अलका सिन्हा की रचनाएँ

नये वर्ष की पहली कविता

नए वर्ष की पहली कविता का इंतज़ार करना
जैसे उत्साह में भरकर सुबह-शाम
नवजात शिशु के मसूढ़े पर
दूध का पहला दाँत उँगली से टटोलना।

मगर मायूस कर देते हैं प्रकाशक
कि कविता की माँग नहीं है आजकल
जैसे कि डॉक्टर खोलती है भेद
ऐन तीसरे माह– गर्भ में लड़की के होने का।

मायूसी होती है कि क्या करना है
किसी लड़की-सी कविता को रचकर
जिसकी आस ही नहीं किसी को
जो उपयोगी ही नहीं
जला दी जाए जो संपादक की रद्दी में
या फिर ख़ुद ही कर बैठे आत्मदाह
किसी की हवस का शिकार होकर ।

रचने से पहले ही थक जाती है क़लम
सूख जाती है सियाही
हो जाती है भ्रूण-हत्या
नए वर्ष की पहली कविता की ।

कौन है जो

ये कौन है जो मेरे साथ-साथ चलता है
ये कौन है जो मेरी धड़कनों में बजता है
मुस्कराता है मेरी बेचैनियों पर
दिन-रात मुझसे लड़ता है ।

रोकता है कभी जुबाँ मेरी
कभी बात करने को मचलता है
टीसता है ज़ख़्म का दर्द बनकर
कभी दर्द पर मरहम रखता है।
झटक के हाथ सरक जाता है कभी
कभी उम्र-भर साथ निभाने की क़सम भरता है ।

भीड़ में हो जाता है गुमसुम
ख़ामोशियों में बजता है
ये कौन है जो मेरे चेहरे पर
नूर-सा चमकता है !

मधुमास 

सुबह की चाय की तरह
दिन की शुरुआत से ही
होने लगती है तुम्हारी तलब
स्वर का आरोह
सात फेरों के मंत्र-सा
उचरने लगता है तुम्हारा नाम
ज़रूरी- गैरज़रूरी बातों में
शिकवे-शिकायतों में

ज़िन्दगी की छोटी-बड़ी कठिनाइयों में
उसी शिद्दत से तलाशती हूँ तुम्हें
तेज़ सिरदर्द में जिस तरह
यक-ब-यक खोलने लगती हैं उँगलियाँ
पर्स की पिछली जेब
और टटोलने लगती हैं
डिस्प्रिन की गोली ।

ठीक उसी वक़्त
बनफूल की हिदायती गंध के साथ
जब थपकने लगती हैं तुम्हारी उँगलियाँ
टनकते सिर पर
तब अनहद नाद की तरह
गूँजने लगती है ज़िन्दगी
और उम्र के इस दौर में पहुँचकर
समझने लगती हूँ मैं
मधुमास का असली अर्थ ।

एक लड़की की शिनाख़्त

अभी तो मैंने
रूप भी नहीं पाया था
मेरा आकार भी
नहीं गढ़ा गया था
स्पन्दनहीन मैं
महज़ माँस का एक लोथड़ा
नहीं, इतना भी नहीं
बस, लावा भर थी…

पर तुमने
पहचान लिया मुझे
आश्चर्य !
कि पहचानते ही तुमने
वार किया अचूक
फूट गया ज्वालामुखी
और बिलबिलाता हुआ
निकल आया लावा
थर्रा गई धरती
स्याह पड़ गया आसमान ।

रूपहीन, आकारहीन,
अस्तित्वहीन मैं
अभी बस एक चिह्न भर ही तो थी
जिसे समाप्त कर दिया तुमने ।

सोचती हूं कितनी सशक्त है
मेरी पहचान
कि जिसे बनाने में
पूरी उम्र लगा देते हैं लोग ।

जीवन पाने से भी पहले
मुझे हासिल है वह पहचान
अब आवश्यकता ही क्या है
और अधिक जीने की !

मुझे अफ़सोस नहीं
कि मेरी हत्या की गई !

अंतिम सांस तक

ग्राहक को कपड़े देने से ठीक पहले तक
कोई तुरपन, कोई बटन
टाँकता ही रहता है दर्ज़ी ।

परीक्षक के पर्चा खींचने से ठीक पहले तक
सही, ग़लत, कुछ न कुछ
लिखता ही रहता है परीक्षार्थी ।

अंतिम साँस टूटने तक
चूक-अचूक निशाना साधे
लड़ता ही रहता है फ़ौजी ।

कोई नहीं डालता हथियार
कोई नहीं छोड़ता आस
अंतिम साँस तक ।

अख़बार की ज़मीन पर 

लिखी जा रही हैं कविताएँ
अख़बार की ज़मीन पर ।

फड़फड़ा रहे हैं कहानियों के पन्ने
पुस्तकालयों के रैक्स पर ।

खींसें निपोर रहे हैं श्रोता
मंच के मसखरों पर ।

बाँग दे रहे हैं आलोचक
टी०वी० स्क्रीन पर ।

मंत्रणा हो रही है विद्वान, मनीषियों में
कि बाँझ हो गई है लेखनी।

उधर जंगल में नाच रहा है मोर !

