अशोक कुमार शुक्ला की रचनाएँ

हाइकु

देश के हालात को बयां करते हाइकु
(1)
दहला देश
धमाकों की बिसात
पुराने हाथ

(2)
बिकाऊ निष्ठा
कोई न पाया भाँप
आस्तीनी साँप

शव-साधना

प्रिये !
उन आन्तरिक
आत्मीय क्षणों में
जब प्रकृति को
निरन्तरता और अमरता
प्रदान करने वाला
अमृत छलक रहा हो
तो तुम्हारा
प्रतिक्रिया शून्य और निष्प्राण
पडा रहना
विचलित करता है मुझे
…सोचता हूं
क्या सचमुच
तुम आधा अंग हो मेरा ?
या
शव आसन की सी
तुम्हारी मुद्रा में
आधा अधूरा ही मै
कर रहा हूं
वात्सायन की शव साधना..!

तुम

क्या
मालूम है तुम्हें
हवा कहाँ रहती है ?
शायद हर जगह

लेकिन दिखती नहीं
बस दस्तक देती है दरवाज़े पर
कभी हौले से
और कभी आँधी बनकर

दिखती नहीं
बस उसका अहसास होता है
जैसे अभी छूकर निकल गई हौले से
ख़ुशबूदार झोंके की तरह
या पेड़ की पत्तियों को सरसराकर
कोई इशारा दे गई जैसे

ठीक ऐसी ही हो तुम !
दिखती भी नहीं,
और पास से हटती भी नहीं ।

तुम (हाइकु)

 (1)
तुम आये तो
महकी फुलवारी
मायूसी हारी
(2)
हरारत है
आलिंगन तुम्हारा
पिघला तन
(3)
तेरी आहट
गुनगुनी धूप सी
माह पूस की
(4)
तुम हंसे तो
बिजली सी चमकी
बादर झरे

रिश्ते (हाइकु)

(1)
कंटीली झाड
जीवन बगिया में
उलझे रिश्ते
(2)
गुणन भाग
के गणित ज्ञान मे
हासिल रिश्ते
(3)
खूंटी पे टंगे
अंधे बंद कमरे
सिसके रिश्ते
(4)
जलती हुयी
गीली लकडी जैसे
सुलगेे रिश्ते
(5)
मौत का कुंआ
देखकर बच्चे से
ठिठके रिश्ते
(6)
पुरानी चोट
नासूर बन कर
रिसते रिश्ते
(7)
दरवाजे की
दरारो से झांकते
भोले से रिश्ते
(8)
पहली बर्षा
मिट्टी की खुशबू
महके रिश्ते
(9)
पागल सांड
बिदकता फिरता
बिगडे रिश्ते
(10)
बट्टे खाते में
पडी रकम जैसे
निस्तेज रिश्ते
(11)
दीमक अहं
शीशम के संबंध
खोखले रिश्ते

सावन (हाइकु)

(1)
फट गयी है
आसमान की झोली
धरा यूँ बोली

(1)
फट गयी है
आसमान की झोली
धरा यूँ बोली

(2)
बादल छाये
धरती पर ऐसे
मोहिनी जैसे

फागुन (हाइकु

(1)
फूली सरसों
भटकता फिरता
बावरा मन
(2)
जान न पाई
छलिया है फागुन
दीवानी धरा
(3)
हवा को आज
फागुन ने पिलाई
कैसी शराब
(4)
लेकर आई
मदभरा मौसम
ये फगुनाई
(5)
फगुनाहट
आके फुसफुसाई
मस्तानी आई

वार्तालाप 

पीले पड चुके
डायरी के पुराने पन्ने को
खोलता हूं
तो हडबडा कर
जाग उठी है वो कविता
जो सो रही थी
मोरपंख के साथ…
इसी तरह वर्षो से
मैं अक्सर जगा देता हूं उसे
फिर वो कविता बतियाती है
उस दूसरी कविता से
जो सूखे गुलाब की
पंखुड़ियों पर
तुम्हारी उंगलियो के
स्पर्श से
लिखी गयी थी
बाते करते करते
और भी सुर्ख हो जाता है
उसका लाल रंग
फिर से महक उठती है
उसमें नयी ताजगी
पन्ने खुलने पर
पुनः
जाग जाता है वो स्पर्श
बैचैन होता है मन
फिर कहॉ सो पाता हूं मैं
और वो भी
जागती ही रहती हैं
सारी सारी रात
मेरे साथ
तुम तक भी जरूर पहुंचती होंगी
उनकी संवेदनाऐं
जब इन्हें देखकर
सोचता हूं मैं
काश..!
संवेदनाओ का आवेग
तोड़ पाता
तुम्हारे अहं की दीवार को..!

