अशोक शाह की रचनाएँ

पहले एक घर थी धरती

मकान
सभ्यता की पूर्ण विराम की तरह
गड़ें है धरती की छाती में

आदमी जब से पैदा हुआ
आदमी के रूप में
मकान बना रहा है
कच्चे-पक्के, छोटे-बड़े
और बढ़ा रहा बोझ
लुटा रहा चैन
धरती का

पहले एक घर थी धरती
अब बदल रही मकानों में
कंक्रीट और पत्थरों के
जिसके दीवारों के भीतर
दबी कैद है उसकी
अपनेपन की समीएँ

कहते हैं
जब से सभ्यता की शुरूआत हुई
और सोचने लगा था आदमी
बनने लगी थीं दीवारें
उन दीवारों से मकान
मकानों के भीतर मकान

ये मकान अब तक बन रहे हैं
और आदमी आज भी
सभ्य हुआ जा रहा है

जंगल-राग

खड़े होकर जंगल के दिल में
एक बार फिर से देखा
संयम और अनुशासन से
मस्ती में जंगल होते देखा

शाखा -प्रशाखा स्तंभ छतनार
पीलु पल्लव पिंजुल प्रबाल
कोंपल कुसुम कली कंट पराग
फल देखा छिलका और नाल

धूनी रमाए, वर्षों एकान्त
देखे तरुवर लता निहाल
धूसर धूमिल सिन्दूरी भूरे
लाल धवल आबनूसी पीले
पियरा, कंजइ, श्‍याम, रूपहला
देखा द्रुम हरा चितकबरा

जितना जहाँ पर होता जल
कहीं मिश्रित कहीं पतझड़ वन
मध्यवन में सरई की रियासत
शुद्ध साल की भली सजावट

बढ़ा सागोन दक्षिण से आया
दोमट लाल मिट्टी को भाया
कान्हा किसली घास मैदान
अंजन को भाया ग्रीष्म का ताप

वन का होता अपना जीवट
कभी हँसता कभी रोता जीवन
ज्यों-ज्यों बढ़ता भू तापमान
जडं थिरकतीं अँखुवाते पात
लाल कोंपल करते शुरुआत
दुश्‍मन कीड़ों को दिखे न पात
खिलता पुहुप मही पर छाता
विहग-वृन्द का बजता बाजा

फूलते-फलते वसन्त-ग्रीष्मान्त
आकलन कर प्रथम बूँदपात
बिखरता बीज चहुँ ओर तमाम
पत्ते हो उठते हरे नीलाभ

हर वृक्ष की अपनी छाल निराली
मोटी-पतली रेशम दिलवाली
यौवन से चमकती गठीली छाल
कभी डोकरी-सी झूलती खाल
वन पुष्पों का अनन्य संसार
इतना कमनीय कहाँ रंग विस्तार
समस्त अरण्य सुरम्य सजावट
कहाँ होती किसी दुःख की आहट

जब जब कानन हँसता-विहँसता
कुसुम-गंध हर दिल में बसता
खट्टे मीठे कड़वे कसैले
पीले लाल बैगनी मटमैले
मटर-से छोटे, कैथा विशाल
फल बीज होते चपटे गोलाकार

पत्र किसलयों के कई आकार
सरल संष्लिष्ट और पंखदार
सपाट किनारे कभी दाँतेदार
लम्बे, पतले, गोल हस्ताकार

आओ खु़द अब चलकर भीतर
देखें वृक्ष फुदकते तीतर
छोड़ लोभ करें वन प्रवेश
देखें अपने ही मित्र विशेष

दुःख ही जीवन की कथा नहीं

जिसे चाहते पाना हरदम
क्या सच में मिलता सुख उसी से
कितना अपना है, मन से
देने जग को आये हम

मोह से ही पैदा होता दुःख
सुख से बड़ा नहीं हो सकता
लक्ष्य कितना ही हो कठिन
निश्‍चय से बड़ा नहीं हो सकता

