अशोक वाजपेयी की रचनाएँ

अपनी आसन्नप्रसवा माँ के लिए / काँच के टुकड़े 

काँच के आसमानी टुकड़े
और उन पर बिछलती सूर्य की करुणा
तुम उन सबको सहेज लेती हो
क्योंकि तुम्हारी अपनी खिड़की के
आठों काँच सुरक्षित हैं
और सूर्य की करूणा
तुम्हारे मुँडेरों भी
रोज बरस जाती है।

अपनी आसन्नप्रसवा माँ के लिए / जीवित जल

तुम ऋतुओं को पसंद करती हो
और आकाश में
किसी-न-किसी की प्रतीक्षा करती हो –
तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं
तुम्हारे कितने जीवित जल
राहें घेरते ही जा रहे हैं।
औऱ तुम हो कि फिर खड़ी हो
अलसाई, धूप-तपा मुख लिए
एक नए झरने का कलरव सुनतीं
– एक घाटी की पूरी हरी गरिमा के साथ!

अपनी आसन्नप्रसवा माँ के लिए / जन्मकथा 

तुम्हारी आँखों में नई आँखों के छोटे-छोटे दृश्य हैं,
तुम्हारे कंधों पर नए कंधों का
हल्का-सा दबाव है –
तुम्हारे होंठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है
और तुम्हारी अंगुलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं
माँ, मेरी माँ,
तुम कितनी बार स्वयं से ही उग जाती हो
और माँ, मेरी जन्मकथा कितनी ताज़ी
और अभी-अभी की है!

(1960)

थोड़ा-सा

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी–

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता–

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता

वही थोड़ा-सा आदमी–
जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण

वही थोड़ा-सा आदमी–
अगर बच सका तो
वही बचेगा।

टोकनी

यकायक पता चला कि टोकनी नहीं है
पहले होती थी
जिसमें कई दुख और
हरी-भरी सब्ज़ियाँ रखा करते थे
अब नहीं है…
दुख रखने की जगहें
धीरे-धीरे कम हो रही हैं ।

छाता

छाते से बाहर ढेर सारी धूप थी
छाता-भर धूप सिर पर आने से रुक गई थी
तेज़ हवा को छाता
अपने-भर रोक पाता था
बारिश में इतने सारे छाते थे
कि लगता था कि लोग घर बैठे हैं
और छाते ही सड़क पर चल रहे हैं
अगर धूप, तेज़ हवा और बारिश न हो
तो किसी को याद नहीं रहता
कि छाते कहाँ दुबके पड़े हैं

जूते

जूते वहीं थे
उनमें पैर नहीं थे
बीच-बीच में उनमें फफूंद लग जाता था
क्योंकि कोई पहनता नहीं था
निरुपयोग से वे कुछ सख़्त भी पड़ गए थे,
उनके तलों में धूल या कीचड़ नहीं लगा था
उन्हें कोई हटाता नहीं था
क्योंकि वे दिवंगत पिता के थे
फिर एक दिन वो बिला गए,
शायद अँधेरे में मौक़ा पाकर
वे ख़ुद ही अंत की ओर चले गए

पत्ती

जितना भर हो सकती थी
उतना भर हो गई पत्ती
उससे अधिक हो पाना उसके बस में न था
न ही वृक्ष के बस में
जितना काँपी वह पत्ती
उससे अधिक काँप सकती थी
यह उसके बस में था
होने और काँपने के बीच
हिलगी हुई वह एक पत्ती थी

पूर्वजों की अस्थियों में

हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-

हम उठाते हैं एक शब्द
और किसी पिछली शताब्दी का वाक्य-विन्यास
विचलित होता है,
हम खोलते हैं द्वार
और आवाज़ गूँजती है एक प्राचीन घर में कहीं-

हम वनस्पतियों की अभेद्य छाँह में रहते हैं
कीड़ों की तरह

हम अपने बच्चों को
छोड़ जाते हैं पूर्वजों के पास
काम पर जाने के पहले

हम उठाते हैं टोकनियों पर
बोझ और समय
हम रुखी-सुखी खा और ठंडा पानी पीकर
चल पड़ते हैं,
अनंत की राह पर
और धीरे-धीरे दृश्य में
ओझल हो जाते हैं
कि कोई देखे तो कह नहीं पायेगा
कि अभी कुछ देर पहले
हम थे

हम अपने पूर्वजों की अस्थियों में रहते हैं-

समय से अनुरोध 

समय, मुझे सिखाओ
कैसे भर जाता है घाव?-पर
एक अदृश्य फाँस दुखती रहती है
जीवन-भर|

समय, मुझे बताओ
कैसे जब सब भूल चुके होंगे
रोज़मर्रा के जीवन-व्यापार में
मैं याद रख सकूँ
और दूसरों से बेहतर न महसूस करूँ|

