आग्नेय की रचनाएँ

आखेट

तुम
उस परिन्दे की तरह
कब तक डैने फड़फड़ाओगे
जिसकी गर्दन पर रखा हुआ है
चाहत का चाकू

उड़ान भरने से पहले ही
तुमने खो दिए हैं अपने पंख
प्यास बुझने के पहले ही
विष पी लिया
अमृत पान के लिए

तुम्हारे जैसा कौन मरता है
लालसाओं के जलसाघरों में
तिल-तिल, घुट-घुट कर
न तुम्हें प्रेम करना आया

बहती रही वह
तुम्हारी धमनियों में
रक्त की वर्णमाला की तरह
अलिखित अपरिभाषित
और न तुम्हें घृणा करना आया

जिसे तुम नकटी जदूगरनी
कहते ही उदास होकर रो देते हो

सारा जीवन किसके मायाजाल में
जकड़े रहे
कि अन्त में स्पाइडर की तरह
अपनी ही वासना की चरम परिणति में
आखेट कर लिए गए।

मरण

कुछ लोग जीते रहते हैं
आगे के समय में
मर जाने के लिए

अब तक मैं कैसे जीता रहा हूँ
जब पिछले समय में
मर चुका हूँ
कई-कई बार

जिससे तुम अब मिलती हो
वह मैं नहीं
मेरा प्रेत है

मैं ऎसा प्रेत हूँ
जिसे न जाने
क्यों तुम प्रेम मानने से
अस्वीकार करती हो

बार-बार
क्या तुम मुझे
एक प्रेत की तरह भी
जीने नहीं दोगी
अपने संसार में?

प्रस्थान 

तुम्हें आख़िरकार
देख रहा हूँ

तुम्हारी आँखों में
गुज़रे वक़्त के आँसू हैं

मैं तुम्हें हमेशा के लिए
छोड़कर जाने वाला हूँ

यकायक देखता हूँ
तुम्हारे पीछे खड़ी
एक दूसरी स्त्री को
जो लगभग तुम्हारी जैसी है

मुझ से कह रही है
किसी को छोड़कर तुम
कैसे पा सकोगे मुझे?

प्रतिध्वनि

देखना
एक दिन
इस तरह चला जाऊंगा
ढूंढोगी तो दिखूंगा नहीं

लौटता रहा हूँ बार-बार
प्रतिध्वनि बनकर
तुम्हारे जीवन में

देखना
एक दिन
इस तरह चला जाऊंगा

लौट नहीं पाऊंगा
प्रतिध्वनि बनकर
तुम्हारे जीवन में।

चयन

चुन नहीं सका
अभी तक
जीवन और मृत्यु के बीच

उसके आगमन से
लगता था
वह सम्पूर्ण जीवन है
वह जीवन का आनन्द है
उसका आह्लाद है

जीवन और मृत्यु के बीच
समय ने बनाना चाहा
शाश्वत प्रेम का सेतु

जीवन में उसका ठहरना
और निरन्तर रहना
सम्पूर्ण जीवन का आभास देकर
अचानक उसका चले जाना

देकर मृत्यु का एकान्त
उसकी निर्जनता
उसकी भव्यता

अब, कितना आसान है
उसके प्रस्थान से
चुनना जीवन और मृत्यु के बीच।

मेरा घर 

यह घर जो मेरा घर है
मेरे लिए अपमान का घर हो गया है
इसकी हर चीज़ जो मेरे लिए लाई गई
अचानक मुझसे ही घृणारत है।
इस अपमान के घर को
अब मुझे छोड़कर जाना ही होगा
रेत का महल है मेरा घर,
अपमान का घर इसी तरह का होता है
ताश का घर है मेरा घर,
तिरस्कृत का घर इसी तरह का होता है
पल भर में उसे ढह जाना है
उसे रौंद दिए जाने वाले पैर उठ चुके हैं
हवा चल चुकी है-
उड़ जाने वाला है मेरा घर
इस घर में दब जाने के पहले ही
मुझे इस घर से
चुपचाप खिसक जाना है

डसने के पहले

यद्यपि
उसने डसने से पहले
कई रंग बदले
वह गिरगिट नहीं था
बदलते रंगों का यह परिवर्तन
सिर्फ़ प्रकृति की माया नहीं थी
उसकी आत्मा भी
भूरी मटमैली और काली थी
रंग बदलने वाली
उसकी चमड़ी की तरह
दरअसल वह गिरगिट था ही नहीं
वह साँप था
डसे जाने के पहले
उसे ऎसा प्रमाणित करने के लिए
मेरे पास पर्याप्त सबूत नहीं थे।

