अर्जुन देव की रचनाएँ

तू मेरा सखा तू ही मेरा मीतु /

तू मेरा सखा तू ही मेरा मीतु, तू मेरा प्रीतम तुम सँगि हीतु॥
तू मेरा पति तू है मेरा गहणा, तुझ बिनु निमखु न जाइ रहणा॥
तू मेरे लालन, तू मेरे प्रान, तू मेरे साहिब, तू मेरे खान॥
जिउ तुम राखहु तिउ ही रहना, जो तुम कहहु सोइ मोहि करना॥
जहँ पेखऊँ तहाँ तुम बसना, निरभय नाम जपउ तेरा रसना॥
तू मेरी नवनिधि, तू भंडारू, रंग रसा तू मनहिं अधारू॥
तू मेरी सोभा, तू संग रचिआ, तू मेरी ओट, तू मेरातकिया॥
मन तन अंतर तूही धिआइया, मरम तुमारा गुरु तें पाइया॥
सतगुरु ते दृढिया इकु एकै, ‘नानक दास हरि हरि हरि टेरै॥
गिआन-अंजनु गुर दिआ, अगिआन-ऍंधेर बिनासु।
हरि-किरपा ते संत भेटिआ, नानक मनि परगासु॥
पहिला मरण कबूलि करि, जीवन की छडि आस।
होहु सभना की रेणुका, तउ आउ हमारे पास॥

मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई 

मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई।।
बिलाप करे चात्रिक की निआई।।
त्रिखा न उतरै संति न आवै बिनु दरसन संत पिआरे जीउ।।1।।
हउ घोली जीउ घोली घुमाई गुर दरसन संत पिआरे जीउ।।2।।

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी 

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी।।
चिरु होआ देखे सारिंग पाणी।।
धंनु सु देसु जहा तूं वसिआ मेरे सजण मीत मुरारे जीउ।।
हउ घोली हउ घोल घुमाई गुरु सजण मीत मुरारे जीउ।।

एक घड़ी न मिलते ता कलियुगु होता

एक घड़ी न मिलते ता कलियुगु होता।।
हुणे कदि मिलीए प्रीअ तुधु भगवंता।।
मोहि रैणि न विहावै नीद न आवै बिनु देखे गुर दरबारे जीउ।।1।।
हउ घोली जीउ घोलि घुमाई तिसु सचे गुर दरबारे जीउ ।।2।।

भागु होआ गुरि संतु मिलाइिआ

भागु होआ गुरि संतु मिलाइिआ।।
प्रभु अबिनासी घर महि पाइिआ।।
सेवा करी पलु चसा न विछुड़ा जन नानक दास तुमारे जीउ।।4।।
हउ घोली जीउ घोलि घुमाई जन नानक दास तुमारे जीउ।।1।।

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