अश्वघोष की रचनाएँ

भीड़ भरे बाज़ारों में 

भीड़ भरे इन बाजारों में
दुविधाओं के अंबारों में
खुद ही खुद को
खोज रहे हम।

लिए उसूलों की इक गठरी
छोड़ी नहीं अभी तक पटरी
छूटे नहीं अभी तक हमसे
पहले वाले,
वे सब क्रम।

संबंधों ने वचन नकारे
छीज रहे हैं अनुभव सारे
मृगजल की लहरों पर लहरें
चारों ओर
उगे हैं विभ्रम।

चले जा रहे जगते-सोते
बंजर में हरियाली बोते
डर लगता है व्यर्थ न जाए
आगत की राहों पर
यह श्रम।

शब्दों की किरचें 

मन में पड़े थे टूटे हुए शब्द
जब तक मैं उनको जोड़ता
चुभने लगीं शब्दों की किरचें

मुक्ति की छटपटाहट में
चिड़िया की तरह हाफँता मैं
सोचता रहा बचने की तरक़ीब
देता रहा दुहाई सम्बन्धों की
सहता रहा किरचों का वहशीपन

चाकू से भी तेज़
तकुए से भी अधिक नुकीली किरचें
बींधती रहीं मुझे अनहद तक

काश! मैंने न छुए होते टूटे हुए शब्द
तो वहीं पड़ी रहतीं किरचें
और अब तक तो उन पर
जम गई होती विस्मृतियों की धूल।

सदियों से भूखी औरत

सदियों से भूखी औरत
करती है सोलह शृंगार
पानी भरी थाली में देखती है
चन्द्रमा की परछाईं
छलनी में से झाँकती है पति का चेहरा
करती है कामना दीर्घ आयु की

सदियों से भूखी औरत
मन ही मन बनाती है रेत के घरौंदे
पति का करती है इन्तज़ार
बिछाती है पलकें
ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर
हर वक़्त गाती है गुणगान पति के
बच्चों में देखती है उसका अक्स

सदियों से भूखी औरत
अन्त तक नहीं जान पाती
उस तेन्दुए की प्रवृत्ति जो
करता रहा है शिकार
उन निरीह बकरियों का
आती रही हैं जो उसकी गिरफ़्त में
कहीं भी
किसी भी समय।

सड़क पर तारकोल

सड़क पर बिछा है तारकोल
पैरों ने कर दिया है इंकार
यात्रा से

सिर्फ़ आँखें हैं
जो तैर रही हैं मछली की तरह
तारकोल के शरीर पर

मन है कि
भर रहा है कुलाँचें
अन्दर ही अन्दर
हिरन की भाँति
पैरों से कर रहा है अनवरत ज़िद
समझ रहा है यात्रा की
मज़बूरियाँ
तन कभी हुलस रहा है
कभी झुलस रहा है
और यात्रा…
जोड़ते-जोड़ते समीकरण
धीरे-धीरे
ख़ुद को भूल रही है,
आशा और निराशा की
डाल पर
चिड़िया की तरह झूल रही है

आज भी 

वक़्त ने बदली है सिर्फ़ तन की पोशाक
मन की ख़बरें तो आज भी छप रही हैं
पुरानी मशीन पर

आज भी मंदिरों में ही जा रहे हैं फूल
आज भी उंगलियों को बींध रहे हैं शूल
आज भी सड़कों पर जूते चटका रहा है भविष्य

आज भी खिड़कियों से दूर है रोशनी
आज भी पराजित है सत्य
आज भी प्यासी है उत्कंठा

आज भी दीवारों को दहला रही है छत
आज भी सीटियाँ मार रही है हवा
आज भी ज़िन्दगी पर नहीं है भरोसा।

अभी तो लड़ना है

अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक मायूस रहेंगे फूल
तितलियों को नहीं मिलेगा हक़
जब तक अपनी जड़ों में नहीं लौटेंगे पेड़

अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक हलों को रोकती रहेंगी लाठियाँ
भूखा रहेगा हथौड़े का पेट
जब तक सीमाओं पर बहाल नहीं होगी शान्ति

अभी तो लड़ना है तब तक
जब तक आत्महत्या करती रहेगी शिक्षा
जेबों में सोता रहेगा रीतापन
जब तक आदमी को पीटता रहेगा वक़्त

