आग़ा ‘शाएर’ क़ज़लबाश की रचनाएँ

बहार आई है फिर चमन में नसीम

बहार आई है फिर चमन में नसीम इठला के चल रही है
हर एक गुंचा चटक रहा है गुलों की रंगत बदल रही है

वो आ गए लो वो जी उठा मैं अदू की उम्मीद-ए-यास ठहरी
अजब तमाशा है दिल-लगी है क़ज़ा खड़ी हाथ मल रही है

बताओ दिल दूँ न दूँ कहो तो अजीब नाज़ुक मआमला है
इधर तो देखो नज़र मिलाओ ये किस की शोख़ी मचल रही है

तड़प रहा हूँ यहाँ मैं तंहा वहाँ अदू से वो हम-बग़ल हैं
किसी के दम पर बनी हुई है किसी की हसरत निकल रही है

घटा वो छाई वो अब्र उठा यही तो है वक़्त मय-कशी का
बुलाओ ‘शाएर’ को है कहाँ वो शराब शीशे से ढल रही है

दिल सर्द हो गया है तबीअत बुझी हुई

दिल सर्द हो गया है तबीअत बुझी हुई
अब क्या है वो उतर गई नद्दी चढ़ी हुई

तुम जान दे के लेते हो ये भी नई हुई
लेते नहीं सख़ी तो कोई चीज़ दी हुई

इस टूटे फूटे दिल को न छेड़ो परे हटो
क्या कर रहे हो आग है इस में दबी हुई

लो हम बताएँ ग़ुंचा ओ गुल में है फ़र्क़ क्या
इक बात है कही हुई इक बे-कही हुई

ख़ूँ-रेज़ जिस क़दर हैं वो रहते हैं सर-निगूँ
ख़ंजर हुआ कटार हुई या छुरी हुई

‘शाएर’ ख़ुदा के वास्ते तौबा का क्या क़ुसूर
है किस के मुँह से फिर ये सुबूही लगी हुई

जब्र को इख़्तियार कौन करे 

जब्र को इख़्तियार कौन करे
तुम से ज़ालिम को प्यार कौन करे

ज़िंदगी है हज़ार ग़म का नाम
इस समुंदर को पार कौन करे

आप का वादा आप का दीदार
हश्र तक इंतिज़ार कौन करे

अपना दिल अपनी जान का दुश्मन
ग़ैर का ऐतबार कौन करे

हम जिलाए गए हैं मरने को
इस करम की सहार कौन करे

आदमी बुलबुला है पानी का
ज़ीस्त का ऐतबार कौन करे

मुझ को आता है तयम्मुम न वज़ू आता

मुझ को आता है तयम्मुम न वज़ू आता है
सजदा कर लेता हूँ जब सामने तू आता है

यूँ तो शिकवा भी हमें आईना-रू आता है
होंट सिल जाते हैं जब सामने तू आता है

हाथ धोए हुए हूँ नीस्ती ओ हस्ती से
शैख़ क्या पूछता है मुझ से वज़ू आता है

मिन्नतें करती है शोख़ी के मना लूँ तुझ को
जब मेरे सामने रूठा हुआ तू आता है

पूछते क्या हो तमन्नाओं की हालत क्या है
साँस के साथ अब अश्कों में लहू आता है

यार का घर कोई काबा तो नहीं है ‘शाएर’
हाए कमबख़्त यहीं मरने को तू आता है

रोने से जो भड़ास थी दिल की निकल

रोने से जो भड़ास थी दिल की निकल गई
आँसू बहाए चार तबीअत सँभल गई

मैं ने तरस तरस के गुज़ारी है सारी उम्र
मेरी न होगी जान जो हसरत निकल गई

बे-चैन हूँ मैं जब से नहीं दिल-लगी कहीं
वो दर्द क्या गया के मेरे दिल की कल गई

कहता है चारा-गर के न पाएगा इंदिमाल
अच्छा हुआ के ज़ख्म की सूरत बदल गई

ऐ शम्मा हम से सोज़-ए-मोहब्बत के ज़ब्त सीख
कमबख़्त एक रात में सारी पिघल गई

शाख़-ए-निहाल-ए-उम्र हमारी न फल सकी
ये तो है वो कली जो निकलते ही जल गई

देखा जो उस ने प्यार से अग़्यार की तरफ़
‘शाएर’ क़सम ख़ुदा की मेरी जान जल गई

उन्स अपने में कहीं पाया न बे-गाने 

उन्स अपने में कहीं पाया न बे-गाने में था
क्या नशा है सारा आलम एक पैमाने में था

आह इतनी काविशें ये शोर-ओ-शर ये इज़्तिराब
एक चुटकी ख़ाक की दो पर ये परवाने में था

आप ही उस ने अनलहक़ कह दिया इलज़ाम क्या
होश किस ने ले लिया था होश दीवाने में था

अल्लाह अल्लाह ख़ाक में मिलते ही ये पा-ए-समर
लो ख़ुदा की शान फल भी फूल भी दाने में था

शैख़ को जो पारसा कहता है उस को क्या कहूँ
मैं ने अपनी आँख से देखा वो मै-ख़ाने में था

‘शाएर’-ए-नाज़ुक-तबीअत हूँ मेरा दिल कट गया
साक़िया लेना के शायद बाल पैमाने में था

ज़र्रा भी अगर रंग-ए-ख़ुदाई नहीं देता 

ज़र्रा भी अगर रंग-ए-ख़ुदाई नहीं देता
अंधा है तुझे कुछ भी दिखाई नहीं देता

दिल की बुरी आदत है जो मिटता है बुतों पर
वल्लाह मैं उन को तो बुराई नहीं देता

किस तरह जवानी में चलूँ राह पे नासेह
ये उम्र ही ऐसी है सुझाई नहीं देता

गिरता है उसी वक़्त बशर मुँह के बल आ कर
जब तेरे सिवा कोई दिखाई नहीं देता

सुन कर मेरी फ़रियाद वो ये कहते हैं ‘शाएर’
इस तरह तो कोई भी दुहाई नहीं देता

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