अशोक कुमार की रचनाएँ

चित्रकार 

जब मैं एक वर्तुल बनाता हूँ
तो उसकी कोई ठोस दीवारें नहीं होतीं
सब कुछ वायवीय होता है
जिसके भीतर तरल उमड़ रहे होते हैं

जब कोई आयत बनाता हूँ
तो उसका मतलब भी यह नहीं होता
कि न जुडें उसके टुकड़े
जब वे पास आ रहे होते हैं

जब मैं खींच रहा होता हूँ आड़ी तिरछी कोई रेखा
तो उन रेखाओं के पार
होता है एक व्यवस्थित सुनहला संसार
और बेचैन होता है
इस पार मेरा चित्रकार।

शब्दावली में अटका हुआ कोई शब्द

पानी बदलता था बानी बदलती थी
और शब्दावली भी

मेरी जमीन में अलग-अलग भाषा लिये हुये लोग थे
जो मुँह में अलग-अलग जुबान रखते थे

जुबान कैचियाँ बन कपडों के अलग-अलग प्रदेश में चलती थीं
और कोई लम्बी थकाऊ यात्रा के बारे में बेफिक्र हो जिक्र करता

कोई सोने के चढ़ते हुये भावों की चर्चा अनमने से करता
और फिर उसके गिरते हुए समय में कुछ गहरी सांसे भरता

मैंने अक्सर पाया था कि जिन्हें बड़ी गाड़ियों की अच्छी जानकारी थी
उन्हें रफ़्तार का गम्भीर तकनीकी ज्ञान था
और मातृभाषा की शब्दावलियों में अंटकते हुये ऐसे लोग
कोई विदेशी भाषा में जलेबियों की दुरूह लड़ियाँ बना जाते

मुझे आश्चर्य था कि किताबों के फड़फड़ाते पन्नों में
कहीं कोई अनुचित शब्द नहीं था
जो अनुचित साधनों की जोशोखरोश वकालत करता था
और इसके बावजूद दुनिया विपर्यित और विभाजित थी

मैं व्यथित था कि साध्यों की नैतिक व्याख्या करते हुए
साधनों के अनैतिक इस्तेमाल का इल्जाम उन्हीं लोगों पर था
जिनकी शब्दावलियों में भाषा विदेशी जमीन पर रफ़्ता-रफ़्ता सरपट सरकती नज़र आती थी

मैं अचम्भित था यह देख कर कि
शब्दावलियों में अंटके हुए जो लोग थे
उन्होंने कोई गम्भीर वा सरल किताबें नहीं पढ़ी थीं
और कहीं कोई सीमा का अतिक्रमण नहीं कर रहे थे

उनके लिए दुनिया किताबों की कब्र पर उगे हुए कुकुरमुत्ते की कोई पौध थी।

प्रयोगधर्मिता

प्रयोग करते रहे कि पानी हवा हो जाय
प्रयोग करते रहे कि हवा पानी हो जाय

प्रयोग करते रहे कि पौधों पर आ जाय खुद ब खुद धूप
और मिट्टी के लोंदे में इंसानी महक आ जाय

प्रयोग यह कि झूठ को अपने हक में बना लें हम सच
और फिर कोई जमीनी हकीकत आसमानी हो जाय।

अच्छाईयों के सपने 

कितने अच्छे हो तुम
हर बार आमंत्रित करते हो
कि वे सौंप दें तुम्हें अपनी बुराईयाँ

वे सौंपते हैं निर्भीक हो कर
तुम उनकी बुराइयों से अच्छे हो जाते हो

कितने अच्छे हो तुम
तुम उन्हें अच्छाईयों के सपने दिखाते हो
और वे अपनी आधी बुराइयाँ छोड़ आधे अच्छे हो जाते हैं

उनकी आधी बुराइयाँ जैसे तुम्हें अच्छा करती हैं
अपनी बची हुई आधी बुराइयों से वे अच्छे हो जाते हैं

कितने अच्छे हो तुम
तुम उन्हें डराते हो हर बार कि अच्छे हो जाओ
और हर बार वे डर कर अपनी सिर्फ़ आधी बुराइयाँ सौंपते हैं

