुन…!

जब कभी

और जब कभी
मैली हो जाती रुह

तब याद आती
तुम्हारे मन में बहते
मीठे झरने की

कि जिसमें डूबकर
साफ़ करती हूँ आत्मा अपनी।

बूढ़ी उदास औरतें 

वे जो खारिज कर दी गईं हैं
रसोई, ऊसारी, आँगन और चौपालों से
मिल जाया करती थीं,
सुबह-शाम कभी भी
एक दूसरे को घेरे
हँसी-मज़ाक करतीं
या करती मोल-भाव चूडियों का
आते-जाते रोक लेती किसी फेरी वाले को
ख़रीद लेती पुरानी चप्‍पल या कि
ठीकरों के बदले नए बर्तन,

अपने पेट से बाँधे परिवार की भूख
झुकी रहती खेतों के सीनों में
लकड़ी के गठ्ठरों में लादे रहती परम्पराओं के सूत्र
फिर भी अजनाल के घाट पहुँचती रही झुण्डों में
हर डुबकी के साथ उतारती गई
शेष पापों का ऋण
तमाम रिश्‍तों को निभाती नम्र ही बनीं रही
अन्तत:
बाहर से साफ़-सुथरी दिखने वाली औरतें
लिपटी रहती
किसी न किसी मलीन चादर के तार से
वे अब मिल जाया करतीं हैं कभी-कभार
बिखरी-सी यहाँ-वहाँ
मन ही मन उँगलियों पर गिनती है
जाने क्‍या

लौट जाना चाहती हैं
शायद वे उन्‍हीं झुण्डों की ओर
जहाँ ख़ुद ही मरहम होतीं
अपने घावों पर
वे खारिज कर दी गई हैं,
समूल जीवन से
कुछ बूढ़ी उदास औरतें

तितलियाँ हैं यादें 

फूल-सी खिल जाती देह
तो फुदकने लगती यादें
बिछ जाता चेहरे पर बसन्त
भर जाती मोहक गंध
छलक उठता राग-रंग पोर-पोर से
तितलियाँ ही तो होती हैं यादें
प्रकृति के हज़ारों रूप
अपने पंखों में समेट कर
घूमती मन के ओर-छोर
हथेली पर उतरती धूप-सी भर जाती
स्‍मृति की देह में

संचित करती जीवन का आनंद अपने भीतर
सुखद पलों का वंशानुकरण करतीं
दौडती फूल-फूल
यादें फुदकती हैं, महकती हैं, घूमती हैं, दौड़ती हैं
तितलियां हैं यादें

देखता है सपना

सपने में बुलाती है माँ और दौड़ पड़ता है
हिरण-शावक-सा कुलाँचे भरता
पिता से ज़िद करता है
हाट घूमने की ।

और चल देता है आगे-आगे मटकता
सपने में चूमता है पत्‍नी का माथा
काँपते होठों से भरता है बाँहों में
ठण्डी साँसों के साथ
खिलाता है बेटी को जी-भर
करता है लाड़
गोद में उठा
सपने में ही बटोरता है ख़ुशियाँ
सहेजता है सपने में सपना
हर बार युद्ध की घोषणा होने से पहले

वह देखता है सपना
घर में दाख़िल होने का ।

बच्चा देखता है

बच्चा देखता है
सपने में रोटी
टपकने लगती है उसकी लार
पेट की अंतड़ियां टटोलता
निकल जाता है सड़क पर
बच्चा फैलाता है हथेली
ढूंढना है मिटती लाइनें
चमकने लगता उस पर सिक्का
बच्चा देखता है
आश्चर्य से…!

घटने लगी है कहानी

माँ सुनाती है कहानी
जो सुन रखी थी उनने
अपनी माँ से
और उनकी माँ ने
अपनी माँ से

सोचती हूँ
मैं भी सुनाऊंगी कहानी
अपने बच्चों को
इस तरह
चलती रहेगी कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी

पर देखती हूँ कि
घटने लगी है तुलसी-चौबारे की तरह कहानी

और उठने लगे हैं
आंगन से
कहानियाँ सुनते-सुनाते लोग।

Share