समय, मुझे सुझाओ
कैसे मैं अपनी रोशनी बचाए रखूँ
तेल चुक जाने के बाद भी
ताकि वह लड़का
उधार लाई महँगी किताब एक रात में ही पूरी पढ़ सके|

समय, मुझे सुनाओ वह कहानी
जब व्यर्थ पड़ चुके हों शब्द,
अस्वीकार किया जा चुका हो सच,
और बाक़ि न बची हो जूझने की शक्ति
तब भी किसी ने छोड़ा न हो प्रेम,
तजी न हो आसक्ति,
झुठलाया न हो अपना मोह|

समय, सुनाओ उसकी गाथा
जो अन्त तक बिना झुके
बिना गिड़गिड़ाए या लड़खड़ाए,
बिना थके और हारे, बिना संगी-साथी,
बिना अपनी यातना को सबके लिए गाए,
अपने अन्त की ओर चला गया|

समय, अँधेरे में हाथ थामने,
सुनसान में गुनगुनाहट भरने,
सहारा देने, धीरज बँधाने
अडिग रहने, साथ चलने और लड़ने का
कोई भूला-बिसरा पुराना गीत तुम्हें याद हो
तो समय, गाओ
ताकि यह समय,
यह अँधेरा,
यह भारी असह्य समय कटे!

विदा

तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार|

तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में|

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास|

तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे|

अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी 

खरगोश अँधेरे में
धीरे-धीरे कुतर रहे हैं पृथ्वी ।

पृथ्वी को ढोकर
धीरे-धीरे ले जा रही हैं चींटियाँ ।

अपने डंक पर साधे हुए पृथ्वी को
आगे बढ़ते जा रहे हैं बिच्छू ।

एक अधपके अमरूद की तरह
तोड़कर पृथ्वी को
हाथ में लिये है
मेरी बेटी ।

अँधेरे और उजाले में
सदियों से
अपना ठौर खोज रही है पृथ्वी

(रचनाकालः1985)

बच्चे एक दिन 

बच्चे
अंतरिक्ष में
एक दिन निकलेंगे
अपनी धुन में,
और बीनकर ले आयेंगे
अधखाये फलों और
रकम-रकम के पत्थरों की तरह
कुछ तारों को ।

आकाश को पुरानी चांदनी की तरह
अपने कंधों पर ढोकर
अपने खेल के लिए
उठा ले आयेंगे बच्चे
एक दिन ।

बच्चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे
और छुड़ा ले आयेंगे
सब पुरखों को
वापस पृथ्वी पर,
और फिर आँखें फाड़े
विस्मय से सुनते रहेंगे
एक अनन्त कहानी
सदियों तक ।

बच्चे एक दिन……

(रचनाकालः1986)

सड़क पर एक आदमी

वह जा रहा है
सड़क पर
एक आदमी
अपनी जेब से निकालकर बीड़ी सुलगाता हुआ
धूप में–
इतिहास के अंधेरे
चिड़ियों के शोर
पेड़ों में बिखरे हरेपन से बेख़बर
वह आदमी …

बिजली के तारों पर बैठे पक्षी
उसे देखते हैं या नहीं – कहना मुश्किल है
हालांकि हवा उसकी बीड़ी के धुएं को
उड़ाकर ले जा रही है जहां भी वह ले जा सकती है ….

वह आदमी
सड़क पर जा रहा है
अपनी ज़िंदगी का दुख–सुख लिए
और ऐसे जैसे कि उसके ऐसे जाने पर
किसी को फ़र्क नहीं पड़ता
और कोई नहीं देखता उसे
न देवता¸ न आकाश और न ही
संसार की चिंता करने वाले लोग

वह आदमी जा रहा है
जैसे शब्दकोष से
एक शब्द जा रहा है
लोप की ओर ….