हम दोनों

हम दोनों ही
जिन्दगी के संघर्ष में
जूझते रहे
पूरी निष्ठा के साथ

तुमने भी फतह कर डाले
कितने ही किले
मैंने भी हासिल कीं
कितनी ही उपलब्धियां
फिर भी एक बुनियादी फर्क
बना रहा हम दोनों के बीच

तुम्हें अच्छी लगती है
अखबार खोल कर
चाय की चुस्कियों के साथ
राजनीति और राजनेता पर
धुआंधार बहस…

बहस तो मैं भी कर सकती हूं
बहुत अच्छी
मगर नहीं करती
क्योंकि इस सारे संघर्ष के बीच भी
मैं चिंतित रही हूं
बच्चों की पढ़ाई और इम्तहान को लेकर
बढ़ते बच्चों की सोहबत और टी.वी. प्रोग्राम में
उनकी बढ़ती दिलचस्पी को लेकर

सोचती हूं
क्यों न हम थोड़ा-थोड़ा-सा बदल जाएं
बांट लें एक दूसरे को
वैसे भी प्रिय
एक रथ के ही हम पहिये हैं दो
आओ मिल कर साथ चलें!

अंखियों में आ जा निंदिया 

हो के चांदनी पे तू सवार
अंखियों में आ जा निंदिया…
खूब पढ़ेगी, खूब बढ़ेगी
जैसे कोई चढ़ती बेल,
हर मुश्किल से टकराएगी
जीतेगी जीवन का खेल।
तू पा लेगी वो ऊंचाई
हैरत से देखे दुनिया
अंखियों में आ जा निंदिया…
धीरे-धीरे झूला झूले
जा पहुंचेगी अम्बर पार,
उड़ने वाला घोड़ा लेक
आएगा एक राजकुमार।
डोली ले जाएगा एक दिन
सजकर बैठी है गुड़िया।
अंखियों में आ जा निंदिया…

कचनार पर कविता

कितना अप्राकृतिक लगता है
आज के समय में
कचनार पर कविता लिखना ।
दौड़ती-भागती ज़िंदगी के बीच
अल्प-विराम, अर्द्ध-विराम की तरह
सड़क के किनारे आ खड़े होते हैं
कितने ही ऊँचे, घने, हरे-भरे
फूलों वाले
या फिर
बिना पत्तियों के
सिर्फ़ डालीदार पेड़…

कैसे पहचानूँ इस भीड़ में कचनार
जानती ही क्या हूँ मैं
इस ख़ूबसूरत नाम के सिवा
चलो, खोज भी लूँ शब्दकोश में अर्थ
देख भी लूँ इंटरनेट पर चित्र
तो भी
क्या सत्यापित हो जाएगा
इस किरदार का चरित्र !

बिना पहचान तो
मुस्कराता तक नहीं है यह महानगर
अपरिचित कोई पता पूछे
तो कुंडियाँ बंद कर देते हैं लोग
बिना पुलिस-जाँच
नौकर तक नहीं रखते घरों में
बंद कमरों में दुबके पड़े होते हैं
रिटायर्ड बुजुर्ग
अलमस्त हवा भी लौट जाती है
बेदस्तक
खिड़की के पार से ।

ऐसे ख़ामोश वक़्त में
मन की कच्ची ज़मीन पर
काव्यात्मक रिश्ते की गुहार लगाते
अबोध कचनार को
कैसे ठुकरा दूँ
यों तो कहानियों-उपन्यासों में भेंट हुई है
इस किरदार से
क्या पता, मिलने पर लगे
कि बरसों से जानती थी मैं इसे
मेरे ही भीतर था कहीं
रंग और गंध में विकसित होता
मैं छूना चाहती हूँ कचनार
लिखना चाहती हूँ
रंग और गंध पर कविता…

मगर मन का एक कोना
सचेत कर रहा है लगातार
बेवजह बात न करें किसी अपरिचित से
किराए पर न दें मकान
अनजान-अजनबी को
न छुएँ कोई लावारिस सामान !

