अर्पित शर्मा ‘अर्पित’ की रचनाएँ

जहाँ में आज कल सभी बहम, नाराज़ रहते है

जहाँ में आज कल सभी बहम, नाराज़ रहते है
हमारी जान हम तुमसे तो कम, नाराज़ रहते है

ज़रा सी बात पे कहती हो क्यूँ तुम हमसे इठला के
करो न बात अब हम से के हम, नाराज़ रहते है

फ़क़ीरों से कोई पानी ही ले आओ, चमत्कारी,
जो मेरे जान-ओ-दिल है वो सनम, नाराज़ रहते है

दुआ हक़ में हमारे पीरो मुर्शिद रोज़ फरमाओ
मुक़ामें फ़िक्र है दोनों ही हम, नाराज़ रहते हैं

ग़नीमत है यही, इनसे था अपनी जान का ख़तरा
चलो अच्छा है जो अहले सितम नाराज़ रहते है

तुमारा साथ हो तो मंज़िलो थकता नहीं हूँ मैं
तुम्हारे बिन नहीं उठते क़दम, नाराज़ रहते है

क़दम रखे है जब से तुमने मेरे दिल के आँगन में
ख़ुशी अठखेलियाँ करती है, ग़म नाराज़ रहते है

है हम तो बे ख़बर इसका सबब क्या है ख़ुदा जाने
न जाने हमसे क्यूँ अहले करम, नाराज़ रहते हैं

मुझे देखा है जब से मुस्कुराकर आपने “अर्पित”
उसी दिन से सभी ज़ुल्म-ओ- सितम, नाराज़ रहते है

आईना रूठ गया है तेरे जाने के बाद 

आईना रूठ गया है तेरे जाने के बाद
एक अंधेरा सा बिछा है तेरे जाने के बाद

किस क़दर टूट के बरसे है ये बादल ग़म के
आसमाँ चीख़ उठा है तेरे जाने के बाद

दिल के टुकड़े हुए बरसात हुई अश्को की
क्या कहूँ क्या क्या हुआ है तेरे जाने के बाद

ज़ेहन भी चुप है ज़ुबा चुप है नज़र भी चुप है
हमने भी कुछ न कहा है तेरे जाने के बाद

चीख़ता खंडर है रोती है हवेली दिल की
घर ये आसेब-ज़दा है तेरे जाने के बाद

घर में दीपक ही जला है न कोई शम्मे वफ़ा
मुद्दतो दिल ही जला है तेरे जाने के बाद

ये ज़माना ही नहीं ख़ुद से भी “अर्पित” मुझको
कुछ तअल्लुक़ न रहा है तेरे जाने के बाद

अब दिल बुझा बुझा है, मुझे मार दीजिए

अब दिल बुझा बुझा है, मुझे मार दीजिए
जीने में क्या रखा है, मुझे मार दीजिए

दिल के मरज़ का अब नहीं दुनिया में कुछ इलाज,
ये इश्क़ ला दवा है, मुझे मार दीजिए

मैं बे-गुनाह हूँ तो यही है मेरी सज़ा,
ये फ़ैसला हुआ है, मुझे मार दीजिए

डरता हूँ आईने को लगाने से हाथ मैं
कहता ये आईना है, मुझे मार दीजिए

मैं हूँ वफ़ा शिआर यहाँ जी के क्या करूँ
ये दौर-ए-बेवफ़ा है, मुझे मार दीजिए

वल्लाह बे नशा न रही मेरी कोई शाम,
उखड़ा हुआ नशा है, मुझे मार दीजिए

ए जाने दिल बहार तेरी बेरुख़ी के बाद
अब मेरे पास क्या है, मुझे मार दीजिए

तन्हाइयों की क़ैद से घबरा के एक शख़्स
आवाज़ दे रहा है, मुझे मार दीजिए

एक बात जोश-जोश में सच कह गया हूँ मैं
तुमको बुरा लगा है, मुझे मार दीजिए

तन्हाई मेरी उससे भी देखी नहीं गई,
उसने भी ये कहा है, मुझे मार दीजिए

रश्के चमन बना है ये “अर्पित” मेरा वजूद
ख़ुश्बू को छू लिया है मुझे मार दीजिए

जिस्म बे जान है पड़ा हूँ मैं 

जिस्म बे जान है पड़ा हूँ मैं
ऐसा लगता है के मरा हूँ मैं

किस जगह आज खो गया हूँ मैं
अपने साये को ढूंडता हूँ मैं

आँसुओ का नहीं हिसाब कोई
बहते दरिया पे ही खड़ा हूँ मैं

है नहीं कोई साथ में मेरे
किस्से ये बात कर रहा हूँ मैं

ख़ाबे राहत दिखा तू आईना
और ग़म से संवर गया हूँ मैं

अब हवाओ में ढूंढिएगा मुझे
खुद में भी अब नहीं रहा हूँ मैं

घर के आईने से पता पूछो
अब उसी में छुपा हुआ हूँ मैं

उसकी हर चीज़ मुझको रोती है
जिस मकाँ में कभी रहा हूँ मैं

धूप देखे हुए ज़माना हुआ
कितनी रातो को सो चुका हूँ मैं

ख़ुद को भुला हुआ हूँ मैं “अर्पित”
ये बताए कोई के क्या हूँ मैं

ज़रा सा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

ज़रा सा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले
नतीजा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

तुम्हारे बिन ये मेरी ज़िंदगी का हाल क्या होगा
ख़ुदारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

यही है इल्तजा मेरी यही मेरी तमन्ना है
दोबारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

तुम्हारे बिन कोई रोता ही रहता है मेरे दिल में
हमारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

सफ़र की इब्तिदा ग़म है सफ़र की इंतेहा ग़म है
सराफा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

नज़र से दूर होगे तुम तो मेरा हाल क्या होगा
के यारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

मेरी ग़मगीन आँखों का मेरी बर्बादिये दिल का
नज़ारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

दमे आख़िर मेरी बुझती हुई आँखों का ए “अर्पित”
इशारा सोच लेते तुम बिछड़ने से ज़रा पहले

जाने क्या सोच के रख्खी है ये दूरी उसने

जाने क्या सोच के रख्खी है ये दूरी उसने
मुझको एक बार भी आवाज़ नहीं दी उसने

एक मुद्दत से समझता रहा मैं जिसको रक़ीब
आपके नाम से ये ख़त भी दिया जी उसने

हिचकिया लेती रही याद मुझे करती रही
रात भर बात तो तन्हाई में है की उसने

साग़रे मय से भी बढ़ कर है मोहब्बत की शराब
रख दिया जाम को फिर आँखों से है पी उसने

उसने तन्हाई का रातो को दिया मेरी अज़ाब
जाने किस जुर्म की मुझको ये सज़ा दी उसने

बन गया सारा ही घर रश्के चमन रश्के बहार
आपके नाम से जब मेहंदी रचा ली उसने

चाहता था वो किसी और को भी मेरी तरह
मुझको ये बात बताई न कभी भी उसने

बहुत उदास था वो मुझसे जब कभी भी मिला
ऐसी क्या बात थी जो मुझसे छुपाई उसने

एक मुद्दत से पड़ा सोच रहा हूँ “अर्पित”
जाने क्या बात थी जो मुझ से कही थी उसने

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