और यह कविता न ही उसका जाना रोक सकती है
और न ही उसका इस तरह नामहीन
ओझल होना ……

कल जब शब्द नहीं होगा
और न ही यह आदमी
तब थोड़ी–सी जगह होगी
खाली–सी
पर अनदेखी
और एक और आदमी
उसे रौंदता हुआ चला जाएगा।

पथहारा वक्तव्य 

हमें पता था
कि खाली हाथ और टूटे हथियार लिए
शिविर में लौटना होगा:
यह भी कि हम जैसे लोग
कभी जीत नहीं पाए-
वे या तो हारते हैं
या खेत रहते हैं-
हम सिर्फ बचे हुए हैं
इस शर्म से कि हमने चुप्पी नहीं साधी,
कि हमने मोर्चा सम्हालने से पहले या हारने के बाद
न तो समर्पण किया, न समझौता:
हम लड़े, हारे और बचे भर हैं!
यह कोई वीरगाथा नहीं है:
इतिहास विजय की कथाएं कहता है,
उसमें प्रतिरोध और पराजय के लिए जगह नहीं होती।
लोग हमारी मूढ़ता पर हंसते हैं-
हमेशा की तरह
वे विजेताओं के जुलूस में
उत्साह से शामिल हैं-
हम भी इस भ्रम से मुक्त होने की कोशिश में हैं
कि हमने अलग से कोई साहस दिखाया:
हम तो कविता और अंत:करण के पाले में रहे
जो आदिकाल से युद्धरत हैं, रहेंगे!
हम पथहारे हैं
पर पथ हमसे कहीं आगे जाता है।

सिर्फ शब्दों से नहीं

सिर्फ शब्दों से नहीं,
बिना छुए उसे छूकर,
बिना चूमे उसे चूमकर
बिना घेरे उसे बाँहों में घेरकर,
दूर से उसे पँखुरी-पँखुरी खोलते हुए
बिना देखे उसे दृश्य करते हुए
मैंने उससे कहा।

चीख

यह बिल्कुल मुमकिन था
कि अपने को बिना जोखिम में डाले
कर दूँ इनकार
उस चीख से,
जैसे आम हड़ताल के दिनों में
मरघिल्ला बाबू, छुट्टी की दरख्वास्त भेजकर
बना रहना चाहता है वफादार
दोनों तरफ।
अँधेरा था
इमारत की उस काई-भीगी दीवार पर,
कुछ ठंडक-सी भी
और मेरी चाहत की कोशिश से सटकर
खड़ी थी वह बेवकूफ-सी लड़की।

थोड़ा दमखम होता
तो मैं शायद चाट सकता था
अपनी कुत्ता-जीभ से
उसका गदगदा पका हुआ शरीर।
आखिर मैं अफसर था,
मेरी जेब में रुपिया था, चालाकी थी,
संविधान की गारंटी थी।
मेरी बीवी इकलौते बेटे के साथ बाहर थी
और मेरे चपरासी हड़ताल पर।

चाहत और हिम्मत के बीच
थोड़ा-सा शर्मनाक फासला था
बल्कि एक लिजलिजी-सी दरार
जिसमें वह लड़की गप्प से बिला गई।
अब सवाल यह है कि चीख का क्या हुआ?
क्या होना था? वह सदियों पहले
आदमी की थी
जिसे अपमानित होने पर
चीखने की फुरसत थी।

गाढ़े अँधेरे में

इस गाढ़े अँधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ-साफ नजर आता है :
हत्यारों का बढ़ता हुआ हुजूम,
उनकी खूँख्वार आँखें,
उसके तेज धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अँधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आँखों को अँधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ नजर आ रहा है।
यह अजब अँधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढ़े अँधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अँधेरा समय रोशन भी होता है?

रचना

कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
— हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले।

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा धूप में चिड़ियों का स्पन्दन है,
हरी पत्तियों का नीरव उजला गान है,
प्रतीक्षा
दरवाज़े पर दस्तक के अनसुने रहने पर
छोड़े गए शब्द हैं –

फिर घर 

माँ को कैसे पता चलेगा
इतने बरसों बाद
हम फिर उसके घर आए हैं?

कुछ पल उसको अचरज होगा
चेहरे पर की धूल-कलुष से विभ्रम भी –
फिर पहचानेगी
हर्ष-विषाद में डूबेगी-उतराएगी।

नहीं होगा उसका घर
विष्णुपदी के पास
याकि हरिचंदन और पारिजात की देवच्छाया में
वहाँ भी ले रखी होगी उसने
किराए से रहने की जगह
वैसे ही भरे-पूरे मुहल्ले और
उसके शोर-गुल में।

फिर पिता आएंगे शाम को घूमकर
और हमेशा की तरह बिना कुछ बोले
हमें देखेंगे और मेज पर लगा रात का खाना खाएंगे
और खखूरेंगे अलमारी में कोई मीठी चीज़।

हम थककर सो जाएंगे
अगले दिन जागेंगे तो ऐसे
हम एक घर छोड़कर
दूसरे घर जाएंगे
ऐसे जैसे कि वही घर हो।

(1990)