वे आधी बुराइयाँ महज भयवश छोड़ते हैं
और तुम उन्हें पूरा अभयदान देते हो

कितने अच्छे हो तुम
कि तुम दुनिया से आधी बुराइयाँ अपने सिर्फ़ एक कठोर कदम से दूर करने के दावे करते हो
अपनी पूरी जनता के सामने नंगे हो कर
और जनता तुम्हें नग्न नहीं शालीन मानती है

तुम उनकी आधी बुराइयों के संग अपने चेहरे को देदीप्यमान बनाते हो
और वे अपनी ऐकान्तिक शेष बुराइयों के साथ दमकते चेहरे होते हैं

कितने अच्छे हो तुम
जब तुम पूरी मानवता को अच्छे होने के सपने दिखाते हो
और वे अपनी बची हुई बुराइयों के साथ फिर पनपते हैं
फिर से तुम्हारी अच्छाईयों के घोषणाओं के लिये
फिर से अच्छा होने के लिये।

बिसंसृत

हम कहीं गिरे हुए नहीं थे
हम तो ऊपर उठ रहे थे

कुछ लोग गाँव से कोई राजधानी आ गये थे
और वह यात्रा उन्हें लोमहर्षक लगी थी

कुछ लोग सीधे देश की राजधानी आ गये थे
और वे जब गाँव पहुँचते तो अरबियन नाईट्स के किस्से सुनाते
बोरा चट्टी लिए स्कूल जाते बच्चे अचरज से सुनते
बंगाल के महानगर से आया वासी जब हावडा ब्रिज के बिना बीच के पायों के खड़े होने की बात बताता
धूल वसना एक किशोर मुँह बाये सुनता और लार पोंछ डालता

यह तो गाँव में कहो घूरे थे उस ज़माने में
जहाँ दालान में जमे लोग लकड़ी डाल आग सेंक लेते
और श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग से किसी न किसी पायदान पर चढ़े बढ़े गाने सुन लेते थे
और बी बी-सी से दिन दुनिया की खबरें जान लेते थे
या फिर ऑल इंडिया रेडिओ से कोई तशरीह समझ लेते थे

उठना जारी था सभी का
कुछ नगर आ गये थे
कुछ महानगर आ गये थे
बचे हुए लोग बचे हुए गाँव को कस्बों में बदल रहे थे
जब मोबाइल के टावर को अपने सरसों के खेत में लगवाने की मारामारी कर रहे थे

बदलते समय में
नज़रों के आगे धुआँ हर जगह था
और महानगरों से स्मॉग की खबरें थीं

लोग टेलीविजन गौर से देखते
टेलीविजन गौर से पढ़ते
एक समान भाषा गढ़ते
एक समान आगे बढ़ रहे थे

समान उठ रहे थे
समान गिर रहे थे।

चलो आदमी आदमी खेलते हैं

वह आदमी-सा दिखता था
उन्होंने चाहा
वह उनके साथ आदमी-आदमी खेले

वह जो था बहिष्कृत था कोई
जिसकी भोंडी-सी शक्ल थी
और जो अक्सर उन्हें दिख जाता था
किसी राह पर
ठीक वहीं से बदरंग और बदसूरत होती थी उनकी दुनिया

वह कोई आदमी आदमी-सा एक जीव था
जो किसी दौड़ में पिछड़ गया था
कोई आदमी-आदमी के खेल में

उसने कहा
मैं सदियों से खेल ही तो रहा हूँ
आदमी आदमी
तुम मुझे आदमी समझते कहाँ हो

उन्होंने कहा
तुम आदमी लगते भी कहाँ हो
अभी उद्-विकास में तुम्हारी पूँछ गयी नहीं है
और आदमी होना सवाल मूँछों का हो गया है अब

हाँ, मुझे अपनी धूरी पर घूमना ही आता है
गोल गोल
वहीं खत्म होता हूँ
जहाँ से रोज शुरू होता हूँ

हाँ तुम इसलिये ही तो आगे नहीं बढ़ पाते
क्योंकि तुम्हें सिर्फ़ घूर्णन ही आता है
परिक्रमा नहीं आती