जीवन-वृक्ष पर पनपी मृत्यु
पलती, बढ़ती रस उसका लेकर
अरे जीवन की यह संगिनी
अस्तित्व अलग नहीं रख सकती

मंजिल नहीं हम मृत्यु के
रोज़ डरा करें थर-थरकर
जीवन अनन्त के सखा-सहचर हम
बहा करें कल-कलकर

आलोकित है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
कण-कण सिंचित है अमल प्यार से
घृणा तो है तिमिर पल का
क्यों बस जाये इस जीवन में

साध्य नहीं हो सकते कभी
इस जग के अवसाद-विशाद
पुष्पित करने जीवन वृक्ष को
खाद समझ और डाल सम्भाल

क्रोध निराशा तृष्णा अहंकार
से परे और हैं अनन्य विस्तार
इस क्रम की अंतिम कड़ी मनुष्य हो
कितना हास्यास्पद यह विचार

स्थूल नहीं हो सकता स्थायी
विघटित निर्मित से होता है
सहचर हम अन्नत यात्रा के
मृत्यु के मोड़ पर कहाँ रुकना है

सृजन के अनुपम समुच्चय का
विनाश एक निश्चित परिणति है
वृत्तीय पथ पर चलते रहना है
मंज़िल एक यही सबकी है

दुःख ही जीवन की कथा नहीं
जीना कोई व्यथा नहीं
जीवन से निर्मित पूरी दुनिया
मेरी दुनिया, तेरी दुनिया

जब बोलना जरूरी हो 

माना कि मुर्गे के बाग देने से
नहीं उगता सूरज
लेकिन पौ फटने का पता तो चलता ही है
कौवे के बोलने से नहीं आते मेहमान
पर जब वे आते , बोलता है कौवा
उसकी काँव-काँव भी दे जाती है
खुशी का पैग़ाम

भू-लुण्ठित होने के पहले वृक्ष
लगाता है ज़ोरदार आवाज़
और बचा जाता है बहुत सारे पक्षियों व वृक्षों को
अकारण ही मारे जाने से

मिमियाती बकरियाँ इतना तो बता ही देती हैं
कोई कसाई गुजर रहा है बगल से
और राहें हों जातीं चौकन्नी

दीवाली के पटाखों में नहीं होता कोई संगीत
फिर भी पसंद की जाती है वह आवाज़
बरसने के पहले गरजते बादलों का शोर
कानों में पड़ता जीवन के सगुन-संगीत की तरह

मछलियाँ पकड़ने में बगुला
नहीं करता कोई आवाज़
और वे मारी जाती है बेआवाज़

बोलने से सजग होता परिवेश
फ़र्क पड़ता है अंतरिक्ष के आयतन में
जहाँ बोलना जरूरी हो, चुप्पी साध लेना
मृत्यु को प्रोत्साहित करना है
हमारी सभ्यता के विकास में
मानवीय गुणों का जन्म हुआ है
सही वक़्त पर बोलने के कारण ही

बोलना हमारे जिन्द़ा रहने का परिचायक है

मरने से पहले बोला गया एक-एक शब्द
धरती को कर जाता है आश्‍वस्त
कि सिर्फ़ भेड़ियों की माँद भर नहीं
बल्कि वह वात्सल्य की गोद भी है

जहाँ जीवन अभी जीया जाना बाकी है

कवियों, पक्षियों, मज़दूरों,
मज़बूरों, लेखकों, पत्रकारों और
पाठकों को बोलना ही चाहिये
अन्यथा उनके ही देश में उन्हें
चिपका दिया जाएगा दीवारों पर पोस्टरों की तरह

हमारे बोलने से टूटती हैं रूढ़ियाँ
मुक्त होती बन्द ऊर्जा
स्पन्दित होता संवेग
बनती है कुछ और ज़गह
आने वाली पीढ़ियों के लिए

