अशोक तिवारी की रचनाएँ

इंसान ही था वह

सफ़दर हाश्मी के लिए

एक इंसान ही था वह
हमारे बीच
हमारी ही तरह
हँसते हुए
गुनगुनाते हुए
लगाते हुए ठहाके
धकेलते हुए आसपास की हवा को
हाथ फिराते हुए बालों में
अपनी ही अदा में
गुदगुदाते हुए पलों को
बिखेरते हुए माहौल में मुस्कराहट
गुस्सा करते हुए
हर उस बात पर
जो हो आदमीयत के खिलाफ़
भाईचारे के खिलाफ़

इंसान ही था वह
हमारे बीच
हमारी ही तरह
ठहरा हुआ था जो
एक झील की तरह
बहता हुआ मगर
ऊँचे झरने और
उद्दाम वेग से बहने वाली
नदी की तरह

पहचानते हुए
समय की नब्ज़़ को
भरते हुए मुठ्ठी में
ज़माने की तपिश
एक इंसान ही था वह
हमारे बीच
हमारी ही तरह
संस्कृति के कितने ही मायनों को
करके गया अभिव्यक्त
नुक्कड़-नुक्कड़
साफ़गोई और बेबाकीपन से
खुलेपन से जो भरता था
अपनी मज़बूत बाँहों में
हमख्याल और हर ज़रुरतमंद को
एक इंसान ही की तरह

एक इंसान ही था वह
हमारे बीच
हमारी ही तरह
देखता हुआ
एक सर्वहारा के सपने को
महसूस करते हुए
पीड़ित की पीड़ा को
अपने अन्दर कहीं गहरे में
अपने सपनों में
रखते हुए एक बुनियाद मजबूती के साथ
थपथपाता रहा जो निराशा के पलों में
हमारे अपने कंधे
अपनत्व और सादगी के साथ
और करता रहा प्रेरित
बदने को आगे ही आगे
विषम परिस्थितियों में भी …….

एक इंसान ही था वह
जो चला गया एकाएक
एक इंसान की तरह
जूझते हुए
विषैली हवा से
व्यवस्था से
अपने आपसे
भर गया जो
जीने की चाहत और मकसद
हमारे दिलों में
अपने जाने की कीमत पर

वो जो चला गया
लाखों दिलों में
पैदा करते हुए जज्बा
उस सपने का
जो इंसान को बने रहने दे बस इंसान
एक नायक था हमारे वक़्त का
एक इंसान ही था वह
हमारी ही तरह
हमारे आसपास

खबर मिली है

खबर मिली है ड्योड़ी पर माँ
रोज़ सुबह ताका करती है
स्कूल जा रहे बच्चों को
दफ़्तर आते-जाते सबको
याद किया करती है उनमें अपने बच्चे
चले गए जो पेट की ख़ातिर दूर-दूर तक

ख़बर मिली है
माँ की आँखें दर्द कर रहीं
गाढ़ी झिल्ली छाई रेटिना के ऊपर
दिखना उसका ख़त्म हो रहा धीरे-धीरे

ख़बर मिली है
माँ की टाँगें बोझ नहीं सह पातीं हैं अब
रह-रहकर दबवाती तलवे
चलते-चलते रुक जाती है
जगह-जगह पर
पर चलती जाती, चलती जाती
कहीं पहुँचने….

ख़बर मिली है
माँ अक्सर सोचा करती है बीती बातें
या आने वाले कल की बातें
कुछ सुख की, कुछ दुःख की बातें
रोज़ देर से सोती माँ जगती है जल्दी
और जागकर देखा करती उन सपनों को
देख नहीं पाती है जिनको गहरी नींद में

ख़बर मिली है
सहेज रही है बिखरे अपने सारे सपने
ख़बर मिली है
अरमानों को लेकर माँ बेचैन नहीं है

ख़बर मिली है
माँ को एक उम्मीद बँधी है
बचपन को जीने की फिर से
ख़बर मिली है
एक बार फिर माँ से सुनते ढेरों बच्चे
किस्स- कहानी
हुआ करते हैं जिसमें
शेखचिल्ली और कोरिया जैसे पात्र
करते हैं जो मेहनत दुनियाभर की
कहे जाते हैं पर सरेआम बेवकूफ़ फिर भी

ख़बर मिली है
इतने पर भी करती है माँ
घर का पूरा काम
मशगूल रहती है सुबह-शाम
भरते हुए
शेखचिल्ली और कोरिया जैसों के सत्व को अपने अंदर
बेवकूफ़ बनने-बनाने के लिए नहीं
पाने के लिए अपने हक को
मेहनत के बल पर

ख़बर मिली है
माँ का चेहरा खिला-खिला है
उसे नाज़ है
अपने उस होने का
जो वो हो पाई
और कोसा करती है
उस न होने को, जो वो नहीं हो पाई

ख़बर मिली है
मेरी माँ अब
गाँव गढ़ी में सबकी माँ है

चलो

चलो …..
चलो कि चलना ही जीवन है
चलो कि चलना ही हासिल है
ज़िन्दगी मैं जुड़ते जा रहे पलों का
चलो कि चलना है मंज़िल पर पहुँचने की
एक हसीन हसरत
चलो कि चलना इस बात का है
पुख्ता सबूत
कि ठहरे नहीं हो तुम

चलो कि चलना लक्षण है उस संस्कृति का
ठहर नहीं सकती जो
उस तहज़ीब का
जो दी जाती है एक बच्चे को
बग़ैर किसी ऊँच-नीच के
चलना है बहती हुई हवा को
अपने होने का अहसास कराना

चलो कि चलना खोलना है
बंद होते जा रहे खिड़की के सभी झरोखे
चलना है उन्हीं झरोखों से झाँकती रौशनी को अपने अंदर भरना

चलो कि चलना
बनना है नदी के उस पानी कि तरह
बहता जाता है जो निश्छलता के साथ
अपने उद्दाम वेग से
पहाड़ों के बीच

चलो कि चलना इस बात की है निशानी
कि हारे नहीं हो तुम
उठ सकते हो बार-बार गिरकर भी

चलो कि चलना जूझना है
उलटी बह रही हवाओं से
और मोड़ना है अपनी दिशा में
अपनी बाजुओं की ताक़त के बल पर

कैसे बँध जाऊँ ब्याह में 

माँ मेरी बतला दे मुझको
कैसे बँध जाऊँ ब्याह में
कैसे जोड़ूँ दिल के रिश्ते
बैठूँ कैसे अनजानी छाँव में

