अशोक कुमार पाण्डेय की रचनाएँ

तुम्हारी दुनिया में इस तरह 

सिंदूर बनकर
तुम्हारे सिर पर
सवार नहीं होना चाहता हूँ
न डस लेना चाहता हूँ
तुम्हारे क़दमों की उड़ान को

चूड़ियों की ज़ंजीर में
नही जकड़ना चाहता
तुम्हारी कलाईयों की लय
न मंगल-सूत्र बन
झुका देना चाहता हूँ
तुम्हारी उन्नत ग्रीवा
जिसका एक सिरा बँधा ही रहे
घर के खूँटे से

किसी वचन की बर्फ़ में
नही सोखना चाहता
तुम्हारी देह का ताप

बस आँखो से बीजना चाहता हूँ विश्वास
और दाख़िल हो जाना चाहता हू
ख़ामोशी से तुम्हारी दुनिया में
जैसे आँखों में दाख़िल हो जाती है नींद
जैसे नींद में दाख़िल हो जाते हैं स्वप्न
जैसे स्वप्न में दाख़िल हो जाती है बेचैनी
जैसे बेचैनी में दाख़िल हो जाती हैं उम्मीदें
और फिर
झिलमिलाती रहती है उम्र भर

नाराज़गी

नाराज़गी की होती हैं
अक्सर बेहद मासूम वज़ूहात
जैसे प्यार की

कोई हो सकता है आपसे नाराज़
कि आप नहीं हैं उस जैसे
और कोई इसलिए कि
बिल्कुल उस जैसे हैं आप

किसी को हो सकती है परेशानी
कि आपकी आवाज़ इतनी नर्म क्यूँ है
वैसे आवाज़ की तुर्शी बड़ी वज़ह है नाराज़गी की

कोई नाराज़ है कि आपने नही समझा उसे अपना
बहुत अपना समझ बैठे नाराज़ कोई इसलिए

बहुतेरे लोग नाराज ज़िंदगी से
मौत से दुख ही होता है अक्सर
भगवान से नाराज़ बहुत से आस्तिक
शैतान से भयभीत नास्तिक भी

अब आलोचना वगैरह जैसी नामासूम वज़हों की तो बात ही क्या करना
प्रशंसा भी कर जाती कितनों को नाराज़

आज जो जितना नाराज़ है आपसे
कल कर सकता है उतना ही अधिक प्यार
दुख की नहीं है यह बात
नाराज़ होने की भी नहीं
हर किसी से होता ही है कोई न कोई नाराज़

और जिनसे नहीं होता कोई
अक्सर वे ख़ुद से नाराज़ होते हैं…

रोने की जगह मुस्करा रही थी वह लड़की 

वह मुस्कराती थी
बस मुस्कराए जाती थी लगातार
और उसके होठ मेरी उँगलियों की तरह लगते थे
उसके पास बहुत सीमित शब्द थे जिन्हें वह बहुत संभाल कर खर्च करती थी
हम दोनों के बीच एक काउंटर था जो हम दोनों से अधिक ख़ूबसूरत था
वह बार-बार उन शब्दों को अलग-अलग क्रमों में दोहरा रही थी
जिनसे ठीक विपरीत थी उसकी मुसकराहट
उस वक़्त मैं भी मुस्कुराना चाहता था लेकिन उसकी मुस्कराहट का आतंक तारी था मुझ पर.

कोई था उसकी मुसकराहट की आड में
हम दोनों ने नहीं देखा था उसे
वह पक्ष में थी जिसके और मैं विपक्ष में
एक पुराने बिल और वारंटी कार्ड के हथियार से मैं हमला करना चाहता था
और उसकी मुसकराहट कह रही थी कि बेहद कमजोर हैं तुम्हारे हथियार
मेरे हथियारों की कमजोरी में उस अदृश्य आदमी की ताकत छुपी हुई थी

कहीं नहीं था वह आदमी उस पूरे दृश्य में
हम ठीक से उसका नाम भी नहीं जानते थे
हम जिसे जानते थे वह नहीं था वह आदमी
पता नहीं उसके दो हाथ और दो पैर थे भी या नहीं
पता नहीं उसका कोई नाम था भी या नहीं
जो चिपका था उस दफ्तर के हर कोने में वह नाम नहीं हो सकता था किसी इंसान का

वह जो कहीं नहीं था और हर कहीं था
मुझे उससे पूछने थे कितने सारे सवाल
मैं मोहल्ले के दुकानदार की तरह उस पर गला फाड़ कर चिल्लाना चाहता था
मैं चाहता था उसके मुंह पर दे मारूं उसका सामान और कहूँ ‘पैसे वापस कर मेरे’
मैं चाहता था वह झुके थोड़ा मेरे रिश्तों के लिहाज में
फिर भले न वापस करे पैसे पर थोड़ा शर्मिन्दा होने का नाटक करे
एक चाय ही मंगा ले कम शक्कर की
हाल ही पूछ ले पिता जी का
दो चार गालियाँ ही दे ले आढत वाले को…

लेकिन वहाँ उस काउंटर पर बस एक ठन्डे पानी का गिलास था
और उससे भी ठंढी उस लड़की की मुसकराहट
जिससे खीझा चाहे जितना जाए रीझा नहीं जा सकता बिलकुल भी
जिससे लड़ते हुए कुछ नहीं हासिल किया जा सकता सिवा थोड़ी और उदास मुसकराहट के
मुझे हर क्षण लगता था कि बस अब रो देगी वह
लेकिन हर अगले जवाब के बाद और चौडी हो जाती उसकी मुसकराहट

क्या कोई जादू था उस काउंटर के पीछे कि बार-बार पैरों की टेक बदलती भी मुस्करा लेती थी वह
या फिर जादू उस नाम में जो किसी इंसान का हो ही नहीं सकता था
कि धोखा खाने के बावजूद जग रही थी मुझमें मुस्कराने की अदम्य इच्छा
क्या जादू था उस माहौल में कि चीखने की जगह सोच रहा था मैं
और रोने की जगह मुस्करा रही थी वह लड़की….

क्या ऐसे ही मुस्कराती होगी वह जब देर से लौटने पर डांटते होंगे पिता?
प्रेमी की प्रतीक्षा में क्या ऐसे ही बदलती होगी पैरों की टेक?
क्या ऐसे ही बरतती होगी नपे-तुले शब्द दोस्तों के बीच भी?
क्या वह कभी नहीं लडी होगी मोहल्ले के दुकानदार से?

मान लीजिए मिल जाए किसी दिन किसी भीडभाड वाली बस में
या कि किसी शादी-ब्याह में बाराती हूँ मैं और वह दिख जाय घराती की तरह
या फिर किसी चाट की दूकान पर भकोसते हुए गोलगप्पे टकरा जाएँ नज़रें…
तब?
तब भी मुस्कराएगी क्या वह इसी तरह?

हत्यारे से बातचीत

(एक)

तो तुम्हारा घर ?

घर छोड़ दिया था मैंने
मुझे घरों से नफ़रत थी
मैंने सबसे पहले अपना घर उजाड़ा
मुझे नफ़रत थी छोटे-छोटे लोगों से
मुझे ग़रीबी से नफ़रत थी, ग़रीबों से नफ़रत थी
मुझे मुश्किल से जलने वाले चूल्हे की आग से नफ़रत थी
मुझे उन सबसे नफ़रत थी जो मेरे लिए नहीं था
जो मेरे लिए था मुझे उससे भी नफ़रत थी

असल में मैंने घर नहीं छोड़ा
मैंने अपनी नफ़रतों का घर बनाया
और फिर जीवन भर उसमें सुकून से रहा

जो घर जलाए मैंने
उनकी चीख़ें मेरे जीवन का संगीत हैं ।

(दो)

प्रेम?

प्रेम मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है
मैंने नहीं किया प्रेम और बनता गया मज़बूत दिनोदिन
वीर प्रेम नहीं करते, वसुन्धरा उनकी भोग्य होती है,

मैंने जंगल देखे तो वह मुझे छिपने की जगह लगी
मुझे तेज़ तूफ़ान सबसे मुफ़ीद लगे हत्या के लिए
बच्चों को देखकर मुझे कोफ़्त होती थी
मैंने चाहा कि रातोरात बड़े हो जाएँ वे
स्त्रियाँ मेरे जीवन में आई चीख़ने की तरह

मैंने ख़ुद को प्रेम किया
और ख़ुश रहा ।

(तीन)

डर नहीं लगता तुम्हें?