अभी तो लड़ना है तब तक।

सोच रहा है दिन 

आँखों पर ओढ़ कर नींद
सो रही है रात, दिन के इन्तज़ार मे

सोच रहा है दिन
अगर नहीं पहुँचा वक़्त से
बेहोश रहेगी आरती और अज़ान
रह रहकर धड़कता रहेगा मुर्गे का दिल
कोलाहल को तरसेगा वक़्त

सोच रहा है दिन
अलावों में घूमती रहेगी आग
चूल्हे बदलते रहेंगे करवटें
ताने देती रहेगी चाय

सोच रहा है दिन
दुकानों के जिस्म में कुलबुलाती रहेंगी चीज़ें
पैरों को तरसती रहेंगी सड़कें
लैम्पपोस्ट में पथरा जाएगीँ
रोशनी की आँखें

रोशनी का ख़्याल आते ही
भाग लिया दिन
रात की आँखों में पिघलने लगी नींद
बर्फ़ की तरह।

पेड़

टिंकू से यह बोला पेड़
टिंकू मुझको अधिक न छेड़
शायद तुझ पर काम नहीं
पर मुझको आराम नहीं
देख अभी नभ में जाना है
बादल से पानी लाना है
जीवों को वायु देनी है
मिट्टी को आयु देनी है
ईंधन देना है बुढ़िया को
मीठे फल देना गुड़िया को
अभी बनाना ऐसा डेरा
पक्षी जिसमें करें बसेरा
इंसानों के रोग हरूँगा
और बहुत से काम करूँगा
टिंकू कर मत पीछा मेरा
मैं धरती का पूत कमेरा

आम आदमी 

व्यर्थ जा रही सारी अटकल
कितना बेबस, कितना बेकल
आम आदमी ।

मन में लेकर सपनों का घर
खड़ा हुआ है चौराहे पर
चारों ओर बिछी है दलदल
कैसे खोजे राहत के पल
आम आदमी ।

तन में थकन नसों में पारा
कंधों पर परिवार है सारा
कहाँ जा रहा मेहनत का फल ?
सोच-सोच कर होता दुर्बल
आम आदमी ।

उखड़ी-उखड़ी साँस ले रहा
संसद को आवाज़ दे रहा
मीलों तक पसरा है छल-बल
बार-बार होता है निष्फल
आम आदमी ।

भाव कुछ अपवाद के

      लड़खड़ाए शब्द
फिर अनुवाद के ।

भोर के दिल में अनोखी धुंध है
धूप का भी व्याकरण अब कुंद है
जुड़ गये हैं भाव
कुछ अपवाद के ।

शीत में इक अग्निवर्णी घाम है
शान्ति में भी हर तरफ़ कोहराम है
होंठ सूखे जा रहे
अवसाद के ।

देख ली हमने शरारत शूल की
पसलियाँ हैं रक्तरंजित फूल की
टूटकर सपने गिरे
आल्हाद के ।

लड़खड़ाए शब्द
फिर अनुवाद के ।

जल नहीं है 

अब नदी में जल
नहीं है

पत्थरों पर
लेटकर खामोश,
बादलों का पढ़ रही अफसोस
सत्य है अटकल नहीं है
अब नदी में जल
नहीं है

दूर, कितने
दूर हैं अब तट,
आती नहीं पदचाप की आहट
पक्षियों की भी, कोई
हलचल नहीं है
अब
नदी में
जल नहीं है

मुक्ति का उल्लास ही

मुक्ति का उल्लास ही
हर ओर छाया
प्यार के इस लोक को किसने बनाया?

रूप, रस और गंध की
सरिता मचलती
सुधि नहीं रहती यहाँ
पल को भी पल की
विश्व व्यंजित नेह कन कण में समाया
प्यार के इस लोक को किसने बनाया?

आचरण को व्याकरण
भाता नहीं है
शब्द का संदर्भ से
नाता नहीं है
मुक्ति के विश्वास की उन्मुक्त काया
प्यार के इस लोक को किसने बनाया?

मौसमों ने त्याग कर
ऋतुओं के डेरे
कर लिए इस लोक में
आकर बसेरे
हार में भी जीत का आनंद आया
प्यार के इस लोक को किसने बनाया?