जब और जहाँ बोलना ज़रूरी हो
हमें होना ही चाहिए पता
और हमें बोलना ही चाहिए
हम अब तक मरे तो नहीं है

पिता

तुम छोड़ जाओगे एक दिन
आजीवन दुःख रहेगा
तुम्हारे बाद सिर्फ पश्चाताप रहेगा

तुमने जिस चाक पर गढ़ा
उससे कितना बड़ा हो गया
तुम्हारा अतीव दुलार पा
राई से पहाड़ हो गया

अपने आखिरी दिनों के लिए
तुमने माचिस की डिबिया की तरह रखा सहेज
तुम्हारी अपेक्षाओं के पूर्ण होने के पहले ही
कोमल भावनाओं के बंधन तोड़ निर्भीक
निकल गया बाहर
तुम जिंदगी भर बटोरते रहे
मैं प्रकाश सदृश बिखरता रहा

याद नहीं
तुम्हारे दुलार का अनुचित लाभ उठाया
तुम्हारे काँपते अंजुलि भर जल का
अमृत की तरह किया उपयोग
तुम्हारी निर्दोष मिट्टी में
अमरबेल की तरह फैलता गया
मैं दीप बाती-सा जला
तुम स्नेह की तरह कमते गए

कोई दुःख नया नहीं रहा तुम्हारे लिए
सब आए तुम्हारे द्वार गले मिल के गए
धरती से उखड़ जाएँगे पाँव
उस दिन मेरे सिर से
अदृश्य हो जाएँ तुम्हारे हाथ
मेरी जानी-पहचानी ऋतुएँ हो जाएँगी समाप्त
तुम्हारे साथ की सुबहें
वह धूप-सी दोपहर
लालटेन की लौ भरी शाम
भोर होने के पहले का तुम्हारा
हिमालय-सा विश्वास भी
पिघल जाएगा

तुम जी खोलकर बता नहीं पाए
सबसे प्यारी अपनी इच्छा
न पूछ पाया सबब
तुम्हारी आजीवन चिंता का

आज तुम सागर हो
कल महासागर हो जाओगे
अनन्त लहरों का सिलसिला
ज़िन्दगी के साहिल पर छोड़ जाओगे

पूजा

चलो उसे पूजते हैं
जो हमारी कल्पना से गढ़ा न हो
पहनता न हो हमारी तरह साड़ी धोती या कमरबन्द
जो किसी मरे पौधे या जीव की पीड़ा से न बना हो
अर्पित करेंगे वह पुष्प जो तोड़ा गया नहीं हो
जली अगरबत्तियाँ नहीं लगायेंगे

नहीं करेंगे उपयोग उस भाषा के मंत्र
जिससे कहे गये हों मनुष्यों के लिए अपशब्द
या किसी निर्दोष को किया गया हो दण्डित
जिसके द्वारा फैलायी गयी हो हिंसा और द्वेष
नहीं करना है उस पुस्तक का पाठ जिसने
तय कर दी हो हमारे विचार की सीमाएं

चलो पूजते हैं उसको
जो हमारी पूजा से न होता हो प्रसन्न
और न पूजने से अप्रसन्न
जाने या अनजाने नहीं करेंगे उसका उपयोग
कायनात के किसी सजीव या निर्जीव के विरूद्ध
न देंगे कोई दुहांई

चलो पूजते हैं उसे जो हमसे हो अलग
और हम जानते नहीं हो उसे
अन्यथा अपनी ही पूजा का
क्या होगा औचित्य

बैगा

जीवन-सिन्धु पर उठते
विकास के हर तूफान के बाद
किनारे लुढ़के
खाली डिब्बों की तरह
आज भी वे ज़िन्दा हैं
संजोए हमारा गुणसूत्र

कृ़त्रिम सभ्यता की सरहदों से दूर
हमारी आवश्‍यकता की सीमा से
बाहर हो चुके
कितने अप्रासांगिक लगते वे