डर नहीं लगा कभी मुझे…
असल में लगा
चीख़ें मेरे डर का इलाज थीं
बहते ख़ून ने मेरी नसों में हिम्मत भरी
डरी हुई आँखों की कातरता ने हरे मेरे डर

जहाँ से शुरू होता है तुम्हारा डर
वहाँ से मेरा ख़त्म हो जाता है
मैं रात के अन्धेरों से नहीं दिन के उजालों से डरता हूँ

(चार)

सपने…?

मुझे सपनों नफ़रत है
मैं रातों को सोता नहीं उनकी आशंका से
पता नहीं कहाँ से आ जाते हैं नदियों के शान्त तट
खेल के मैदान, बच्चे…वे औरतें भी जिन्हें बहुत पीछे छोड़ आया था कहीं

मैं नहीं चाहता लोग सपने देखें और डरना भूल जाएँ थोड़ी देर के लिए
मैं नहीं चाहता लोग सपने देखें और सोचना शुरू कर दें
मैं नहीं चाहता कि लोग सपने देखें और नींद में गुनगुनाने लगें
मैं नहीं चाहता कि सपने देखते हुए इतिहास की किसी दुर्गम कन्दरा में ढूंढ लें वे प्रेम
और जागें तो चीखने की जगह कविताएँ पढ़ने लगें

असल में मुझे कविताओं से भी नफ़रत है
और संगीत की उन धुनों से भी जो दिल में उतर जाती हैं
मुझे नारे पसन्द है और बहुत तेज संगीत जो होठ और कानों तक रह जाएँ
मैं चाहता हूँ हृदय सिर्फ़ रास्ता दिखाए लहू को
और जब मैं एकदम सटीक जगह उतारूँ अपना चाकू
तो निकल कर ज़मीन को लाल कर दे

मैं इतिहास में जाकर सारे ताजमहल नेस्तनाबूद कर देना चाहता हूँ
और बाज बहादुर को सूली पर चढ़ाने के बाद रूपमती को जला देना चाहता हूँ
मैं उन सारी किताबों को जला देना चाहता हूँ जो सपने दिखाती हैं

मैं उनके सपनों में अँधेरा भर देना चाहता हूँ
या इतना उजाला कि कुछ दिखे ही नहीं

(पाँच)

लेकिन ?

जाइए मुझे अब कोई बात नहीं करनी !

किसी सलीब पर देखा है मुझको बोलो तो

(एक)

आधी रात बाक़ी है जैसे आधी उम्र बाक़ी है
आधा कर्ज़ बाक़ी है आधी नौकरी आधी उम्मीदें अभी बाक़ी हैं
पता नहीं आधा भी बचा है कि नहीं जीवन

अब भी अधूरे मन से लौट आता हूँ रोज़ शाम
रोज़ सुबह जाता हूँ तो अधूरे मन से ही
जो अधूरा है उसे पूरा कहके ख़ुश होने का हुनर बाक़ी है अभी
अधूरे नाम से पुकारता हूँ जिसे प्यार का नाम समझता है वह उसे !

एक अधूरे तानाशाह के फरमानों के आगे झुकता हूँ आधा
एक अधूरे प्रेम में डूबता हूँ कमर तक

(दो)

वह जो चल रहा है मेरे क़दमों से मैं नहीं हूँ

हवा में धूल की तरह चला आया कोई
कोई पानी में चला आया मीन की तरह
कोई सब्ज़ियों में हरे कीट की तरह
और इस तरह बना एक जीवन भरा-पूरा

पाँचों तत्व सो रहे हैं जब गहरी नींद में
तो जो गिन रहा है सड़कों पर हरे पेड़
वह मैं नहीं हूँ

(तीन)

इतनी ऊँची कहाँ है मेरी आवाज़
एक कमज़ोर आदमी देर तक घूरता है कोई तो डर जाता हूँ
कोई लाठी पटकता है ज़ोर से तो अपनी पीठ सहलाता हूँ
शराबियों तक से बच के निकलता हूँ
कोई प्रेम से देखे तो सोचते हुए भूल जाता हूँ मुस्कुराना
दफ़्तर में मन्दिर की तरह जाता हूँ
मन्दिर में दफ़्तर की तरह

अभी अभी जो सुनी मेरी आवाज़ आपने और भयभीत हुए
वह मेरे भय की आवाज़ है बन्दानवाज़

(चार)

कौन करता है मेरा ज़िक्र?

मैं इस देश का एक अदना-सा वोटर
एक नीला निशान मेरा हासिल है
मैं इतिहास में दर्ज होने की इच्छाओं के साथ जी तो सकता हूँ
मरना मुझे परिवार के शज़रे में शामिल रहने की इच्छा के साथ ही है

किसी ने कहा प्रेम तो मैंने परिवार सुना
किसी ने क्रान्ति कहा तो नौकरी सुना मैंने
मैंने हर बार बोलने से पहले सोचा देर तक
और बोलने के बाद शर्मिन्दा हुआ
मैंने मोमबत्तियाँ जलाईं, तालियाँ बजाईं
गया जुलूस में जन्तर मन्तर गया कुर्सियाँ कम पड़ी तो खड़ा रहा सबसे पीछे हाल में
और रात होने से पहले घर लौट आया

वह जो अखबार के पन्ने में भीड़ थी
जो अधूरा-सा चित्र उसमें वह मेरा है
सिर्फ़ इतने के लिए भी चाय पिला सकता हूँ आपको
कमीज़ साफ़ होती तो सिगरेट के लिए भी पूछता

रुकिए… लिख तो दूँ कि धूम्रपान हानिकारक है स्वास्थ्य के लिए

होना न होने की तरह

(एक)
जूतों को माप भले हो जाये एक सी
पिता के चश्मों का नम्बर अमूमन अलग होता है पुत्र से

जब उन्हें दूर की चीजें नहीं दिखती थी साफ़
बिल्कुल चौकस थी मेरी आँखें
जब मुझे दूर के दृश्य लगने लगे धुधंले
उन्हें क़रीब की चीजों में भी धब्बे दिखाई लेने लगे

और हम दृश्य के अदृश्य में रह एक-दूसरे के बरअक्स

(दो)
उनके जाने के बाद अब लगता है कि कभी उतने मज़बूत थे ही नहीं पिता
जितना लगते रहे । याद करता हूँ तो मंहगे कपड़े का थान थामे ब्रांड के नाम
पर लूट पर भाषण देता उनका जो चेहरा याद आता है उस पर भारी दागदार
तीस रूप्ये मीटर वाली कमीज़ लिए लौटता खिचड़ी बालों वाला दागदार
उदास चेहरा। स्मृतियों की चौखट पर आकर जम जाती है सुबह-सुबह
स्कूटर झुकाए संशयग्रस्त गृहस्थ की आँखों के नीचे उभरती कालिख

जैसे पृथ्वी थक-हार कर टिकती होगी कछुए के पीठ पर पिता की गलती
देह पर टिक जाता है वह स्कूटर

(तीन)
हम स्टेफी से प्यार करते थे और नवरातिलोवा के हारने की मनौती माँगते थे
काली माई से । भारतीय टीम सिर्फ इसलिए नहीं थी दुलारी कि हम भारतीय थे।
मोटरसाइकल पर बैठते ही एक राजा श्रद्धेय फकीर में बदल गया।
त्रासदियाँ हमें राहत देती रहीं पुरूषत्व के सद्यप्राप्त दंश से। हम जितने
शक्तिशाली हुए उतने ही मुखलिफ़ हुए।

हमारे प्रेम के लिए पिता को दयनीय होने की प्रतीक्षा करनी पड़ी।

(चार)
इसकी देह पर उम्र के दाग हैं । इसकी समृतियों में दर्ज है सन
बयासी….चौरासी….. इक्यानवे के बाद ख़ामोश हो गया यह और फिर इस
सदी में उसका आना न आने की तरह था होना न होने की तरह।

घर में रखा फिलिप्स का यह पुराना ट्रांजिस्टर देख कर पिता का चेहरा याद
आता है ।

(पाँच)

भीतर उतर रहा नाद निराला ।

दियारे की पगडंडियों पर चलता यह मैं हूँ उंगलियाँ थामे पिता को देखता
अवाक गन्ने के खेतों की तरह शान्त सरसराती आवाज़ में कविताओं से
गूँजते उन्हें । आँखें रोहू मछली की तरह मासूम और जेठ की धूप में चमकते
बालू-सी चमकती पसीने की बूँदों के बीच यह कोई और मनुष्य था।
सबसे सुन्दर – सबसे शान्त – सबसे प्रिय – सबसे आश्वस्तिकारक।

वही नदी है। वही तट। निराला नहीं हैं न वह आवाज़ । बासी मन्त्र गूँज रहें हैं
और सुन रही है पिता की देह शान्त ….सिर्फ शान्त।

मेरे हाथों में उनके लिए कोई आशवस्ति नहीं अग्नि है

(छः)

