अशोक शर्मा की रचनाएँ

माँ 

तुम नहीं हो बताओ तो अब कौन से घर जाऊं मैं!!
मन करता है बस जिंदा रह कर भी मर जाऊं मैं!!

तुम्हारे चले जाने के बाद सब सूना सा लगता है,
बात करने को नहीं है , मन है चुप कर जाऊं मैं!!

सबसे बातें मुलाकातें, बस बेगानी सी लगती है,
तुमे मिलने का मन हो, तो कहो कौन घर जाऊं मैं!!

कभी कभी तो हर चेहरा माँ तेरे जैसा लगता हैं ,
अब तुम जैसी ढूंढने को कहाँ और किधर जाऊं मैं!!

क्यों इतनी तुम अनजान, और निर्मोही हो गई माँ,
तेरी यादों का पावन दिया कैसे बुझा कर जाऊं मैं!!

अब तो बस एक ही मेरी, इच्छा है पूरी कर देना,
अगले जन्म मैं भी तेरा ही बेटा आ कर बन जाऊं मैं!

मंजिल दूर तो है लेकिन

मंजिल दूर तो है लेकिन, तुम हिम्मत कर के चलो!!
राह मुश्किल हों तो हों, तुम प्यार के रंग भर के चलो!!

जिंदगी तो सुलगती रहती है सदा कशमकश में मगर,
रोज़मर्रा की ज़दोजहद से तुम निकल उभर के चलो!!

कभी समझेगा कोई तेरी उलझनों के तानो-बानो को,
तुम इस ख्याल को अपने ज़ेहन से अलग कर के चलो!!

सुना करते थे के जिंदगी को जिंदादिली का नाम है,
सो तुम सीना तान के जूझो और हों निडर के चलो !!

ग़मों के अंधेरों में उम्मीदों का दिया जलाये रखना,
भूल के कल की बीती बातें, आज को बना संवर के चलो!!

कशमकश

कुछ लोग हम से अक्सर मिल कर बिछड़ जाते है!
कुछ रिश्ते बनते तो है कुछ मगर बिगड़ जाते है!!

जब मिलते है वो फ़कत रातों की नींदें उड़ा देते है,
जब बिछड़ने है तो अक्सर घर भी उजड़ जाते है !!

पास रहते है तो हमे बस अपना सा बना लेते है,
जुदा होते है तो दिल के सब चैन भी उड़ जाते है!!

शायद कभी वो जिंदगी में फिर आयें या ना आयें,
अकेले में उन की यादों के समन्दर उमड जाते है !!

‘आशु’ कितना होता है दर्द, प्यार की कशमकश में,
खुशकिस्मत है फिर भी वो जो इश्क में पड़ जाते है!!

अब

अब खुद से बात कर के घबरा जाते है हम!
दिल की बात दिल से न कह पाते है हम!!

तन्हाईयों के जंगल में खो कर अक्सर,
अपनी ही परछाई से डर जाते है हम !!

तेरे जैसा कोई नहीं हैं साथी या संगी मेरा,
जिंदगी की राहों में बस कसमसाते है हम !!

या खुदा यह इश्क का कैसा है इम्तिहा,
अकेले में जुदाई की ठोकरें खाते है हम !!

ऐ काश हमें पुकार लो इक बार भी तुम,
तेरी कसम सब छोड़ के चले आते है हम !!

‘आशु’ ख़ुशी में भी रोने का ही मन करता है,
तेरी याद में इस दिल को तडपाते है हम !!

ख्यालों में 

ख्यालों में डूब कर तेरा, चेहरा दिखाई देता है!
गमों से सुखी रेत सा, सहरा दिखाई देता है !!

तुम को भुलाने की हम ने की हजारों कोशीशें ,
दिल के हर कोने पे तेरा, पहरा दिखाई देता है!!

बदनाम तेरे प्यार में हम हो चुके ओ बेरहम ,
जिंदगी बहता पानी है पर, ठहरा दिखाई देता है!!

हर हसीन चेहरे से हमें आती है तेरी ही झलक,
जुल्फों से तेरे गैंसुओं का, लहरा दिखाई देता है!!

तुम किस दुनिया में खो कर भूल गए हो हमे,
मुझे अपना हर ज़ख़्म अब, गहरा दिखाई देता है!!

‘आशु’ हमें दुनिया दीवाना, कहती है कहती रहे,
नहीं सुन सकता ये दिल, बहरा दिखाई देता है!!

भूल जाता हूँ

तुम्हारी याद को दिल से भुलाना भूल जाता हूँ!
आदतन अपने हालात बताना भूल जाता हूँ!!

मिलती हो तो चाहता हूँ करूँ मैं बहुत सी बातें,
तुम्हारी आँखों में खो कर सुनाना भूल जाता हूँ!

तुम्हारी खिलखिलाती हंसी में अक्सर खो कर,
मैं सारी दुनिया सारा जमाना भूल जाता हूँ!

नहीं वाकिफ हूँ मुहब्बत के रस्मों और रिवाज़ो से
अपने पागल दिल को मैं समझाना भूल जाता हूँ!

क्या राज-ऐ-उल्फत है मुहब्बत करने वालों का,
मैं ‘आशु’ समझना यह अफसाना भूल जाता हूँ !

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