बहुत दूर का रास्ता मेरा
नहीं चाहती सिर्फ़ अकेले
कौन साथ में होगा मेरे
कितने होंगे मेले-ठेले

कहाँ में देखूँ किसको देखूँ
कैसे देखूँ कब तक देखूँ
देखूँ देखूँ या न देखूँ
और देखकर भी न देखूँ

आसपास मदेखूँ कुछ तो
घात लगाए बैठे हैं
मिले जो मौका एक उन्हें
जो आँख टिकाए बैठे हैं

एक और नदी है मेरे भीतर
जो बहती ही जाती है
बहते बहते जो दुनिया की
हरसंभव प्यास बुझाती है

ऐसे में बहना मेरा माँ
क्या कुछ कहकर जाता है
रिश्तों की बुनियाद से मेरा
मानवता का नाता है

एक बात मैं कहती हूँ माँ
लोभ नहीं न लालच ही
बहना मेरा धर्म करम
और सच्चाई के साथ रही

साफ-साफ बहना मुझको माँ
आता भी और भाता भी
उजला-उजला पानी सा मन
मेरे मन में गाता भी

बंधन के धागों को मैंने
जाना भी, पहचाना भी
बाँध की ताक़त देखी मैंने
सीमाओं को माना भी

मेरी प्यारी माँ तू मुझको
एक बात तो बतला दे
कौन है अपना कौन पराया
राह मुझे तू दिखला दे

कितने दुखों को सहके तूने
पाला हमको जीवनभर
घर-घर करके पूरे जीवन
मिली न फिर भी सही डगर

अपना कहके हक जमाते
ऐसों को में खूब जानती
खून के रिश्ते खून से बनते
नहीं मानती, नहीं मानती

बेहतर है आऊँ मैं काम
खेतों और खलिहानों में
सागर से मिलने की चाहत
रही है सिर्फ़ ख़यालों में

एक नदी हूँ बहना मुझको
पर क्या मिलन अवश्यंभावी
रिश्तों को ढोने से अच्छा
ढूँढूँ बेहतर भविष्य की चाबी

एक आवाज़

रात के सपने में
सुनाई देती है
एक लड़की की आवाज़
फ़ोन पर
इन दिनों अक्सर
‘कौन है’ के जवाब में
‘मैं हूँ’ सुनते ही
खँगालने लगता हूँ
भूली बिसरी आवाज़ों को
विस्मृत चेहरों पर
फिराने लगता हूँ उँगलियाँ

खुरदरे स्पर्शों से
घायल होकर
लौटता हूँ वापस जब
झंकृत करती है मेरी संवेदनाओं को
उसकी आवाज़

मुझे लगता है
वो आवाज़ आ रही है
मीलों गहरी सुरंग से
आवाज़ में छटपटाहट
मुझे वैसी ही लगती है
जैसी सालों पहले
उस लड़की के क्रंदन में थी
पाई गयी थी जो ‘अधजली’
गुसलखाने में
उस लड़की के रुदन में थी
धकेल दिया गया था जिसे
गहरे अंधेरे कुंए में
अघोषित सजा पाने के लिए
ज़िंदगीभर के लिए
ऐसे आदमी के साथ शादी करके
जो उसे कतई पसंद न था

बहुत दूर से आती हुई आवाज़
उस गुहार में कब हो जाती है तब्दील
पता ही नहीं चलता,
जो बन जाती है बहुधा
मेरी ही आवाज़ की प्रतिध्वनि

ये आवाज़
कभी बंद कमरे में
आग से जलकर मरी औरत की
आँखों से टपकने वाली पीड़ा
से मेल खाती है
तो कभी रेल की पटरियों पर
पाई गई अंग-भंग औरत के
खून के कतरों को सुखाती है
करते हुए अपने दस्तख़त
चीख़-चीखकर

उस औरत की चीख़
जो सुनने से ज़्यादा
की जा सकती है महसूस
अपने अंदर,
मेल खाती है
हमारे अंदर की
ऐसी ही अनगिनत औरतों से

रात सपने में
सुनाई देने वाली आवाज़
किसकी है ?
करता हूँ क्या
मैं ख़ुद ही डायल
सुनने के लिए बार-बार
……………………..

रचनाकाल : 14 जून, 2010

एक बहती नदी

घर के कोने कोने के साथ मेरा रिश्ता
उतना ही गहरा रहा है माँ
जितना एक बेटी का होना चाहिए
हवा में पानी और
पानी में हवा की तरह

बचपन में खेले गए छुप्पन-छिपाई में
दीवारों की ओट
बहुत बड़ा सहारा थी मेरे लिए
वही दीवारें
नागफनी की बाड़ की तरह
छाने लगती हैं मेरे चारों ओर मेरी माँ
जब तुम्हारे बदन पर चिपकी हज़ारों आँखें
मुझे तोलती हुई
मेरे अंदर की औरत को
देखने की कोशिश करती हैं
पुरातन चश्मे से
और मुझे अपने ही घर के कोने
मुँह चिढ़ाते हैं
कराने लगते हैं अजनबीपन का अहसास

औरत की रचनात्मकता
एक सवाल की तरह घेरती है मुझे

हवा में फैले गहरे काले धुएँ की घुटन
मौजूद रही है तुम्हारी धड़कनों में
जिसने बना दिया है तुम्हें
कहीं ज़्यादा गहरा और शांत
समाज की जकड़बंदी
बहती रही है तुम्हारी साँसों में
सालों-साल

सामाजिक बंधनों को तो
मैं भी मानती हूँ माँ
माँ-बेटी के रिश्ते की महक
हमसे अधिक और कौन सूँघ सकता है
हम दोनों के दिल भले ही हों अलग
धड़कते रहे हैं मगर एक साथ
हमारी साँसों की गरमाहट
रही है हमेशा एक सी
एक ही आवृत्ति के साथ
स्पंदित होते रहे हैं हमारे सुर
फिर माँ
तुम्हारा अकेले में मुझे देखना
क्यों कर देता है मुझे विचलित
क्यों मेरी छातियों की ओर
देखने लगती हैं तुम्हारी निगाहें
और मैं डर जाती हूँ
तुम्हारी पहाड़-सी आकांक्षाओं के सामने
तुम्हारे अंदर घुमड़ते सवालों को
जब में पढ़ती हूँ
मुझे लगता है
मेरा अधूरापन
छा रहा है तुम्हारे अंदर
और मैं होती जा रही हूँ
तुम्हारे सत्व से सराबोर