तो फिर मेरे संग
क्यों खेलना चाहते हो खेल
आदमी आदमी का

क्योंकि मैं तुमसे जीतना चाहता हूँ
हर हाल में

क्या जीत इतनी ज़रूरी है
वह भी उससे
जो आदमी न हुआ हो

अरे
तुम आदमी न हुए
तो क्या
तुम्हें आदमी बनाने में हमने
कसर कहाँ छोड़ी
तुम्हारे लिये
शास्त्र रचे
वेद
पुराण
उपनिषद

अभी भी रच रहे हैं
कहानियाँ
कवितायें
महाकाव्य
महाकाव्यात्मक उपन्यास

तुम्हारे लिये
रचे कई भाषा विज्ञान की किताबें
प्रेम की कई परिभाषायें
जिन्हें दीमकों से बचा कर रखा गया है

तुम्हें पढाना है
नाट्य शास्त्र
सिखाना है नृत्य
गायन
और सबसे बड़ी
और सबसे पहले
दुनियादारी

इसके सीखते ही
तुम बन जाओगे आदमी

फिलहाल
खेलो तो
मेरे संग
आदमी आदमी

क्या पता
खेलते खेलते
बन जाओ
आदमी

चलो आदमी-आदमी खेलते हैं।

खाली होते हुए भी

जब वह पैदा हुआ था
पहाड़ हरे-भरे थे
पेड़ फलों से लदे हुए थे
नदियाँ भरी-पूरी थीँ पानी से
खेतों में फसलें लहलहा रही थीं

वहाँ जहाँ पैदा हुआ था
वह खाली घर था
अनाज के दानों से
रेशों के कपड़ों से
छत के खपड़ों से

उस घर में जनमते ही
आँगन में तलमलाते पाँव रखते ही
तुतलाती बोली बोलते ही
खाली होने की परिभाषा वह जानने लगा था
और यह भी कि भरे होने का भान देती यह सृष्टि उसके घर का एक टीनही खाली कटोरा है

सनातन चिरंतन भरी-पूरी दिखती दुनिया खाली पैदा हुए लोगों के लिये एक चुनौती है
जो सिमटती है चन्द भरे लोगों के इर्द-गिर्द
और उन्हें धुरी बनाती है

भरी दुनिया के बीच वह अपना खाली कोना टटोलता है
पैदा होने के बाद रोज-रोज जिन्दा रहते हुए
और अपनी दुनिया के बदरंग पहाड़ों में
अपने सपनों में हरे रंग रंगता है
पेड़ों पर फल लादता है
नदियों में पानी
और खेतों में लहलहाती फसलें
भरता है

खाली होते हुए भी वह यह जानता है
हौसलों से भरा होना ज़रूरी है
अपनी खाली दुनिया को भरी-पूरी बनाने के लिये।

काजल की काली कोठरियाँ

काजल की कोठरी में
क्या दीवारें होती हैं काली
क्या रोशनी भी हो जाती है काली उसमें।

मैंने देखा तो नहीं कहीं भी, कभी भी
काजल से पुती हुयी कोठरी,
बस सुना है जैसे सुना है आपने।

मुझे पक्का भरोसा है आप जानते होंगे
कब बनी होगी पहली कोठरी काजल की
इतिहास में आपने जाना होगा
कैसी होगी लम्बाई-चौड़ाई उसकी,
यह भी कि वह कच्ची दीवारों की थी या पक्की।

मैंने तो बस यह सुना है
उसमें दखल देती रोशनी भी
हो जाती है काली,
घुसती हवाएँ वहाँ हो जाती हैं
बदरंग।
वहाँ बैठे सफेदपोश आदमी की पोशाक
हो जाती है काली चित्तीदार।

पता नहीं किस शिल्पी ने
बनाई ऐसी कोठरियाँ
और क्यों बनायीं,
फिर उनमें घुसता आदमी
क्यों उजले पोशाक पहन
अन्दर जाने की जिद ठाने बैठता है।

क्या कोई शिल्पकार से कह नहीं सकता
कि न बनाये वह काली कोठरियाँ,
क्या वह उजला रंग नहीं दे सकता
काजल की काली कोठरियों को।

आदमी गढते हुए 

आदमी गढते हुए
आदमी का एक साँचा गढना ज़रूरी है
आदमी गढने के लिये साँचे का ढाँचा गढना ज़रूरी है

साँचे तय करते हैं आदमी की विशेषताएँ
आदमी बनने के लिए
ढाँचे में फिट बैठने की विवशताएँ ज़रूरी हैं