तुमसे मिलके

तुमसे मिलके
खुश रहता हूँ
तुमसे मिलके

उजले लगते
धूल धूसरित मैले से दिन
तुमसे मिलके

जग से मिलते
बंजारे मेरे सब पल-छिन
तुमसे मिलके

अनायास ही
हट जाते कुंठा के छिलके
तुमसे मिलके

वात्सल्य का
एक अजब झरना सा झरता
तुमसे मिलके

मन आँगन में
तुलसी जैसा बोध उभरता
तुमसे मिलके

लाजवंती धारणाएँ

लाजवंती धारणाएँ
पढ़ रहीं
नंगी कथाएँ

नीतियाँ बेहाल हैं
आदर्श की धज्जी उड़ी है,
रीतियाँ होकर
अपाहिज
कोशिशों के घर पड़ी है,
पुस्तकों में
कैद हैं नैतिक कथाएँ

मूल्य सारे
टूटकर बिखरे पड़े हैं,
प्रचलन को
स्वार्थ,
अब ज़िद पर अड़े हैं,
तेज होती जा रहीं
पछुआ हवाएँ

संसद के गलियारे

चहल-पहल से
भरे हुए हैं
संसद के गलियारे

एक दूसरे को
जा-जाकर सांसद कथा सुनाएँ,
राजनीति के
दाँव पेच में
डूबी क्षेत्र कथाएँ
छूट रहे हैं
कहकहों के शानदार फव्वारे

जनता के दुखदर्द
जरा भी नहीं किसी को भाते,
तोड चुके हैं
सब गाँधी से
अपने रिश्ते-नाते
दीवारों पर लिखवाते हैं
खुशहाली के नारे

हिंसा को
हथियार बनाकर
अपना राज्य चलाएँ
घर से लेकर खेतों तक ये
बस दहशत फैलाएँ
मानवता का खून करें ये
खुले आम हत्यारे

प्रीत-गंध

वासन्ती रूप की तरह
केसरिया धूप की तरह
प्रीत-गन्ध फैली।

ऋतुओं ने तोड़ दिए
वक़्त के कगार
मोती-सा दमक उठा
मटमैला प्यार।

स्वप्नमयी हूर की तरह
तन के मयूर की तरह
नाच उठी चेतना रुपहली
प्रीत-गन्ध फैली।

आँगन भर अनुभव ने
मोहबेल छोड़ी
जगवंती हो गई
आस्था निगोड़ी।

अपराजित राग की तरह
फागुनी अनुराग की तरह
गूँज उठी एक स्वर-शैली
प्रीत-गन्ध फैली।

आम्र-मंजरी 

कोयल के कानों में कह दी
कुछ बात रस भरी
सुधियों में फूल गई आम्र-मंजरी।

हरियाले पत्तों की पहने क़मीज़
अंग-अंग फूल रहे सृजन के बीज
तारों की दुनिया में
प्रियतम को छोड़
फुनगी पर बैठी है रात की परी।

सूरज ने चैता के डाकिए के हाथ
भेजी है प्यार की चटकिल सौगात
लज्जा के आँचल से
यौवन को ढाँप
धरती को देखती पसार अंजुरी
सुधियों में फूल गई आम्र-मंजरी।

जो भी सपना

जो भी सपना तेरे-मेरे दरमियाँ रह जाएगा
बस वही इस ज़िन्दगी की दास्ताँ रह जाएगा

कट गए है हाथ तो आवाज़ से पथराव कर
याद सबको यार मेरे ये समाँ रह जाएगा।

भूख है तो भूख का चर्चा भी होना चाहिए
वरना घुट कर सबके भीतर ये धुआँ रह जाएगा।

ये धुँधलके हैं समय के तू अभी परवाज़ कर
फट गया गर यूँ ही बादल, तू कहाँ रह जाएगा।

जो भी पूछे ये अदालत बोल देना बेझिझक
तू न रह पाया तो क्या तेरा बयाँ रह जाएगा।

रफ़्ता रफ़्ता

रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से यों ही गुज़र जाती है रात
मैंने देखा झील पर जाकर बिखर जाती है रात।

मैं मिलूँगा कल सुबह इस रात से जाकर ज़रूर
जानता हूँ बन-सँवर कर कब किधर जाती है रात।