मुझे चाहिए 

मुझे चाहिए पूरी पृथ्वी
अपनी वनस्पतियों, समुद्रों
और लोगों से घिरी हुई,
एक छोटा-सा घर काफ़ी नहीं है।

एक खिड़की से मेरा काम नहीं चलेगा,
मुझे चाहिए पूरा का पूरा आकाश
अपने असंख्य नक्षत्रों और ग्रहों से भरा हुआ।

इस ज़रा सी लालटेन से नहीं मिटेगा
मेरा अंधेरा,
मुझे चाहिए
एक धधकता हुआ ज्वलंत सूर्य।

थोड़े से शब्दों से नहीं बना सकता
मैं कविता,
मुझे चाहिए समूची भाषा –
सारी हरीतिमा पृथ्वी की
सारी नीलिमा आकाश की
सारी लालिमा सूर्योदय की।

(1987)

मौत की ट्रेन में दिदिया

ट्रेन के बरामदे में खड़े लोग
बाहर की ओर देखते हैं पर न तो जल्दी ही
उतरने और न ही कहीं अंदर
बैठने की जगह पाने की उम्मीद में

बिना उम्मीद के इस सफ़र में
दिदिया भी कहीं होगी दुबकी बैठी
या ऐसे ही कोने में कहीं खड़ी
और पता नहीं उसने काका की खोज की भी या नहीं
दोनों अब इस ट्रेन में हैं जो बिना कहीं रुके
न जाने किस ओर चली जा रही है हहराती हुई

कहीं सीट पर
बरसों पहले आयी कुछ महीनों की बहन भी है
जिसका चेहरा भी याद नहीं और बड़ी सफ़ेद दाढ़ीवाले
मंत्र बुदबुदाते बाबा भी

न कोई नाम है न संख्या न रंग
सब एक दूसरे से बेख़बर हैं और बेसामान
न ट्रेन के रुकने का इंतज़ार है न किसी के आने का

नीचे घास पर आँगन में छुकछुक गाड़ी का खेल खेलते
जूनू डुल्लो दूबी चिंकू
उस ट्रेन की किसी खिड़की से
दिदिया को पता नहीं दीख पड़ते हैं या नहीं?

जबर जोत 

उसने एक पेड़ काट कर फेंक दिया
कानून की उस निष्क्रिय उपधारा की तरह
जो उस जैसों के हित के लिए बनाई गई थी।
निर्धारित पद्धति से अलग
और गिरफ़्तारी का इंतज़ार करते हुए
उसने अपने नए साहस के सरल गणित को
पहली बार पहचाना।

मुंशी और हवलदार वहीं पास थे
रौब के संवैधानिक व्याकरण से बंधे हुए
और ज़िंदगी में
बहुत बार चुप रहने के बाद अब
वह बेपरवाह एक नया शब्द बोल रहा था –
ज़ाप्ता फ़ौजदारी और राजस्व संहिता में
जिसके लिए प्रावधान न था।

ज़मीन के ज़रा-से टुकड़े को अपना मानकर
उसने नाधा हल
और पहली बार
अपने को बैलों से अलग कर लिया।

एक कील सी गढ़ती चली गई
समृद्घ पातालिक शांति में
और बड़ी बी अट्टे पर से चीख़ीं
चीख उनकी आई नीचे तक बरकरार
कानून तोड़नेवालों को पूरी मुस्तैदी से
हमने किया गिरफ़्तार।
सज़ा दी अदालत ने योग्य
आंकड़े सभी के रोज़-रोज़।
लौट गए सभी निश्चिंत
अपनी रौब-दाब की कानूनसम्मत भाषा में
जुती-अधजुती परती पर
कुछ फूट ही आया
भादों के बादलहीन आसमान के नीचे
सूखते सुनसान में
कुछ हरे शब्द मुंतज़िर पड़े रह गए
पत्थर होने को।

(1970)

गाढे अंधेरे में

इस गाढे अंधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूंख़्वार आंखें,
उसके तेज़ धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अंधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आंखों को अंधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अंधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंतःकरण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढे अंधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अंधेरा समय रोशनी भी होता है?

एक बार जो 

एक बार जो ढल जाएंगे
शायद ही फिर खिल पाएंगे।

फूल शब्द या प्रेम
पंख स्वप्न या याद
जीवन से जब छूट गए तो
फिर न वापस आएंगे।
अभी बचाने या सहेजने का अवसर है
अभी बैठकर साथ
गीत गाने का क्षण है।

अभी मृत्यु से दांव लगाकर
समय जीत जाने का क्षण है।
कुम्हलाने के बाद
झुलसकर ढह जाने के बाद
फिर बैठ पछताएंगे।

एक बार जो ढल जाएंगे
शायद ही फिर खिल पाएंगे।

वह कैसे कहेगी

वह कैसे कहेगी – हाँ!
हाँ कहेंगे
उसके अनुरक्त नेत्र
उसके उदग्र-उत्सुक कुचाग्र
उसकी देह की चकित धूप
उसके आर्द्र अधर
कहेंगे – हाँ
वह कैसे कहेगी – हाँ ?