पढ़ रही हूँ मैं
अपने और कचनार के बीच आकार लेती
एक संदिग्ध कविता
चुप… और ख़ौफ़ज़दा…

गुलमोहर 

वृक्ष ने आवेश में भर लिया
पत्तियों को
अपनी बलिष्ठ बाँहों में
बेतरह ।

पत्तियाँ लजाईं,
सकुचाईं
और हो गईं –
गुलमोहर ।

मैं तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ 

मैं लौट जाना चाहती हूँ
शब्दों की उन गलियों में
जहाँ से कविताएँ गुज़रती हैं
कहानियों की गलबहियाँ डाले ।

मेरी तमाम परेशानियों, नाकामियों के विष को
कंठस्थ कर लेने वाली नीलकंठ क़लम
मुझे रचने का सौंदर्य दे
कि मैं स्याही से लिख सकूँ
उजली दुनिया के सफ़ेद अक्षर ।

मुझे जज़्ब कर हे कलम !
मैं तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ ।

मैं काग़ज़ की देह पर
गोदने की तरह उभर आना चाहती हूँ
और यह बता देना चाहती हूँ
कि काग़ज़ की संगमरमरी देह पर लिखी
शब्दों की इबारत
ताजमहल से बढ़कर ख़ूबसूरत होती है ।

मुझे गढ़ने की ताक़त दे हे ब्रह्म !
मैं संगतराश होना चाहती हूँ ।

अपने मान-अपमान से परे
अपने संघर्ष, अपनी पहचान से परे
नाभि से ब्रह्मांड तक गुँजरित
शब्द का नाद होना चाहती हूँ ।

मुझे स्वीकार कर हे कण्ठ
मैं गुँजरित राग होना चाहती हूँ ।

औरत और लंच-बॉक्स 

बचपन में देखती थी
कचहरी से लौटकर आते थे बाबूजी
और मां
झट हाथ से छाता, बैग ले लेती थी
आसन बिछाकर भोजन परोसती थी।

बाबूजी घर-बाहर का हाल-समाचार
पूछते-बताते खाना खाते
और मां पंखा झलती रहती थी।

कितनी तृप्ति होती थी
थाली समेटती मां के चेहरे पर
सुखदायी होती थी कल्पना
खुद को इस परंपरा की
कड़ी के रूप में देखने की।

किन्तु इस भाग-दौड़ में
दो पल बतियाने की
सामने बिठाकर खाना खिलाने की
फुर्सत कहा मिलती है।

तुम्हारे लाख मना करने पर भी
धर देती हूँ दो रोटी, सूखी सब़्जी
और थोड़ा अचार
तुम्हारे लंच-बॉक्स में।

‘क्यों नाहक परेशान होती हो तुम
हमारी कैंटीन में भी मिल जाती है दाल-रोटी’
कहकर उठा लेते हो तुम अपना डिब्बा
और चल देते हो दफ़्तर की ओर।

तुम कभी नहीं करते हो तारीफ़
न ही शिकायत
कि आज लंच में क्या दे दिया तुमने ?

शाम जब सिंक में खोलती हूँ
उँगलियों से चाटकर
साफ किया लंच बॉक्स
तो दिखने लगता है मुझे
कि दफ्तर के लॉन
या कैंटीन में बैठकर
तुमने खोला था डिब्बा
खाई थी रोटी और
ऊँगलियों से चाटकर कटोरी
बैठ गये थे सुस्ताकर।

ठीक तभी
एकदम दबे पाँव
गुनगुनी धूप की तरह पहुँचकर मैंने
समेट-दिये थे रोटी-सब्जी के डिब्बे
जैसे कि माँ पानी छिड़ककर
समेट लेती थी बासन
और चौका कर तृप्त हो जाती थी।

वैसी ही तृप्ति मुझे भी मिल जाती है
सिंक में खोलते हुए तुम्हारा लंच-बॉक्स
और सोचती हूँ तृप्ति का ये सुख
एक औरत के हिस्से का है
इसे तुम नहीं समझ पाओगे।

तुम क्या जानो 

दिन भर की लम्बी यात्रा के बाद
जो थोड़ा-सा वक्त
तुम्हारे साथ बीतता है
तुम क्या जानो
वह मेरे लिए कितना कीमती होता है।

अलग-अलग भूमिकाओं की फाइलें निपटाते
प्लास्टिकी मुस्कान से परे
जब होती हूँ मैं तुम्हारे स्नेहिल आगोश में
वो नितांत निजी पल
कितने अनमोल होते है!

उस वक्त मैं कोई नहीं होती हूँ
न कोई संबंध, न संबोधन
तमाम अवरणों से परे
एक ऐसा शून्य हो जाती हूँ
जो तुम्हारे संयुक्त होने पर
अनंत को पाता है
नीले आकाश, गहरे सागर में
विलीन हो जाता है…

काश तुम जान पाते
कि दिन भर की लम्बी यात्रा के बाद
जो थोड़ा-सा वक्त तुम्हारे साथ बीतता है
वह मेरे लिए कितना कीमती होता है!

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