अहमद अली ‘बर्क़ी’ आज़मी की रचनाएँ

सता लें हमको, दिलचस्पी जो है उनकी सताने में 

सता लें हमको, दिलचस्पी जो है उनकी सताने में
हमारा क्या वो हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने में

लड़ाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़द्दर आज़माने में

जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नाला
सुकूने दिल नहीं हासिल किसी को इस ज़माने में

वो गुलचीं हो कि बिजली सबकी आखों में खटकते हैं
यही दो चार तिनके जो हैं मेरे आशियाने में

है कुछ लोगों की ख़सलत नौए इंसां की दिल आज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरों का दिल दुखाने में

अजब दस्तूर-ए-दुनिया- ए-मोहब्बत है , अरे तौबा
कोई रोने में है मश़ग़ूल कोई मुस्कुराने में

पतंगों को जला कर शमअ-ए-महफ़िल सबको ऐ ‘बर्क़ी’!
दिखाने के लिए मसरूफ़ है आँसू बहाने में.

नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा

नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
बिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ा

अमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को
उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ा

सितम शआरी में उसका नहीं कोई हमसर
सितम शआरों में वह है बुलंद आवाज़ा

गुज़र रही है जो मुझपर किसी को क्या मालूम
जो ज़ख्म उसने दिए थे हैं आज तक ताज़ा

गुरेज़ करते हैँ सब उसकी मेज़बानी से
भुगत रहा है वह अपने किए का ख़मियाज़ा

है तंग क़फिया इस बहर में ग़ज़ल के लिए
दिखाता वरना मैं ज़ोरे क़लम का अंदाज़ा

वह सुर्ख़रू नज़र आता है इस लिए `बर्क़ी’
है उसके चेहरे का ख़ूने जिगर मेरा ग़ाज़ा

अमीरे शहर-हाकिम, सितम शआरी-ज़ुल्म
सितम शआर- ज़लिम, ग़ाज़ा-क्रीम, बुलंद आवाज़ा- मशहूर

दर्द-ए-दिल अपनी जगह दर्द-ए-जिगर अपनी जगह 

दर्द-ए-दिल अपनी जगह दर्द-ए-जिगर अपनी जगह
अश्कबारी कर रही है चश्मे-ए-तर अपनी जगह

साकित-ओ-सामित हैं दोनों मेरी हालत देखकर
आइना अपनी जगह आइनागर अपनी जगह

बाग़ में कैसे गुज़ारें पुर-मसर्रत ज़िन्दगी
बाग़बाँ का खौफ़ और गुलचीं का डर अपनी जगह