रचनाकाल :1990

शरण्य

शरण खोजते हुए
फिर हम तुम्हारे पास ही आएँगे।

नक्षत्रों में नहीं मिलेगा कहीं ठौर –
देवता मुँह फेर लेंगे,
स्वर्ग-नरक की भीड़ में
पुरखों का नहीं चलेगा कहीं पता-ठिकाना –
अजनबी की तरह देखेंगे मित्र और पड़ौसी।

छोड़ नहीं पाएँगे पीछे अपनी यादें,
तज नहीं पाएँगे पुराने कपड़ों की तरह
अपने मोह,
किसी चबूतरे पर अवैध कुछ की तरह
चुपके से रख नहीं पाएँगे अपने शब्द,
ओझल नहीं हो पाएँगे
किसी बियाबान में –
किसी प्रार्थना की तरह गूँजकर
देवघर में
हवा में दूर बह नहीं जाएँगे।
अपने घाव, अपने चेहरे पर धूल,
अपनी आत्मा में थकान लिए,
अपनी आँखों में उम्मीद का आखिरी क़तरा
गिरने से बचाए हुए

जन्मांतर और नामहीनता की राहत
अस्वीकार कर,
हम फिर इसी मटमैले पर
वापस आएँगे।

मिले, न मिले
यहीं शरण पाएँगे …।

(1990)

पहला चुंबन

एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ
रक्ताभ, उत्सुक
काँपकर जुड़ गई
मैंने देखा :
मैं फूल खिला सकता हूँ।

(1960)

तुम जहाँ कहो

तुम जहाँ कहो
वहाँ चले जायेंगे
दूसरे मकान में
अँधेरे भविष्य में
न कहीं पहुँचने वाली ट्रेन में

अपना बसता-बोरिया उठाकर
रद्दी के बोझ सा
जीवन को पीठ पर लादकर
जहाँ कहो वहाँ चले जायेंगे
वापस इस शहर
इस चौगान, इस आँगन में नहीं आयेंगे

वहीं पक्षी बनेंगे, वृक्ष बनेंगे
फूल या शब्द बन जायेंगे
जहाँ तुम कभी खुद नहीं आना चाहोगे
वहाँ तुम कहो तो
चले जायेंगे

वहाँ भी

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे

अपनी आखिरी उड़ान भरने से पहले,
नीम की डाली पर बैठी चिड़िया के पास,
आकाशगंगा में आवारागर्दी करते किसी नक्षत्र के साथ,
अज्ञात बोली में उचारे गये मंत्र की छाया में
हम जायेंगे
स्वयं नहीं
तो इन्हीं शब्दों से-

हमें दुखी करेगा किसी प्राचीन विलाप का भटक रहा अंश,
हम आराधना करेंगे
मंदिर से निकाले गये
किसी अज्ञातकुलशील देवता की-

हम थककर बैठ जायेंगे
दूसरों के लिए की गयी
शुभकामनाओं और मनौतियों की छाँह में-

हम बिखर जायेंगे
पंखों की तरह
पंखुरियों की तरह
पंत्तियों और शब्दों की तरह-

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे।

हम न होंगे 

हम न होंगे-
जीवन और उसका अनन्त स्पन्दन,
कड़ी धूप में घास की हरीतिमा,
प्रेम और मंदिरों का पुरातन स्थापत्य,
अक्षर, भाषा और सुन्दर कविताएँ,
इत्यादि, लेकिन, फिर भी सब होंगे-
किलकारी, उदासी और गान सब-
बस हम न होंगे।

शायद कभी किसी सपने की दरार में,
किसी भी क्षण भर की याद में,
किसी शब्द की अनसुनी अन्तर्ध्वनि में-
हमारे होने की हलकी सी छाप बची होगी
बस हम न होंगे।

देवता होंगे, दुष्ट होंगे,
जंगलों को छोड़कर बस्तियों में<
मठ बनाते सन्त होंगे,
दुबकी हुई पवित्रता होगी,
रौब जमाते पाप होंगे,
फटे-चिथड़े भरे-पूरे लोग होंगे,
बस हम न होंगे।

संसार के कोई सुख-दुख कम न होंगे
बस हम न होंगे।

अकेले क्यों

हम उस यात्रा में
अकेले क्यों रह जायेंगे ?
साथ क्यों नहीं आयेगा हमारा बचपन,
उसकी आकाश-चढ़ती पतंगें
और लकड़ी के छोटे से टुकड़े को
हथियार बनाकर दिग्विजय करने का उद्यम-
मिले उपहारों और चुरायी चीजों का अटाला ?