उम्र के इस पड़ाव में
जब मेरी उम्र
तुम्हारे हिसाब से
ढोती है बच्चों का बोझ
मेरे लिए साथी ढूँढ़ने की तुम्हारी मुहिम
तुम्हें तोड़ रही है कहीं गहरे में
मगर मैं क्या करूँ माँ
नए-नए रिश्तों की बुनावट
की कल्पना से ही सिहर जाती हूँ मैं
जहाँ मैं अपने होने न होने में
नहीं कर पाती हूँ फ़र्क

मुझे मालूम है
मैं ‘अपने’ ही घर में
हूँ चिंता का सबब
मेरे छोटे नहीं,
बड़े नहीं,
मैं हूँ …….
जो तारीख़ बदलने की बात करती हूँ
मगर बदल नहीं पाती
अपने घर के ही कुछ उसूलों को

ज़िंदगी का ठहराव ऐसे में
मेरे मन में करता है बेचैनी पैदा
जब में देखती हूँ
तुम्हारे अंदर सुलगते कोयलों को
धधक रहे हैं जो तुम्हारे कलेजे में
सुसुप्त ज्वालामुखी की तरह
तुम्हें खा रही है कोई अनजानी चिंता
धीरे-धीरे
और तुम बहाना लेकर
छेड़ देती हो ऐसा ही कोई राग
घोल देता है जो मौसम में कडुवाहट

नदी बनकर
और धाराओं के साथ बहना और जीना
मैंने तुमसे ही सीखा है
नदी होकर
एक नदी से अपनी स्वच्छंदता
क्यों छीनना चाहती हो माँ

भीड़ में खोना नहीं चाहती मैं
क्योंकि भीड़ में खोना
डुबो देना है अपने आपको
ठहरे हुए पानी में
एक नदी की आत्महत्या
कर पाओगी तुम बरदाश्त?
मैं तो बिलकुल नहीं
हरगिज़ नहीं……..!!

रचनाकाल : 12 मई, 2010

गुड़िया नहीं बोलती

बच्ची खेल रही है गुड़िया से
और परेशान है कि
गुड़िया कुछ बोल क्यों नहीं रही
सोई पड़ी है जस की तस

वो अपनी गुड़िया को रोटी खिला रही है
उसे दुलार रही है
पुचकार रही है
मनुहार रही है
रोटी को उसके मुँह में ठूँसे दे रही है
मगर गुड़िया है कि
न खिलखिला रही है
न ही झपटकर रोटी के टुकड़े को
अपने मुँह में रखने को ज़िद कर रही है
न उसकी तरह
मम्मी से रूठते हुए
अपनी बात को मनवाने की ज़िद कर रही है

पाँच साल की बच्ची समझ नहीं पा रही है
कि सुबह से भूखी गुड़िया
खा क्यों नहीं रही है
क्यों है नाराज़
कि कुछ बोल ही नहीं रही
ग़ुस्सा है तो चीख़ क्यों नहीं रही
दर्द है अगर तो रो क्यों नहीं रही
वो कभी थपकियों से उसे सहलाती है
तो कभी उसे उठाकर कंधे से लगाती है
मगर गुड़िया है कि
बगैर किसी हलचल
निस्तेज पड़ी है बच्ची कि बाँहों में

और बच्ची है
परेशान कि
गुड़िया क्यों नाराज़ है.

रचनाकाल : 17 अप्रैल 2011

उजाला

उजाला

उजाला भरो अपने अंदर
कि अँधेरा दूर हो
अपनी नज़रों से
और हम देख पाएं
बहुत सी अनचीन्ही चीज़ों को
उन्हें भी,
जो दिखाई तो देती हैं
मगर होती नहीं वैसी

समाने दो उजाले को अपने रेशे-रेशे में
कि अँधेरे की काली घुप चादर
फैला न सके मन में ज़हरीले अहसास
और दीवारों की बाड़
पैदा न कर सके ख़ूबसूरत वादियों में
ख़ूनी लडाई का जूनून
ज़मीन के उन टुकड़ों के सवाल पर
जो आपने पैदा ही नहीं किए
काँटों भरे रास्तों पर
बचाया जा सके इंसानियत को हर सिम्त
कि भरो उजाला अपने अंदर
इस क़दर कि नज़र न आएं सिर्फ़ हम ही
देख पाएं दूसरों को
और पहचान पाएं अच्छे से

खोलो एक खिड़की अपने अंदर
उजाले के लिए
कि उजाला ही रहे उजाले के लिए
बना न दे रौशनी की भयंकर चकाचोंध
हमें कहीं अँधा


17/04/2011

वह जो कहीं नहीं है 

वह जो कहीं नहीं है

वह जो
जीता रहा अधूरी ज़िंदगी,
वह जो
मरते-खपते
ढूढ़ता रहा
जीने का सहारा
अपनी मेहनत और
कला के बल पर
ज़िंदगीभर
कहीं नहीं है
कहीं भी नहीं है ……

उसकी कला पर लगी
मुहर में
उसके नाम का
कोई संकेत तक नहीं है

वह जो कहीं नहीं है
दूर-दूर तक
व्याप्त है मगर क़तरों-क़तरों में
रगों में बह रहे
खून की हर कोशिका में
और ऐसा है जो
लाख कोशिशों के बावजूद
निकाला नहीं जा सकता
उन यादों से
जो रहना चाहती हैं याद
इंसानियत के लिए

उन यादों को
याद रखने की कोई रिवायत
नहीं है मगर
इतिहास के किसी भी कोने में
किसी भी हर्फ़ में
नहीं है उसका कोई ज़िक्र

सरपट दौड़ती ज़िंदगी के
भागते लम्हों में
किसको फ़ुरसत है इतनी
कि झांक सके कोई
ऊंची-ऊंची भव्य इमारतों की
ईंटों के बीच
छू सके
उन निशानों को
जहां मौजूद है उसकी जिजीविषा
पत्थरों की कारीगरी में
उसके बच्चों की किलकारी
चीख़ और भूख की छाप
पत्नी की सूनी आँखों का आवेग
माँ-बाप की पथराई उम्मीद
दर्ज हैं जहां
चंद रोटी के टुकड़ों में
खरीदे गए उसके हाथ
और हुनर का दर्द

मेहनतकश की रोटी की
असल क़ीमत जाननी है
और चखना है
अगर असली स्वाद
तो चखो
उन इमारतों की किरचों को छूकर
महसूस करो
समूची इन्द्रियों से
उन सांसों की गरमाहट
जो बीत गए काम करते-करते
चिकने धरातल के भीतर
मौजूद खुरदरेपन में
समाया है जहां
पूरा का पूरा अनलिखा इतिहास
जो गढ़ा नहीं गया है
जड़ा गया है
मज़दूर के मज़बूत हाथों से
भविष्य की सीमाओं के परे
तय करो उससे पहले मगर
अपनी दृष्टि का आधार
इधर या
उधर !!