हर कदम पर तीरगी है, हर तरफ़ एक शोर है
हर सुबह एकाध रहबर कत्ल कर जाती है रात।

जैसे बिल्ली चुपके-चुपके सीढ़ियाँ उतरे कहीं
आसमाँ से ज़िंदगी में यों उतर जाती है रात।

एक चिड़िया कुछ दिनों से पूछती है ‘अश्वघोष’
सिर्फ़ इक आहट को सुनके क्यों सिहर जाती है रात।

रोज़मर्रा

रोज़मर्रा वही इक ख़बर देखिए
अब तो पत्थर हुआ काँचघर देखिए।

सड़कें चलने लगीं आदमी रुक गया
हो गया यों अपाहिज सफ़र देखिए।

सारा आकाश अब इनके सीने में है
काटकर इन परिंदों के पर देखिए।

मैं हक़ीक़त न कह दूँ कही आपसे
मुझको खाता है हरदम ये डर देखिए।

धूप आती है इनमें, न ठंडी हवा
खिड़कियाँ हो गईं बेअसर देखिए।

सिलसिला ये दोस्ती का

सिलसिला ये दोस्ती का हादसा जैसा लगे
फिर तेरा हर लफ़्ज़ मुझको क्यों दुआ जैसा लगे।

बस्तियाँ जिसने जलाई मज़हबों के नाम पर
मज़हबों से शख़्स वो इकदम जुदा जैसा लगे।

इक परिंदा भूल से क्या आ गया था एक दिन
अब परिंदों को मेरा घर घोंसला जैसा लगे

घंटियों की भाँति जब बजने लगें ख़ामोशियाँ
घंटियों का शोर क्यों न ज़लज़ला जैसा लगे।

बंद कमरे की उमस में छिपकली को देखकर
ज़िंदगी का ये सफ़र इक हौसला जैसा लगे।

नए साल में

नए साल में
प्यार लिखा है
तुम भी लिखना

प्यार प्रकृति का शिल्प
काव्यमय ढाई आखर
प्यार सृष्टि पयार्य
सभी हम उसके चाकर

प्यार शब्द की
मयार्दा हित
बिना मोल, मीरा-सी-बिकना

प्यार समय का कल्प
मदिर-सा लोक व्याकरण
प्यार सहज संभाव्य
दृष्टि का मौन आचरण

प्यार अमल है ताल
कमल-सी,
उसमें दिखना।

मनचाहे सपनों को 

मनचाहे सपनों को
कोख में दबा
बंजारे दिन
हो गए हवा

नयनों के गेह से
गूँगा विश्वास
सहमा-सा देख रहा
अनुभव की प्यास
तन-मन में ेमी हुई
नींद की दवा

सूली पर लटके-से
लगते हैं दिन
चिड़ियों-सी उड़ जातीं
रातें दुल्हिन
सड़कों पर बिखरा है
मौन का रवा
हो गए हवा ।

कैसे सहें छतों का बोझा

कैसे सहें
छतों का बोझा
सीलन से भीगी दीवारें ।

पानी-पानी अन्तर तल है
टुकड़े-टुकड़े बिखरा सीना,
देख-देख बुनियादें दुबली
पेशानी पर घिरा पसीना ।

जल्लादों-सी
तेज़ हवाएँ
दौड़-दौड़ चाबुक से मारें ।

आँतों में दीमक की हरकत
आले-खिड़की लदे गोद में,
चिड़ियों ने सब खाल खुरच दी
आमादा होकर विरोध में

कोढ़ सरीखी
चितकबरी-सी
उभर रही तन पर बौछारें ।
कैसे सहें
छतों का बोझा
सीलन से भीगी दीवारें ।

ठूँठ पर बैठा कबूतर 

ठूँठ पर
बैठा कबूतर
देखता है जाल ।

जाल में है एक चिड़िया
सेर भर दाने,
छटपटाते शब्द हैं
कुछ तप्त अगिहाने,

ढेर सारी
चुप्पियाँ
दब रहा भूचाल ।

दूरवर्ती झाड़ियों से
दो बघेली आँख
शातिराने ढँग से
गुपचुप रही है झाँक

हो न जाए
कोई कछुआ
भील या संथाल !