नमक

उसने कहा :
तुम पृथ्वी का नमक बनो
वह हाड़-माँस का पुतला बना रहा
किसी ने सुई की नोंक चुभा दी
करता रहा वह अरण्य-रुदन
काल-रात्रि के भय से।
किसी ने गुदगुदा दिया
खिलखिलता रहा नंदन-वन जैसा।
कभी किसी ने बैठा दिया रत्न-जड़ित सिंहासन पर
अपनी बत्तीसी दिखा अकड़ गया कंकाल-सा
किसी ने गिरा दिया, रौंद दिया गया चींटियो-सा।
उसने फिर कहा :
तुम बन नहीं सके
किसी के भोजन का स्वाद।
अब जलते रहो अनन्त काल तक
दावानल में
जलता है जैसा सूर्य अनादि काल से।

दीमक-समय 

मैं दुधारी तलवार के लिए
खड़ा हूँ
समय के खिलाफ़
पंख वाले चींटे के पास
जितना समय है उतना ही समय है
दीमक-समय जीवन का सब कुछ
चाट जाएगा
गिद्ध-समय शरीर के सारे अंग
भकोस लेगा
दुधारी तलवार के लिए
खड़ा रहेगा मेरा कंकाल
क्यों खड़ा हूँ ? फिर भी
मैं दुधारी तलवार लिए
समय के खिलाफ़।

गमन 

फूल के बोझ से
टूटती नहीं है टहनी
फूल ही अलग कर दिया जाता है
टहनी से

उसी तरह टूटता है संसार
टूटता जाता है संसार–
मेरा और तुम्हारा

चमत्कार है या अत्याचार है
इस टूटते जाने में
सिर्फ़ जानता है

टहनी से अलग कर दिया गया
फूल

सम्पूर्णता

वह आकाश की ओर
देखती रही
जबकि मैं उसके निकट
छाया की तरह लिपटा था,
उसका हाथ
दूसरी स्त्री के कन्धे पर था,
जबकि मैं उसके चारों ओर
हवा की तरह ठहरा था,
भरी-पूरी स्त्री का भरा-पूरा प्यार
अन्तिम इच्छा की तरह जी लेने के लिए
मैं उसे हरदम
पल्लवित और फलवती
पृथ्वी की सम्पूर्णता की तरह
रचता रहूंगा

रतजगा 

मुझे जागते रहना है–
एक कथा और सुनाओ
ख़त्म हो जाए तो और कथाएँ सुनाओ
समुद्र में रहने वाली मछलियों
साइबेरिया से आने वाली बत्तखों
बब्बर शेर, चालक लोमड़ी, हँसते लकड़बग्घे की कथाएँ
परिन्दों, दरख़्तों और जंगलों
रेशम बुनते कीड़ों, घड़ियालों
ध्रुवों पर जमी बर्फ़, प्राणरक्षक औषधियों
और सदाबहार वनस्पतियों की कथाएँ
इन सबकी कथाएँ सुनाते रहना
मुझे जगाए रखना
मेरे कानों में फुसफुसाकर कहना :
वे मनुष्यों की दुनिया से दुखी हैं
उनके संताप की कथा सुनाकर
मुझे जगाए रखना

कल 

सीना तानकर चलता हूँ दिन-रात
गजराज की तरह झूमता हूँ सड़कों पर
अपने मित्रों और शत्रुओं के समक्ष
दम्भ से भरी रहती है मेरी मुखाकृति–मेरी वाणी
अलस्स सवेरे गुज़रता हूँ उस सड़क पर
जिसके बाईं ओर शमशान है
विनम्र हो जाता हूँ चींटी की तरह
आज स्वयं चलकर आया हूँ यहाँ तक
कल लाया जाऊंगा कन्धों पर यहाँ तक

युद्ध

एक माँ
सुनकर
अपने बेटे की मृत्यु का समाचार,
जला देती है
दूसरी माँओं के बेटों को
अपने फूस के घर में
आए थे
जो अतिथि बनकर
उसके घर में

मेरा घर, उसका घर 

एक चिड़िया
प्रतिदिन मेरे घर आती है
जानता नहीं हूँ उसका नाम
सिर्फ़ पहचानता हूँ उसको
वह चहचहाती है देर तक
ढूँढती है दाने :
और फिर उड़ जाती है
अपने घर की ओर
पर उसका घर कहाँ है?
घर है भीउसका
या नहीं है उसका घर?
यदि उसका घर है
तब भी उसका घर
मेरे घर जैसा नहीं होगा
लहूलुहान और हाहाकार से भरा
फिर क्यों आती है
वह मेरे घर
प्रतिदिन चहचहाने