क्यों पीछे रह जायेगा युवा होने का अद्भुत आश्चर्य,
देह का प्रज्जवलित आकाश,
कुछ भी कर सकने का शब्दों पर भरोसा,
अमरता का छद्म,
और अनन्त का पड़ोसी होने का आश्वासन?

कहाँ रह जायेगा पकी इच्छाओं का धीरज
सपने और सच के बीच बना
बेदरोदीवार का घर
और अगम्य में अपने ही पैरों की छाप से बनायी पगडण्डियाँ ?
जीवन भर के साथ-संग के बाद
हम अकेले क्यों रह जायेंगे उस यात्रा में ?
जो साथ थे वे किस यात्रा पर
किस ओर जायेंगे ?

वे नहीं आयेंगे हमारे साथ
तो क्या हम उनके साथ
जा पायेंगे ?

हम

हम उस मंदिर में जायेंगे
जो किसी ने नहीं बनाया
शताब्दियों पहले

हम प्रणाम करेंगे उस देवता को
जो थोड़ी देर पहले
हमारे साथ चाय की दूकान पर
अखबार पलट रहा था

हम जंगल के सुनसान को भंग किये बिना
झरने के पास बैठकर
सुनेगे पक्षियों-पल्लवों-पुष्पों की प्रार्थनाएँ

फिर हम धीरे-धीरे
आकाशमार्ग से वापस लौट जायेंगे
कि किसी को याद ही न रहे
कि हम थे, जंगल था
मंदिर और देवता थे
प्रणति थी-

कोई नहीं देख पायेगा
हमारा न होना
जैसे प्रार्थना में डूबी भीड़ से
लोप हो गये बच्चों को
कोई नहीं देख पाता-

सब कुछ छोड़कर नहीं

हम सब कुछ छोड़कर
यहाँ से नहीं जायेंगे

साथ ले जायेंगे
जीने की झंझट, घमासान और कचरा
सुकुमार स्मृतियाँ, दुष्टताएँ
और कभी कम न पड़नेवाले शब्दों का बोझ।

हरियाली और उजास की छबियाँ
अप्रत्याशित अनुग्रहों का आभार
और जो कुछ भी हुए पाप-पुण्य।

समय-असमय याद आनेवाली कविताएँ
बचपन के फूल-पत्तियों भरे हरे सपने
अधेड़ लालसाएँ
भीड़ में पीछे छूट गये, बच्चे का दारुण विलाप।

दूसरों की जिन्दगी में
दाखिल हुए अपने प्रेम और चाहत के हिस्सों
और अपने होने के अचरज को
साथ लिये हम जायेंगे।
हम सब कुछ छोड़कर
यहाँ से नहीं जायेंगे।

नहीं आ पायेंगे

जब एक दिन हम
सब कुछ छोड़कर चले जायेंगे
तो फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आयेंगे।

पता नहीं किस अँधेरे, किस भविष्य, किस जंगल में भटकेंगे,
किस गुफा में बसेरा करेंगे,
कहाँ क्या-कुछ बीन-माँग कर खायेंगे ?

पता नहीं कौन से शब्द और स्वप्न,
कौन सी यादें और इच्छाएँ,
कौन से कपड़े और आदतें,
यहीं पीछे छूट जायेंगे-
जाते हुए पता नहीं कौन सी शुभाशंसा
कौन सा विदागीत हम गुनगुनायेंगे ?

फिर जब लौटेंगे
तो पुरा-पड़ोस के लोग हमें
पहचान नहीं पायेंगे,
अपना घर चौबारा बिना पलक झपकाये ताकेगा,
हम जो छोड़कर गये थे
उसी में वापस नहीं आ पायेंगे।

हम यहाँ और वहाँ के बीच
कुछ देर चिथड़ों की तरह फड़फड़ायेंगे-
फिर हवा में,

गैब में
आसमान में
ओझल हो जायेंगे।

हम चले जायेंगे
फिर वापस आयेंगे
और नहीं आ पायेंगे।

वापसी 

जब हम वापस आयेंगे
तो पहचाने न जायेंगे-
हो सकता है हम लौटें
पक्षी की तरह
और तुम्हारी बगिया के किसी नीम पर बसेरा करें
फिर जब तुम्हारे बरामदे के पंखे के ऊपर
घोंसला बनायें
तो तुम्हीं हमें बार-बार बरजो-