हम जब भी पहुँचते
उनके चुम्बकीय क्षेत्र में
अपनी उबाऊँ थकान में
आनन्द का सोता तलाशने
उनके खालीपन से
निःसृत होता आत्मीय मधुर संगीत
हमारे स्वार्थी ज्ञान की
गाँठें खोलता
फूलों के खिलने की
आज़ादी परोसता
तितलियों के उड़ने का
अंतरिक्ष फैलाता

राग-द्वेष से र्निर्लिस
ऊष्म प्यार से अभिसिंचित
प्राकृत संग करते अभिसरण
वे दुनिया के सबसे खूबसूरत मनुष्यों में से हैं
जिनके सहज विमल स्पर्ष से
बहती नदी महकती है आज भी
हमारी धरती के सूखे स्तन पर

जब भी भूलेगा द्विपद
अपने आदमी होने का सबूत
मिलेंगे प्रकाश-स्तम्भ सदृश
खड़े प्रमुदित बैगा वे प्रकृति-पुरुष
-0-
1.मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की अत्यंत पिछड़ी आदिम जनजाति

रिवायत 

मेरी तन्हाइओं को तानकर तुम रूठ गयी
खींचके तन्हे लम्हें करवट बदल ली

बेसमय जी रहा हॅू बिना उम्र का
तेरे दीदार हेतु उफ़क पर पलकें बिछाये

भेजा था चाँद को तुम्हारा हाल पूछने
महीना बाद लौटा है फिर अमावस होकर

तुम्हारे इंतजार में जीना ही रिवायत हो गयी है
तेरे तसव्वुर को ओढ़ता, तेरे लम्स बिछाता हूँ

मेरी नज़र टिकी है दरख़्त के उस पत्ते पर
तेरे एहसास को सम्भाले वह अबतक झड़ा नहीं है

ज़रा आहिस्ता चलो 

देखो, ज़रा आहिस्ता चलो

बज ना उठें पाज़ेब तुम्हारे पांव के
सबा गुनगुनाके के चलने लगी तो
शब जाग जायेगी तुम्हारे दीदार को
कैसे सो रही थकी, दिन की सगाई कर

ज़रा आहिस्ता चलो
परदा सरक जाएगा सहर की पेशानी से
दरीचों पर शफ़ीक़ किरनों का
देखो तो कैसा जमघट लगा है
टूट पड़ेगीं तुमसे लिपटने को

ज़रा आहिस्ता चलो
दरख़्त बयक वक़्त घूम गये तो
सब पड़ेंगे पीछे तुम्हारें, हैरान करेंगे
काल बेचैन खड़ा है इन्तज़ार में
तुम्हारी उम्र से एक दिन चुराने को

ज़रा आहिस्ता चलो
बज ना उठें पाजेब तुम्हारे पाँव के

देखा नहीं उसने पलटकर

वह आती सुबह की धूप की तरह
हल्के कदम रखकर
वक़्त गुजरता ज़िन्दगी का
मुसलसल पहर बदलकर
क्यों रहता बैचेन समन्दर
चीखता हर लहर बदल कर

उदास रात की ख़ामोशी को
तोड़ती सहर में बदलकर
मेरे चेहरे पर जड़ गया ताला
कई दिनों से देखा नहीं उसने पलटकर

बहते अश्कों का सुकून लिए वह
चली गयी मेरे गीतों के हर्फ़ बदलकर
ग़मगीन दिनों का दर्द वह भुला न पायी
आजमाया उसने है खुद को कई शहर बदलकर

जि़न्दगी है, फरमाइश तो नहीं 

बिल्कुल सम्भलकर न चलो
धरो ना फूँक फूँक के पाँव
उधर जाने से डरो न इधर आने से

दिन-रात के हर पहर से गुजरो
जरा देखों तो कोई पल अछूता
छूट गया हो कहीं

उलट-पलट के देखो हर क्षण को
उसके पीछे लगा कोई दाग तो नहीं
चिपका न हो कोई उपदेश
लिखा कोई दिशा निर्देश