वे अब भी हँस रहे हैं

अब नहीं चमकता है चन्द्रमा
बुझ चुकी है
शाम से जलने वाली आग
घुप्प अंधेरे में
वे सब हँस रहे हैं
उनके साथ हँस रहे हैं
उनके बच्चे, उनकी बकरियाँ
उनके गदहे और उनके कुत्ते
मेरे घर और उनके घुप्प अंधेरे के बीच
पसरी है एक सड़क
दस क़दमों में पार की जा सकने वाली सड़क
उनका हँसना,
चट कर जाएगा
मेरा घर, मेरा सुख-संसार
रोकना है मुझे
उनकी हँसी को
बना देना है
सड़क से आकाश तक जाने वाली दीवार
दीवार के उस पार
अब भी हँस रहे हैं
नष्ट हो चुकी है
दीवार बनाए जाने की अन्तिम सम्भावना
वे सब अब भी हँस रहे हैं।

कहाँ हैं वे मेरी कविताएँ

कहाँ गई वे मेरी कविताएँ
क़िताबों के पन्नों में दबा
दी गई थीं जो मेरी कविताएँ
जो छपने वाली थीं क़िताबों में
जिनके लिए सन्तापों की गठरी
सिर पर धरे भागता रहा
इस नगर से उस नगर तक
जिनके लिए हाथियों के पैरों तले
कुचला जाता रहा हूँ चींटियों जैसा
जिनके लिए मधुमक्खियों को छत्तों में
पकता रहा हूँ शहद जैसा
दुबारा कैसे मिलेंगी कविताएँ
खो गईं मेरी कविताएँ
दूसरे लोग जब लिखेंगे मेरी कविताएँ
तभी मिलेंगी खोई मेरी कविताएँ

अंत में मैं ही हँसूंगा 

अंत में मैं ही हँसूंगा
सर्वप्रथम मैं ही रहूंगा
अन्तिम होने पर भी
राख की ढेरी होते हुए भी
ज्वालामुखी-सा धधकूंगा
काफ़्का का किला होकर भी
खुले हुए आँगन की तरह
खुला रहूँगा
गिलहरियोंके लिए
उनकी चंचलता
चिडियों के लिए
उनकी प्रसन्नता
चींटियों के लिए
उनका अन्न
नदियों के लिए
उनका जल
उदास मनुष्यों की उदास दुनिया के लिए
उसका स्वप्न
लेकर जल्दी ही आऊँगा
अंत में मैं ही हँसूंगा

शिखर पर बौने 

नहीं ले सका
दीमक से उसका विध्वंस
मधुमक्खियों से उनका रस
तितलियों से उनका रंग
चींटियों से उनका गौरव
नहीं ले सका
सर्वहारा से उनका साहस
मित्रों से उनकी आत्मीयता
मनुष्यों से उनका सम्मान
अपनी दरिद्रता ओढे हुए
सोता रहा विद्वानों की सभाओं में
अपनी ही ग्लानि पोते हुए मुख पर
दिखता रहा सबको सब स्थानों पर
अपनी पीठ पर असंख्य धिक्कार लादे
दौड़ता रहा सीढ़ियों पर
पहुँचने के लिए वहाँ
बसते हैं जहाँ
बौने शिखरों पर

उसके लिए 

रात में जिसे प्यार करता हूँ
दिन में उससे ही घृणा करता हूँ
अंधकार में ही खड़े रहें सब
स्थगित रहे सूर्य का प्रकाश
जब तक मैं बचा हूँ
जानता हूँ रचा गया है सूर्य
जीवन के लिए
अंधकार भी तो रचा गया है
प्रेम के लिए
अंतत: मुझे अंधकार में
उसके साथ
उसके प्रेम के लिए खड़ा रहना है ।

सिर्फ़ प्रतीक्षा

कहीं कोई सूखा पेड़
फिर हरा हो गया।
कहीं कोई बादलों पर
फिर इन्द्रधनुष लिख गया।
कहीं कोई शाम का सूरज
फिर डूब गया।
हम भुतही पुलियों पर
पतलूनों की जेबों में
बादल, इन्द्रधनुष, डूबते सूरज
भरे किसकी प्रतीक्षा करते हैं।
अरे! वह हरा पेड़ तो
फिर से सूख गया!
अरे! वह लिखा इन्द्रधनुष
फिर से बादल हो गया!
अरे! वह डूबता सूरज तो
सिर्फ़ प्रतीक्षा है!

Share