आदमी बनने के लिए ज़रूरी है
कुम्हार की चाक पर सही लोंदा बनना
आदमी बनने के लिए कुम्हार के मन में बसना ज़रूरी है

आदमी बनना तय करती है
एक मजबूत खड़ी दीवार
आदमी बनने के लिए
उस दीवार को फाँदना ज़रूरी है

आदमी बनने से रोकती है एक साजिश
आदमी बनने के लिए
उस कुचक्र को पहचानना और भेदना ज़रूरी है।

बेजुबान

बचपन की दी गयी नसीहतों में
यह भी था चुप हो जाना
उम्र के आगे

और उम्र के आगे वह किसी ऊँची शिला पर उकेरी मूर्ति की तरह नतमस्तक था

चुप होने का मतलब एक तहजीब को जिन्दा रखना था
और मन में उठती आवाजों को
एक सलीके के लिये बेजुबानी का अमली जामा पहना दिया जाना था

ऐसा तो बिलकुल ही न था
कि खौलते पानी के पतीलॅ को
किसी ढक्कन से दबा दिया जाय हमेशा के लिये
वह बन गया था पतीले के उपर
रखा गया थाल
जो हिल जाता था खुद के भीतर
उफनते उबाल के आगे

जमीन पर खींच दी गयी थी एक रेखा
जिसके पार जाना खतरे की तमाम संभावनाओं से भरा था
वह रेखाओं के पार भेज देना चाहता था उन शब्दों को
जो ककहरे की व्याकरण सम्मत विधियों के भीतर ही बनाये थे उसने
पर जिसमें रेखाओं की ज्वाला से कहीं अधिक धधक और आग थी
कहीं अधिक बेचैनी
जो किसी अनन्य सर्जन की वेदना के उदास रंग भर रहे थे

चटख रंगों का एक सुघड़ सपना अपनी आँखों के आगे पसरी जमीन पर
जमी हुई बर्फ की तरह देखना चाहता था वह
जिसे कभी पिघला सके तो वैसी ही आग
जो बेजुबानी की हदों से आगे जाकर
निकाले गये शब्दों की आग से धधकता हो

फिलहाल एक चुप्पी जो धर दी गयी थी उसकी जुबान के आगे
उस अनुशासन के अनुसंधान में लगा था वह
जो चुप रहने और खौल कर बुदबुदाने से निकले मौन शब्दों को
बेजुबानी की हदों को पार करा सके
उम्र की सारी अड़चनों को तोड़ कर।

प्रशंसा

उसने मुझे शेर की तरह ताकतवर बताया
चीते की तरह तेज

उसने हिरन से फुर्तीला कहा मुझे
और कहा कि
हाथी जैसी है तुम्हारी याददाश्त

वह जब खुश था
मेरी प्रशंसा कर रहा था

मैं मन ही मन
उसकी नाराजगी से डर रहा था।

अधूरा आदमी

बचपन से ही आधा-अधूरा था वह
पाठशाला की पाठों को सही ढंग से पढ नहीं पाया
और बन गया अधूरा आदमी

अपनी अधूरी भाषा में चिड़ियों से बातें करता था वह
अधूरी ज़बान में चिड़ियाघरों के लंगूरों से बदजबानी कर जाता था

नदियों के ऊपर बनी पुलिया पर
अधूरे कदम रख पाता था वह
और अधूरी पोशाक में
बस सभ्यता की एक शेष होती साख भर होता था वह।

अधूरे आदमी के सपने कभी पूरे नहीँ होते
पूरी तरह नहीं जानता था वह
और जीता था अपनी अधूरी जिन्दगी
पूरे मनोवेग से।

अपनी पूरी नींद से
अकबका कर जागता था आदमी
जब खूबसूरत इच्छायें
पूरे सपने में अधूरी बन
हताशाओं के पार चली जाती थीं

अधूरे ख्वाब को जागी आँखों में लिये जागता था अधूरा आदमी
अधूरा आदमी आधी सचाई बन जाता था
और आधे झूठ के साथ जीता था अपनी पूरी ज़िन्दगी।

हारे हुए आदमी का रंग 

जो जीतते
उनके अलग झंडे थे
अलग अलग रंग थे
अलग ढंग थे

वे अपनी विजय पर पताकाएँ लहराते
वे अपनी पताकाओं से पहचाने जाते

उन्हें जो जिताता
वह हर बार हार जाता था

उस हारे आदमी का रंग
एक था
ढंग एक था।

कविता मेरे लिए 

कविता बस दृष्टि है मेरे लिए
जहाँ से देखता हूँ मैं

बस एक शीशे के पार ही तो होता है
दुनिया का सारा ऐश्वर्य

जहाँ ठहर जाता हूँ मैं!