चोरी हो जाते है सपने 

क्या लिखना था
याद तो है
लेकिन कैसे लिखूं..?
छुटकी का संदेशा आया है
“पता नहीं क्यों..
नींद नहीं आती
सारी सारी रात
यूँ ही आँखों में गुजर जाती है
आँख अगर लगती भी पल भर को
तो दीखते हैं
अजीब अजीब से सपने
मैं क्या करूँ दद्दा…?”
मैंने भी
सारे परंपरागत उपदेश
उंडेल दिए इनबॉक्स में
मसलन
ज्यादा सोचा मत करो
समय से सो जाया करो
कही उनसे
झगड़ा तो नहीं कर बैठी हो कोई..?
ऐसा ही और बहुत कुछ
लेकिन
नहीं बताया उसे
कि
आजकल
मेरा भी वी पी बढ़ गया है
नींद के लिए
मैं भी खाने लगा हूँ गोलियां
अक्सर चला जाता हूँ
घर के उस एकांत कमरे में
जहां तुमने जो रख छोड़ी है
अपनी ढेरों निशानियाँ
उसी फिरोजी रंग के
दुपट्टे में लिपटी
रखी हैं गुड़िया
जिसे बाबू जी लाये थे
देवांशरीफ के मेले से
अक्सर टटोलता हूँ वो डायरी
जिसमे तुमने
लिखने शुरू किये थे देवी गीत
परंतु जिसका पिछ्ला हिस्सा
भरा पड़ा है रफ़ी लता के
दर्दभरे गीतों के मुखड़े से
निहारता हूँ वो गुलाबी फ्राक
जो मैंने पार्सल की थी
जब पहली बार
नौकरी करने
पहाड़ पर गया था
और
मिली थी मुझे
अपनी पहली तनख्वाह
बाबूजी का खादी का गाउन
देखता हूँ
साथ ही देखता हूँ
तुम्हे गुदगुदी करना
और फिर तुम्हारा खिलखिलाना
सचमुच
देखते ही देखते
कितना बदल गया सब कुछ
कितने बदल गए सपने
मेरी आँखों में
तुम्हे हमेशा खुश देखने का सपना
अब भी तो है
तुम ही तो थी
जो सपनों सी बसती थी
घर के हर सदस्य की आंखो में
कुछ दिनों बाद
चोरी चोरी
सपना बनकर बसने लगी थी
किसी और की भी आँखों में
पगली .. यही रीति है
रोती बिलखते
बिदा किया था तुम्हे
ताकि जा कर बसो
उसी आँगन में
जिनके सपनो में
चोरी-चोरी जगह बनायी थी तुमने
अब सोच रहा हूँ..
….कहाँ तो तुम
हम सब की आँखों का
जीती जागती सपना थी..!
…और कहाँ
आज तुम्हारी आँखे
खुद तरस रही हैं
नींद में भी
सपना देखने को…!

इस जग की
यही रीत है पगली..!
सपने चोरी हो जाते है

अस्मिता की नुमाइश 

उस तूफानी रात
जब बरस रहा था अहंकार
और जाग उठा था रावण
नई दिल्ली के रामलीला मैदान में
क्रूर अट्टहासों के बीच
अर्ध्यरात्रि में मैंने
एक भटकती हुयी
दीन, मलीन, किन्तु शालीन
युवती को
सिसकते हुये देखा

उत्सुकतावश पास जाकर पूछा
‘‘देवी !
इतनी रात गये तुम यहां ?’’
उसने सिसकते हुए कहा
‘‘मैं एक परित्यक्ता हूं,
मेरा पति ‘विधान’ है,
जो एक फैशनपस्त
आधुनिका ‘फरेब’ के साथ
विवाह रचा लाया है,
उसी ने मुझे
घर से बाहर निकाला है
एक टोपीवाले नेता ने
मुझे तिरस्कृत देखकर
मेरे पति को लताड़ा है,
दूरसे भगवावस्त्रधारी बाबा ने
नेता जी को भी पछाड़ा है,
उसने
मेरी लुटी अस्मिता को
सारी दुनिया के आगे
नुमाइश सी बनाकर
परोस डाला है,
अब छोटे छोटे बच्चे भी
मुझे मुंह चिढाते हैं
अक्सर उन पत्थरों से घाव भी हो जाते हैं
जिन्हें वे मेरी ओर निरर्थक ही चलाते हैं
अब मैं अपनी शालीनता पर पछता रही हूं
सिर्फ ‘सच्चाई’ होने का
दंड पा रही हूं।

गुमशुदा की तलाश

गुमशुदा की तलाश
गुमशुदा
मुझे तलाश है
रिश्तों की एक नदी की
जो गुम हो गयी है
कंक्रीट के उस जंगल में
जहॉ स्वार्थ के भेडिये,
कपट के तेंन्दुये,
छल की नागिनों जैसे
सैकडों नरभक्षी किसी भी
रिश्ते को लील जाने को
हरपल आतुर हैं
इस अभ्यारण्य में
मौकापरस्ती के चीते जैसे
जंगली जानवर
हर कंक्रीट की आड में
घात लगाये बैठे हैं
इसलिये मुझे लगता है
कि रिश्तों की वह निरीह नदी
कहीं दुबककर रो रही होगी
याकि निवाला बन गयी होगी
इन कंक्रीट के बासिंदों का,
और अब प्यास बनकर
उतर गयी होगी
उन नरभक्षियां के हलक में ?
जाने क्यों ?
फिर भी मुझे तलाश है
रिश्तों की उस नदी की
जो बीते दिनों में
तब बिछड गयी थी मुझसे
जब मैं शाम के खाने के लिये
रोजगार की लकडियां बीनने
चला आया था
इस कंक्रीट के जंगल में!