यह एक शाम का दृश्य है जब एक आधा बूढ़ा आदमी एक आधे जवान लड़के को पीट रहा है अधबने घर के दालान में
यह समय आकाशगंगा में गंगा के आकार का है प्रकाश वर्ष में वर्ष जितना
और प्रलय में लय जितना। दो जोड़ी आँखें जिनमें बराबर का क्षोभ और
क्रोध भरा है । दो जोड़ी थके हाथ प्रहार और बचाव में तत्पर बराबर। यह
भूकम्प के बाद की पृथ्वी है बाढ़ के बाद की नदी चक्रवात के बाद का
आकाश।

और……

एक शाम यह है कुहरे और ओस में डूबी । एक देह की अगिन मिल रही है
अग्नि से वायु, जल, आकाश अपने-अपने घरों में लौट रहे हैं नतशिर ।
अकेली हैं एक जोड़ी आँखें बादल जितने जल से भरी ।
उपमाएँ धुएँ की तरह बहुत ऊपर जाकर नष्ट हाती हुई शून्य के आकार में ।

(सात)
कुछ नहीं गया साथ में

गंध रह गयी लगाए फूलों में स्वाद रह गया रोपे फलों में। शब्द रह गये
ब्रह्मांड में ही नहीं हम सबमें भी कितने सारे। मान रह गए अपमान भी।
स्मृतियाँ तो रह ही जाती है विस्मृतियाँ भी रह गयी यहीं। रह गयी किताबें
अपराध रह गए किए-अनकिए। कामनाएँ न जाने कितनी।

जाने को बस देह गयी जिस पर सारी दुनिया के घावों के निशान थे
और एक स्त्री के प्रेम के।

कितनी आश्वस्ति थी तुम्हारे होने ही से बुद्ध 

कुशीनगर में एक विशाल बुद्ध माल बन रहा है जिसे मैत्रेयी परियोजना का नाम दिया गया है. उसके लिए चार सौ गाँवों की ज़मीन का अधिग्रहण हो रहा है जिसके खिलाफ किसान लाम पर हैं। यह कविता उनकी ही ओर से… – कवि

दुखों की कब कमी रही इस कुशीनारा में
अविराम यात्राओं से थककर जब रुके तुम यहाँ
दुखों से हारकर ही तो नहीं सो गये चिरनिद्रा में?
कितना कम होता है एक जीवन दुख की दूरी नापने के लिये
और बस सरसों के पीलेपन जितनी होती है सुख की उम्र…

आख़िरी नहीं थी दुःख से मुक्ति के लिए तुम्हारी भटकन
हज़ार वर्षों से भटकते रहे हम देश-देशान्तरों में
कोसती रहीं कितनी ही यशोधरायें कलकतिया रेल को
पटरियाँ निहार-निहार गलते रहे हमारे शुद्धोधन

उस विशाल अर्द्धगोलीय मंदिर में लेटे हुए तुम
हमारे इतिहास से वर्तमान तक फैले हुए आक्षितिज
देखते रहे यह सब अपने अर्धमीलित नेत्रों से
और आते-जाते रहे कितने ही मौसम…

गेरुआ काशेय में लिपटे तुम्हारे सुकोमल शिष्य
अबूझ भाषाओं में लिखे तुम्हारे स्तुति गान
कितने दूर थे ये सब हमसे और फिर भी कितने समीप
उस मंदिर के चतुर्दिक फैली हरियाली में शामिल था हमारा रंग
उन भिक्षुओं के पैरों में लिपटी धूल में गंध थी हमारी
घूमते धर्मचक्रों और घंटों में हमारी भी आवाज़ गूंजती थी
और हमारे घरों की मद्धम रौशनियों में घुला हुआ था तुम्हारे अस्तित्व का उजाला

हमारे लिये तो बस तुम्हारा होना ही आश्वस्ति थी एक…

कब सोचा था कि एक दिन तुम्हारे कदमों से चलकर आयेगा दुःख
एक दिन तुम्हारे नाम पर ही नाप लिए जायेंगे ढाई कदमों से हमारे तीनों काल
यह कौन सी मैत्रेयी है बुद्ध जिसे सुख के लिये सारा संसार चाहिये?
और वे कौन से परिव्राजक तुम्हारी स्मृति के लिए चाहिए जिन्हें इतनी भव्यता?

तुम तो छोड़ आये थे न राज प्रासाद
फिर…
कौन है ये जो तुम्हें फिर से क़ैद कर देना चाहते है?
कौन हैं जो चाहते हैं चार सौ गाँवों की जागीर तुम्हारे लिए
यह कैसा स्मारक है बहुजन हिताय का जिसके कंगूरों पर खड़े इतराते हैं अभिजन?

कहो न बुद्ध
हमारा तो दुःख का रिश्ता था तुमसे
जो तुम ही जोड़ गए थे एक दिन
फिर कौन हैं ये लोग जिनसे सुख का रिश्ता है तुम्हारा?

कहाँ चले जाएँ हम दुखों की अपनी रामगठरिया लिए
किसके द्वारे फैलाएं अपनी झोली इस अंधे-बहरे समय में
जब किसी आर्त पुकार में नहीं दरवाजों के उस पार तक की यात्रा की शक्ति
कौन सा ज्ञान दिलाएगा हमें इस वंचना से मुक्ति
आसान नहीं अपने ही द्वारों के द्वारपाल हो जाने भर का संतोष
कहाँ से लाये वह असीम धैर्य जिसके नशे में डूब जाता है दर्द का एहसास
वह दृष्टि कि निर्विकार देख सकें सरसों के पौधों पर उगते पत्थरों के जंगल
निर्वासन का अर्थ निर्वाण तो नहीं होता न हर बार
और ऐसे में तो कोई स्वप्न भी अधम्म होगा न बुद्ध

कहो न बुद्ध दुःख ही क्यों हो सदा हमारे हिस्से में?
बामियान हो कि कुशीनगर हम ही क्यों हों बेदखल हर बार?
मुक्ति के तुम्हारे मन्त्र लिए हम ही क्यों हों हविष्य हर यज्ञ के ?

कहो न बुद्ध
क्या करें हम उस अट्टालिका में गूंजते
‘बुद्धं शरणम गच्छामि’ के आह्वान का

दक्खिन टोले से कविता

(एक)

क़त्ल की उस सर्द अंधेरी रात हसन-हुसैन की याद में छलनी सीनों के करुण विलापों के बीच जिस अनाम गाँव में जन्मा मैं किसी शेषनाग के फन का सहारा हासिल नहीं था उसे किसी देव की जटा से नहीं निकली थी उसके पास से बहने वाली नदी किसी राजा का कोई सिंहासन दफन नहीं था उसकी मिट्टी में यहाँ तक कि किसी गिरमिटिये ने भी कभी लौटकर नहीं तलाशीं उस धरती में अपनी जड़ें

कहने को कुछ बुजुर्ग कहते थे कि गुजरा था वहाँ से फाह्यान और कार्तिक पूर्णिमा के मेले का ज़िक्र था उसके यात्रा विवरणों में लेकिन न उनमें से किसी ने पढ़ी थी वह किताब न उसे पढते हुए कहीं मुझे मिला कोई ज़िक्र

इस क़दर नाराज़गी इतिहास की कि कमबख्त इमरजेंसी भी लगी तो मेरे जन्म के छः महीने बाद वैसे धोखा तो जन्म के दिन से ही शुरू हो गया था दो दिन बाद जन्मता तो लाल किले पर समारोह का भ्रम पाल सकता था इस तरह जल्दबाजी मिली विरासत में और इतिहास बनने से चुक जाने की नियति भी….

(दो)

वह टूटने का दौर था पिछली सदी के जतन से गढे मुजस्सिमों और इस सदी के तमाम भ्रमों के टूटने का दौर

कितना कुछ टूटा

अयोध्या में एक मस्जिद टूटने के बहुत पहले इलाहाबाद रेडियो स्टेशन के किसी गलियारे में जवान रसूलन बाई की आदमकद तस्वीर के सामने चूडिहारन रसूलन बाई खड़े-खड़े टूट रही थीं. सिद्धेश्वरी तब तक देवी बन चुकीं थी और रसूलन बाई की बाई रहीं.

यह प्यासा के बाद और गोधरा के पहले का वाकया है…

बारह साल जेल में रहकर लौटे श्याम बिहारी त्रिपाठी खँडहर में तबदील होते अपने घर से निकल साइकल से ‘लोक लहर’ बांटते हुए चाय की दुकान पर हमसे कह रहे थे ‘हम तो हार कर फिर लौट आये उसी पार्टी में, तुम लोगों की उम्र है, हारना मत बच्चा कामरेड….और हम उदास हाँथ उनके हाथों में दिए मुस्करा रहे थे.