गाँव

गाँव

गाँव मेरा है, पूछूं तुमसे भाई एक ही बात
कैसे बन गया एक अजनबी ख़ुद ही रातों रात
काम मेरा पुश्तैनी था जो छूट गया तो छूट गया
बाज़ारों की होड़ में मिल गई कैसी ये सौगात
वैश्वीकरण के चलते तुमने गाँव बनाए शहर
धंधा छूटा, काम छूटा खाई मात पे मात
कहते हैं अब गाँव बन गई ये पूरी दुनिया
कहाँ गया पर गाँव मेरा वो, थामे था जो हाथ
सोंधी मिट्टी, गाँव की ख़ुशबू मेहनतकश वे लोग
कहाँ गए, क्या हुआ उन्हें क्यों बेक़ाबू हालात
भाईचारा धर्म था जिनका, मानवता था कर्म
अपना-तेरा ऐसा फैला सिमटे अपने आप
दाने को मुहताज हो गए खाने को बेहाल
पैसे के बल पर तुमने तो ख़ूब उड़ाए माल
पूँजी का ये खेल भई अब किसको समझ न आए
अनगिन इंसानों को तुमने दिए ज़ख्म, आघात I

कावड़िए

कावड़िए

आया आया
फिर से आया
कावड़ियों का मौसम आया
खड़े हो जाओ रास्ता छोड़कर
आ न जाओ कहीं तुम बीच में
और हो जाओ कहीं
एक और अयोध्या या गोधरा के शिकार

अब किसी बलात्कारी को भी
नहीं पकड़ पाएगी पुलिस
तस्करी में फँसे हुए लोगों का
नहीं ले पाएगी कोई सुराग
और किसी भी अवमानना के लिए
नहीं होगी वो ज़िम्मेवार
क्योंकि वो जुटी है अब
सरकारी ड्यूटी पर
जुटी है उन सबकी मेहमानी पर
थे कल तक जो ब्लैक लिस्ट में
स्पेशल व्यवस्था बनाई जा रही है
जगह-जगह
उनके आराम के लिए
ताकि भरे जा सकें कुछ हद तक
कावड़ से छिले उनके कंधों के घाव

आख़िरकार वो ढोकर ला रहे हैं कावड़
कोसों पैदल
कर रहे हैं वो
एक राष्ट्रवादी काम
ऐसा काम जिसे आयोजित करते हैं
देख के संवैधानिक सदन के
संवैधानिक सदस्य
असंवैधानिकता के लिए
और करते हैं विदा
कावड़ियों के समूह के समूह
इस तरह
जा रहे हों जैसे वो
देश की सीमा पर लड़ने और शहीद होने
अपने जुनून में
अपने नशे में

शिव के नए अवतार
नए संस्करण में
अपनी जटाओं में
धारण किए हुए गंगा
निकल पड़े हैं संस्कृति के रक्षार्थ
आस्था के कपोल कल्पित संसार के लिए

बिखेरे जा रहे हैं जो बीज
उगेंगे अपने नए संस्करण के साथ
मज़बूती से कल
जब इसी दुनिया को मान लिया जाएगा
सबसे प्रमाणिक इतिहास

आस्था का सवाल
आमजनों की रोज़मर्रा की
ज़िंदगी से जुड़ जाता है जब
बन जाता है सबसे ज़्यादा ख़तरनाक तब
और इस्तेमाल कर सकते हैं आप
मासूम से मासूम चेहरों को
अपने किसी भी मक़सद के लिए

आज जब छटे हुए बदमाशों
और नशेड़ियों की पूरी बिरादरी भी
बनाए हुए है
अपने कंधों पर
कावड़ के दोनों पल्लों का बेलेंस
रखी होती हैं जिनमें
छोटी-छोटी शीशियां
गंगाजल से भरी हुई
नफ़रत के संकल्प में डूबी
हम भूल रहे हैं गंगा की संस्कृति का
मूल अध्याय
जो एक नदी है
जो तोड़ने नहीं, जोड़ने की हिमायत करती है

इससे पहले कि वो आकर
उघाड़ें तुम्हारा बदन
और दे दें पूरा प्रमाण अपने शिवभक्त होने का तुम्हें
रफ़ा-दफ़ा हो जाओ भाई इन रास्तों से
चिन्हित कर दिए गए हैं जो उनके लिए
और सिर्फ़ ‘उनके’ लिए
इंतज़ार करो
उनके गुज़र जाने का
………………

30.10.2008

पहाड़

एक पहाड़
थामा था जिसने
समूचा जंगल
थामे हुए थे जिसने पेड़-पौधे
जीव-जंतु, तालाब, गरोखर
और नदी….
वही नदी जिसने बहना भी सीखा
उसी पहाड़ की अतल गहराइयों में जाकर
जो टकराती रही पेड़ों के हज़ारों झुरमुटों से
और बहती रही समेटते हुए
तमाम कूड़े-कबाड़ को अपने अंदर
अपने से बाहर को साफ़-सुथरा करने के लिए

एक पहाड़
जिसके सीने में बिखरी पड़ी हैं
पूरे जंगल की जड़ें
एक जंगल जहां
पेड़ अपने पेड़ होने का अहसासभर नहीं कराते
बल्कि होते हुए पेड़
भर लाते थे अपने अंदर
पहाड़ की ऊंचाई

एक पहाड़
जिसकी विशालता उसकी ऊपरी कठोरता और
खाड़-खड्डों से नहीं
उसके अंदर मौजूद उस मोम से थी
जो पिघलना भी जानता था
और जमना भी
जो घरती के ममत्व के साथ अस्तित्व में आया
उसके अंदर बहने वाली
सभी धाराओं की बारीकियों से
पहचान की जानी चाहिए
उसके क़द की
सोच की….

एक पहाड़
जो पहाड़ होने के साथ
इंकार करता रहा पहाड़ होने से
वो पहाड़
वक़्त की तलहटी में खो गया
जिसने पैदा किए
कई-कई और पहाड़
इस ज़मीन को
सुंदर और हसीन बनाने के लिए….
………..
(गुरु एवं प्रिय दोस्त ‘के.पी.’ के निधन पर)
08/11/2009

स्टेज के ऊपर दिखने वाली लड़की

स्टेज के ऊपर
दिखने वाली लड़की की
आखों की नमी
बॅंट नहीं जाती क्या
हज़ारों की संख्या में बैठे
दर्शकों की आँखों में?

