अर्श मलसियानी की रचनाएँ

कुछ शेर-1

(1)
जिन्दगी कशमकशे-1इश्क के आगाज2 का नाम,
मौत अंजाम है इसी दर्द के अफसाने का।

(2)
जिस गम से दिल को राहत हो, उस गम का मुदावा3 क्या मानी?
जब फितरत4 तूफानी ठहरी, साहिल5 की तमन्ना क्या मानी?

(3)
तसन्नो6 की फुसूंकारी7 का कुछ ऐसा असर देखा,
कि यह दुनिया मुझे दुनियानुमां मालूम होती हैं।

(4)
न आने दिया राह पर रहबरों ने,
किये लाख मंजिल ने हमको इशारे।

(5)
किसका कुर्ब8,कहाँ की दूरी, अपने आप में गाफिल9 हैं,
राज अगर पाने का पूछो, खो जाना ही पाना है।

1. कशमकश – (i) खींचातानी, आपाधापी (ii) असमंजस, संकोच, दुविधा, पसोपेश (iii) संघर्ष, लड़ाई (iv) दौड़-धूप 2. आगाज – आरम्भ, शुरूआत 3.मुदावा – दवा, इलाज 4. फितरत – आदत, स्वभाव 5. साहिल – किनारा, तट 6.तसन्नो- (i) बनावट, कृत्रिमता (ii) दिखावा, जाहिरदारी (iii) चापलूसी, चाटुकारिता 7. फुसूंकारी – जादूगरी, माया, तिलिस्म 8.कुर्ब – समीपता, नजदीकी, निकटता 9गाफिल – (i) संज्ञाहीन, बेहोश (ii) असावधान, बेखबर (iii) आलसी, काहिल

कुछ शेर-2

(1)
यूँ मुतमइन1 आये हैं खाकर जिगर पै चोट,
जैसे वहाँ गये थे इसी मुद्दआ के साथ।

(2)
रहबर या तो रहजन2 निकले या हैं अपने आप में गुम,
काफले वाले किससे पूछें किस मंजिल तक जाना है।

(3)
वफा पर मिटने वाले जान की परवा नहीं करते,
वह इस बाजार में सूदो-जियो3 देखा नहीं करते।

(4)
वह मर्द नहीं जो डर जाये, माहौल के खूनी खंजर4 से,
उस हाल में जीना लाजिम है जिस हाल में जीना मुश्किल है।

(5)
गुल भी हैं गुलिस्ताँ भी है मौजूद,
इक फकत आशियाँ नहीं मिलता।

1.मुतमइन – (i) संतुष्ट (ii) आनन्दपूर्वक, खुशहाल 2.रहजन – डाकू, लुटेरा 3.सूदो-जियो – लाभ-हानि 4. खंजर – तलवार

कुछ शेर-3

(1)
खयाले-तामीर1 के असीरों,करो न तखरीब2 की बुराई,
बगौर3 देखो तो दुश्मनी के करीब ही दोस्ती मिलेगी।

(2)
खुश्क बातों में कहां ऐ शैख4 कैफे-जिन्दगी,
वह तो पीकर ही मिलेगा जो मजा पीने में है।

(3)
आने दो इल्तिफात 5में कुछ और भी कमी,
मानूस6 हो रहे हैं तुम्हारी जफा7 से हम।

(4)
‘अर्श’ पहले यह शिकायत थी खफा होता है वह,
अब यह शिकवा है कि वह जालिम खफा होता नहीं।

(5)
इस इन्तिहाए-तर्के-मुहब्बत8 के बावजूद,
हमने लिया है, नाम तुम्हारा कभी-कभी।

1.तामीर – निर्माण, रचना, इमारत बनाना 2.तखरीब – (i) तामीर का उल्टा, बरबादी, विनाश, विध्वंस (ii) बिगाड़, खराबी 3.बगौर – ध्यान से 4.शैख – पीर, गुरू, धर्माचार्य 5इल्तिफात – (i) प्यार, लगाव (ii) कृपा, दया, मेहरबानी (iii) तवज्जुह 6मानूस – आसक्त, मुहब्बत करने वाला 7.जफा – सितम, अत्याचार 8.इन्तिहाए-तर्के-मुहब्बत – मुहब्बत का बिल्कुल परित्याग

कुछ शेर-4

(1)
ऐ सितमगर[1] मेरे इस हौसले की दाद दें,
सामने तेरे अगर फरियाद[2] कर लेता हूँ मैं।

(2)
नहीं है राज कोई राज दीदावर[3] के लिये,
नकाब पर्दा नहीं शौक की नजर के लिये।

(3)
बला[4] है कहर है आफत है फित्ना है कयामत है,
हसीनों की जवानी को, जवानी कौन कहता है?