यह नक्सलबारी के बाद और सोवियत संघ के बिखरने के ठीक पहले का वाकया है…

इस टूटने के बीच हम कुछ बनाने को बजिद थे हमारी आँखों में कुछ जाले थे हमारे होठों पर कुछ अस्पष्ट बुद्बुदाहटे थीं

और तिलंगाना से नक्सलबारी होते हुए हमारे कन्धों पर सवार इतिहास का एक रौशन पन्ना था जिसकी पूरी देह पर हार और उम्मीद के जुड़वा अक्षर छपे थे. सात रंग का समाजवाद था जो अपना पूरा चक्र घूमने के बाद सफ़ेद हो चुका था. एक और क्रान्ति थी संसद भवन के भीतर सतमासे शिशु की तरह दम तोडती. इन सबके बीच एक फ़िल्म थी इन्कलाब जिसका नायक तीन घंटों में दुनिया बदलने के तमाम कामयाब नुस्खों से गुजरता हुआ नाचते-गाते संसद के गलियारों तक पहुँच चुका था.

एक और धारावाहिक था जिसे रोका रखा गया कई महीनों कि उसके नायक के सिर का गंजा हिस्सा बिल्कुल उस नेता से मिलता था जिसने हिमालय की बर्फ में बेजान पड़ी एक तोप को उत्तर प्रदेश के उस इंटर कालेज के मैदान में ला खड़ा किया था जिसमें अपने कन्धों से ट्रालियां खींचते हम दोस्तों ने पहली बार परिवर्तन का वर्जित फल चखा था. वह हमारे बिल्कुल करीब था…इतना कि उस रात उसकी छायाएँ हमसे गलबहियाँ कर रहीं थीं और हम एक फकीर को राजा में तबदील होते हुए देख रहे थे जैसे तहरीर को तस्वीर होते देखा हमने वर्षों बाद….

(तीन)

फिर एक रोज हास्टल के अध-अँधेरे कमरे में अपनी पहली शराबें पीते हुए हमने याद किया उन दिनों को जब अठारह से पहले ही नकली नामों से उँगलियों में नीले दाग लगवाए हमने और फिर भावुक हुए…रोए…चीखे…चिल्लाये…और कितनी-कितनी रातों सो नहीं पाए…

वे जागते रहने के बरस थे जो बदल रहा था वह कहीं गहरे हमारे भीतर भी था बेस्वाद कोका कोला की पहली बोतलें पीते हम एक साथ गर्वोन्नत और शर्मिन्दा थे

जब अर्थशास्त्र की कक्षा में पहली बार पूछा किसी ने विनिवेश का मतलब तो तीसेक साल पुराने रजिस्टर के पन्ने अभिशप्त आत्मा की तरह फडफडाये एक बारगी और फिर दफन हो गए कहीं अपने ही भीतर

पुराने पन्ने पौराणिक पंक्षी नहीं होते उनकी राख में आग भी नहीं रहती देर तक झाडू के चंद अनमने तानों से बिखर जाते हैं हमेशा के लिए वे बिखरे तो बिखर गया कितना कुछ भीतर-बाहर ….

और बिखरने का मतलब हमेशा मोतियों की माला का बिखरना नहीं होता न ही किसी पेशानी पर बिखर जाना जुल्फों का टूटे थर्मामीटर से बिखरते पारे जैसा भी बिखरता है बहुत कुछ.

(चार)

सब कुछ बदल रहा था इतनी तेजी से कि अकसर रात को देखे सपने भोर होते-होते बदल जाते थे और कई बार दोपहर होते-होते हम खिलाफ खड़े होते उनके हम जवाबों की तलाश में भटक रहे थे सड़कों पर, किताबों में, कविताओं में और जवाब जो थे वे बस सिगरेट के फ़िल्टर की तरह बहुत थोड़ी सी गर्द साफ़ करते हुए… और बहुत सारा ज़हर भीतर भरते हुए हम नीलकंठ हुए जा रहे थे …

इतना ज़हर लिए हमें पार करनी थी उम्र की दहलीज जहाँ प्रेम था हमारे इंतज़ार में जहाँ एक नई दुनिया थी अपने तमाम जबड़े फैलाए जहाँ बनिए की दुकान थी, सिगरेट के उधार थे ज़रूरतों का सौदा बिछाये अनगिनत बाज़ार थे हमें गुजरना था वहाँ से और खरीदार भी होना था इन्हीं वक्तों में हमें नींद ए बेख्वाब भी सोना था

और फिर…उजाड़ दफ्तरों में बिकी हमारी प्रतिभायें अखबारों के पन्ने काले करते उड़े हमारे बालों के रंग

वह ज़हर ही था हमारी आत्मा का अमृत वह ज़हर ही था नारों की शक्ल में गूंजता हमारे भीतर कहीं वह ज़हर ही था किसी दंतेवाड़ा के साथ धधक उठता वह ज़हर ही था किसी सीमा आज़ाद के साथ उदास वह ज़हर ही था कविताओं की शक्ल में उतरता हमारी आँखों से

(पांच)

हाँ, हम लगभग अभिशप्त हुए कवि होते जाने को. आजादी की तलाश में हम एक ऐसी दुनिया में आये जहाँ एक बहुत पुराना गाँव रहता था अपनी पूरी आन-बान के साथ. ढेर सारे कुल-कुनबे थे और चली ही आ रही थी उनकी रीत. आलोचक थे, संपादक थे, निर्णायक थे, विभागाध्यक्ष थे, पीठाध्यक्ष थे और इन पञ्च परमेश्वरों के सम्मुख हाथ जोड़े सर्वहारा कवियों की एक पूरी जमात जिनका सब कुछ हरने के बाद उन्हें पुरस्कार दे दिए जाते थे. पंचों की आलोचना वर्जित रीत थी और मौत से कम किसी सज़ा का प्रावधान नहीं था उस अलिखित संविधान में. हैरान आँखों से देखते-समझते सब हम जा बसे दक्खिन टोले में.

(छह)

और पूरा हुआ जीवन का एक चक्र खुद को छलते हुए खुद की ही जादूगरी से बीस से चालीस के हुए और अब शराब के खुमार में भी नहीं आते आंसू डर लगता है कि कहीं किसी रोज कह ही न बैठें किसी से कि ऐसे ही चलती रही है दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी और … और ज़ोर-ज़ोर से कहने लगते हैं बदलती ही रही है दुनिया और बदलती रहेगी…

अंधड़ों की धूल-सा धूसर दुख

पता नहीं आप आधुनिक कहेंगे
उत्तर आधुनिक या कि कुछ और इस समय को
जब विकास-दरों के निर्गुण पैमाने पर नापी जा रही है ख़ुशी
ख़ुदकुशी शामिल नहीं है दुख के सूचकांकों में
और हत्या अमूर्त-चित्रों की तरह
अपने-अपने तरीके से की जा रही है व्याख्यायित
टी०वी० के पर्दों से छन-छन कर
हमारे बीच के निर्वातों पर
किसी रंगहीन विषैली गैस से कब्ज़ा जमाते इस समय में
किसी अपरिचित-सी आकाशगंगा के चित्रों का भयावह कोलाज
झाँकता है किसी डरावनी फ़िल्म के आदमक़द पोस्टर की तरह
जहाँ तमाम विकृत मुद्राओं के बीच
सिर्फ़ जुगुप्सा जगाते हैं हास्य और नृत्य के दृश्य
हँसो तो गों-गों करके रह जाती है आवाज़
नाचो तो ताण्डव की आवृति में कसमसाते हैं पाँव
कौन सी दुनिया है यह?
कौन से युग का कौन सा चरण?
किस विश्वविद्यालय में बना था इसका ब्लूप्रिण्ट?
किस संसद में तय की गई इसकी नियमावली?
कवियों की तो ख़ैर बिसात ही क्या रही अब
पर किन नायकों ने गढ़े ऐसे आदर्श
कि कुछ भी नहीं बचा आश्चर्यजनक-असंभाव्य
कुछ भी हो सकता है किसी भी शब्द का अभिप्राय
किसी भी आस्तीन पर हो सकता है किसी का भी लहू
इस समय के पराजित युद्धबंदी
कुटिन मुस्कान वाले तानाशाह के शरणार्थी शिविरों-सी
अलक्षित अरक्षित बस्तियों में रह रहे जो
बाल-विधवा बुआ-सा रहता ही है दुख उनके साथ स्थाई
फुटपाथ पर हों तो कुचल जाता है कोई सितारा
झोपड़ों से कोई निठारी चुपचाप उठा ले जाता भविष्य
खेतों में पता ही नहीं चलता कब निगल जाती ज़मीन
ख़ुशी-ख़ुदकशी-हत्या-हादसा सब
जैसे हिस्सा रोज़मर्रा की ज़िंदगी का
किसी को नहीं पड़ता फ़र्क

पर
समय के विजय-स्तम्भों से
ख़ुशी से लिपे-पुते से आलीशान मकानों में भी
जहाँ हवा तक नहीं आ सकती बेरोकटोक
पता नहीं किन वातायनों से चला आता है
अंधड़ों की धूल-सा धूसर दुख
और बिखर जाता है दूध से धवल फर्श पर
आश्चर्य-तब भी नहीं पड़ता कोई फ़र्क !
सिर्फ़ थोड़ा और उदास हो जाता है कवि
और उँगलियों से कुरेदता हुआ राख
पूछता है ख़ुद से ही शायद
कौन सा समय यह
कि जिसमें ज़िंदगी की सारी कशमकश
बस, मौत के बहाने ढूँढने के लिए…

सबसे बुरे दिन

सबसे बुरे दिन नहीं थे वे
जब घर के नाम पर
चौकी थी एक छह बाई चार की
बमुश्किलन समा पाते थे जिसमे दो जि+स्म
लेकिन मन चातक सा उड़ता रहता था अबाध!