उस लड़की की ऊर्जा का प्रवाह
फैलता नहीं चला जाता क्या
कण-कण में
विकिरण की तरह पूरे वातावरण में?
उसका आर्तनाद और चीत्कार
फैल नहीं जाता क्या
चारों ओर की हवा में
और हवा की नमी के साथ घुल नहीं जाता क्या
आपके अपने भीतर?
उसका स्पंदन, उसकी धड़कन
पैदा नहीं करती क्या
आपके दिलों में समान आवृत्ति
जिसकी प्रतिक्रिया में
भिंच जाते हैं आपके जैसे
हज़ारों होठ
फड़कने लगती हैं भुजाएं
तनने लगते हैं जबड़े
गर्म होने लगती हैं कनपटी की शिराएं

भिची हुई आपकी मुट्ठियों की ताक़त
स्टेज पर दिखने वाली लड़की
आपसे लेती है
और भर लेती हैं उसे अपने बदन में ………

स्टेज पर दिखने वाली लड़की
आपसे संवाद करती है…….
ऐसा संवाद…..
जिसमें कभी आप बोलते ही जाते हैं
और कभी सिर्फ़ सुनते हैं
और सुनते ही जाते हैं…….
और वो लड़की
जो स्टेज पर एक लड़की ही की तरह होती है
सिर्फ़ लड़की नहीं
आपके लिए ज़िंदगी की पर्तों की
दास्तानगोई करने वाली
एक ज़ुबान बन जाती है
जो बिखेर देती है ऊसर ज़मीन पर
हरियाली का सपना
सपना सिर्फ़ सपने के लिए नहीं
हक़ीकत में बदलने के लिए भी…..

15/01/2008
(पीना बाउश की प्रस्तुति को देखकर। बेहतरीन अदाकारा पीना बाउश की पिछले दिनों आकस्मिक मौत हो गई।)
15/01/2008

नीम गांव वाली 

उस औरत का चेहरा
कैसा था आख़िर……
लंबा-सा
सुता हुआ
पिचके हुए गाल
लंबी जीभ
पीले दांतों के बीच
बुदबुदाती हुई
उसके अंदर की एक और औरत
देती हुई
दुनिया के बच्चों को
आशीष, गाली या
मिला जुला सा कुछ

कैसा था उस औरत का चेहरा
सूखी हड्डियों पर जैसे मुरझाए मांस का सा लोथ
पटसन बाल
बसंत के मौसम में टूटे हुए
पीले पत्तों की तरह
क़दमों को जमा जमाकर
उस औरत का चलना
उसकी भंगिमा को
कर देता था तब्दील एक ऐसे रूप में
जा रही हो जैसे कोई हिरनी
अपने बच्चों की हिफ़ाजत में
आती हो जो खदेड़कर किसी ताक़तवर जानवर को

एक सवाल टॅकता है
मेरे जे़हन में बार बार
कैसी होती उसकी भावभंगिमा
छत पर दौड़ते और कूदते मेरे बच्चों को देखकर
कोसती क्या आज भी
होती अगर अब वो
अपने इसी घर में
बनवाया था जिसे उसके आदमी ने
एक आस और उम्मीद के साथ
रह नहीं पाया था जिसमें मगर वो एक भी दिन
और चला गया था ज़िंदगीभर के लिए उसे
अकेला और बेसहारा छोड़कर
बेऔलाद होने के दंश के साथ
देवर जेठ की घुड़कियों और गालियों के बीच

उस औरत का चेहरा कैसा था
कि पहचान सकता था जिसे कोई भी
मिला हो जो उससे एक बारगी
कभी भी, कहीं भी
मेले की भीड़ के बीच में भी
ख़रीदते हुए
सिंघाड़े या केले की गहर,
धनिया या हरी मिर्च
या सुबह शाम
खेत में जाते हुए फ़ारिग होने के लिए
लोटा हाथ में उठाए
बुदबुदाते हुए मन ही मन
बनाते हुए हाथों को विभिन्न मुद्राओं में
जूझ रही हो जैसे
वो अनंत समय से
किन्हीं अनसुलझे अनगिनत सवालों से
और कर रही हो शिकवा- शिकायत
किसी उससे
बैठा था जो उसके अपने अंदर
और सुन सकता था
उसकी कही अनकही बातों को
या अपने आपसे यूं ही……..

वो औरत
नहीं पुकारी गई जो कभी भी
किसी एक ख़ास नाम से
पुकारा गया कभी उसे घर
तो कभी घेर के नाम से
कभी गांव तो
कभी शहर के नाम से
फूटे वाली
नीम गांव वाली
फाटक वाली
कच्चे वाली या
मरे हुए आदमी की रांड़
विशेष दर्जों से नवाजा गया कई बार उसे
नाम में क्या रखा था उस औरत के लिए
जिसका चेहरा
बिल्कुल सपाट बन गया है
मेरी आंखों के पुराने नैगेटिव में आज
और जिसकी झुर्रियों की धुंधली परत
अब मेरी विस्मृतियां का हिस्सा है सिर्फ़
इस हद तक कि मैं
अपने आपसे ही पूछता हूं कि
कैसा था उस औरत का चेहरा आख़िर
और सुनता रहता हूं मैं
लंबे वक़्त तक
इसी प्रश्न का अनुनाद बार-बार!!
………………………..
17/9/2009

मैं एक पेड़ हूं 

मैं एक पेड़ हूं….
सालों साल से खड़ा हूं यहां
ज़मीन में गहरी धँसी हैं मेरी जड़ें

विस्थापित होने के डर से अभिशप्त
मैं एक पेड़ हूं….

