आदर्श सिंह ‘निखिल’ की रचनाएँ

याद रखना 

मिथ्य जुगनू चाँद तारे क्षितिज अम्बर सिंधु सरिता
पुष्प उपवन भ्रमर तितली बदलते मौसम गुलाबी
मेघ पुरवा मोर कोकिल रात दिन या भोर शामें
सब लिखा ही जा चुका जब फिर भला आवृत्तियाँ क्यों
तात नूतन बिम्ब लेकर यदि रचोगे गीत कोई
रागिनी स्वर में स्वयं गायन करेगी, याद रखना।

उर्वशी या मेनका के रूप से आबिद्ध चिंतन
राधिका के प्रेम पर आकर विसर्जित ही हुआ है
रूप जीवनदायिनी के रूप से आंका सदा ही
कल्पना का पृष्ठ अब तक लेखनी से अनछुआ है
तोड़ मानस की हदें अर्जित मधुर आसव बिखेरो
तब परागों सी खुशी कण कण झरेगी, याद रखना।

युद्ध के अवरुद्ध पथ से बुद्ध के बोधत्व तक सब
शब्द चित्रों में कथानक रेशमी अलिखित कलाएं
आंसुओं के उपनयन अभिषेक की सब व्याख्याएं
सब रचीं आमोद की वाचित अवाचित मधु ऋचाएं
किन्तु इनके पार विस्तृत कल्पनाएं पढ़ सके तो
गीत माला नव सृजन पथ पग धरेगी, याद रखना।

जिन विचारों का उदधि दधि मथ लिया नवनीत मधुरिम
पुनर्मंथन से मिला आसव कहाँ पर्याप्त होगा
उल्लिखित आवृत्तियों से मन प्रफुल्लित हो भले ही
किन्तु क्या प्रारब्ध कविता का अभीप्सित प्राप्त होगा
यदि नवल आभूषणों से काव्य का श्रृंगार होगा
गीत आशातीत कविता दम भरेगी, याद रखना।

महलों के सब मौन चीखते

महलों के सब मौन चीखते
चढ़कर ऊंचे कंगूरों पर
ये मुस्काता खड़ा कौन है
झोपड़ियों की चीख मौन है।

कोई मांग रहा है खुशियां
घड़ी घड़ी हर बात बात पर
कोई सुख के बांध बनाता
रिसती पीड़ा के प्रपात पर
व्यथित हो रही भरी तिजोरी छाती पीटे साहूकारी
कैसे नाहक खुश रह लेता दरवाजे पर खड़ा भिखारी
प्राचीरों के पार सहमती
चौराहों पर भीख मौन है।

कुछ चौबारों पर सजती ये
तृष्णा की खूनी रंगोली
तुष्टि लिपे गोबर में करती
कहीं पसरकर हंसी ठिठोली
दुर्ग कंगूरे सुघड़ मलिन मन खोज रहे कोई कस्तूरी
वहां फूस की छत के नीचे कैसे दमक रही मजदूरी
नगरों की माया से विचलित
गावों की हर सीख मौन है।

अमिट क्षुधा में दफन हो गयीं
कितनी रकमें मोटी मोटी
इधर भूख संतुष्ट हो गयी
मानुष चार महज दो रोटी
कांप रही ये शीत लहर से थर थर मोटी गरम रजाई
मुस्काता नंगा तन चूमे कैसे ठिठुर रही पुरवाई
अर्थतंत्र द्वारा उन्मूलित
वेदों की तारीख मौन है।

गीत कहा तो होंगे गीत

जीवन के सब रंग सुनहरे
अक्षर अक्षर पिरो पिरोकर
भावों की तूलिका मनोहर
चित्ताकर्षक चित्र बनाये
चित्र स्वयं सब मुखर हुए जब
अंतर्मन से प्रतिध्वनि आई
इन सस्वर ध्वनियों को जग ने
गीत कहा तो होंगे गीत।

आशाओं के पुच्छल तारे
नभ से झांक रहे चमकीले
छद्म लब्धियों के सब टीले
संभवतः होंगे रेतीले
छिड़क गया सागर के तटपर
कोई जैसे मुट्ठी भरकर
उंगली से लिख जाती होंगी
बैठ दिशाएं सागर तट पर
लहरें जिनको पढ़ लिख आती
सिंधु जिन्हें स्वर देता रहता
उन नश्वर ध्वनियों को जग ने
गीत कहा तो होंगे गीत।