चन्दा मामा दूर के

चन्दा मामा दूर के
छिप-छिप कर खाते हैं हमसे
लड्डू मोती चूर के

लम्बी-मोटी मूँछें ऐंठे
सोने की कुर्सी पर बैठे
धूल-धूसरित लगते उनको
हम बच्चे मज़दूर के
चन्दा मामा दूर के।

बातें करते लम्बी-चौड़ी
कभी न देते फूटी कौड़ी
डाँट पिलाते रहते अक्सर
हमको बिना कसूर के
चन्दा मामा दूर के।

मोटा पेट सेठ का बाना
खा जाते हम सबका खाना
फुटपाथों पर हमें सुलाकर
तकते रहते घूर के
चन्दा मामा दूर के।

मणियों का जूता

मम्मी पर है ऐसा जूता,
जिसको लाया इब्न बतूता!

यह जूता परियों का जूता,
यह जूता मणियों का जूता,
मोती की लड़ियों का जूता,
ढाई तोले सबने कूता,
इसको लाया इब्न बतूता!

इस जूते की बात निराली,
पल में भरता पल में खाली,
बच्चे देख बजाते ताली,
अजब-अनूठा है यह जूता,
इसको लाया इब्न बतूता!

इसमें अपने पाँव फँसाकर,
हम जाते हैं नानी के घर,
इसे पहनकर भग जाता डर,
इसको रोके किसमें बूता,
इसको लाया इब्न बतूता!

समय नहीं है 

नानी-नानी! कहो कहानी,
समय नहीं है, बोली नानी।
फिर मैंने पापा को परखा,
बोले-समय नहीं है बरखा।

भैया पर भी समय नहीं था,
उसका मन भी और कहीं था।
मम्मी जी भी लेटी-लेटी,
बोलीं-समय नहीं है बेटी।

मम्मी, पापा, नानी, भैया,
दिन भर करते ता-ता-थैया।
मेरी समझ नहीं आता है,
इनका समय कहाँ जाता है!

रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से यूँ ही गुज़र जाती है रात

रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से यूँ ही गुज़र जाती है रात
मैंने देखा, झील पर जाकर बिखर जाती है रात

मैं मिलूँगा कल सुबह इस रात से जाकर ज़रूर
जानता हूँ, बन-सँवरकर कब, किधर जाती है रात

हर क़दम पर तीरगी है, हर तरफ़ इक शोर है
हर सुबह एकाध रहबर क़त्ल कर जाती है रात

जैसे बिल्ली चुपके-चुपके सीढ़ियाँ उतरे कहीं
आसमाँ से ज़िंदगी में यूँ उतर जाती है रात

एक चिड़िया कुछ दिनों से पूछती है अश्वघोष
सिर्फ़ इस आहट को सुनके क्यों सिहर जाती है रात !

द्वार खोलो दौड़ कर लो आ गया अख़बार

द्वार खोलो दौड़कर लो आ गया अख़बार
कुलमुलाती चेतना पर छा गया अख़बार ।

हर बसर ख़ुशहाल है इस भुखमरी में भी,
आँकड़ों की मार्फ़त समझा गया अख़बार ।

कल मरी कुछ औरतें स्टोव से जलकर,
आज उनको देखता हूँ खा गया अख़बार ।

हर तरफ़ ख़ामोशियों में रेंगते चाकू,
एक सुर्ख़ी फेंक के दिखला गया अख़बार ।

भूख से संतप्त होकर मर गई चिड़िया,
लाश ग़ायब है अभी बतला गया अख़बार ।

चुप्पी छाई, बात करो अब

चुप्पी छाई बात करो अब
है तनहाई, बात करो अब

आतुर है ऊपर आने को
इक गहराई, बात करो अब

तोड़ रहा भीतर ही भीतर
ग़म हरजाई, बात करो अब

झूठ के महलों में बैठी है
चुप सच्चाई, बात करो अब

मन में डर, डर में सन्नाटा
मेरे भाई, बात करो अब !