घिसें विचार ही बन गये हो न राह
हमारी रिवायतो की बिछी हो न दरी
हर परदा हटाके, हर दरीचा खोलके देखो
आने दो वह सबा जो सदियों से
आ न सकी भीतर

रखो जख़्मों पर उँगली और जानो,
इंसां के दर्द का कारण क्या है
निकल पड़ो दिशाहीन अकेला
जहाँ साथ न हो तुम्हारी परछाई भी
आख़िर यह ज़िन्दगी तुम्हारी है
किसी की फ़रमाइश तो नहीं

औरत

वह विविधता है देशकाल की
परिवर्तन है जीवन की
जिसमें नहीं होता कोई बदलाव

एक विचार है वह
ढँंक ली है उसने पूरी पृथ्वी
जहाँ कहीं भी रहता है आदमी

वह ओढ़ती है एक बहुआयामी स्वभाव
जिसमें गूंथित है रंग-बिरंगे भाव
वह नदी जैसी खुश होती है
और एक नंगे पहाड़ की तरह दुःखी

वह सुन्दर है शिव की तरह
काल की काली है
सुबह जैसी हुलसित है
और शोषण की तरह पीड़ित

परम्पराओं की समीक्षा है वह
जीवन की अभीप्सा है
होली के बचे रंगों की पुड़िया है वह

वह नींद की बिछावन है
फिर-फिर जी जाने की
बची हुई हौसला है वह

वह हमारी आदतों में शुमार है
और अन्तर्तम में पसरी है
एक विशाल वृक्ष की जड़ों की तरह

वह वयस्क है, यौवनभरी
वह प्रेम करती है तुमसे
सभी चाहते हैं उसे

वह रिश्तों की सेतु है
जिससे होकर बहता है जीवन
अलग-अलग रूपों और संबंधों में

प्रकृति की माकूल अभिव्यंजना है वह
जिस दिन नहीं बचेंगे स्वाद और गन्ध
वह बीज बनकर उग जाएगी
सपाट धरती को बार-बार गुदगुदाती हुई

वह धरती हो गई

धरती ने जो नज़्म कहा
नदी बन गयी

नदी-मिट्टी ने मिलकर
लिख डाले गीत अनगिन
होते गये पौधे और जीव

इन सबने मिलकर लिखी
वह कविता आदमी हो गई

धरती को बहुत उम्मीद है
अपनी आखि़री कविता से

तुम्हारा मन मेरा घर है

तुम्हारे चेहरे में जो खूबसूरती है
उसमें मेरा सौंदर्य है
तुम्हारे स्वर में जो मधुरता है
उसमें मेरे शब्द हैं

तुम्हारे पैरों में जो लय है
मेरी हसरतों की पूँजी है
तुम्हारी चितवन में बसी है
मेरी आँखो की परछाईं

तुम्हारे आँचल में जो रंग हैं
मेरे मन के हैं
तुम्हारे उठने-बैठने-घूमने-फिरने में
शामिल हैं मेरे जीवन के खुले पल

तुम्हारे प्यार में सनी हैं
मेरी निराकार भावनाएँ
जितना बड़ा तुम्हारा दुःख है
उतना ही छोटा है मेरा सुख

मैं बीज बनकर धरती में उगा
तुम पुष्प बनकर आकाश में खिली
मेरे सारे रास्तों में अंकित हैं
तुम्हारे पैरों के निशान

तू गाँव के खेत
और नगर की सड़कों को
पार करती जा रही
मैं हर मोड़ पर कर रहा हूँ
तेरे लिए प्रार्थना