या फिर थोड़ी सी बारिश के बाद
तुम्हारे घर के सामने छा गयी हरियाली
की तरह वापस आयें हम
जिससे राहत और सुख मिलेगा तुम्हें
पर तुम जान नहीं पाओगे कि
उस हरियाली में हम छिटके हुए हैं।

हो सकता है हम आयें
पलाश के पेड़ पर नयी छाल की तरह
जिसे फूलों की रक्तिम चकाचौंध में
तुम लक्ष्य भी नहीं कर पाओगे।

हम रूप बदलकर आयेंगे
तुम बिना रूप बदले भी
बदल जाओगे-

हालाँकि घर, बगिया, पक्षी-चिड़िया,
हरियाली-फूल-पेड़, वहीं रहेंगे
हमारी पहचान हमेशा के लिए गड्डमड्ड कर जायेगा
वह अन्त
जिसके बाद हम वापस आयेंगे
और पहचाने न जायेंगे।

एक खिड़की 

मौसम बदले, न बदले
हमें उम्मीद की
कम से कम
एक खिड़की तो खुली रखनी चाहिए।

शायद कोई गृहिणी
वसंती रेशम में लिपटी
उस वृक्ष के नीचे
किसी अज्ञात देवता के लिए
छोड़ गई हो
फूल-अक्षत और मधुरिमा।

हो सकता है
किसी बच्चे की गेंद
बजाय अनंत में खोने के
हमारे कमरे में अंदर आ गिरे और
उसे लौटाई जा सके

देवासुर-संग्राम से लहूलुहान
कोई बूढ़ा शब्द शायद
बाहर की ठंड से ठिठुरता
किसी कविता की हल्की आंच में
कुछ देर आराम करके रुकना चाहे।

हम अपने समय की हारी होड़ लगाएँ
और दाँव पर लगा दें
अपनी हिम्मत, चाहत, सब-कुछ –
पर एक खिड़की तो खुली रखनी चाहिए
ताकि हारने और गिरने के पहले
हम अंधेरे में
अपने अंतिम अस्त्र की तरह
फेंक सकें चमकती हुई
अपनी फिर भी
बची रह गई प्रार्थना।

(1990)

वर्षान्त

वर्षान्त किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी।

हरे-हलके बाँसों से
एक दिन अचानक आ
मुट्ठी से अन्तिम बादल बह जाने देगा।

फिर किसी दिन चौंक कर
देखेंगे हम :
अरे, यह खिड़की पर
इन्द्रधनुष कौन रच गया है,
किसने ये ढेर हरसिंगार ला धरे हैं?

वर्षान्त प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी या किसी की।

रचनाकाल : 1959

विदागीत 

भागते हैं,
छूटते ही जा रहे हैं पेड़
पीपल-बैर-बरगद-आम के,
बिछुड़ती पग-लोटती घासें,
खिसकती ही जा रही हैं
रेत परिचय की अनुक्षण,
दूरियों की खुल रही हैं मुट्ठियाँ!
फिर किसी आवर्त्त में बंध
कभी आऊँगा यहाँ
रेत जाने किन तहों तक धँसेगी
परिचय न चमकेगा कभी भी
चुप रहेंगे पेड़-धरती घास सब…
तब मुझे पहचान
छोड़ता हूँ आज जिसको
टेरेगा सहसा क्या
विदा का बूढ़ा-सा पाखी?

रचनाकाल : 1957

युवा जंगल

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी पत्तियों से बुलाता है।
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है
आँखों में हरी परछाइयाँ फिसलती हैं
कंधों पर एक हरा आकाश ठहरा है
होंठ मेरे एक हरे गान में काँपते हैं :
मैं नहीं हूँ और कुछ
बस एक हरा पेड़ हूँ
– हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना!
ओ युवा जंगल
बुलाते हो
आता हूँ
एक हरे बसंत में डूबा हुआ
आऽताऽ हूं…।

(1959)

कोई नहीं सुनता

कोई नहीं सुनता पुकार–
सुनती है कान खड़े कर
सीढियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।

कोई नहीं सुनता चीख़–
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाये पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख़ है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।

कोई नहीं सुनता प्रार्थना–
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुंही बच्ची,
जो आदिम अंधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौंचक है
कि उसके लिए अभी आवाज़
होने, न होने के बीच का सुनसान है।