(4)
मिल गया आखिर निशाने-मंजिले-मकसूद मगर,
अब यह रोना है कि शौके-जुस्तजू[5] जाता रहा।

(5)
यह किसने कह दिया गुमराह कर देता है मैखाना[6] ,
खुदा की फजल[7] से इसके लिए मंदिर हैं, मस्जिद हैं।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें जुल्म ढानेवाला
  2. ऊपर जायेंशिकायत, परिवाद, न्याय-याचना, सहायता के लिए पुकार
  3. ऊपर जायें किसी चींज के गुण-दोष अच्छी तरह समझने वाले
  4. ऊपर जायें मुसीबत, विपत्ति, आस्मानी मुसीबत
  5. ऊपर जायें तलाश
  6. ऊपर जायेंशराबखाना
  7. ऊपर जायेंमेहरबानी, कृपा

मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है

मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
ख़ामोशी भी है आवाज़ भी है

नशेमन के लिये बेताब ताईर
वहाँ पाबन्दी-ए-परवाज़ भी है

ख़ामोशी पे भरोसा करने वालो
ख़ामोशी ग़म का गम्माज़ भी है

मेरी ख़ामोशि-ए-दिल पर न जाओ
कि इस में रूह की आवाज़ भी है

दिल-ए-बेगाना-ख़ूँ, दुनिया में तेरा
कोई हमदम कोई हमराज़ भी है

है मेराज-ए-ख़िरद भी अर्श-ए-अज़ीम
जुनूँ का फ़र्श-ए-पा अंदाज़ भी है

जब आदमी वहशी बन गया 

बस्तियों की बस्तियां बर्बादो-वीराँ हो गईं
आदमी की पस्तियां आखिर नुमांयां हो गईं

क़त्लो-ग़ारत के हज़ारों दाग़ लेकर वहशतें
आज सुनते हैं कि फिर इस्मत बदामाँ हो गईं

देखिये सरसब्ज कब होती है कश्ते-ज़िन्दगी
आँधियां कहते तो हैं अब्रे-बहाराँ हो गईं

यूँ कभी मज़हब की क़दरों को न इन्साँ छोड़ता
ऐ ख़ुशा वह ख़ुद बलाए-जाने-इन्साँ हो गईं

कौन अब नेकी करे इन्सानियत के नाम पर
नेकियां तो जिस क़दर थीं सर्फ़े-ईमाँ हो गईं

जिन ख़ताओं पर दरे-जन्नत हुआ आदम पै बन्द
वह ख़तायें ही बिनाए-बज़्मे-इमकाँ हो गईं

न आने दिया राह पर रहबरों ने

न आने दिया राह पर रहबरों ने
किए लाख मंज़िल ने हमको इशारे

हम आग़ोशे-तूफ़ाँ तो होना है एक दिन
सम्भल कर चलें क्यों किनारे-किनारे

यह इन्साँ की बेचारगी हाय तौबा
दुआओं के बाक़ी हैं अब तक सहारे

यह इक शोब्दा है, कि है मौज दिल की?
किसी को डुबोए किसी को उभारे

मुझसे पिछले बरस की बात न कर

पूछ अगले बरस में क्या होगा
मुझसे पिछले बरस की बात न कर

यह बता हाल क्या है लाखों का
मुझसे दो-चार-दस की बात न कर

यह बता क़ाफ़िले पै क्या गुज़री?
महज़ बाँगे-जरस की बात न कर

क़िस्सए-शैख़े-शहर रहने दे
मुझसे इस बुलहबिस की बात न कर

जवाबे-तल्ख़ में शामिल मलामत और हो जाती

जवाबे-तल्ख़ में शामिल मलामत और हो जाती
जहाँ सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती

नहीं गो फ़र्क़ कुछ घर और मैख़ाने में ऐ वाइज़
वहां पीते तो साक़ी की ज़ियारत और हो जाती

ख़ताएं मान लीं मैंने यह अच्छा किया वर्ना
पशेमानी से बचने की नदामत और हो जाती

मुझको ले डूबी मेरी खुद्दारियां 

अर्ज़े-वाजिब से रक्खा बे-नियाज़
मुझको ले डूबी मेरी खुद्दारियां
उनसे मिलता है, क़नाअ़त का सबक़
एक नज़मत है, मेरी नादारियां
कोशिशे-इज़हारे-ग़म भी ज़ब्त भी
आह यह मजबूरियाँ, मुख्तारियां
‘अर्श’ क्यों हँसता है तू झूठी हँसी
किससे सीखी हैं यह दुनियादारियाँ?

तेरी दोस्ती पै मेरा यकीं

तेरी दोस्ती पै मेरा यकीं, मुझे याद है मेरे हमनशीं
मेरी दोस्ती पै तेरा ग़ुमाँ, तुझे याद हो कि न याद हो

वह जो शाख़े-गुल पै था आशियां जो था वज्ह-ए-नाज़िश-ए-गुलसिताँ
गिरी जिसपै बर्के-शरर-फ़िशाँ तुझे याद हो कि न याद हो

मेरे दिल के जज़्बए-गर्म में मेरे दिल के गोशए नर्म में
था तेरा मुक़ाम कहाँ-कहाँ तुझे याद हो कि न याद हो

इश्क़े-बुताँ का ले के सहारा कभी-कभी

इश्क़े-बुताँ का ले के सहारा कभी-कभी
अपने ख़ुदा को हमने पुकारा कभी-कभी

आसूदा ख़ातिरी ही नहीं मतमए-वफ़ा
ग़म भी किया है हमने गवारा कभी-कभी

इस इन्तहाए-तर्के-मुहब्बत के बावजूद
हमने लिया है नाम तुम्हारा कभी-कभी

बहके तो मैक़दे में नमाज़ों पे आ गए
यूँ आक़बत को हमने सँवारा कभी-कभी

रूबाईयात 

मग़रिब से उमड़ते हुए बादल आए
भीगी हुई ऋतु और सुहाने साए
साक़ी, लबे जू, मुतरबे-नौ.ख़ेज़, शराब
है कोई जो वाइज़ को बुला कर लाए?