श्राद्ध-कर्म

वह अपने खुश होने की लगाता कीमत
तय करता आशीर्वाद के अलग-अलग मूल्य
देख सामने वाले की चेहरे की चमक
कपड़े की सफेदी से गढ़ता है लक्ष्य
खींचता तब वह अपनी इच्छाओं की दीर्घ लकीर
और सहम जाते आप देख खिसकता अपना चीर
मिमियाते है हर तरफ से घिरा कोई शिकार
लकीर को छोटा करने लगाते पूरा भार
कभी हँसते, मुस्कुराते, गुस्साते, गम्भीर होते
चिढ़ते, गुदगुदाते कोशिश लगातार करते
माथे पर चमचमा जाती पसीने की बूँदे
तभी याद आता पिताजी हैं चल बसे
और दिखानी है उनके प्रति श्रद्धा उसे
विवश आखों की निरीहिता सामने वाला खूब जानता है
वह जानता है कि मुक्ति का द्वार उसके ही है हाथ

वह मंत्र पढ़ता, फूँक मारता छींटता पानी है,
तिलक लगाता अंगुलियों में कुश बाँधता,
सिर्फ वही जानता पान के पत्ते कहाँ रखना है,
सुपारी सीधी या तिरछी रखी
सौ का नोट पान के ऊपर या केले के नीचे
कब जलानी है अगरबत्ती किस जगह पर
और उसका धुआँ कहाँ-कहाँ फेंकना है
खटिया, बर्तन, छाता, गदद्ा, चादर, धोती,
कुर्ता, छड़ी कराता है सबका स्पर्श अघोरी
बात स्वर्ग जाने की है, पढ़ता कुछ और मंत्र
कुछ उपर कुछ नीचे दाएँ-बाएँ का वशीकरण
सरकाता चीजों को छूता रहता यंत्रवत
एक वाक्य क्या एक शब्द भी नहीं बोलता शुद्धवत्
पर वसुलता है कीमत एक-एक शब्द का तर्पण
आपके हाथ में दक्षिणा सदा रहना चाहिए तत्पर

सावधान की मुद्रा में बैठे-बैठे झुकती जा रही है कमर
शैनेः शैनेः लिफाफा होता जा रहा रिक्त भुगतकर
जितनी लम्बी उम्र और जितना बड़ा था पद मृतक का
उसी अनुपात में होता है सौदा समय का
कुल-गोत्र पूर्वज परिवार सब किये जाते हैं याद़
कर-कर कर्मकाण्ड अनूठा आ जाती नानी भी याद

उन दस दिनों का मानसिक संत्रास
भुला ही देता मरने वाले का संताप
पर बात अभी बनी नहीं

लाइन छोटी होती देख
लगती उसे जमीन खिसकती
दे जाता उसका सब्र जवाब
‘साहब आप ही कर लो श्राद्ध-कर्म
स्वर्ग का नहीं खुलेगा द्वार
लो अब मैं जाता हूँ ‘निज गृह’
सुन आशंकित आप होते बदहवास
आता मृत पिता का चेहरा याद
नरक में घूमते दीखते पैर लहूलुहान
घिघियाते, करते अब दृढ़ संकल्प
लकीर लघुतर करने का छोड़ मोह अब
‘भइया मान भी जाओ हो न रुष्ट
ले लो जितना हो अभीष्ट
रूठो मत न दिखाओ आँख
काम अब तो करो समाप्त’

हाथ जोड़ते पाँव पूजते होती हैं आँखें नम
कर लेते आखिरी संकल्प हो और विनम्र
मुक्ति पिता को मिले न मिले
दस दिनों के संत्रास से होने दो मुक्त
उसके भी माथे पर नाच उठती स्मित रेखा प्रसन्न
हँसता वो पढ़ता मंत्र अभ्यस्त
देता आशीर्वाद दिवंगत को मिलेगा अब स्वर्ग
जय हो यजमान पूजो चरण कमल
आखि़री दक्षिणा दो हो जाओ विमल
सहसा उसकी जाति के चार और जन
हो जाते ईश्वर की तरह प्रकट
पूजो, पूजो उनके भी चरण
देख आए हैं पथ पिता का स्वर्गारोहण