बुरे नहीं वे दिन भी
जब ज़रूरतों ने कर दिया था इतना मजबूर
कि लटपटा जाती थी जबान बार बार
और वे भी नहीं
जब दोस्तों की चाय में
दूध की जगह मिलानी होती थी मज+बूरियां.

कतई बुरे नहीं थे वे दिन
जब नहीं थी दरवाजे पर कोई नेमप्लेट
और नेमप्लेटों वाले तमाम दरवाजे
बन्द थे हमारे लिये.

इतने बुरे तो खैर नहीं हैं ये भी दिन
तमाम समझौतों और मजबूरियों के बावजूद
आ ही जाती है सात-आठ घण्टों की गहरी नींद
और नींद में वही अजीब अजीब सपने
सुबह अखबार पढ़कर अब भी खीजता है मन
और फाइलों पर टिप्पणियाँ लिखकर ऊबी कलम
अब भी हुलस कर लिखती है कविता.

बुरे होंगे वे दिन
अगर रहना पड़ा सुविधाओं के जंगल में निपट अकेला
दोस्तों की शक्लें हो गई बिल्कुल ग्राहकों सीं
नेमप्लेट के आतंक में दुबक गया मेरा नाम
नींद सपनों की जगह गोलियों की हो गई गुलाम
और कविता लिखी गई फाईलों की टिप्पणियांे सी.

बहुत बुरे होंगे वे दिन
जब रात की होगी बिल्कुल देह जैसी
और उम्मीद की चेकबुक जैसी
वि’वास होगा किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विज्ञापन
खुशी घर का कोई नया सामान
और समझौते मजबूरी नहीं बन जायेंगे आदत.

लेकिन सबसे बुरे होंगे वे दिन
जब आने लगेगें इन दिनों के सपने!

वैश्विक गाँव के पंच-परमेश्वर

पहला
कुछ नहीं ख़रीदता
न कुछ बेचता है
बनाना तो दूर की बात है
बिगाड़ने तक का शऊर नहीं है उसे
पर तय वही करता है
कि क्या बनेगा — कितना बनेगा — कब बनेगा
ख़रीदेगा कौन – कौन बेचेगा

दूसरा
कुछ नहीं पढ़ता
न कुछ लिखता है
परीक्षायें और डिग्रियाँ तो ख़ैर जाने दें
क़िताबों से रहा नहीं कभी उसका वास्ता
पर तय वही करता है
कि कौन पढ़ेगा — क्या पढ़ेगा — कैसे पढ़ेगा
पास कौन होगा — कौन फेल

तीसरा
कुछ नहीं खेलता
ज़ोर से चल दे भर
तो बढ़ जाता है रक्तचाप
धूल तक से बचना होता है उसे
पर तय वही करता है
कि कौन खेलेगा — क्या खेलेगा — कब खेलेगा
जीतेगा कौन — कौन हारेगा

चौथा
किसी से नहीं लड़ता
दरअसल ’शुद्ध ’शाकाहारी है
बंदूक की ट्रिगर चलाना तो दूर की बात है
गुलेल तक चलाने में काँप जाता है
पर तय वही करता है
कि कौन लड़ेगा — किससे लड़ेगा — कब लड़ेगा
मारेगा कौन — कौन मरेगा

और
पाँचवाँ
सिर्फ़ चारों का नाम तय करता है ।

कहाँ होंगी जगन की अम्मा

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये
ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा ’शर्मिन्दा सा जेबें टटोलते
अचानक पहुँच जाता हूँ
बचपन के उस छोटे से कस्बे में
जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं
और माँ बाँस की रंगीन-सी डलिया में
दो मुठ्ठी चने डाल भेज देती थीं भड़भूजे पर
जहाँ इंतज़ार में होती थीं
सुलगती हुई हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा।

तमाम दूसरी औरतों की तरह कोई अपना निजी नाम नहीं था उनका
प्रेम या क्रोध के नितांत निजी क्षणों में भी
बस जगन की अम्मा थीं वह
हालाँकि पाँच बेटियां भी थीं उनकीं
एक पति भी रहा होगा ज़रूर
पर कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई
उसे जानने की
हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू
और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान।

हालाँकि उन दिनों दूरदर्शन के इकलौते चैनल पर
नहीं था कहीं उसका विज्ञापन
हमारी अपनी नंदन, पराग या चंपक में भी नहीं
अव्वल तो थी हीं नहीं इतनी होर्दिंगे
और जो थीं उन पर कहीं नहीं था इनका जिक्र
पर मां के दूध और रक्त से मिला था मानो इसका स्वाद
तमाम खुशबुओं में सबसे सम्मोहक थी इसकी खुशबू
और तमाम दृ’यों में सबसे खूबसूरत था वह दृश्य .

मुट्ठियाँ भर-भर कर फांकते हुए इसे
हमने खेले बचपन के तमाम खेल
उंघती आँखांे से हल किये गणित के प्रमेय
रि’तेदारों के घर रस के साथ यही मिला अक्सर
एक डलिया में बांटकर खाते बने हमारे पहले दोस्त
फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने
यही दिया उपहार की तरह
यही खाते-खाते पहले पहल पढ़े
डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयों के विज्ञापन!

और फिर जब सपने तलाशते पहुँचे
महानगरों की अनजान गलियों के उदास कमरों में
आतीं रहीं अक्सर जगन की अम्मा
मां के साथ पिता के थके हुए कंधो पर
पर धीरे-धीरे घटने लगा उस खुशबू का सम्मोहन
और फिर खो गया समय की धुंध में तमाम दूसरी चीजों की तरह.

बरसों हुए अब तो उस गली से गुजरे
पता ही नहीं चला कब बदल गयी
बांस की डलिया प्लास्टिक की प्लेटों में
और रस भूजा – चाय नमकीन में!
अब कहाँ होंगी जगन की अम्मा?
बुझे चूल्हे की कब्र पर तो कबके बन गये होंगे मकान
और उस कस्बे में अब तक नहीं खुली चिप्स की फैक्ट्री
और खुल भी जाती तो कहाँ होती जगह जगन की अम्मा के लिए?
क्या कर रहे होंगे आजकल
मुहल्ले भर के बच्चों की डलिया में मुस्कान भर देने वाले हाथ?
आत्महत्या के आखिरी विकल्प के पहले
होती हैं अनेक भयावह संभावनायें….

जेबें टटोलते मेरे ’शर्मिन्दा हाथांे को देखते हुए गौर से
दुकानदार ने बिटिया को पकड़ा दिये है- अंकल चिप्स!

चाय अब्दुल और मोबाइल

रोज़ की तरह था वह दिन और दफ़्तर भी
चेहरों के अलावा कुछ नहीं बदला था जहाँ वर्षों से
थके हुए पंखे बिखेर रहे थे ऊब और उदासी
फाईलें काई की बदरंग परतों की तरह बिखरीं थीं बेतरतीब
अपनी अपार निष्क्रियता में सक्रिय
आत्माओं का सामूहिक वधस्थल ।

रोज़ की तरह घड़ी की सुईयों के एक ख़ास संयोग पर
वर्षों के अभ्यस्त पाँव
ठीक सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो के बाद पहुँचे अब्दुल की दुकान पर
चाय पीना भी आदत थी हमारी ऊब की तरह !
रोज़ की तरह करना था उसे नमस्कार
रोज़ की तरह लगभग मुस्कुराते हुए कहना था हमें-
पाँच कट
फिर जुट जाना था कुर्सियों और अख़बार के जुगाड़ में
रोज़ की तरह जताना था अफ़सोस बढ़ती क़ीमतों पर

दुखी होना था बच्चों की पढाई से, बीबी की बीमारी
और दफ़्तर की परेशानियों से, देश की राजनीति तक पर
तिरछी निगाहों से देखते हुए तीसरे पेज के चित्र ।
कि अचानक दाल में आ गए कंकड़-सी बिखर गई
एक पालीफ़ोनिक स्वरलहरी !

