अशरफ़ अली ‘फ़ुगां’ की रचनाएँ

आलम में अगर इश्क़ का बाज़ार

आलम में अगर इश्क़ का बाज़ार न होता
कोई किसी बंदे का ख़रीदार न होता

हस्ती की ख़राबी नज़र आती जो अदम में
उस ख़्वाब से हरगिज़ कोई बेदार न होता

कहता है तुझे ख़ाक न दूँ ग़ैर-ए-अज़ीयत
ये दिल में अगर थी तो मेरा यार न होता

मालूम किसे थी ये तेरी ख़ाना-ख़राबी
मैं जानता ऐसा तो गिरफ़्तार न होता

आलम को जलाती है तेरी गर्मी-ए-मजलिस
मरते हम अगर साया-ए-दीवार न होता

ऐ शैख़ अगर कुफ़्र से इस्लाम जुदा है
पस चाहिए तस्बीह में ज़ुन्नार न होता

ज़ालिम मेरे हासिद की तो शादी थी इसी में
यानी मुझे दर तक भी तेरे बार न होता

देते तेरी मजलिस में अगर राह ‘फ़ुग़ाँ’ को
उस शख़्स से हरगिज़ कोई बे-ज़ार न होता

अबस अबस तुझे मुझ से हिजाब

अबस अबस तुझे मुझ से हिजाब आता है
तेरे लिए कोई ख़ाना-ख़राब आता है

पलक के मारते हस्ती तमाम होती है
अबस को बहर-ए-अदम से हुबाब आता है

ख़ुदा ही जाने जलाया है किस सितम-गर ने
जिगर तो चश्म से हो कर कबाब आता है

शब-ए-फ़िराक़ में अक्सर मैं ले के आईना
ये देखता हूँ कि आँखों में ख़्वाब आता है

नज़र करूँ हूँ तो याँ ख़्वाब का ख़याल नहीं
गिरे है लख़्त-ए-जिगर या कि आब आता है

अक्स भी कब शब-ए-हिज्राँ का 

अक्स भी कब शब-ए-हिज्राँ का तमाशाई है
एक मैं आप हूँ या गोशा-ए-तन्हाई है

दिल तो रुकता है अगर बंद-ए-क़बा बाज़ न हो
चाक करता हूँ गिरेबाँ को तो रुसवाई है

ताक़त-ए-ज़ब्त कहाँ अब तो जिगर जलता है
आह सीने से निकल लब पे मेरे आई है

मैं तो वो हूँ कि मेरे लाख ख़रीदार हैं अब
लेक इस दिल से धड़कता हूँ कि सौदाई है

दिल-ए-बे-ताब ‘फ़ुग़ाँ’ उम्मत-ए-अय्यूब नहीं
न उसे सब्र है हरगिज़ न शकेबाई है

बहार आई है सोते को टुक जगा 

बहार आई है सोते को टुक जगा देना
जुनूँ ज़रा मेरी ज़ंजीर को हिला देना

तेरे लबों से अगर हो सके मसीहाई
तो एक बात में जीता हूँ मैं जिला देना

अब आगे देखियो जीतूँ न जीतूँ या क़िस्मत
मेरी बिसात में दिल है उसे लगा देना

रहूँ न गर्मी-ए-मजलिस से मैं तेरी महरूम
सिपंद-वार मुझे भी ज़रा तू जा देना

ख़ुदा करे तेरी ज़ुल्फ़-ए-सियह की उम्र दराज़
कभी बला मुझे लेना कभी दुआ देना

ब-रंग-ए-ग़ुंचा ज़र-ए-गुल के तईं गिरह मत बाँध
‘फ़ुग़ाँ’ जो हाथ में आवे उसे उड़ा देना

देखिए ख़ाक में मजनूँ की असर है 

देखिए ख़ाक में मजनूँ की असर है कि नहीं
दश्त में नाक़ा-ए-लैला का गुज़र है कि नहीं

वा अगर चश्म न हो उस को न कहना पी अश्क
ये ख़ुदा जाने सदफ़ बीच गुहर है कि नहीं

एक ने मुझ को तेरे दर के उपर देख कहा
ग़ैर इस दर के तुझे और भी दर है कि नहीं

आख़िर इस मंज़िल-ए-हस्ती से सफ़र करना है
ऐ मुसाफ़िर तुझे चलने की ख़बर है कि नहीं

तोशा-ए-राह सभी हम-सफ़राँ रखते हैं
तेरे दामन में ‘फ़ुग़ाँ’ लख़्त-ए-जिगर है कि नहीं

दिल धड़कता है कि तू यार है सौदाई

दिल धड़कता है कि तू यार है सौदाई का
तेरे मजनूँ को कहाँ पास है रुसवाई का

बर्ग-ए-गुल से भी कम अब कोह-ए-ग़म उस ने जाना
ये भरोसा तो न था दिल की तवानाई का

कीजिए चाक गिरेबाँ को बहार आई है
ज़िक्र बे-लुत्फ़ है याँ सब्र ओ शकेबाई का

सर्व साबित-क़दम इस वास्ते गुलशन में रहा
नहीं देखा कभी जलवा तेरी रानाई का

ज़ोर मंज़ूर-ए-नज़र तो तू ‘फ़ुग़ाँ’ रखता है
मैं तो बंदा हूँ तेरी चश्म की बीनाई का

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