वो आए
अपने मीठे, मगर क्रूर इरादों के साथ
वो आए
अपनी पूरी ताक़त और
संवैधानिक धाराओं की कमज़ोरियों के साथ
पूरे लाव-लश्कर के साथ
कमेटी की गाड़ियों
और दस्ते के साथ
हथियारों को लेकर हाथ
मुझ बेजान और असहाय के ऊपर हमला करने

अपनी इंसानियत का ओढ़े हुए खोल
उन्होंने किया भरपूर हमला
मेरी ख़ुशहाली पर
मेरी फलती-फूलती शाखों को
करते रहे कुल्हाड़ी के हवाले
छीजते रहे मेरा बदन
मेरी हँसी की खनखनाहट
जो कर देती थी उनके सीनों को चाक
मेरे लहलहाते सपने उनकी आंखों में
दहशत का तूफ़ान किए खड़े थे,
कर रहे थे
उनके सपनों को चकनाचूर
और बन रहे थे उनकी परेशानी का सबब

मैं एक पेड़ हूं….
और देखता रहा अपने आपको कटते
पीड़ा को दबाते हुए
भुजाओं को अपने से अलग होते
महसूस करता रहा
और तमाशबीनों की तरह
जो सोच रहे थे
‘क्या फ़र्क़ पड़ता है’
फ़र्क़ पड़ना संवेदना से जुड़ा है
क्या वे सचमुच नहीं जानते कि
मेरी सांसों का हिसाब इंसान से बहुत फ़र्क़ नहीं है
और देखते रहे दूर से ही
मेरे उजड़ते सपनों का मंजर
मेरे बदन पर चलने वाली
हर कुल्हाड़ी पर
मनाते रहे अपने मन में ख़ैर
होते रहे आल्हादित

मैं एक पेड़ हूं
नाम कुकरेजा
खुराक़ मेरी बहुत कम
मगर बढ़ता है मेरा क़द
किसी और पेड़ के दुगने से भी अधिक
मेरा ये गुण
बन गया शायद मेरा अवगुण
और हो गया
क्रूर आक्रांताओं(इंसानों) का मैं शिकार

मगर मैं बाबजूद इस सबके
कहूंगा यही कि
ठूंठ ही सही….
मैं एक पेड़ हूं
एक भरपूर पेड़…
पूरी जीवटता के साथ
मुझे इन आतताइयों से नहीं डरना है
पेड़ होने के नाते
वही करूंगा मैं, जो मुझे करना है….
मैं फिर बढूंगा
और दूंगा उन्हें फिर-फिर चुनौती!
……………………..
(उस पेड़ के लिए जो मेरे बेटे प्रयास की उम्र का था और जिसे वन विभाग के छंटाई के आदेश के चलते पूरा छील दिया गया और ठूंठ बनाकर छोड़ दिया.)
13/04/2011

सपने 

रेल की पटरियों के किनारे
दौड़ती हुई सड़कों के जालों पर बिछे
फ्लाईओवर्स के नीचे
डिवाइडर्स के पतले थडों पर
गहरी नींद में सोते हुए
आदमी की चलती सांसों को गिनिए
उसके सपनों में दाख़िल हुइए
और गोल रोटी के गोले को
गोल-गोल घूमता देखिए चारों तरफ़
सुनिए,
उसकी धौंकनी के सुरों को
जहां वे सब तराने तह दर तह रिकॉर्ड हैं
जो उनकी माँओं ने उनके लिए गाए थे
अपने लाड़ले की हर आहट के लिए
बिछाए थे पलक-पावड़े
धोती के नर्म कोने की गर्म फूँक से
सेंका था जिन्हें
अपने कल से बेख़बर
टंके होते थे जिनके चेहरों पर
भविष्य में पूरे होने वाले सपने
और उम्मीद

गाड़ा किया था ख़ून को जिसने
अपनी इन सांसों के लिए
थकान से चूर
भीड़ में ग़ुम
उन्हीं नौनिहालों की
बेतरतीब गर्म सांसें
धोंकनी की तरह चलती हैं
महानगर की सड़कों पर
सुबह से शाम तक……
सोते हुए भी …..
अपने सपनों में भी
खींच रही होती हैं जो भारी बोझ
अधभरे या ख़ाली पेट
पोंछते हुए टपकता पसीना
चढ़ा रही होती हैं जो
बार-बार
रिक्शे की घिसी हुई चैन

भीड़ और शोर के बीच
सोता हुआ वह आदमी
निपट अकेला होता है…
अपने सपने में भी
दुनिया से बेख़बर
वैसे ही जैसे
बेख़बर होती है ख़ुद दुनिया उससे
……………….
01/05/2011

बीत रहा है समय 

बीत रहा है समय
ख़ाली हो रहे हैं मर्तबान
यादों के
सूख रही है जहां मन में उपजी हरी दूब
फूल रहे हैं मन में हज़ारों गुलमोहर वहीं पर

मन करता है
स्विच दबाकर अपनी यादों का
लौटता चला जाऊं
लम्हा-लम्हा पीछे
साल दर साल गुज़रते हुए
चप्पा-चप्पा नगरों का
पार करते हुए सड़कों के जालों को
खेत खलियानों की मटमैली, धूसर यादों को लेकर
पहुंच जाऊं उस चुलबुली लड़की के पास
सहला सकती है जो वक़्त को
हथेलियों की चोट से
आती है कई शक्लों में मेरे पास …..
कभी उस संबल के रूप में
जो संभलता ही नहीं
फिसलता ही जाता है
तो कभी ‘कर्मनाशा की हार’ की
विधवा के रूप में
जहां वो
दिखाई देती है सफ़ेद कपड़ों में लिपटी
तुलसी चौरे के पास
जहां रिमझिम बूंदों का स्पर्श
औरत होने के
हज़ारों सवालों के साथ
मन के सुलगते कोनों में
करता है अनगिनत चोट
दर्ज करता है
तुलसी चौरे के इर्द-गिर्द लिपटे कलावों का
लिजलिजापन
व्यवस्था के नारों में लिपटा मोह
आस्था और विश्वास के गठजोड़ तक जाता है
आसान नहीं है तोड़ पाना इन्हें
मगर तोड़नी तो होंगी ये हदें
हमें ही,
हमसे ही होगी शुरूआत,
पीछे से नहीं
आना होगा आगे से

कुछ बेड़ियों को तोड़ने की फ़िक्र में
बना रहे हैं हम
नई बेड़ियाँ अपने लिए
मन बहला रहे हैं
‘यही क्या कम है ‘
कहकर गा रहे हैं
मगर वक़्त तो बीत रहा है
फिर भी
और ख़ाली हो रहे हैं मर्तबान
यादों के उसी तरह !