मेरी कश्ती की रवानी देखकर तूफ़ान में
पड़ गए हैं सख़्त चक्कर में भँवर अपनी जगह

है अयाँ आशार से मेरे मेरा सोज़-ए-दुरून
मेरी आहे आतशीं है बेअसर अपनी जगह

हाल-ए-दिल किसको सुनायें कोई सुनता ही नहीं
अपनी धुन में है मगन वो चारागर अपनी जगह

अश्कबारी काम आई कुछ न ‘बर्क़ी’! हिज्र में
सौ सिफ़र जोड़े नतीजा था सिफ़र अपनी जगह

नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए

नया साल ख़ुशियोँ का पैग़ाम लाए
ख़ुशी वह जो आए तो आकर न जाए

ख़ुशी यह हर एक व्यक्ति को रास आए
मोहब्बत के नग़मे सभी को सुनाए

रहे जज़ब ए ख़ैर ख़्वाही सलामत
रहें साथ मिल जुल के अपने पराए

जो हैँ इन दिनोँ दूर अपने वतन से
न उनको कभी यादें ग़ुर्बत सताए

नहीँ खिदमते ख़ल्क़ से कुछ भी बेहतर
जहाँ जो भी है फ़र्ज़ अपना निभाए

मुहबबत की शमएँ फ़रोज़ाँ होँ हर सू
दिया अमन और सुलह का जगमगाए

रहेँ लोग मिल जुल के आपस में बर्क़ी
सभी के दिलोँ से कुदूरत मिटाए

इतना न खींचो हो गया बस

इतना न खींचो हो गया बस
टूट न जाए तारे नफस

शीरीं बयानी उसकी मेरे
घोलती है कानों में मेरे रस

खाती हैं बल नागिन की तरह
डर है न लेँ यह ज़ुलफें डस

उसका मनाना मुशकिल है
होता नहीं वह टस से मस

वादा है उसका वादए हश्र
अभी तो गुज़रे हैँ चंद बरस

फूल उन्हों ने बाँट लिए
मुझको मिले हैं ख़ारो ख़स

सुबह हुई अब आँखें खोल
सुनता नहीँ क्या बाँगे जरस

उसने ढाए इतने ज़ुल्म
मैंने कहा अब बस बस बस

बर्क़ी को है जिस से उम्मीद
उसको नहीं आता है तरस

जिस परी पैकर से मुझको प्यार है

जिस परी पैकर से मुझको प्यार है
वह मुसलसल दरपए आज़ार है

ख़ानए दील मेँ मकीँ है वह मेरे
फिर न जाने कैसी यह दीवार है

कर दिया है जिस ने दोनोँ को जुदा
जिस से रबते बाहमी दुशवार है

है ख़ेज़ाँ दीदह बहारे जाँफेज़ा
दूर जब से मूझसे मेरा यार है

उसके इस तर्ज़े तग़ाफ़ुल के सबब
ज़ेहन पर हर वक्त मेरे बार है

उसका तरज़े कार तो ऐसा न था
पहले था एक़रार अब इंकार है

क्या बताए अपनी बर्क़ी सरगुज़श्त
हाले दिल नाक़ाबिले इज़हार है

भर दे दिल मे यह दिवाली आपके ख़ुशियों के रंग 

भर दे दिल में यह दिवाली आपके ख़ुशियों के रंग
आपके इस रंग मेँ पडने न पाए कोई भंग

जो जहाँ हो उसको हासिल हो वहाँ ज़ेहनी सुकून
दूर हो जाए जहाँ से बुगज़, नफरत और जंग

अपने दिल को साफ रखिए आप मिसले आइना
आपकी शमशीरे ईमाँ पर न लगने पाए ज़ंग

है ज़रूरत वक़्त् की आपस में रखिए मेल-जोल
भाइचारा देख कर सब आपका रह जाएँ दंग

आइए आपस में मिल कर यह प्रतिज्ञा हम करेँ
रंग मे अपनी दिवाली के न पडने देँगे भंग

महफ़िले शेरो सुख़न में जश्न का माहौल है
कीजिए नग़मा सराई आप ‘बर्क़ी’ लेके चंग

हैं किसी की यह करम फर्माइयाँ 

हैं किसी की यह करम फर्माइयाँ
बज रही हैं ज़ेहन मेँ शहनाइयाँ

उसका आना एक फ़ाले नेक है
ज़िंदगी मेँ हैँ मेरी रानाइयाँ

मुर्तइश हो जाता है तारे वजूद
जिस घडी लेता है वह अंगडाइयाँ

उसकी चशमे नीलगूँ है ऐसी झील
जिसकी ला महदूद हैँ गहराइयाँ

चाहता है दिल यह उसमेँ डूब जाँए
दिलनशीँ हैँ यह ख़याल आराइयाँ

मेरे पहलू मेँ नहीँ होता वह जब
होती हैँ सब्र आज़मा तन्हाइयाँ

तल्ख़ हो जाती है मेरी ज़िंदगी
करती हैँ वहशतज़दा परछाइयाँ

इश्क़ है सूदो ज़ियाँ से बेनेयाज़
इश्क़ मे पुरकैफ हैँ रुसवाइयाँ

वलवला अंगेज़ हैँ मेरे लिए
उसकी बर्क़ी हौसला अफज़ाइयाँ

मुर्तइश. कंपित, सब्र आज़मा. नाक़ाबिले बरदाश्त नीलगूँ , नीली सूदो ज़ियाँ . नफ़ा -नुकसान