लगता एक गुरुत्वाकर्षण
अनुभावों के धूमकेतु पर
उभय तटों का क्रंदन सुनता
मांझी बेबस नीर सेतु पर
सरिता नेहिल सुर संवाहक
बही जन्म जन्मों की प्यासी
उल्लासों की लहरें लेकर
तट की विचलित मौन उदासी
सब सहेज ऊंचे पर्वत से
घाट घाट को सौंप रही जो
प्रलयंकर ध्वनियों को जग ने
गीत कहा तो होंगे गीत।

अन्तस की उदीप्त पिपासा
स्मृतियों की धूप छांव में
मेघदूत संदेशे लेकर
जाते अलकापुरी गांव में
उद्वेलित मानस की पीड़ा
ऋतुएं मूक सुनाएं गाएं
विरह वेदना की लपटों में
मधुरिम वात गात झुलसाएं
पिघले मन के शब्द पत्र सब
सावन या पलाश से झरते
उन निर्झर ध्वनियों को जग ने
गीत कहा तो होंगे गीत।

रात अकेली पगली बेसुध

रात अकेली पगली बेसुध सिसक सिसक कर रोई ।

उसकी श्यामल काया का उपहास उड़ाते तारे
हा! अभाग लो भोर किये हो निष्ठुर वारे न्यारे
झिलमिल मोती जो वसुधा के आंचल पर कुछ टांकें
शबनम शब नम नयनों से मधु छिड़क छिड़क कर रोई।

थकित निराश मनुजता को भर आलिंगन दुलराया
भर सामर्थ्य निराशा में आशा का मंत्र सिखाया
उस पर ही आक्षेप उसी का चित्रण कलुषित कल्पित
सुनती सहती किन्तु अकिंचन बिखर बिखर कर रोई।

चाँद भला है तारे प्यारे बादल और दिशाएं
सबमें जग ने ढूढ़ निकाली कितनी मधुर कलाएं
कुत्सित मानस की प्रतिबिम्ब बनी पर मौन रही वो
निशा अंधेरी नभ से बेबस उतर उतर कर रोई।

कहते होंगे कहने वाले लेकिन धीरज धारो
ओ नवजीवन की संवाहक जग को पार उतारो
तुम बिन सम्भव नहीं पार हो जीवन की वैतरणी
ये सुन मुझको अंक लगाया वो झर झर कर रोई।

बादल लेकर जाओ

मिट पिपासा मन अतृप्त मरु जीवन करुणा सागर
सुनो हवाओं नभ से काले बादल लेकर जाओ।

बांच न पाए जीते जी खलिहानों की खामोशी
फिर निर्वाण असम्भव प्यारे क्या मगहर क्या काशी
पियो हलाहल या अमृत सम उभय परिस्थितियां ये
वैतरणी तरणार्थ न दो गंगाजल लेकर जाओ।

मनोवृत्तियों के आंगन में धूमिल नैतिकताएं
फिर कंदीलें जलें जलें या सूरज भी बुझ जाएं
जमी हुई भावों की सरिता पनघट से मरघट तक
सिंधु तिरोहित अंतस की बड़वानल लेकर जाओ।

पतझड़ की अगवानी करतीं फूलों की बागानें
लो ऋतुराज समेट ले गया अपनी भव्य दुकानें
झुलसेंगी नित नूतन पीड़ाओं या संतापों में
ओ मौसम के साथी मधुरिम कोपल लेकर जाओ।

आह! ये सौंदर्य के प्रतिमान 

आह! ये सौंदर्य के प्रतिमान जो तुम गढ़ रहे हो
क्या कहीं आधार है इसका बताओ चाँद बोला।

तुम सभी उपमान जिसके नाम अब तक कर चुके हो
बस मुझे उस देवि के दर्शन करा दो याचना है
कौन वो मनमीत जिसके प्रेम के व्याख्यान पढ़ते
भूल जाते सृष्टि तुम कवि कौन वो नवयौवना है
या कि कल्पित भाव भर श्रृंगार करते स्वप्न का तुम
नित्य प्रति उत्कर्ष के सोपान मधुरिम चढ़ रहे हो
आह! ये सौंदर्य के प्रतिमान जो तुम गढ़ रहे हो
क्या कहीं आधार है इसका बताओ चाँद बोला।