05/02/2011

अक्सर 

अक्सर मेरी यादों में एक चेहरा आता है
लीक छोड़कर नई-नई जो राह बनाता है
सपनों की बुनियाद रखी थी जो सालों पहले
आज उन्हीं सपनों में कोई सेंध लगता है
गिरकर उठना, उठकर चलना, चलते ही जाना
घोर मुसीबत में भी वो जो हँसकर गाता है
काम नहीं आसान बनाना एक ऐसी दुनिया
ऊंच-नीच और शोषण का जो नाम मिटाता है
यार हक़ीक़त बात यही है बोझिल मन सारे
जोश भरो, कुछ काम करो, ये कहकर जाता है

14/07/2011

नर्तकी 

स्टेज के कोने से एक मूँछ
एनाउंसमेंट करती है
डांस के लिए ….
मसखरा अभी-अभी
शुक्रिया अदा करके गया है एक दानकर्ता का
तैयारी हो रही है अगले दृश्य की
बदले जा रहे हैं परदे
तब्दील किया जा रहा है राज-दरबार
रखा जा रहा है राजा का सिंहासन
बनाई जा रही है
दरबारियों के लिए जगह
दर्शाने के लिए न्याय का अंतर साफ़-साफ़
फ़रियादियों की जगह को रखा जा रहा है नीचा
परदे के पीछे कई परदे हैं
उन पर्दों के पीछे कई दृश्य हैं
जो आगे होने के लिए हो रहे हैं तैयार
मगर परदे का आगे का भाग
ख़ाली है नाच के लिए
वहां अभी मुस्कराते चेहरे के साथ
एक नर्तकी आएगी
ठुमके लगाएगी
मनचलों का दिल बहलाएगी
नौटंकी के मालिक की जेब भरवाएगी
मेकअप से लिपी-पुती ये नर्तकी
औरत होने के साथ-साथ माँ है
जो चिपकाए बैठी है नन्हें बच्चे को
अपनी छाती से विंग्स में
दूध पिलाने के वास्ते …..
उसके नाम का एनाउंसमेंट
हो रहा है बार-बार
लाउडस्पीकर पर
मगर बच्चा है कि छोड़ ही नहीं रहा है
माँ से अलग होने की संवेदना
बच्चे को विचलित करती है
फ़िल्मी धुन के साथ गाने के बोल
हो गए है और तेज़
“……हम तुम चोरी से
बँधे एक डोरी से ……”
…………..
और डोरी में बँधी हुई
एक माँ
न चाहते हुए भी
छाती से छुड़ाकर अपनी जान को
मुंह मोड़ती है
बच्चा है कि चुप ही नहीं होता
माँ की गंध और कौन है जो जान पाएगा
तेज़ होती जाती है जैसे-जैसे
बच्चे के रोने की चीख़
छाती में उमड़-उमड़ने लगता है
उसके अंदर का ज्वार
नसों में बहता हुआ गर्म अहसास
समा जाता है उसकी पोर-पोर में
हक़ीकतन एक माँ
धीरे-धीरे
रूपांतरित होती जाती है कलाकार में
उतर जाती है जो स्टेज पर
अभिनय के लिए
एक माँ पर भारी होते कलाकार
के थिरकते क़दम
उठाते हैं कई सवाल
कि कितने अभिनय निभा रही है वो एक साथ …
घर के कोने-कोने में बिखरी
एक पत्नी…एक बहू
एक माँ
एक कलाकार
तालियों की गड़गड़ाहट और
मनचलों की छिछोरी टिप्पणियों में
ढूँढ़ते हुए अपने रिश्तों को
एक औरत
महसूस करती है अपने को
ठगी-सी, अधूरी
और बिकी-बिकी-सी
चोरी-चोरी नहीं खुलेआम
एक डोरी से नहीं
लाखों-लाख डोरियों से बँधी हुई
कि हो न जाय कहीं वो
टस से मस….

और मूँछ है कि पसरी पड़ी है
मसंद के सहारे
अगले एनाउंसमेंट के लिए …!!
(आठवें दशक में लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज, इगलास के अहाते में होने वाली नौटंकी की कुछ यादें)

04 /08 /2011

नींव की ईंट 

नींव की ईंट नींव में होती है
दिखाई नहीं देती
इसलिए कि अदृश्य होना
अपनी उपस्थिति नहीं करता है दर्ज
नींव की ईंट रहती है
अनुपस्थित पूरे परिदृश्य से
सँभाले हुए पूरा बोझ
नहीं की जाती है
चर्चा में शरीक़
हो जाती है शुमार
ग़ैर ज़रूरी चीज़ों में

इमारतों के झुंड के झुंड
नहा रहे होते हैं जब
रोशनी के समंदर में
ले रहे होते हैं मज़े क़ामयाबी के
ख़ूबसूरत उपादानों के साथ
पड़ी होती है
नींव की ईंट
अँधेरे की गुमनामी में चुपचाप

नींव की ईंट
कहने में नहीं
करने में यक़ीन रखती है
करने की ख़ातिर
मरने में यक़ीन रखती है
मज़बूती के साथ
वह ख़ुद ही करती है फ़ख़्र
अपने दायित्वों पर
ख़ुद ही कर्तव्यबोध भी

नींव की ईंट
क्या सचमुच दिखाई नहीं देती
या कर दी जाती है नज़रंदाज
महत्वाकांक्षाओं के चलते!!
02/02/2012

काम वाली

क्या है नाम उसका
काम करती है जो तुम्हारे घर में आकर
रोज सुबह से लेकर शाम तक
छोटे से लेकर बड़े काम
मोटे से लेकर पतले काम
झाड़ू बुहारी से लेकर
बर्तन और पोंछे का काम
क्या है उसका नाम
– काम वाली
उसका असली नाम
– काम वाली
प्रचलित नाम
– काम वाली
काम वाली, काम वाली
ही पुकारी जाती है काम वाली
उसके नाम की ज़रूरत
किसी को नहीं
काम की ज़रूरत सबको है
और इसीलिए पुकारी जाती है वो – काम वाली
ऐसी काम वाली
जो अपने घर के काम को
छोड़कर आती बिना किए पूरा – अधूरा
अपने घर के अधूरेपन को
पूरा करती है काम वाली
आपके घरो में आकर
आपके घर में आकर सांस लेती है
आपके सपने के साथ
उसे सजाती है
सॅवारती है
क़रीने से रखती है
हर बेजान वस्तु को,
जुटी रहती है वो
करने के लिए
तुम्हारा हर काम
तुम्हारी इच्छा के मुताबिक
अपने बच्चों की भूख
को मिटती देखती है जो
आपकी रसोई में काम करते हुए