हमारी रोज़ की आदतों में शामिल नहीं था यह दृश्य
उबलती चाय के भगोने को किसी सिद्धहस्त कलाकार की तरह आँच के ऊपर-नीचे नचाने
और फिर गिलासों में बराबर-बराबर छानने के बीच
पहले कविता-पाठ में उत्तेजित कवि-सा बतियाता अब्दुल
सरकारी डाक्यूमेण्टरी के बीच बज उठे सितार-सा भंग कर रहा था हमारी तंद्राएँ ।

चौंकना सही विशेषण तो नहीं पर विकल्प के अभाव में कर सकते हैं आप
उस अजीब-सी भंगिमा के लिये प्रयोग
जो बस आकर बस गई उस एक क्षण में हमारे चेहरों पर
और फिर नहीं रहा सब कुछ पहले-सा, बदल गए हमारी नियमित चर्चाओं के विषय ।
पहली बार महसूस किया हमने कि घटी क़ीमतें भी हो सकती हैं दुख का सबब !

हमारी कमीज़ की जेबों में
सम्मान-सूचक बिल्लों से सजे मोबाईल की स्वरलहरियों से झर गया सम्मोहन ।।।
मानो हमारे ठीक सामने की छोटी लकीर अचानक हुई हमारे बराबर-और हम हो गए बौने !

हालाँकि बदस्तूर जारी है
हमारा सताइस सीढ़ियों और छियालिस क़दमो का सफ़र
अब भी रोज़ की तरह अब्दुल करता है नमस्कार
पहले-सा ही है
पत्ती-शक्कर-दूध-अदरक का अनुपात
पर कप और होंठों के बीच मुँह के छालों-सा चुभता है
मोबाईल पर चाय के आर्डर लेता अब्दुल ।

आजकल हम सब कर रहे हैं इंतज़ार
कैमरे वाले मोबाईल के भाव गिरने का !

दुख के बारे में एक कविता

पता नहीं आप आधुनिक कहेंगे
उत्तर आधुनिक या कि कुछ और इस समय को
जब विकास-दरों के निर्गुण पैमाने पर नापी जा रही है ख़ुशी
ख़ुदकुशी शामिल नहीं है दुख के सूचकांकों में
और हत्या अमूर्त-चित्रों की तरह
अपने-अपने तरीके से की जा रही है व्याख्यायित
टी०वी० के पर्दों से छन-छन कर
हमारे बीच के निर्वातों पर
किसी रंगहीन विषैली गैस से कब्ज़ा जमाते इस समय में
किसी अपरिचित-सी आकाशगंगा के चित्रों का भयावह कोलाज
झाँकता है किसी डरावनी फ़िल्म के आदमक़द पोस्टर की तरह
जहाँ तमाम विकृत मुद्राओं के बीच
सिर्फ़ जुगुप्सा जगाते हैं हास्य और नृत्य के दृश्य
हँसो तो गों-गों करके रह जाती है आवाज़
नाचो तो ताण्डव की आवृति में कसमसाते हैं पाँव
कौन सी दुनिया है यह?
कौन से युग का कौन सा चरण?
किस विश्वविद्यालय में बना था इसका ब्लूप्रिण्ट?
किस संसद में तय की गई इसकी नियमावली?
कवियों की तो ख़ैर बिसात ही क्या रही अब
पर किन नायकों ने गढ़े ऐसे आदर्श
कि कुछ भी नहीं बचा आश्चर्यजनक-असंभाव्य
कुछ भी हो सकता है किसी भी शब्द का अभिप्राय
किसी भी आस्तीन पर हो सकता है किसी का भी लहू
इस समय के पराजित युद्धबंदी
कुटिन मुस्कान वाले तानाशाह के शरणार्थी शिविरों-सी
अलक्षित अरक्षित बस्तियों में रह रहे जो
बाल-विधवा बुआ-सा रहता ही है दुख उनके साथ स्थाई
फुटपाथ पर हों तो कुचल जाता है कोई सितारा
झोपड़ों से कोई निठारी चुपचाप उठा ले जाता भविष्य
खेतों में पता ही नहीं चलता कब निगल जाती ज़मीन
ख़ुशी-ख़ुदकशी-हत्या-हादसा सब
जैसे हिस्सा रोज़मर्रा की ज़िंदगी का
किसी को नहीं पड़ता फ़र्क

पर
समय के विजय-स्तम्भों से
ख़ुशी से लिपे-पुते से आलीशान मकानों में भी
जहाँ हवा तक नहीं आ सकती बेरोकटोक
पता नहीं किन वातायनों से चला आता है
अंधड़ों की धूल-सा धूसर दुख
और बिखर जाता है दूध से धवल फर्श पर
आश्चर्य-तब भी नहीं पड़ता कोई फ़र्क !
सिर्फ़ थोड़ा और उदास हो जाता है कवि
और उँगलियों से कुरेदता हुआ राख
पूछता है ख़ुद से ही शायद
कौन सा समय यह
कि जिसमें ज़िंदगी की सारी कशमकश
बस, मौत के बहाने ढूँढने के लिए…

विरूद्ध 

पता नहीं किस-किस के विरूद्ध
कौन सी रणभूमि में
निरन्तर कटते-कटाते संघर्ष रत
रोज लौट आते अपने शिविर में
श्रांत-क्लांत

रक्त के अनगिन निशान लिये
न जीत के उल्लास में मदमस्त
न हार के नैराष्य से संत्रस्त।

कोई आकस्मिक घटना नहीं है यह युद्ध
न आरम्भ हुआ था हमारे साथ
न हमारी ही किसी नियति के साथ हो जायेगा समाप्त
शिराओं में घुलमिलकर
दिनचर्या का कोई अपरिहार्य सा हिस्सा हो ज्यों
बिलकुल असली इन घावों के निशान
लहू बिल्कुल लहू की तरह – गर्म,लाल और गाढ़ा
हथियारों के बारे में नहीं कह सकता पूरे विश्वास से
इससे भी अधिक कठिन है
दोस्तों और दुश्मनो के बारे में कह पाना

अंधकार – गहरा और लिजलिजा अंधकार
मानो फट पड़ा हो सूर्य
और निरंतर विस्फोटों के स्फुलिंगों के
अल्पजीवी प्रकाश में कैसे पहचाने कोई चेहरे
बस यंत्रमानवों की तरह-प्रहार-प्रहार-प्रहार

कई बार तो ऐसा लगता है
कि अपने ही हथियारों से कट गिरा हो कोई अंग
अपना ही बारूद छा गया हो दृष्टिपटल पर
अपनी ही आवाज से फट गया हो कर्णपटल
अपना ही कोई स्वप्न भरभराकर गिर पड़ा हो कांधे पर
अपनी ही स्याही घुलमिल गयी हो लहू में
अपना ही कोई गीत बदल गया हो रणभेरी में

इस लिजलिजी अंधेरी दलदल में
अमीबा की तरह तैरते विचार
जितनी कोशिश करो पकड़ने की
उतने ही होते जाते दूर
और पांव है कि धंसता ही जा रहा है
गहरा – और गहरा- और गहरा

किस दिशा में जा रहा है यह समय रथ?
कौन इसका सारथी?
किस रंग की इसकी ध्वजा?

कुछ नहीं – कुछ भी नहीं दीखता स्पष्ट
हम स्वघोषित सेनानियों को
लड़ रहे हैं – बस लड़ रहे हैं अनवरत
नियतिबद्ध या कि शायद विकल्पहीन
“लड़ रहे हैं कि नहीं बैठ सकते खा़मोश
लड़ रहे हैं कि और कुछ सीखा नहीं
लड़ रहे हैं कि जी नहीं सकते लड़े बिन
लड़ रहे हैं कि मिली है जीत लड़कर ही अभी तक”
प्रश्न तो लेकिन यही है – जीत आखिर कौन सी है?

