अशोक द्विवेदी की रचनाएँ

बसन्त फागुन

धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन के रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के मन, मोजरियाइल अउर फसलन के देह गदराइल बन हँसल नदिया के कछार हँसल दिन तनी, अउर तनी उजराइल कुनमुनाइल मिजाज मौसम के दिन फिरल खेत केम खरिहानन के! मन के गुदरा दे, ऊ नजर लउकल या नया साल के असर लउकल जइसे उभरल पियास अँखियन में वइसे मुस्कान ऊ रसगर लउकल ओने आइलबसन्त बन ठन के एने फागुन खनन खनन खनके! उनसे का बइठि के बतियाइबि हम पहिले रूसब आ फिर मनाइबि हम रात के पहिला पहर अइहे जब, कुछ ना बोलब, महटियाइबि हम आजु नन्हको चएन से सूति गइल नीन आइल उड़त निनर बन के! रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के!

चइत के छन्द 

कोइलरि कूहे अधिरतिया आ बैरी चइत कुहुँकावे. रहि रहि पाछिल बतिया इ बैरी चइत उसुकावे. कुरुई-भरल-रस-महुवा, निझाइल कसक-कचोटत मन मेहराइल उपरा से कतना सँसतिया, आ बैरी चइत कुहुँकावे फगुवा गइल दिन कटिया के आइल अइले ना उहो, खरिहनवा छिलाइल कब मिली उहाँ फुरसतिया, इ बैरी चइत कुहुँकावे मुसवा-बिलइया, चुहनिया अँगनवा खड़के जे कुछ कही, चिहुँकेला मनवाँ धक् धक् धड़केले छतिया, आ बैरी चइत कुहुँकावे उनुका नोकरिया क सुख बाटे एतना संग कहाँ रहिहें, देखलको बा सपना हमनी क इहे किसमतिया, इ बैरी चइत कुहुँकावे

चिट्ठी 

हम तोहके कइसे लिखीं? कइसे लिखीं कि बहुते खुश बानी इहाँ हम होके बिलग तोहन लोग से… हर घड़ी छेदत-बीन्हत रहेला इहवों हमके गाँव इयाद परावत रहेला हर घड़ी ओइजा के बेबस छछनत जिन्दगी. कल कहाँ बा बेकल मन के एहूजा? हम ई सब लिखि के नइखीं चाहत मन दुखावल तोहार. रुपया आ रौनक का एह शहर में देखले बानी हमहुँ एगो सुबिधा, न जिनिगी जिये के सपना. सपना त पतई पर टँगाइल ओस के बूने नु हऽ घाम लागल ना कि उड़ि गइल. फेरु शहर त शहर हऽ इहवाँ अंत ले ना हो पावेला आदमी के इतमीनान. साँच मानऽ हमार परतीत करऽ भुलाइल नइखीं हम कुछऊ ना त, होत फजीरे तहरा पातर होठन पर थिरके वाली किरिनिन के लाली ना घर ना दुआर ना खेत ना बधार हमके इयाद बा आजो ऊ कटहरी चंपा के बरबस खींचे वाली गंध जवन पछिला साल हुलसि के खिल गइल रहे आ तनिकी बर बोल दिहल पर मिलल रहे अधरसा अमरुद अस न्यौतत तहार मीठ झिड़की ऊ बनावटी खीसि में आँख तरेरल तोहार भला कइसे भोर परी? बाकिर का करीं? जवना खातिर घर छूटल ऊ गरीबी, ऊ बेबसी ऊ तहरा पुरान खाँखर होत साड़ी से झाँकत मसकल कुर्ती हमके भर नीन सूते ना देलस आजु ले! मन मार के केहूँ तरे जीयल भला कवनो जीयल ह? कूल्ही उछाहे मरि जाव जब जब जियला के हँसी गायब हो जाय धीरे धीरे ओठन से ना ना, हम माई आ बाबूजी लेखा नइखीं जीयल चाहत, मार के मन, एही से झोंकि दिहनी हम अपना के अनजान शहर का एह दहकत भरसाईं में. अब कम से कम एगो भरोसा आ एगो सपना त बा ढंग से जिनिगी जीये के हम लड़त त बानी ओकरा खातिर इहां. घबड़इहऽ जिन तू तनिको इहाँ ठहर ठेकाना हो गइल बा आ बहुत कुछ नीक जबून के ज्ञान आज सिरिफ कुछ रुपिया भेजि के मनिआर्डर ना होई सुब्बुर हमके कपड़ो लत्ता से ना, हम त देखल चाहत बानी तोहन लोग के एतना खुशहाल जेमे ना होखे अइसन कुछ के कमी कि मन मार के जिये के परे… एही इन्तजाम में बानी. मत होइहऽ तनिको उदास तूँ मन के थिर रखिहऽ माई बाबू के दीहऽ ढाढस आ विश्वास, हम जल्दिये लौटब गाँव हो सकी त एही फगुआ ले!