काठ हो जाना है

शेरों को काठ हो जाना है
पेड़ों को काठ हो जाना है

समय की अनुर्वर भूमि पर
खाद पानी के अभाव में
विस्मृत होते हुए
आदमी को काठ हो जाना है।

बस्तियों में जंगल 

जंगलों में बस्तियाँ थीं
वे वहशी थीं
ज़रूरी था वहशीपने को हटाना
काटे गये जंगलों से बचे अवशिष्ट
सभ्यता के चिह्न थे
सभ्यता की पहली शर्त यह थी
कि बस्तियाँ जंगलों के बाहर हों
बस्तियाँ बाहर थीं
अब काटे गये जंगल से
और विवेकशीलता के
विशुद्ध बचे होने का दावा
कर लिया गया था
पशुता खारिज कर दी गयी थी
बस्तियों में जंगल न होने का वहम
दरिंदे न होने का दम
भर रहा था
वहीं कोई हठी पूँछ अब भी बच रही थी
और वहशियाना हरकतें कर रही थी।

विवाद

ज़िन्दगी के कारण पर कोई विवाद नहीं था
जीवन के कारण तयशुदा थे
जीने के हर किसी के कारण निहायत ही निजी थे

कोई पेट के लिए जीता था
कोई जीभ के लिए
कोई हाथ और कोई पैरों के लिए जीता था
कोई नाक तो कोई कान के लिए
कोई पूरी की पूरी देह के लिए जीता था

कोई मकान के लिए जीता था
कोई मुकाम के लिए जीता था
कोई जमीन के लिए
तो कोई आसमान के लिए जीता था

जीने के कारण स्पष्ट थे
जीने के कारण अभिव्यक्त थे
जीने के कारण तर्कपूर्ण थे
जीने के कारण मतिपूर्ण थे

हर कोई जीने के लिए मरता था
हर कोई जीते-जीते एक दिन मर जाता था

मरना मियादी था
मरना आकस्मिक था

मरने के कारण
जीने के ही कारण थे
और हर मृत्यु का एक कारण था
जो हर व्यक्ति के संग अव्यक्त था

ज़िन्दगी के कारकों पर कोई विवाद नहीं था
पर ताज्जुब था कि जीवन का परम सत्य
विवाद के परे नहीं था।

खबरें डराती हैं

खबरों में दिखा एक सज्जन हुआ दुर्जन
सन्त हुआ कुसन्त
दिखी एक साध्वी अपनी ग्रन्थियों की शिकार
कोई भद्र महिला दुरभिसन्धियों के बुर्ज पर बैठी हुई

खबरों में कोई चोरी कर रहा था
कोई बरजोरी कर रहा था

कोई उग्रवादी गाँव में घुस आया था
कोई आतंकवादी सरहद पार कर आया था
और भून चुका था कई नरम शिकार
संगीनों की आँच में

खबरें दिखा रही थीं
तार तार हुए रिश्तों की लाइव टेलीकास्ट
और वहाँ बैठा कोई संजय बाँच रहा था खबर

संजय हमें कभी दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान ले जाता था
और वहाँ राजनीति में चल रही रामलीला दिखाता था

संजय कभी कहता
अब चलिये मुम्बई के वानखेडे स्टेडियम
वहाँ धर्माचार्य जुटे हैं
अब हम दिखाते हैं धर्म पर हुई
अब तक की सबसे बड़ी बहस

संजय उवाचता
यह ब्रेकिंग न्यूज है
आज एक तरकारी सेंसेक्स की तरह ऊपर चढ़ गयी है
ससुरी नीचे उतरती ही नहीं