माँ की डिग्रियाँ

घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

बचपन में अक्सर देखा है माँ को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
मरे हुए चूहे-सी एक ओर कर देतीं
वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी
और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों-सा
देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिंदा

कभी क्रोध, कभी खीझ
और कभी हताश रुदन के बीच
टुकड़े-टुकड़े सुनी बातों को जोड़कर
धीरे-धीरे बुनी मैंने साड़ी की कहानी
कि कैसे ठीक उस रस्म के पहले
घण्टों चीख़ते रहे थे बाबा
और नाना बस खड़े रह गए थे हाथ जोड़कर
माँ ने पहली बार देखे थे उन आँखों में आँसू
और फिर रोती रही थीं बरसों
अक्सर कहतीं यही पहनाकर भेजना चिता पर
और पिता बस मुस्कुराकर रह जाते…

डिग्रियों के बारे में तो चुप ही रहीं माँ
बस एक उकताई-सी मुस्कुराहट पसर जाती आँखों में
जब पिता किसी नए मेहमान के सामने दुहराते
’उस ज़माने की एम० ए० हैं साहब
चाहतीं तो कालेज में होतीं किसी
हमने तो रोका नहीं कभी
पर घर और बच्चे रहे इनकी पहली प्राथमिकता
इन्हीं के बदौलत तो है यह सब कुछ’
बहुत बाद में बताया नानी ने
कि सिर्फ कई रातों की नींद नहीं थी उनकी क़ीमत
अनेक छोटी-बडी लड़ाईयाँ दफ़्न थीं उन पुराने काग़ज़ों में…

आठवीं के बाद नहीं था आसपास कोई स्कूल
और पूरा गाँव एकजुट था शहर भेजे जाने के ख़िलाफ़
उनके दादा ने तो त्याग ही दिया था अन्न-जल
पर निरक्षर नानी अड़ गई थीं चट्टान-सी
और झुकना पड़ा था नाना को पहली बार
अन्न-जल तो ख़ैर कितने दिन त्यागते
पर गाँव की उस पहली ग्रेजुएट का
फिर मुँह तक नहीं देखा दादा ने

डिग्रियों से याद आया
ननिहाल की बैठक में टँगा
वह धूल-धूसरित चित्र
जिसमें काली टोपी लगाए
लम्बे से चोगे में
बेटन-सी थामे हुए डिग्री
माँ जैसी शक्लोसूरत वाली एक लड़की मुस्कुराती रहती है
माँ के चेहरे पर तो कभी नहीं देखी वह अलमस्त मुस्कान
कॉलेज के चहचहाते लेक्चर थियेटर में
तमाम हम-उम्रों के बीच कैसी लगती होगी वह लड़की ?

क्या सोचती होगी रात के तीसरे पहर में
इतिहास के पन्ने पलटते हुए?
क्या उसके आने के भी ठीक पहले तक
कालेज की चहारदीवारी पर बैठा कोई करता होगा इंतजार?
(जैसे मैं करता था तुम्हारा)
क्या उसकी क़िताबों में भी कोई रख जाता होगा कोई
सपनों का महकता गुलाब?
परिणामों के ठीक पहले वाली रात क्या
हमारी ही तरह धड़कता होगा उसका दिल?
और अगली रात पंख लगाए डिग्रियों के उड़ता होगा उन्मुक्त…

जबकि तमाम दूसरी लड़कियों की तरह एहसास होगा ही उसे
अपनी उम्र के साथ गहराती जा रही पिता की चिन्ताओं का
तो क्या परीक्षा के बाद क़िताबों के साथ
ख़ुद ही समेटने लगी होगी स्वप्न?
या सचमुच इतनी सम्मोहक होती है
मंगलसूत्र की चमक और सोहर की खनक कि
आँखों में जगह ही न बचे किसी अन्य दृश्य के लिए?
पूछ तो नहीं सका कभी
पर प्रेम के एक भरपूर दशक के बाद
कह सकता हूँ पूरे विश्वास से
कि उस चटख़ पीली लेकिन उदास साडी के नीचे
दब जाने के लिए नहीं थीं
उस लड़की की डिग्रियाँ !!!

सोती हुई बिटिया को देखकर 

अभी-अभी
हुलसकर सोई हैं
इन साँसों में स्वरलहरियां

अभी-अभी
इन होठों में खिली है
एक ताज़ा कविता

अभी-अभी
उगा है इन आंखों में
नीला चाँद

अभी-अभी
मिला है
मेरी उम्मीदों को
एक मज़बूत दरख़्त

मैं हर जगह था वैसा ही

मैं बम्बई में था
तलवारों और लाठियों से बचता-बचाता भागता-चीखता
जानवरों की तरह पिटा और उन्हीं की तरह ट्रेन के डब्बों में लदा-फदा
सन साठ में मद्रासी था, नब्बे में मुसलमान
और उसके बाद से बिहारी हुआ

मैं कश्मीर में था
कोड़ों के निशान लिए अपनी पीठ पर
बेघर, बेआसरा, मज़बूर, मज़लूम
सन तीस में मुसलमान था
नब्बे में हिन्दू हुआ

मैं दिल्ली में था
भालों से बिंधा, आग में भुना, अपने ही लहू से धोता हुआ अपना चेहरा
सैंतालीस में मुसलमान था
चौरासी में सिख हुआ

मैं भागलपुर में था
मैं बड़ौदा में था
मैं नरोड़ा-पाटिया में था
मैं फलस्तीन में था अब तक हूँ वहीं अपनी कब्र में साँसें गिनता
मैं ग्वाटेमाला में हूँ
मैं ईराक में हूँ
पाकिस्तान पहुँचा तो हिन्दू हुआ

जगहें बदलती हैं
वज़ूहात बदल जाते हैं
और मज़हब भी, मैं वही का वही!

हारने के बाद पता चला मैं रेस में था

वह जो बीमार बच्चे की दुहाई देता
टिकट खिड़की के सामने की लम्बी लाइन में आ खड़ा हुआ ठीक मेरे सामने
जिसका चेहरा उदासी और उद्विग्नता के घने कुहरे में झुलसा हुआ सा था
आवाज़ जैसे किसी पत्थर से दबी हुई हाथ कांपते और पैर अस्थिर
उसकी ट्रेन शाम को थी और साथ में न कोई बच्चा न कोई चिंता.

वह जिसे चक्कर आ रहे थे
मितलियों से घुटा जा रहा था गला, फटा जा रहा था दर्द से सर
पैरों में दर्द ऐसा कि जैसे बस की सख्त ज़मीन पर कांटे बिछें हों अथाह
खिड़की वाली सीट ख़ाली करते ही मेरे सो गयी थी ऐसे कि जैसे हवा ने सोख ली हों मुश्किलें सारी.

जो कंधे पर दोस्ताना हाथ रखे निकल आया आगे
उसने कहा कहीं बाद में – अब कछुए दौड़ नहीं जीता करते खरगोशों ने सीख लिए हैं सबक.
जिसके हाथों के दबाव को दोस्ती की गर्माहट समझा
वह कोई खेल खेलता हुआ जीत चुका था.
जिसने भरी आँखों वाला चेहरा काँधे पर टिका दिया
वह अगले ही पल क़ीमत माँगता खड़ा हुआ बिलकुल सामने.

यह अजीब दुनिया थी
जिसमें हर कदम पर प्रतियोगिता थी
बच्चे बचपन से सीख रहे थे इसके गुर
नौजवान खाने की थाली से सोने के बिस्तर तक कर रहे थे अभ्यास
बूढ़े अगर समर्पण की मुद्रा में नहीं थे तो विजय के उल्लास में थे गर्वोन्मत्त
खेल के लिए खेल नहीं था न हँसी के लिए हँसी रोने के लिए रोना भी नहीं था अब
किसने सोचा था
कि ऐसी रंगमंच होगी धरती एक दिन कि कवि भी करेगा कविता प्रतियोगिता में हिस्सेदारी की तरह

जीत और हार के इस कुंए में घूमता गोल-गोल सोचता सिर धुनता मैं
और चिड़ियों की एक टोली ठीक सिर के ऊपर से निकल जाती है चहचहाती
अपनी ही धुन में गाती, बड़बड़ाती याकि धरती के मालिक को गरियाती…मुँह बिराती

माफ़ीनामा

एक सीधी रेखा खींचना चाहता हूँ
अपने शब्दों में थोड़ी सियाही भरना चाहता हूँ
कुछ आत्मस्वीकृतियाँ करना चाहता हूँ
और अपनी कायरता के लिए माफ़ी माँगने भर का साहस चाहता हूँ

किसी दिन मिलना चाहता हूँ तमाम शहरबदर लोगों से
अपने शहर के फक्कड़ गवैये की मज़ार पर बैठकर लिखना चाहता हूँ एक कविता
और चाहता हूँ कि रंगून तक पहुंचे मेरा माफ़ीनामा.