करता रहा मैँ क़ाफिया पैमाई रात भर

करता रहा मैं क़ाफिया पैमाई रात भर
बजती थी मेरे ज़ेह्न मेँ शहनाई रात भर

आई जो उसकी याद तो आती चली गई
एक लमहा मुझको नीँद नहीँ आई रात भर

बरपा था मेरे ज़ेह्न मेँ एक महशरे ख़याल
उसने बना दिया मुझे सौदाई रात भर

कितना हसीँ था उसका तसव्वुर न पूछिए
सब्र आज़मा रही मुझे तनहाई रात भर

मैँ छेड़ता था उसको तसव्वुर में बार- बार
रह रह के ले रही थी वह अंगडाई रात भर

मैं देखता ही रह गया जब आई सामने
मुझ मेँ नहीं थी क़ूवते गोयाई रात भर

मैँ दमबख़ुद था देख के उसका वफ़ूरे शौक़
वह मुझ को देख देख के शरमाई रात भर

बातों में उसकी आगया मैं और कहा कि जाओ
मैँ फिर मिलूँगी उसने क़सम खाई रात भर

यह जानते हुए भी कि वादा शिकन है वह
मैं मुंतज़िर था चलती थी पुरवाई रात भर

करता रहा मैँ उसका कई दिन तक इंतेज़ार
लेकिन वह ख्वाब मेँ भी नहीँ आई रात भर

बर्क़ी नेशाते रूह था मेरा जुनूने शौक़
मैं कर रहा था अंजुमन आराई रात भर

मेरी जानिब निगाहें उसकी हैं दुज़दीदह दुज़दीदह

मेरी जानिब निगाहें उसकी की हैं दुज़दीदह दुज़दीदह
जुनूने शौक़ में दिल है मेरा शोरीदह शोरीदह

न पूछ ऐ हमनशीं कैसे गुज़रती है शबे फ़ुर्क़त
मैं हूँ आज़ुर्दह ख़ातिर वह भी है रंजीदह रंजीदह

गुमाँ होता है हर आहट पे मुझको उसके आने का
तसव्वुर में मेरे रहता है वह ख़्वाबीदह ख़्वाबीदह

वह पहले तो न था ऐसा उसे क्या हो गया आख़िर
नज़र आता है वह अकसर मुझे संजीदह संजीदह

न पूछो मेरी इस वारफ़्तगी ए शौक़ का आलम
ख़लिश दिल की मुझे कर देती है नमदीदह नमदीदह

बहुत पुरकैफ़ था उसका तसव्वुर शामे तनहाई
निगाहे शौक़ है अब मुज़तरिब नादीदह नादीदह

सफर दश्ते तमन्ना का बहुत दुशवार है बर्क़ी
पहुँच जाऊँगा मैं लेकिन वहाँ लग़ज़ीदह लग़ज़ीदह

सफ़र नया ज़िंदगी का तुमको न रास आए तो लौट आना

सफ़र नया ज़िंदगी का तुमको न रास आए तो लौट आना
फ़िराक़ में मेरे नींद तुमको अगर न आए तो लौट आना

नहीं है अब कैफ़ कोई बाक़ी तुम्हारे जाने से ज़िंदगी में
तुम्हें भी रह-रह के याद मेरी अगर सताए तो लौट आना

तेरे लिए मेरा दर हमेशा इसी तरह से खुला रहेगा
अगर कभी वापसी का दिल में ख़याल आए तो लौट आना

बग़ैर तेरे बुझा- बुझा है बहार का ख़ुशगवार मंज़र
तुझे भी यह ख़ुशगवार मंज़र अगर न भाए तो लौट आना

तुम्हारी सरगोशियाँ अभी तक वह मेरे कानों में गूँजती हैं
हसीन लमहा वह ज़िंदगी का जो याद आए तो लौट आना

ग़ज़ल सुनाऊँ मैं किसको हमदम कि मेरी जाने ग़ज़ल तुम्हीं हो
दोबारा वह नग़म-ए- मोहब्बत जो याद आए तो लौट आना