और फिर रात चढ़ते ही दिखाते
सेक्स और वारदात की खबरें
जहाँ एक आदमी जोर-जोर से चिल्लाता हुआ
खबरों का बयान तफसील से करता

खबरें देखते हुए मैं अक्सर डर जाता हूँ
और फिर डर कर सो जाता हूँ

खबरें डराती हैं
खबरें देखता आदमी डरता है।

नज़रिया

धरती का टुकड़ा था
प्रदेश में भी था
देश में भी था

अब तुम कह सकते हो
धरती पर क्या हो रहा है
बजाय इसके कि
प्रदेश में क्या हो रहा है
देश में क्या हो रहा है

धरती पर कोई नस्ल ही था
प्रदेश में भी था
देश में भी था
तुम नि: संकोच कह सकते हो
कि नस्लें क्यों मरी जा रही हैं धरती पर

घास के एक तिनके को तुम
रख सकते हो बेधड़क
धरती के मानचित्र पर
और कह सकते हो
कि हरियाली फैल रही है

बस यहीं तुम्हारे और मेरे नजरिये में फर्क है
बस रख देना थोड़ी आग वहीं
जहाँ सूखे पत्ते हों
कि ज़रूरी है आग
हरियाली के लिये भी।

चेहरा

भीड़ खोज रही थी एक चेहरा
भीड़ में ही छुपा था वह चेहरा

चेहरा स्वच्छ था
चमकदार

यही है
शानदार
भीड़ ने कहा था

इसके चेहरे से
उम्मीद टपकती है
नूर के साथ

तुम ही रहो
उम्मीदवार
भीड़ चिल्ला पड़ी थी

जश्न मने थे
मिठाईयाँ बँटी थीं

भीड़ की उम्मीद का चेहरा
चमक रहा था
दमक रहा था

चेहरा पहले भीड़ में पड़ा था
चेहरा अब भीड़ से बड़ा था

चेहरा भीड़ के दर्द की चिन्ता व्यक्त करता
उनके दुख हरने के वायदे करता
चेहरा भीड़ में दुखी दिखता

अकेले में मुस्काता
खिल उठता
चमकता

भीड़ उसे भीड़ में देखती
उसे उदास देख दुखी हो जाती

फिर नया उर्जस्वी चेहरा खोजती
उससे उम्मीद जगाती
फिर फिर दुखी हो जाती

भीड़ बार-बार नये चेहरे
भीड़ से बाहर लाती
बार बार उदास हो जाती

चेहरे अकल्पनीय हो चले थे
भरोसेमंद नहीं रहे थे
भीड़ के सामने उनकी चिन्ता से सराबोर चेहरे
जल्द ही अपने एकांत में चले जाते थे
ठठा कर हँसते थे।

अवशेष

आज सुबह मैंने अश्वमेध के घोडों को देखा
और लगा घोड़े सबल हो गये हैं
पूरी दुनिया जीतते-जीतते

आज सुबह मैंने खुद को महसूस किया
और लगा मैं घोड़ा बन गया हूँ
दौड़ते दौड़ते

आज सुबह मैंने पशुओं को देखा
और लगा मवेशी दुर्बल हो गये हैं
खेत जोतते-जोतते

आज सुबह मैंने सच के घोडों को कहाँ देखा था
सच के घोड़े कहीं निर्बल ही हो गये होंगे
घोड़े अब सिर्फ़ अवशेष भर थे।

समय पूछता है

समय पूछता है मुझसे
कि चौपड़ खेलना जानता हूँ
या शतरंज

कि दो ही तो खेल हैं अभी
आज के माहौल में
और वे बंद कमरों में खेले जा रहे हैं

समय पूछता है मुझसे
क्या पसंद है मुझे
दाँव या शह और मात

कि बिछी हुई हैं बिसातें
दोनों ही जगह
और एक पक्ष लेना है मुझे
तो मैं कौन-सा पसंद करूँगा

समय सवाल उठाता है
कि एक की पाँच लोगे
या ढाई घर दौड़ते घोड़े की मात खाओगे

कि बोली लगाते लोगों
और चाल चलते लोगों
में कौन पसंद हैं मुझे

समय बार-बार कहता है
कि समय यही है
जुआ या षड्यंत्र
और जीना और मरना
इनके दो पाटों के बीच में दब कर होगा