सूरज को उगता – डूबता हुआ देखती है
वो भागते हुए
कभी घर से, कभी घर को
यांत्रिक गति के साथ चलते है
उसके शरीर के हर अवयब
खट खटा खट खट चलती है
उसके जीवन लय
काम के लिए
काम के साथ…….
काम करते हुए भी वो सोचती है
काम के बारे में
खानों मे बॅटी हुई उसकी ज़िंदगी में
भरे पड़े हैं ढेरों काम
काम में बीबीजी हैं
काम में बाबूजी हैं
काम में माताजी हैं
काम में पति है, बच्चे हैं
मां है, बाप है, भाई है
रिश्तों की पूरी फ़ेहरिश्त है

काम है जो चिपका हुआ है
उसके माथे पर मोटा मोटा
यही है जिसे वो सोच रही होती है
आपके घर आने और घर से जाते वक़्त

आप हैरान न हों
बहुत संभव है आप
उसे उसके असली नाम से पुकारें जब भी
वो न दे कोई रेस्पोंस
क्योंकि काम के लिए समर्पित वो औरत
न चाहते हुए भी बन जाती है वही
जो नहीं चाहती वो बनना
सिर्फ़ काम वाली।
…………….
01/05/2009

चींटियाँ

चढ़ रही हैं लगातार
दीवार पर बार-बार
आ रही हैं
जा रहीं हैं
कतारबद्ध चींटियाँ

ढो रही हैं अपने घर का साजो-सामान
एक नए घर में
आशा और उम्मीद के साथ
गाती हुई
ज़िन्दगी का खूबसूरत तराना
इकट्ठी करती हुई
ज़रुरत की छोटी से छोटी
और बड़ी से बड़ी चीज़
बनाती हुई गति और लय को
अपनी जिंदगी का एक खास हिस्सा

अपने घर से
विस्थापित होती हुई चींटियाँ
चल देती हैं नए ठिए कि तलाश में
किसी भी शिकवा शिकायत के बग़ैर

पुराने घर की दीवारों से गले लगकर
रोती हैं चींटियाँ
बहाती नहीं हैं पर आँसू
दिखाती नहीं हैं आक्रोश
प्रकट नहीं करती हैं गुस्सा
जानती हैं फिर भी प्रतिरोध की ताक़त

मेहनत की क्यारी में खिले फूलों की सुगँध
सूँघती हैं चींटियाँ
सीखा नहीं है उन्होंने
हताश होना
ठहरना कभी
मुश्किल से मुश्किल समय में भी
उखड़ती नहीं है उनकी साँस
मसल दिए जाने के बाद भी
उठ खड़ी होती हैं चींटियाँ
लगे होते हैं उनके पैरों में डायनमो
चलते रहने के लिए
बढ़ने के लिए आगे ही आगे
पढ़ती हुई हर ख़तरे को
जूझती हैं चींटियाँ

जानती हैं वो आज़माना
मुठ्ठियों की ताक़त को एक साथ!!

रचनाकाल : 5 सितम्बर, 2003

गढ़ी

मेरे गाँव में एक गढ़ी है,
सालों से वीरान जो पड़ी है
गढ़ी में एक पोखर है
पोखर में कीचड़ है
कीचड़ में मलवा है
मलवे में कूड़ा है
कूड़े में खिलौने हैं
खिलौनों में आवाज़ें हैं
आवाज़ों में सिसकियाँ हैं
सिसकियों में तरंगे हैं
तरंगों में चुंबक है
चुम्बक में खिचाव है

खिंचाव से खिंचा आता है
हज़ारों कंठो का सामूहिक क्रंदन
खिचे आते हैं उनके मन
जो नहीं गए थे कहीं
दबे पड़े हैं मलबे में आज भी
बिखरा पड़ा है टूटते रिश्तों का गणित
चूल्हे की कालिमा में
बिखरी चूड़ियों की लालिमा में
देहरी के पत्थर पर पटके गए माथे के निशानों में
ओटों पर काढ़े गए कील-कांटे
चित्रकारी
लिखा सूद का हिसाब
दस्तावेज़ हैं
उनके मन की व्यथा को व्यंजित करते हुए
बुझ गए थे जो
छप्पन साल पहले
पाकिस्तान जाते माँ-बाप
और उनके बच्चों की
किलकारियों और सिसकियों के बीच !!

रचनाकाल : 24 सितम्बर, 2003

सपने में गाँधी 

आज रात सपने में गाँधी घूम रहे थे इधर-उधर
परेशान और त्रस्त भाव से खोज रहे थे सही डगर
इस धरती की घूल में मिलकर सीखा पाठ ख़ुदाई का
दर्द किया महसूस उन्होंने खून बहा जो भाई का
बात बढ़ेगी और बढ़ेगी मिटा नहीं ये बैर अगर
आज रात सपने में गाँधी ………….

धू-धू, धू-धू, लपटें उठतीं भस्म हुआ सब घर आँगन
खून ख़राबा मारकाट में, बुझा-बुझा सा रहता मन
डूब रहा तिनके का सहारा दिखती नहीं है राह मगर
आज रात सपने में गाँधी …………

आसमान में धुआं उठता, हो-हल्ला है सड़कों पर
हिंदू राष्ट्र की एक झलक से धरती उसकी खून से तर
त्रिशूलों को घोंप-घोंपकर बरपा रहे हैं ख़ूब कहर
आज रात सपने में गाँधी …………

कौन जला है, कौन मिटा है और कौन सा है बाकी
कौन पहनता है खद्दर और कौन पहनता है खाकी
दिखा रहे हैं वर्दी, निक्कर मिलकर अपना नाच ज़बर
आज रात सपने में गाँधी …………

तेरी धरती पर गाँधी ‘वे’ भीख मांगते जान की
फ़िक्र उन्हें ज़िंदा रहने की नहीं फ़िक्र पहचान की
बँटवारे के बाद आज फिर चीख़ रहा है नगर-नगर
आज रात सपने में गाँधी …………

गाँधी उठकर राजघाट से चले वहीं फिर घर की ओर
बंद देखकर अपना आश्रम रोए बहुत लगाकर ज़ोर
क्या होगा अब मानवता का रहा अगर इनका ये सफ़र
आज रात सपने में गाँधी …………

फ़ासीवादी ख़तरे घर-घर सांकल अब खटकाते हैं
घर के भीतर माँ की कोख़ के बच्चे भी मिमियाते हैं
हिटलर के चेलों को देखो फैलाते हैं ख़ूब ज़हर
आज रात सपने में गाँधी घूम रहे थे इधर-उधर
परेशान और त्रस्त भाव से खोज रहे थे सही डगर

रचनाकाल : 18 अप्रैल, 2002

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