अहमद रिज़वान की रचनाएँ

आँखें बनाता दश्त की वुसअत को देखता 

आँखें बनाता दश्त की वुसअत को देखता
हैरत बनाने वाले की हैरत को देखता

होता न कोई कार-ए-ज़माना मिरे सुपुर्द
बस अपने कारोबार-ए-मोहब्बत को देखता

कर के नगर नगर का सफ़र इस ज़मीन पर
लोगों की बूद-ओ-बाश ओ रिवायत को देखता

आता अगर ख़याल शजर छाँव में नहीं
घर से निकल के धूप की हिद्दत को देखता

यूँ लग रहा था मैं कोई सहरा का पेड़ हूँ
उस शाम तो अगर मिरी हालत को देखता

‘अहमद’ वो इज़्न-ए-दीद जो देता तो एक शाम
ख़ुद पर गुज़रने वाली अज़िय्यत को देखता

आता ही नहीं होने का यक़ीं क्या बात करूँ 

आता ही नहीं होने का यक़ीं क्या बात करूँ
है दूर बहुत वो ख़्वाब-नशीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ जो अक्स था मेरी आँखों में
वो छोड़ गया इक शाम कहीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ जो घड़ियाँ मेरी हमदम थीं
वो घड़ियाँ ही आज़ार बनी क्या बात करूँ

क्या बात करूँ मिरे साथी मुझ से छूट गए
वो लोग नहीं वो ख़्वाब नहीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ ये लोग भला कब सुनते हैं
सब बातें अंदर डूब गईं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ अपनों की जितनी लाशें थीं
मिरे सीने में सब आन गिरीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ जो बातें तुम से करनी थीं
अब उन बातों का वक़्त नहीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ कभी पानी बातें करता था
ये दरिया इस की ख़ुश्क ज़मीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ सहरा में चाँद अकेला है
और मेरे साथ भी कोई नहीं क्या बात करूँ

क्या बात करूँ ‘रिज़वान’ कि रोना आता है
सब बातें उस की बात से थीं क्या बात करूँ

बात करने का नहीं सामने आने का नहीं 

बात करने का नहीं सामने आने का नहीं
वो मुझे मेरी अज़िय्यत से बचाने का नहीं

दूर इक शहर है जो पास बुलाता है मुझे
वर्ना ये शहर कहीं छोड़ के जाने का नहीं

क्या यूँही रोत के पहलू में कटेगी ये हयात
क्या कोई शहर के लोगों को जगाने का नहीं

अजनबी लोग हैं मैं जिन में घिरा रहता हूँ
आश्ना कोई यहाँ मेरे फ़साने का नहीं

ये जो इक शहर है ये जिस पे तसर्रूफ़ है मिरा
मैं यहाँ कोई भी दीवार बनाने का नहीं

बाद मुद्दत के जो आया था वही लौट गया
अब यहाँ कोई चराग़ों को जलाने का नहीं

आने वाली है नई सुब्ह ज़रा देर के बाद
क्या कोई राह-ए-तमन्ना को सजाने का नहीं

ख़ाक देखी है शफ़क़ ज़ार-ए-फ़लक देखा है 

ख़ाक देखी है शफ़क़ ज़ार-ए-फ़लक देखा है
ज़र्फ़ भर तेरी तमन्ना में भटक देखा है

ऐसा लगता है कोई देख रहा है मुझ को
लाख इस वहम को सोचों से झटक देखा है

क़ुदरत-ए-ज़ब्त भी लोगों को दिखाई हम ने
सूरत-ए-अश्क भी आँखों से छलक देखा है

जाने तुम कौन से मंज़र में छुपे बैठे हो
मेरी आँखों ने बहुत दूर तलक देखा है

रात का ख़ौफ़ नहीं घटता अंधेरा तो कुजा
सब तरह-दार सितारों ने चमक देखा है

एक मुद्दत से उसे देख रहा हूँ ‘अहमद’
और लगता है अभी एक झलक देखा है

किसी को छोड़ देता हूँ किसी के साथ चलता हूँ 

किसी को छोड़ देता हूँ किसी के साथ चलता हूँ
मैं चलता हूँ तो वाबस्तगी के साथ चलता हूँ

सितारे बाँटने वाले किसी पल लौट आएँगे
चलो कुछ देर यूँही तीरगी के साथ चलता हूँ

मुझे ये क्या पड़ी है कौन मेरा हम-सफ़र होगा
हवा के साथ गाता हूँ नदी के साथ चलता हूँ

वो कहते हैं ज़माना तेज़ है लम्बी मसाफ़त है
मोहब्बत का सितारा हूँ सभी के साथ चलता हूँ

बदलते मौसमों का ख़्वाब हूँ कितने ज़मानों से
यहाँ मैं कारवान-ए-ज़िंदगी के साथ चलता हूँ

मनाज़िर रोक लेते हैं मिरे उठते क़दम ‘अहमद’
ज़रा सा भी अगर बेगानगी के साथ चलता हूँ

मैं ख़ाक हो रहा हूँ यहाँ ख़ाक-दान में

मैं ख़ाक हो रहा हूँ यहाँ ख़ाक-दान में
वो रंग भर रहा है उधर आसमान में

ये कौन बोलता है मिरे दिल के अंदरूँ
आवाज़ किस की गूँजती है इस मकान में

फिर यूँ हुआ कि ज़मज़मा-पर्दाज़ हो गई
वो अंदलीब और किसी गुलसितान में

उड़ती है खाक दिल के दरीचों के आस पास
शायद मकीन कोई नहीं इस मकान में

यूँही नहीं रूका था ज़रा देर को सफ़र
दीवार आ गई थी कोई दरमियान में

इक ख़्वाब की तलाश में निकला हुआ वजूद
शायद पहुँच चुका है किसी दास्तान में

‘अहमद’ तराशता हूँ कहीं बाद में उसे
तस्वीर देख लेता हूँ पहले चटान में

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