समय फिर पूछता है
कि विकल्पों में
मैंने कौन-सा चुना है।

कोई स्वप्न 

मैं आसमान में एक कविता लिख रहा था
और वह आसमान के बारे में नहीं था

मैं आकाश में कविता ज़मीन पर लिख रहा था

जब मैं यह कह रहा था
तब क्या सच में मैं आसमान में था
या ज़मीन से थोड़ा उठा हुआ था

और फिर ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठ जाना
आकाश हो जाना था

अक्सर होता है कि ज़मीन लिखवा लेती है
खुद के बारे में
ज़मीन पर रहते हुए

और फिर आसमान में पहुँचा देती है।

पिता

पिता-तुम माँ से जुदा क्यों हो
क्यों अलग हो तुम
तुम अपने इर्द-गिर्द बुनते हो एक चुप्पी
अनकहे शब्दों का शान्त पारावार।
शब्द जो माँ की आँखों में दिखते थे
और उछलते थे उसकी होठों पर
मुस्कान बनकर
तुम्हारे मूंछों के आस-पास
ठहरा होता था जमा हुआ जल
और शब्द उन खामोश सतहों पर
उथल रहे होते थे स्थिर होकर।

पिता-तुम अलग क्यों हो
जब माँ का आँचल
बनती थी जादू की छतरी
जो कर जाते थे स्नेहिल
अपनी ओट में
और हमारी उछलती-कूदती इच्छायें
लेती थीं कल्पना की उड़ान
वहीँ तुम्हारा दुशाला भी तो था
हमारे लिये जादुई आवरण
जो भनक भी न देता था
कि तुम मौजूद हो हमारे साथ
हमारे सिर पर अपने बलिष्ठ हाथों को फैलाये
किसी अनिष्ट की आशंका में
उन्हें दूर करने की जुगत बिठाये!

पिता-तुम अलग लगते हो
पर नहीं हो अलग
नहीं हो कतई जुदा
माँ की पोरों से आती ममतामयी सुगंध से
हम सने हुए थे,
तुम्हारे बलिष्ठ चौड़े सीने में था पसरा हुआ एक
लम्बा-चौड़ा बरगद
जिसके नीचे हम सह और बच सकते थे
जिन्दगी की गरमी और धूप से।

पिता-तुम अलग न हो माँ से
तुम सिर्फ़ अलग लगते हो!

फुरसत की भाषा

हिन्दी मेरी दूसरी भाषा थी
जिसे मैंने भोजपुरी के बाद सीखा था
अंगरेजी वह तीसरी भाषा थी
जो हिन्दी के बाद आयी थी

शर्ट पैंट मेरी पहली और आखिरी पोशाक थी
जो अंगरेजी सीखने के पहले ही आयी थी
कुरते पजामे तो फुरसत में पहने जाते थे

कहीं हिन्दी मेरी फुरसत की भाषा तो नहीं थी।

इक्कीसवीं सदी में चश्मा

वह चश्मों का ही युग था
कि जब से ईजाद हुए थे चश्मे
खूब बनने लगे थे

पिछली सदियों में बने थे चश्मे
और इस सदी में धड़ल्ले से बिक रहे थे

अब हर आदमी के पास एक चश्मा था
और हर आदमी को एक नाक थी

चश्मे नाक ऊँची कर देते थे
या चश्मे थे इसलिये नाक ऊँची थी
कह पाना मुश्किल था

अच्छा था
अब कोई किसी को चश्मल्लू नहीं कहता था
और कोई बात कहने के पहले
चश्मा अच्छी तरह से पोंछ लेता था

जब कोई रोता अब
चश्मे पोंछ लेता था
और उसकी रुदन और असरदार हो जाती थी

ज़रूरी हो गया था
टेलिवीजन पर खबरों को पढ़ने के लिये
चश्मा लगा लेना
क्योंकि ख़बर बांचते आदमी ने भी चश्मे पहन रखे थे
और ख़बर बांचती स्त्री के होठों पर एक शातिर मुस्कान थी

यह कोई चमत्कार नहीं था इस युग का
कि युग-धर्म समूहों में बँटा था
और सबके अपने चश्मे थे
और फूटते थे चश्मे
तो तुरत स्थानापन्न शीशे उपलब्ध थे