मैं लखनऊ के उस होटल की छत पर बैठ
किसी सर्द रात ‘रुखसते दिल्ली’ पढ़ना चाहता हूँ
इलाहाबाद की सड़कों पर ग़र्म हवाओं से बतियाते भेड़िये के पंजे गिनना चाहता हूँ
जे एन यू के उस कमरे में बैठ रामसजीवन से माफ़ी मांगना चाहता हूँ
पंजाब की सड़कों पर पाश के हिस्से की गोली
और मणिपुर की जेल में इरोम के हिस्से की भूख खाना चाहता हूँ

मैं साइबेरिया की बर्फ़ से माफी मांगना चाहता हूँ
एक शुक्राना लिखना चाहता हूँ
हुकूमत-ए-बर्तानिया और बादशाह-ए-क़तर के नाम

कहां होंगी जगन की अम्मा?

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये
ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिंदा सा ज़ेबें टटोलते
अचानक पहुंच जाता हूं
बचपन के उस छोटे से कस्बे में
जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं
और मां बांस की रंगीन सी डलिया में
दो मुठ्ठी चने डाल भेज देती थीं भड़भूजे पर
जहां इंतज़ार में होती थीं
सुलगती हुई हांड़ियों के बीच जगन की अम्मा.

तमाम दूसरी औरतों की तरह कोई अपना निज़ी नाम नहीं था उनका
प्रेम या क्रोध के नितांत निज़ी क्षणों में भी
बस जगन की अम्मा थीं वह
हालांकि पांच बेटियां भी थीं उनकीं
एक पति भी रहा होगा ज़रूर
पर कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई उसे जानने की
हमारे लिये बस हंड़िया में दहकता बालू
और उसमे खदकता भूजा था उनकी पहचान.

हालांकि उन दिनों दूरदर्शन के इकलौते चैनल पर
नहीं था कहीं उसका विज्ञापन
हमारी अपनी नंदन,पराग या चंपक में भी नहीं
अव्वल तो थी हीं नहीं इतनी होर्डिगें
औा जो थीं उन पर कहीं नहीं था इनका ज़िक्र
पर मां के दूध और रक्त से मिला था मानो इसका स्वाद
तमाम खुशबुओं में सबसे सम्मोहक थी इसकी खुशबू
और तमाम दृश्यों में सबसे खूबसूरत था वह दृश्य.

मुठ्ठियां भर भर कर फांकते हुए इसे
हमने खेले बचपन के तमाम खेल
उंघती आंखो से हल किये गणित के प्रमेय
रिश्तेदारों के घर रस के साथ यही मिला अक्सर
एक डलिया में बांटकर खाते बने हमारे पहले दोस्त
फ्राक में छुपा हमारी पहली प्रेमिकाओं ने
यही दिया उपहार की तरह
यही खाते खाते पहले पहल पढ़े
डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयों के विज्ञापन!

और फिर जब सपने तलाशते पहुंचे
महानगरों की अनजान गलियों के उदास कमरों में
आतीं रहीं अक्सर जगन की अम्मा
मां के साथ पिता के थके हुए कंधो पर
पर धीरे धीरे घटने लगा उस खुशबू का सम्मोहन
और फिर खो गया समय की धुंध में तमाम दूसरी चीज़ों की तरह.

बरसों हुए अब तो उस गली से गुज़रे
पता ही नहीं चला कब बदल गयी
बाँस की डलिया प्लास्टिक की प्लेटों में
और रस भूजा-चाय नमकीन में!

अब कहां होंगी जगन की अम्मा?
बुझे चूल्हे की कब्र पर तो कबके बन गये मक़ान
और उस कस्बे में अब तक नहीं खुली चिप्स की फैक्ट्री
और खुल भी जाती तो कहां होती जगह जगन की अम्मा के लिए?

क्या कर रहे होंगे आजकल
मुहल्ले भर के बच्चों की डलिया में मुस्कान भर देने वाले हाथ?
आत्महत्या के आखिरी विकल्प के पहले
होती हैं अनेक भयावह संभावनायें….

ज़ेबें टटोलते मेरे शर्मिन्दा हांथो को देखते हुए ग़ौर से
दुकानदार ने बिटिया को पकड़ा दिये है- अंकल चिप्स!

एक वीरानी है ठहरी हुई जैसे कोई गाँठ सीने में 

एक धुआँ सा उठा है कसैला जानी पहचानी गंध
एक बीमार चूल्हा ले रहा है अंतिम साँसें
धब्बों सा लपेटे पाउडर गुज़रती है वह कि ठहरी है
तेज़ रफ़्तार कोई गाड़ी गुज़र गई सद शुक्र कि मरा कोई नहीं।।मैं भी नहीं
एक गुबार उठा है धूल का और नशे में घुल मिल गया है
अपनी चप्पलों में चल रहा हूँ जाने कि उस नशे में

एक जलन तेज़ उठती है सीने में
उस औरत के पास खड़ा हो जाना चाहता हूँ
पर मेरा तो कोई ख़रीदार नहीं लफ्ज़ घर छोड़ आया हूँ
देह है उसकी मेरा घर है एक
अपनी अपनी क़त्लगाह में सुरक्षाएँ ढूंढ़ते बिके जाते हैं हम रोज़

लड़खड़ाता हुई एक छाया ढेर हो गयी है दिन के मलबे पर
पौवे की आखिरी बूँद के बाद भीख सी उम्मीद में देखते हुए बोतल की तली
यह मैं था जिसने दिन में कहा था “एक आदत है भीख”
यह मैं हूँ उसके बगल में बैठा भीख की शराब देता।।वह मना कर देता है
उपेक्षा एक आदत है।।कहता हूँ और चल देता हूँ

सायरन की तेज़ आवाज़ सड़कों पर
और धूल का एक गुबार उठता है तेज़ संगीत के साथ
मद्धम चलता हूँ दोनों के बीच बचता बचाता
चप्पल में कोई कंकड़ सा है शायद।।।निकालता नहीं आदत डाल लेता हूँ

कोई गिद्ध आकर बैठ गया है कन्धों पर
कहती है लड़की कौआ है यार।।पर यह आया कहाँ से इस शहर में?
देखो कोई ख़त तो नहीं मेरे लिए उसका
अब बस करो थक गए मेरे कंधे
मेरी उँगली छोड़ो।।छोड़ो मेरे हाथ सुन्न हो गए हैं दोनों
बर्फ नहीं नदी किनारे के पत्थर सा गलते रेत हो रहा हूँ
चिता सी जल रही आँखों में मत ढूंढों कमल की सुर्खी
नींद है ज़रा सी तुम्हारे पास?

नशा है रात के बाज़ार में
नींद न दिन में न रात में

एक पोस्टर मुस्कुराता हुआ कहता साथ चलो मेरे
सिर्फ मैं दे सकता हूँ तुम्हें मुक्ति कहता दूसरा
तीसरे के पास इतिहास है, भविष्य नहीं
काम शक्ति बढ़ाने वाले पोस्टर के ठीक सामने उल्टियाँ करता हँसता है कोई
सब चोर हैं साले

नींद कहीं नहीं है जाओ घर जाओ बाबू
तुम तो मेरे भी किसी काम के नहीं
क्या करूंगी तुम्हारी कविताओं का उनसे बेहतर हैं कच्ची रुई के कपड़े बेकार
दे जाना अगर होंगे घर में पड़े।।सब मंहगा है साला इन दिनों

किसी छत पर पी रहे होंगे दोस्त शराब?
किसी नदी में ठीक इसी वक़्त आया होगा तूफ़ान?
किसी शहर में दंगे हो रहे होंगे ठीक इसी वक़्त?
कौन सा नशा सबसे तेज़ दुनिया में जिससे फिर न वापस आये कोई?

ज़िन्दगी नशा है बाबू
क़िस्मत नहीं होगी तो दया आ जायेगी दोस्तों को
तूफ़ान ठहर जाएगा दंगों में जो मिलेंगे उनके अंग पर होगा तुम जितना ही चाम
जाओ जहाँ मरना है मरो
वही घर है तुम्हारी कब्रगाह मेरी देह जैसे मेरी
हर ज़मीन श्मशान नहीं होती थोड़ी देर में हो जायेगी सुबह।।
रात खराब कर दी तुमने मेरी
हो पचास का नोट तो चलो दो घंटे के घर में
जाने दो नहीं होगा तुमसे।।जाओ घर जाओ ।।
मरो जहाँ चाहे जाओ।।

लौटना कितना सुन्दर शब्द है
सुन्दरता कितना भयानक बिम्ब

थोड़े और धब्बे चाहिए मुझे अपनी आवाज़ों में
अपने चेहरे पर थोड़े और घाव
मन पर आग के कुछ और शोले।।

लौटता हूँ अब!

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