मैं सहज ही मुस्कराया और फिर उससे कहा ये
देखते हो तुम गुलाबों के खिले मधुबन सुहाने
इन सभी की वो समेकित ताजगी के बिम्ब सी है
रति स्वयं श्रृंगार करती ढूढ़ आ नूतन बहाने
वो मेरा मनमीत जिसकी अर्चना करती हवाएं
और जिसके रूप के अध्याय तुम भी पढ़ रहे हो
आह! ये सौंदर्य के प्रतिमान जो तुम गढ़ रहे हो
क्या कहीं आधार है इसका बताओ चाँद बोला।

इस नदी की धार सी उन्मुक्त वो पावन सरस जो
मेघ उसके केश गुहते इत्र का छिड़काव करते
सिंधु मन विस्तृत सुकोमल कत्थई आंखे मनोरम
प्रेम की प्रतिमूर्ति अगणित भाव अन्तस् में विचरते
हाँ वही है बस वही मनमीत मेरी किन्तु नाहक
कल्पना का मिथ्य ही आरोप मुझ पर मढ़ रहे हो
आह! ये सौंदर्य के प्रतिमान जो तुम गढ़ रहे हो
क्या कहीं आधार है इसका बताओ चाँद बोला।

गुजर गयी अभिशप्त रात 

धरती के कोमल आँचल पर
झिलमिल मोती की मृदु कतार
कर यत्न रश्मि ले टांक गयी
हो कोमल काया स्याह क्षार
संतापों की जलती लौ में
पीड़ाओं सी रिसती रिसती
सब गुजर गयी अभिशप्त रात।

आक्षेपों के संस्करणों पर
यति धर धीरज धारे सुधीर
बन नीलकंठ पी गयी गरल
सब आत्मसात कर द्वंद्व पीर
पुचकार स्वप्नरत दिवसों को
भर अंक सांझ बन श्रमित भोर
उत्फुल्ल विप्लवित मानस में
जड़ में नव चेतन की हिलोर
भुवनों से गमनों में प्रभात
बस छोड़ गयी जग के उर में
आलोकित अन्तःकरणों में
धूमिल उजास के श्री पुर में
कितने हल की श्रीगाथायें
कितने अनसुलझे सवालात
तब गुजर गयी अभिशप्त रात।

मरुथल उपवन खंडहर भुवन
बिन भेद भाव सब पर उतरी
रंग एक रंग त्रैलोक निशा
कण कण पसरी तृण तृण बिखरी
रजताभ वसन श्यामल काया
शीतल आँचल मन ज्वाल जाल
वेदना तिरोहित सांसों में
कारुणिक सिंधु में स्वप्न ताल
सब प्रश्रचिन्ह लांछन तमाम
उपमान विशेषण ले निराश
सब कलुषित कर्मों की प्रतीक
मानुष मन नाहक अमलताश
निर्दिष्ट घोर तम में विवेक
उल्लिखित मिथ्य मन दृष्टिपात
कब गुजर गयी अभिशप्त रात।

अभिशप्त मौन मानस अतृप्त
जग तृष्णाओं का तुष्टि क्षेत्र
सहलाती श्रमित मनुजता को
आलिंगन ले नित मूंद नेत्र
पिघलाकर उन्नत भाल नित्य
भरती निशि-राज्ञी में जीवन
सरि सिंधु सरोवर के तट पर
धर जाती मरुथल पर मधुबन
सब ग्राह्य तुम्हे हे निराकार
अभिराम तरल मृदु सौम्य सरल
कटु कलुषित लांछन पूर्वाग्रह
मधु नीर छीर मय अमिय गरल
तुम धन्य सभ्यता संवाहक
निष्काम मनोरम पारिजात
अब गुजर गयी अभिशप्त रात
सब गुजर गयी अभिशप्त रात।

अभियोगी अभियुक्त हो गए

अभियोगी अभियुक्त हो गए

राजनीति का उड़नखटोला
जबसे चढ़ बैठे बनवारी
अंग्रेजी फूलों से महकी
गेंदा बेला की फुलवारी
भँवरे जैज बजाते फिरते
राग भैरवी मुक्त हो गए।

सारे गिरगिट प्रतिभागी थे
रंग बदलने का आयोजन
बनवारी काका भी आये
करके जनता का अभिवादन
सत्ता की गुंजाइश देखी
सारे दांव प्रयुक्त हो गए।