एक नन्ही किरण ! 

हौसलों के सूरज से निकलकर
हताशा की घटाओं से छनकर
दिल के बागीचे तक
आज फिर आ पहुंची है
एक नन्ही किरण !
इसकी गर्माहट ने
पुनः ला दी है
मुरझायें हुये पौधों में
जीवन की चमक!
उम्मीदों की क्षितिज पर
फिर से उभर आया है
एक नया इंद्रधनुष !
खिल उठी हैं अनेक कलियां!!
हमारे और
आप के बागीचे में!!

बिल्लियॉ

ख़ूबसूरत पंखों वाली नन्हीं चिडियों को
एक पिंजरें में क़ैद कर लिया था हमने ,
क्योंकि उनके सजीले पंख लुभाते थे हमको,
इस पिंजरे में हर रोज़ दिए जाते थे
वह सभी संसाधन
जो हमारी नज़र में
जीवन के लिये ज़रूरी हैं,
लेकिन कल रात बिल्ली के झपट्टे ने
नोच दिए हैं चिडियों के पंख
सहमी और गुमसुम हैं
आज सारी चिडियाँ
और दुबककर बैठी हैं पिजरें के कोने में
पहले कई बार उड़ान के लिये मचलते
चिड़ियों के पंख आज बिखरे हैं फर्श पर
और गुमसुम चिड़ियों को देखकर सोचता हूँ
मैं कि आख़िर इस पिंजरे के अन्दर
कितना उड़ा जा सकता है
आख़िर क्यों नहीं सहा जाता
अपने पिंजरे में रहकर भी
ख़ुश रहने वाली
चिड़ियों का चहचहाना

देह

देह एक बूंद ओस की नमी
……पाकर ठंडाना चाहते है सब
देह एक कोयल की कूक
……सुनना चाहते हैं सब
देह एक आवारा बादल
……छांह पाना चाहते हैं सब
देह एक तपता सूरज
……झुलसते हैं सब
देह एक क्षितिज
…..लांधना चाहते हैं सब
देह एक मरीचिका
……भटकते हैं सब
देह ऐक विचार
…….पढना चाहते हैं सब
देह ऐक सम्मान
…….पाना चाहते हैं सब
देह एक वियावान
…….भटकना चाहते हैं सब
देह एक रात
……जीना चाहते हैं सब
और
देह ऐक दवानल
……फंस कर दम तोडते है सब

तुम्म्हारी आँच

जीवन की
सर्द और स्याह रातों में
भटकते भटकते आ पहुँचा था
तुम तक

उष्णता की चाह में
और तुम्हारी ऑच
जैसे धीरे धीरे समा रही है मुझमें
ठीक उसी तरह

जैसे धीमी ऑच पर
रखा हुआ दूध
जो समय के साथ
हौले हौले अपने अंदर
समेट लेता है सारे ताप को

लेकिन उबलता नहीं
बस भाप बनकर
उडता रहता है तब तक
जब तक अपना
मृदुल अस्थित्व मिटा नहीं देता

और बन जाता है
ठेास और कठोर
कुछ ऐसे ही सिमट रहा हूँ मैं
लगातार हर पल
शायद ठोस और कठोर

होने तक या
उसके भी बाद
ऑच से जलकर
राख होने तक ?

परिभाषा 

शब्दों के जाल में
अर्थो को तलाशता हुआ इंसान
जब थककर
निढाल हो जाता है
सृजन का वही क्षण
कविता कहलाता है।

कटे हाथों वाली लाश

मै ठिठक कर रुक गया

मंदिर के आहाते में

आज फिर एक लाश मिली थी

तमाशबीन

लाश के चारों ओर खडे थे

नजदीक ही कुछ

पुलिसवाले भी खडे थे

उत्सुकतावश मै भी शामिल हो गया तमाशवीनों में

देखा कटे हाथों वाली वह लाश

औधे मुॅह पडी थी

नजदीक ही उसके कटे हाथ पडे थे

जिसकी मुट्ठियॉ

अभी तक भिंची थी

न मालूम क्रोध से अथवा विरोध से

भीड का एक आदमी

चिल्ला चिल्लाकर बता रहा था

आज दूसरा दिन हुआ है

मंदिर को खुले और

हिंसा फिर होने लगी है

मुझे उसकी बात पर हॅसी सी आयी

तभी पुलिसवाले ने मेरी तरफ निगाह घुमायी

और बोला मिस्टर! तुम जानते थे इसे?

मैने कहा- जी नहीं,

तभी दूसरे ने लाश को

पलट दिया

लाश का चेहरा देखते ही मै सकपका गया

खून से लिपटी

कटे हाथों वाली वह लाश

किसी और की नहीं

मेरी अपनी ही तो थी?

Share