उनुका से कहि दऽ

रसे-रसे महुवा फुलाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। रस देखि भँवरा लोभाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। पुलुई चढ़ल फिरु उतरल फगुनवा कुहुँकि-कुहुँकि रे बेकल मनवाँ सपनो में चएन न आइल हो रामा। उनुका से कहि दऽ। टहटह खिलल आ झरल अँजोरिया झुरुकलि कइ राति पुरुबी बयरिया अँखिया अउर सपनाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। चइते लेसाइल बिरह अगिनिया सेजिया पऽ लोटेले सुधि के नगिनिया रतिया लगेले बिखियाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ।

रस ना बुझाइल 

गते-गते दिनवाँ ओराइल हो रामा रस ना बुझाइल। अँतरा क कोइलर कुहुँकि न पावे महुवा न आपन नेहिया लुटावे अमवो टिकोरवा न आइल हो रामा रस ना बुझाइल। चिउँ -चिऊँ चिकरेले, गुदिया चिरइया हाँफे बछरुआ त हँकरेले गइया पनिया पताले लुकाइल हो रामा रस ना बुझाइल। रूसल मनवाँ के,झुठिया मनावन सीतल रतियो में दहके बिछावन सपना, शहर उधियाइल हो रामा रस ना बुझाइल। तनी अउरी पवला के,हिरिस न छूटल भितरा से कवनो किरिनियो न फूटल सँइचल थतियो लुटाइल हो रामा रस ना बुझाइल।

हम तोहरा, तूँ हमरा मन में 

जब देखीं भितरी दरपन में तूँ लउकेलऽ, हमरा जगहा हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! नीमन बाउर कुछ न बुझाला रीझत खीझत मन अझुराला होके बेकल, खिंचि खिंचि जाई हम तोहरा लसोर चितवन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! खोलत आँखि तहार सिरिजना तहरे सुमिरन, तहरे सपना सूतल जागत तहरे धुन बा जस पपिहा पिउ पीउ रटन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! जरत दिया से निकसे जोती सीपी भीतर बिकसे मोती तोहसे बिछुड़ि कहाँ जाइब हम ठौर मिली तोहरे बाँहन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! जीयत जागत जूझत जिनिगी कब चढ़ि जाई डाढ़ि के फुनुगी पता न हमके आगम आपन कब उड़ि जाइब नील गगन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में !

बसन्त फागुन

धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन के रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के मन, मोजरियाइल अउर फसलन के देह गदराइल बन हँसल नदिया के कछार हँसल दिन तनी, अउर तनी उजराइल कुनमुनाइल मिजाज मौसम के दिन फिरल खेत केम खरिहानन के! मन के गुदरा दे, ऊ नजर लउकल या नया साल के असर लउकल जइसे उभरल पियास अँखियन में वइसे मुस्कान ऊ रसगर लउकल ओने आइलबसन्त बन ठन के एने फागुन खनन खनन खनके! उनसे का बइठि के बतियाइबि हम पहिले रूसब आ फिर मनाइबि हम रात के पहिला पहर अइहे जब, कुछ ना बोलब, महटियाइबि हम आजु नन्हको चएन से सूति गइल नीन आइल उड़त निनर बन के! रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के!

चइत के छन्द 

कोइलरि कूहे अधिरतिया आ बैरी चइत कुहुँकावे. रहि रहि पाछिल बतिया इ बैरी चइत उसुकावे. कुरुई-भरल-रस-महुवा, निझाइल कसक-कचोटत मन मेहराइल उपरा से कतना सँसतिया, आ बैरी चइत कुहुँकावे फगुवा गइल दिन कटिया के आइल अइले ना उहो, खरिहनवा छिलाइल कब मिली उहाँ फुरसतिया, इ बैरी चइत कुहुँकावे मुसवा-बिलइया, चुहनिया अँगनवा खड़के जे कुछ कही, चिहुँकेला मनवाँ धक् धक् धड़केले छतिया, आ बैरी चइत कुहुँकावे उनुका नोकरिया क सुख बाटे एतना संग कहाँ रहिहें, देखलको बा सपना हमनी क इहे किसमतिया, इ बैरी चइत कुहुँकावे