देखिए बाज़ार में हर चीज़ के पैसे चढ़े हैं

देखिए बाज़ार में हर चीज़ के पैसे चढ़े हैं,
क़ीमतें आकाश में हैं, हम ज़मीं पे ही खड़े हैं ।

आप कैसे पढ़ सकेंगे उनके चेहरे की जबीं,
उस जमी पर पोस्टर ही पोस्टर चिपके पड़े हैं ।

एक ही शहतीर पर बीमार मंज़िल है खड़ी,
और खम्बे तो महज तीमारदारी में खड़े हैं ।

पेट हो या पीठ हो, कुछ भी दिखाना व्यर्थ है,
हर बसर ये जानता है, वे बहुत चिकने घड़े हैं ।

इस कदर पाबंदियों में मत अकेले जाइए,
जान जोखों में उधर कानून के पहरे कड़े हैं ।

पेट की इस आग को 

पेट की इस आग को इज़्हार तक लेकर चलो।
इस हक़ीक़त को ज़रा सरकार तक लेकर चलो।

मुफ़लिसी भी, भूख भी, बीमारियाँ भी इसमें हैं,
अब तो इस रूदाद को व्यवहार तक लेकर चलो।

डूबना तो है सफ़ीना, क्यों न ज़ल्दी हो ये काम
तुम सफ़ीने को ज़रा मँझधार तक लेकर चलो।

बँट गए क्यों दिल हमारे, तज़्किरा बेकार है
क्यूँ न इस अहसास को आधार तक लेकर चलो।

हाँ, इसी धरती पर छाएँगी अभी हरियालियाँ
हौसला बरसात की बौछार तक लेकर चलो।

ज़िन्दगी मछली है जैसे

ज़िन्दगी मछली है जैसे मुफ़लिसी के जाल में।
कूद जाने को तड़पती है समय के जाल में।

जेब का इतिहास ही तो पेट का भूगोल है,
ये समझना-जानना है आपको हर हाल में।

जो मिली इमदाद उसको खा गए सरपंच जी,
देर तक चर्चा हुआ ये गाँव की चौपाल में।

न्याय की आशा न करना, चौधरी से गाँव के
वो तो बस एक भेड़िया है आदमी की खाल में।

भूख भी क्या चीज है. गुस्सा भी है, फ़रियाद भी
भूख ने ही चेतना को बल दिया हर काल में।

आत्मा परमात्मा

आत्मा परमात्मा की व्यंजना है
क्या पता ये सत्य है या कल्पना है

देश को क्या देखते हो पोस्टर में
आदमी देखो मुकम्मल आइना है

क्या गिरेगा पेड़ वो इन आन्धियो से
जिसकी जड़ में गाँव भार की प्रार्थना है

उसके सपनों को शरण मत दीजिएगा
इनको आखिर बाढ़ में ही डूबना है

इन अन्धेरो को अभी रखना नज़र में
क्योंकि इनमें सूर्य की सम्भावना है

हादसा-दर-हादसा

हादसा-दर-हादसा-दर-हादसा होता हुआ
क्या कभी देखा किसी ने आसमाँ रोता हुआ

ये ज़मीं प्यासी है फिर भी जानकर अनजान-सा
हुक़्मराँ-सा एक बादल रह गया सोता हुआ

मेरी आँखों में धुआँ है और कानों में है शोर
सोच की बैसाखियों पर जिस्म को ढोता हुआ

एक दरिया कल मिला था राजधानी में हमें
आदमी के ख़ून से अपना बदन धोता हुआ

चल रहा हूँ जानकर भी अजनबी हैं सब यहाँ
प्यार की हसरत में एक पहचान को बोता हुआ

रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से 

रफ़्ता-रफ़्ता द्वार से यों ही गुज़र जाती है रात
मैंने देखा झील पर जाकर बिखर जाती है रात।

मैं मिलूँगा कल सुबह इस रात से जाकर ज़रूर
जानता हूँ बन-सँवर कर कब किधर जाती है रात।

हर कदम पर तीरगी है, हर तरफ़ एक शोर है
हर सुबह एकाध रहबर कत्ल कर जाती है रात।

जैसे बिल्ली चुपके-चुपके सीढ़ियाँ उतरे कहीं
आसमाँ से ज़िंदगी में यों उतर जाती है रात।

एक चिड़िया कुछ दिनों से पूछती है ‘अश्वघोष’
सिर्फ़ इक आहट को सुनके क्यों सिहर जाती है रात।

Share