रिन्दों के लिए मंज़िलें-राहत है यही
मैख़ान-ए-पुरकैफ़-ए-मसर्रत है यही
पीकर तू ज़रा सैरे-जहां कर ऐ शैख
तू ढूंढता है जिसको वह जन्नत है यही

हर ज़र्फ़ को अन्दाज़े से तोल ऐ साक़ी
यह बुख़्ल भरे बोल न बोल ऐ साक़ी
मैं और तेरी तल्ख़नबाज़ी तौबा
यह ज़हर न इस शहद में घोल ऐ साक़ी

फ़रदौस के चश्मों की रवानी पै न जा
ऐ शैख़ तू जन्नत की कहानी पै न जा
इस वहम को छोड़ अपने बुढ़ापे को ही देख
हूरान-ए-बहिश्ती की जवानी पै न जा

तू आतिशे-दोज़ख़ का सज़ावार कि मै?
तू सबसे बड़ा मुलहदो-ऐय्यार कि मैं?
अल्लाह को भी बना दिया हूर फ़रोश
ऐ शैख़ बता तू है गुनहगार कि मैं?

रुबाई 

तूफ़ाँ के तलातुम में किनारा क्या है,
गरदा में तिनके का सहारा क्या है.
सोचा भी ऐ ज़ीस्त पे मरने वाले,
मिटती हुई मौजों का इशारा क्या है?

जंगे-कोरिया

सुलह के नाम पर लड़ाई है
अम्ने-आलम तेरी दुहाई है

सुलह-जूई से बढ़ गई पैकार
आदमी-आदमी से है बेज़ार

आदमीयत का सीना चाक हुआ
क़िस्सा-इन्सानियत का पाक हुआ

आदमी-ज़ाद से ख़ुदा की पनाह
इसके हाथों है, इसकी नस्ल तबाह

कौन पुरसाँ है ग़म के मारों का
कमसिनों और बेसहारों का

खोल दे मैकदा मुहब्बत का
नाम ऊँचा हो आदमीयत का

एक फ़रमान पर चले आलम
हो बिनाए-निज़ामे नौमहकम

तख़्त बाक़ी रहे न कोई ताज
सारे आलम पै हो आवामी राज

हो उख़व्वत की इस तरह तख़लीक़
काले-गोरे की दूर हो तफ़रीक़

आदमी-आदमी से मिल के रहे
गुंचए-सुलहे-आम खिल के रहे

शर्क़ पर जोरे-ग़र्ब मिट जाए
दिले-आलम का कर्ब मिट जाए

हो तहे-आबे-बहरे-काहिल गर्क़
एशियाई-ओ-यूरपी का फ़र्क

कुछ आज़ाद शेर

मेरी ख़मोशी-ए-दिल पर न जाओ
कि इसमें रूह की आवाज़ भी है

हर गुल हमारी अक्ल पै हँसता रहा
मगर हम फ़स्ले-गुल में रंगे-ख़िज़ाँ देखते रहे

मेरा कारवाँ लुट चुका है, कभी का
ज़माने को है शौक़ अभी रहज़नी का
अजब चीज़ है आस्ताने-मुहब्बत नहीं
जिस पै मक़बूल सज़दा किसी का

इक फ़रेबे-आरज़ू साबित हुआ
जिसको ज़ौके-बन्दगी समझा था मैं

पहुँचे हैं, उस मक़ाम पै अब उनके हैरती
वह ख़ुद खड़े हैं दीद-ए-हैराँ लिए हुए

रहबर तो क्या निशाँ किसी रहज़न का भी नहीं
गुम-गश्तगी गई है मुझे छोड़ कर कहाँ

हज़ार पिन्दो-नसायह सुना चुका वाइज़
जो बादाख़्वार थे वह फिर भी बादाख़्वार रहे
इधर यह शान कि इक आह लब तक आ न सकी
उधर यह हाल कि पहरों वह अश्क़वार रहे

रहबर या तो रहज़न निकले या हैं अपने आप में गुम
काफ़िले वाले किससे पूछें किस मंज़िल तक जाना है
किसका क़र्ब कहाँ की दूरी अपने आप से ग़ाफ़िल हूं
राज़ अगर पाने का पूछे खो जाना ही पाना है

कूए-जानाँ मुक़ामे-फ़ैज़ है ‘अर्श’
तुम इसी काबे का तवाफ़ करो

Share