चिट्ठी 

हम तोहके कइसे लिखीं? कइसे लिखीं कि बहुते खुश बानी इहाँ हम होके बिलग तोहन लोग से… हर घड़ी छेदत-बीन्हत रहेला इहवों हमके गाँव इयाद परावत रहेला हर घड़ी ओइजा के बेबस छछनत जिन्दगी. कल कहाँ बा बेकल मन के एहूजा? हम ई सब लिखि के नइखीं चाहत मन दुखावल तोहार. रुपया आ रौनक का एह शहर में देखले बानी हमहुँ एगो सुबिधा, न जिनिगी जिये के सपना. सपना त पतई पर टँगाइल ओस के बूने नु हऽ घाम लागल ना कि उड़ि गइल. फेरु शहर त शहर हऽ इहवाँ अंत ले ना हो पावेला आदमी के इतमीनान. साँच मानऽ हमार परतीत करऽ भुलाइल नइखीं हम कुछऊ ना त, होत फजीरे तहरा पातर होठन पर थिरके वाली किरिनिन के लाली ना घर ना दुआर ना खेत ना बधार हमके इयाद बा आजो ऊ कटहरी चंपा के बरबस खींचे वाली गंध जवन पछिला साल हुलसि के खिल गइल रहे आ तनिकी बर बोल दिहल पर मिलल रहे अधरसा अमरुद अस न्यौतत तहार मीठ झिड़की ऊ बनावटी खीसि में आँख तरेरल तोहार भला कइसे भोर परी? बाकिर का करीं? जवना खातिर घर छूटल ऊ गरीबी, ऊ बेबसी ऊ तहरा पुरान खाँखर होत साड़ी से झाँकत मसकल कुर्ती हमके भर नीन सूते ना देलस आजु ले! मन मार के केहूँ तरे जीयल भला कवनो जीयल ह? कूल्ही उछाहे मरि जाव जब जब जियला के हँसी गायब हो जाय धीरे धीरे ओठन से ना ना, हम माई आ बाबूजी लेखा नइखीं जीयल चाहत, मार के मन, एही से झोंकि दिहनी हम अपना के अनजान शहर का एह दहकत भरसाईं में. अब कम से कम एगो भरोसा आ एगो सपना त बा ढंग से जिनिगी जीये के हम लड़त त बानी ओकरा खातिर इहां. घबड़इहऽ जिन तू तनिको इहाँ ठहर ठेकाना हो गइल बा आ बहुत कुछ नीक जबून के ज्ञान आज सिरिफ कुछ रुपिया भेजि के मनिआर्डर ना होई सुब्बुर हमके कपड़ो लत्ता से ना, हम त देखल चाहत बानी तोहन लोग के एतना खुशहाल जेमे ना होखे अइसन कुछ के कमी कि मन मार के जिये के परे… एही इन्तजाम में बानी. मत होइहऽ तनिको उदास तूँ मन के थिर रखिहऽ माई बाबू के दीहऽ ढाढस आ विश्वास, हम जल्दिये लौटब गाँव हो सकी त एही फगुआ ले!

उनुका से कहि दऽ

रसे-रसे महुवा फुलाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। रस देखि भँवरा लोभाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। पुलुई चढ़ल फिरु उतरल फगुनवा कुहुँकि-कुहुँकि रे बेकल मनवाँ सपनो में चएन न आइल हो रामा। उनुका से कहि दऽ। टहटह खिलल आ झरल अँजोरिया झुरुकलि कइ राति पुरुबी बयरिया अँखिया अउर सपनाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ। चइते लेसाइल बिरह अगिनिया सेजिया पऽ लोटेले सुधि के नगिनिया रतिया लगेले बिखियाइल हो रामा उनुका से कहि दऽ।

रस ना बुझाइल 

गते-गते दिनवाँ ओराइल हो रामा रस ना बुझाइल। अँतरा क कोइलर कुहुँकि न पावे महुवा न आपन नेहिया लुटावे अमवो टिकोरवा न आइल हो रामा रस ना बुझाइल। चिउँ -चिऊँ चिकरेले, गुदिया चिरइया हाँफे बछरुआ त हँकरेले गइया पनिया पताले लुकाइल हो रामा रस ना बुझाइल। रूसल मनवाँ के,झुठिया मनावन सीतल रतियो में दहके बिछावन सपना, शहर उधियाइल हो रामा रस ना बुझाइल। तनी अउरी पवला के,हिरिस न छूटल भितरा से कवनो किरिनियो न फूटल सँइचल थतियो लुटाइल हो रामा रस ना बुझाइल।

हम तोहरा, तूँ हमरा मन में 

जब देखीं भितरी दरपन में तूँ लउकेलऽ, हमरा जगहा हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! नीमन बाउर कुछ न बुझाला रीझत खीझत मन अझुराला होके बेकल, खिंचि खिंचि जाई हम तोहरा लसोर चितवन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! खोलत आँखि तहार सिरिजना तहरे सुमिरन, तहरे सपना सूतल जागत तहरे धुन बा जस पपिहा पिउ पीउ रटन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! जरत दिया से निकसे जोती सीपी भीतर बिकसे मोती तोहसे बिछुड़ि कहाँ जाइब हम ठौर मिली तोहरे बाँहन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में ! जीयत जागत जूझत जिनिगी कब चढ़ि जाई डाढ़ि के फुनुगी पता न हमके आगम आपन कब उड़ि जाइब नील गगन में ! हम तोहरा, तूँ हमरा मन में !

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