यह विलाप नहीं है

यह विलाप नहीं है
एक नीरव प्रार्थना है
जो किसी देवता को संबोधित नहीं है :
उसमें कोई शब्द भी नहीं है कातर या व्याकुल,
वह एक दिग्हीन चीख़ है
किसी पक्षी की जो दूरदेस से लौटने पर पाता है
कि तिनका-तिनका जोड़कर बनाया उसका घोंसला
आंधी उड़ा ले गई है।

यह प्रार्थना है
जिसमें खारे पानी के क़तरे हैं
अपनी हर बूंद में बिलखते हुए
जिन्हें पता है कि उन्हें
अब अनदेखे और अकेले ही सूख जाना है।
यह सारी नमी को सोखते हुए
सब कुछ को ठूंठ में बदलने पर विलाप है।

यह ध्वस्त मंदिर के पिछवाड़े पड़े मलबे में दबी
भग्न मूर्ति के ऊपर रेंगती दीमकों की क़तार का विन्यास है :
यह चिथड़ों की तरह
तेज़ हवा में फड़फड़ाते
दुख के अवाक होते जाते शब्दों का बीहड़ संगीत है।
संसार में जहां कहीं भी आंसू झर रहा है
सिसकी या चीख़ है
वे सभी वही इस प्रार्थना की इबारत हैं।
यह विलाप नहीं है।

उसकी खिड़की खुली है

उसकी खिड़की खुली है,
उसके आँगन में गूँज रहा है दुख,
उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम।

उसकी सुन्दरता ने बनाया है घर,
उसकी चाहत ने डाला है छप्पर,
उसकी उदासी ने खींचे हैं परदे।

वह कुछ कहती नहीं है
पर उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द,
उसके इशारों में डूबते-उतराते हैं नक्षत्र,
वह आकाश में कौंधती है बिजली की तरह,
वह उगती है वृक्ष की तरह पृथ्वी पर।

वह चाय बनाती है,
रोटी सेंकती है,
सब्ज़ियाँ खरीदने बाज़ार जाती है,
वह मन्दिर में प्रार्थना बुदबुदाती है।
वह दस्तक देती है…
अन्दर जाती है,
धूप में बाल सुखाने छज्जे पर आती है :
वह जीती है
पोर-पोर पग-पग।

क्या उत्तर 

प्रेम इसका क्या उत्तर दे
कि हर रोज़ क्यों?
उसकी अवधि तो
हर पल है।

प्रेमगीत

मैं रास्ते पर झरे सफ़ेद फूल उठाता हूँ,
बेंच पर बैठे बूढ़ों को झगड़ते सुनता हूँ,
गोरी उन्नत-उरोजाओं को झपटकर जाते देखता हूँ,
नए फूलों की चकाचौंध निहारता हूँ,
ट्राम और कारों की भर्राहट के पार कुछ सुनता हूँ,
चर्च की घण्टियाँ सुनकर अपनी घड़ी में समय
मिलाता हूँ :
मैं इस तरह उसके लिए
अपना प्रेमगीत लिखता हूँ।

हलके से

वह पत्ती हवा में हलके से काँपी
हवा उस पत्ती के पास से गुज़रते हुए हलके से काँपी
एक बच्चा उधर बैठे ठण्ड से हलका सा काँपा
एक बूढ़े के लगभग मरणासन्न चेहरे पर
जीवन फिर से काँपा और शान्त हो गया ।

जीवन

तुम्हें जीने के लिए
कम से कम क्या चाहिए ?
थोड़ी सी रोटी, कुछ नमक, पानी,
एक बसेरा, एक दरी, एक चादर,
एक जोड़ी कपड़े, एक थैला,
दो चप्पलें,
कुछ शब्द, एकाध पुस्तक, कुछ गुनगुनाहट,
दो-चार फूल, मातृस्मृति,
दूर चला गया बचपन,
पास आती मृत्यु।
तुम्हें कविता करने के लिए क्या चाहिए ?
बहुत सारा जीवन, पूर्वज,
प्रेम, आँसू, अपमान,
लोगों का शोरगुल, अरण्य का एकान्त,
भाषा का घर, लय का अन्तरिक्ष,
रोटी का टुकड़ा, नमक की दली,
पानी का घड़ा
और निर्दय आकाश।

बुढ़िया 

बुढ़िया की झोली में
कुछ फल थे सूखे हुए,
कुछ दबी हुई आकांक्षाएँ,
कुछ अनकहे रह गए शब्द।
बुढ़िया के घर में अन्न न था,
न कोई बिछौना,
न कोई, किसी के होने की आवाज़।
अपनी झोली बग़ल में रखे हुए
बुढ़िया पसरी रहती है
ओसारे में
जैसे जीवन बिछा हो मृत्यु के फर्श पर।

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