ख़याल इसका नहीं कि दुनिया हमारे बारे में क्या कहेगी
जो कोई तुमसे न अपना अहदे वफ़ा निभाए तो लौट आना

है दिन में बे-कैफ़ क़लबे मुज़तर बहुत ही सब्र आज़मा हैं रातें
तुम्हेँ भी ऐसे मे याद मेरी अगर सताए तो लौट आना

तुझे भी एहसास होगा कैसे शबे जुदाई गुज़र रही है
सँभालने से भी दिल जो तेरा संभल न पाए तो लौट आना

कभी न तू रह सकेगा मेरे बग़ैर ‘बर्क़ी’ मुझे यक़ीं है
ख़याल मेरा जो तेरे दिल से कभी न जाए तो लौट आना

जब मेरे सामने तेरा रुख़ ए ज़ेबा होगा

जब मेरे सामने तेरा रुख़-ए-ज़ेबा होगा
तब कहीं जा के शब-ए-गम का सवेरा होगा

है मेरा ख़ान-ए-दिल तेरे लिए चश्म बराह
तू न आएगा अगर कैसे गुज़ारा होगा

किस तरह मेरे गुज़रते हैं शब-ओ-रोज़ न पूछ
होगा महसूस तुझे जब कभी तन्हा होगा

गुलबदन,गुन्चा दहन,ज़ोहरा जबीन,जान ए ग़ज़ल
कितना पुरकैफ़ -ओ- हसीन तेरा नज़ारा होगा

है तेरी जलवागाह-ए-नाज़-ओ-अदा होश रूबा
सोचता हूँ मैं सरापा तेरा कैसा होगा

है मुझे जोश-ए-जुनून में भी तेरा पास ओ लहाज़
तू हो रुसवा यह मुझे कैसे गवारा होगा

यह तेरी ज़ुल्फ -ए-गिरहगीर है ग़ारतगरे होश
तुझ को मश्शात-ए-फ़ितरत ने सँवारा होगा

तेरा जाना है खिज़ां और तेरा आना है बहार
तू न होगा तो यह बेकैफ़ नज़ारा होगा

तेरी तस्वीर ए तस्व्वुर है निहायत पुरकैफ़
होगा क्या रूबरू जब भी तेरा जलवा होगा

लाया यह सोज़-ए-दुरून रंग बिल-आख़िर “बर्क़ी”
अब तेरे सामने वो हुस्न-ए-दिलारा होगा

अफसाना -ए- हयात का उनवाँ तुम्हीं तो हो

अफसाना -ए- हयात का उनवाँ तुम्हीं तो हो
तारे नफ़स है जिस से ग़ज़लख्वाँ तुम्हीं तो हो

रोशन है तुम से शमए शबिस्ताने आरज़ू
मेरे नेशाते रूह का सामाँ तुम्हीं तो हो

आबाद तुमसे ख़ान -ए-दिल था मेरा मगर
जिसने किया है अब उसे वीराँ तुम्हीं तो हो

कुछ तो बताओ मुझसे कि आख़िर कहाँ हो तुम
नूरे निगाहें दीद -ए- हैराँ तुम्हीं तो हो

मैँ देखता हूँ बज़्मे नेगाराँ में हर तरफ
जो है मेरी निगाह से पिनहाँ तुम्हीं तो हो

करते हो बात बात में क्यों मुझसे दिल्लगी
जिसने किया है मुझको परीशाँ तुम्हीं तो हो

क्योँ ले रहे हो मेरी मोहब्बत का इम्तेहाँ
लूटा है जिसने मेरा दिलो जाँ तुम्हीँ तो हो

है मौसमे बहार में बेकैफ ज़िंदगी
मश्शात- ए- उरूसे बहाराँ तुम्हीं तो हो

“बर्क़ी” के इंतेज़ार की अब हो गई है हद
उसके तसव्वुरात में रक़साँ तुम्हीं तो हो

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