जातियों में बँधे जीवन की यह कैसी अकुलाहट
पीढ़ियों से चली आ रही दक्षिणा छटपटाहट
ये बाँधती हैं, मारती हैं देती संत्रास अथक
डरती, डराती करती नृत्य जीवन से पृथक
पवित्र नहीं अपवित्र हैं शापित जीवन की ये चमक
अतीत की स्वामिनी ये भविष्य पर अटूट पकड़

मध्य इनके जीवन नहीं, बस रीति रिवाज हैं
तारती है, तोड़ती है, ये ही नरक की द्वार हैं
धर्म इनका दास, शापित ईश्वर है डरा हुआ
जन्म से मृत्यु तक कैसा कचरा है फैला हुआ
हारती मनुष्यता, जीतती लिजलिजी यह शल्क क्यों
क्या बचाने में लगा मन है ढूँढ़ता नहीं विकल्प क्यों

लो मैं लेता जीवन का अंतिम संकल्प सजग
मत्योपरान्त इस शरीर को बस कर देना भस्म
छोड़ देना राख वहीं जैसे धूम्र हुआ विलीन
शेाक-संतप्त न होना मित्र न ही विचार तल्लीन
शृगालों को भोज न देना करना न कोई मंत्र-पाठ
शेष रहेगा न कुछ भी यह बात तुम रखना याद
नहीं चाहिए मोक्ष न कल्पित स्वर्ग की छाया भी
कल्पतरु या कामधेनु वे अपसराएँ बस माया ही

हर वृक्ष धरा का कल्पतरु हर इच्छा ही कामधेनु है
उठती गिरती साँसों की लय ही जीवन की वेणु है
शापित न हो मत्यु, करना न किसी विधि की पुनरावृति
मोक्ष साथ लेकर जाऊँगा होगी न जीवन की आवृत्ति

किसलय नये निकलने दो

मैं मुट्ठियाँ खोलता हूँ
दामन तुम फैलाओ
सरके थोड़ा समीर
नम धरा हो जाने दो

अखुँवाने दो बीज ज़मीं में
नन्ही जड़ें जाएँपसर
रेंग-रेंग पानी मिट्टी का
पोर-पोर भिगोने दो

खोलो झरोखे गाएँ पंछी
सावन अभी बरसने दो
चटकें कलियाँ शाखों की
फूलों को अब खिलने दो

अपनी सीमाएँ तोड़ता हूँ
विचारों को तुम बुहारो
कालिख लगा अँधेरा छँट जाए
मन की दीवारें ढहने दो

कहाँ कहाँ से घूम-घामकर
इस घर में लौटे हैंहम
निष्कर्षों-सा टंगे चित्रों को
समय रहते उतरने दो

झडे़ पत्ते तुम उठा लो
बाहर मैं फेंक आता हूँ
तन-मन की गाँठे खोलो
किसलय नये निकलने दो

भीतर थोड़ी जगह बनाओ
मैं आसमान फैलाता हूँ
सूरज हँसतीराह हो जाए
सृष्टि कण-कणमहकने दो

दिल में हिलोरे उठने दो
ज़िन्दगी थोड़ी बदलने दो
भ्रम दिशाओ केमिटने दो
निसर्ग की नेमत बरसने दो

ब्रह्माण्ड एक आवाज़ है 

ध्वनि नहीं मोहताज माध्यम की
नहीं निःशब्दता शब्दों की
भीतर बाहर इनसे भी गहरी
पसरी चादर नीरवता की

झूम उठते हैं किसलय
जब जब चूमता उन्हें पवन
बिखराकर सुगन्ध चहॅु ओर
आत्ममुग्ध हैं शाख सुमन