सांप नेवला एक हुए हैं
एक हो गए काबा काशी
अभिशापों के बोझ तले ही
राम हुए फिर से वनवासी
किये पांडवों ने समझौते
कौरव सँग संयुक्त हो गए।

जो रंग डाले तन मन सारा

इस होली में वो रंग बरसे
जो रंग डाले तन मन सारा।

वो रंग जिसमे हो प्रेम भरा
रंग सतत सफलता का मानी
रंग जो समृद्धि अवाहक हो
ज्यों धरती की चूनर धानी
जन जन के मन मे हो अविरल
सौहार्द प्रेम रंग की धारा।

हो एक रंग मानवता का
जिसमे हो जग बंधुत्व कथा
रंग एक अनोखा जो ढँक ले
आंसू करुणा सब पीर व्यथा
अमृत कर दे नव रंग सहज
निर्मल कर दे सब जल खारा।

हो एक रंग जो कांटो को
रंग दे रंग कर तितली कर दे
श्वानों के कर्कश नादों को
जो रंग सहज मुरली कर दे
उन रंगों से पथ सुगम रहे
हों रंग दीप्त ज्यों ध्रुव तारा।

गीत मुझे लिखते आए हैं 

 प्यारे गीतकार का तमगा जाओ किसी और को दे दो।
मैं क्या गीत लिखूंगा साहब गीत मुझे लिखते आए हैं।

इस चिंतन के आयामों की
दूर वहां तक जहां परिधि है
उन नंदनवन तक गीतों की
पसरी हुई मनोरम निधि है
उसके पार कहीं भावों की
सरिताएं हैं जिनके तट पर
मुझे नहीं मालूम गीत कब
लाते हैं अपने घट भर कर
सीमाओं के पार मुझे ही गीत उठाकर के लाए हैं
प्यारे गीतकार का तमगा जाओ किसी और को दे दो
मैं क्या गीत लिखूंगा साहब गीत मुझे लिखते आए हैं।

नहीं मुझे कुछ चाह ख्याति की
और न ही कुछ जय की मंशा
यदि करना है मेरी छोड़ो
बस गीतों की करो प्रशंसा
पंच तत्व की इस काया से
भली भांति परिचित हैं कैसे
मेरे सारे ही चरित्र इन
शब्दों में परिणित हैं कैसे
मेरे जैसे कितने ही इनकी छाया में सुस्ताए हैं
प्यारे गीतकार का तमगा जाओ किसी और को दे दो
मैं क्या गीत लिखूंगा साहब गीत मुझे लिखते आए हैं।

सुनता हूँ तुम लोग गीत के
विन्यासों को बांच रहे हो
भावों के अथाह सागर का
मंथन करके जांच रहे हो
मैं क्या उनका करूँ विवेचन
जो मेरा अस्तित्व समेटे
मुझ जैसे जाने कितनों के
अलिखित से व्यक्तित्व समेटे
सूखा एक सरोवर सा मैं गीत मेघ बनकर छाए हैं
प्यारे गीतकार का तमगा जाओ किसी और को दे दो
मैं क्या गीत लिखूंगा साहब गीत मुझे लिखते आए हैं।

मत मनाओ शोक प्यारी रात तुम 

मत मनाओ शोक प्यारी रात तुम।

श्यामवर्णी घूंघटों में उम्र कटना पाप ही है
चाँद के यौवन सरीखा बोझ भी अभिशाप ही है
और इस पर भी सितारों का उधम निर्बाध होना
शबनमी कुछ आंसुओं से व्योम का तुमको भिगोना
सह रही हो सब निठुर आघात तुम

टूटती हैं सब प्रथाएं जब तुम्हारी छांव पातीं
वेदनाएं जो छिपी आगोश आकर ठाँव पातीं
तुम सहस्रों वेदनाओं का करुण क्रंदन रही हो
लांछन कितने लगें जग जानता है तुम सही हो
हों बुरे मानस मगर बदजात तुम

सोचता हूं याचना कर लूं कभी दिनमान से मैं
मांग लूं कुछ लालिमा उसकी अटल पहचान से मैं
घोल दूँ लाकर तुम्हारे स्याह धूमिल आवरण में
रोप दूँ विश्वास थोड़ा सा कहीं अंतः करण में
तब न होगी शून्य या निर्वात तुम

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