चमत्कार सिर्फ़ यह था
कि उजले साफ शीशों से
लोग अपने मनपसंद रंग देख रहे थे

मौजूं था कहना
कि अब जो थे वंचित चश्मों से
उनके पास किताबें न थीं
या उन्होंने उन्हें किताबों पर भूल से रख छोड़े थे।

चक्रव्यूह

मैंने खुद ही रचा है
अपने लिए एक चक्रव्यूह,
बुना है
अपना लिये ही एक मकडजाल।

मैंने कई हदें पार करने की कोशिश की थी
कई पहाड़, जंगल, नदियाँ, रेगिस्तान
कई बंदिशें, कई सरहदें
जो बाँधी थी खुद के लिए
उन्हें ही तोड़ कर निकल जाना चाहा था
एक अनजान देश, एक अनजाने मुकाम की ओर।

उन चहारदीवारियों को फांदने की कोशिश में
छिलीं थीं मेरी कुहनियाँ और घुटने
और रिसा था खून पसीने के साथ-साथ।

क्या तुम बता सकते हो
जब तुम बुनते हो खुद के लिए बंदिशें
तय करते हो खुद की सरहदें
रचते हो खुद की एक लक्ष्मण रेखा,
तो क्या सचमुच उस सीमा रेखा से
बाहर निकलने के लिए
तुम कभी नहीं छटपटाते।

सदी का आखिरी बुना हुआ स्वेटर

वह माँ ही होगी
जो इस सदी में
बुन रही होगी स्वेटर

ऊन के लच्छे ला कर

उल्टे सीधे हाथों से
काँटों के नम्बर पहचान कर

बरसात के बाद ही
माँ पहचान लेती है
जाड़े की आहट
और लाती है खरीद कर
ऊन के लच्छे-
लाल
नारंगी
बैंगनी
सफेद
मैरून
और बेटे का कद आँखों में माप कर
बुनती है स्वेटर

और फिर गले और पीठ को
बार-बार नाप कर
फंदे उधेड़ कर
नये सिरे से जोड़ कर
पूरा करती है स्वेटर
गुलाबी जाड़ा आने तक

माँ जानती है
अब उसके बेटों को दिलचस्पी नहीं
हाथ से बुने हुए स्वेटरों में
और शायद अब वे रख देते होंगे उन्हें
ट्रंक में सहेज कर
और पहनते हैं
मिल के स्वेटर

फिर भी
माँ बुनती है हर साल स्वेटर

माँ दरअसल
बेटों के बड़े होते कदों के साथ
बुनती रही है स्वेटर
और शायद उनकी भूलना नहीँ चाहती
आकृतियाँ
इसलिये बुनती है स्वेटर

या फिर
माँ ने पाला है यह शगल
इसलिये भी कि
जब बरसात में भींगती हो उसकी आँखें
वह याद कर ले इस बहाने
बाहर रह रहे बेटों को
इसी बहाने
गुलाबी जाड़े के आने तक

माँ स्वेटर बुनने की सोच रही होगी
हर बरसात में सोचता हूँ मैं

एक माँ ही तो होगी
जो बुन रही होगी
बेटों के लिये
हाथ से बुना हुआ
इस सदी में
इस सदी का
आखिरी स्वेटर।

परख 

जमीन को छू कर
एक ने कहा
ऊसर है जमीन
दूसरे ने कहा
उपजाऊ है

मैं सोच में पड़ गया
मैं जमीन से कहाँ जुड़ा था

फसल को देख
एक ने कहा
लहलहा रही है
दूसरे ने कहा
सूख रही है
मैं चुप रहा
मुझे रबी और
खरीफ के बारे में भी
क्या पता

बस्ती को देख
एक ने कहा
शहर नहीं हुआ
दूसरे ने कहा
गाँव नहीं रहा
मैं चुप रहा
गाँव से शहर आ कर
मैं दोनों की
परिभाषायें नहीं जी पाया

हवा को भांप
एक ने कहा
प्रेम है
दूसरे ने कहा
घृणा
मैं प्रेम और घृणा के द्वन्द में
पशोपेश में रहा

आदमी को लख
एक ने कहा
आम है
दूसरे ने कहा
खास
मैंने कहा-बस
मुझे परख का कहाँ पता!

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