कभी सुना हमने विहगों का
सुबह-शाम का कलरव
और दृढ़ विश्‍वास मुझे है
सुना नहीं अपना ही अनुभव

सम्पूर्ण नीरवता में खड़े
सुना नहीं वृक्ष के रव को
उसके तने से कान सटाये
शिराओं में बहते पय को

प्रकृति एक है पूर्ण ध्वनि
ब्रह्माण्ड वही पूर्ण प्रणाद
हर रचना है एक निनाद
बिना सृजन भी गहरी आवाज़

नाद के भीतर अन्तर्नाद है
भीतर के भीतर और भी गहरा
ध्वनन होता रहता अनवरत
अप्रतिम अनहद नाद है
रूप-विरूप से ध्वनित होती
अक्षुण्ण निनादित तान है

बिना आवाज़ के
नहीं नीरवता
सम्पूर्ण आवाज़ है
पूर्ण नीरवता
चलो सुनते हैं एक आवाज़
बाहर भीतर बेआवाज़

पीपल का इकलौता पत्ता 

वर्षों बरस पहले खूब खेला उसके साथ
एक वही इकलौता मित्र
लाल गुलाबी किसलय फहराता
हवा में हिलता बड़ा होता
सूर्य किरणों से आँख मिचौली करता
नीचे गिरता लहराता

पोर-पोर भरता ऑक्सीजन
डंठलों में जमा करता कार्बन
कचरों के संहार के लिए

मेरी आँखे अब उसे नहीं
पत्तों को देखतीं हैं
और गिनती है उनकी संख्या
ढूँढ़ती मात्रा और आकार

देखतीं नहीं उसकी रन्ध्रों से निकलता सूरज
उसकी धारियाँ ही धुरी थी
जिसके चारों ओर घूम जाती पृथ्वी
विहँसता ब्रह्माण्ड ठीक उसकी नोक पर
उसका आकार ही है ऊँ की ध्वनि
जिससे जन्म ले रही दुनिया

ध्यान से कब देखा उसे
इसलिए करता हूँ बहाना
अनेक चीजों के देखने का
और भटकता जाता हूँ
आस्था के अंतहीन अन्धेरे में

मैं तेरा अनुवाद हूँ

तुम्हारे दिल की धड़कनों सें
तरंगायित मन में
उठती पदचापों का
हस्ताक्षर अनित्य हूँ

तुम रोज़ जो बदलती हो
रोती कभी हँसती हो
जीवन की खोयी तानों की
लय मधुर मैं ताल हूँ

दुख लिये, सुख ढूँढ़ती
आँचल से आती तुम्हारे
सलवटी हवाओं की मैं
बलखाती अनुगूँज हूँ

तुम्हारे अधरों के स्फुरण से
बनते ब्रह्माण्डों के
सम्मिलित निनादों का
रुपांकित अनुवाद हूँ

मैं तुम्हारा मीत वही
ईशारों का हमराज़ भी
होंठ तुम्हारे जब भी खुलें
मैं बना संगीत हूँ

टिटिहिरी 

काली-सफेद कुर्ती में
कजरारे नयन और छरहरा बदन वाली
सरपट भागती लमगोड़ी
पुकारती हर मौसम को
कुदरत के लिए करती है मॉडलिंग
हमारी पड़ोसन टिटिहिरी

शाम को, दोपहर में
ग्रीष्म वसन्त शिशिर में
खेत खलिहान जंगल जहान में
प्रकृति के हर रूप एवं मूड को
परोसती अथक
हम सबके समक्ष
जो कुछ भी बचा रह गया धरती पर
सवारने करती आहवान

देखो, खोलती सहेजके धरहरों का आकाश
जिसमें मेघ है, हवा है, आकार हैं
और खूब सारी जगह
आने वाली पीढ़ियों के लिए

किताबों के हम पढ़ाकू
अपना खाना और मकान से
कितना अधिक जानते हैं
निसर्ग की इस मॉडल को

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