आनंद कृष्ण की रचनाएँ

बाद मुद्दत के ……. 

एक ग़ज़ल : बाद मुद्दत के …….

बाद मुद्दत के इक हंसी देखी।
एक मजलूम की खुशी देखी।
उनको देखा तो यूँ लगा मुझको-
जैसे बर-बह्र शाइरी देखी।
दिल के हाथों ही हम हुए मजबूर
हमने ऐसी भी बेबसी देखी।

है सितारा बुलंद किस्मत का-
उनकी आँखों में बेखुदी देखी।

नींद- तेरा बड़ा है शुकराना
ख्वाब में हमने आशिकी देखी।

यूँ हुआ इल्म मुक़म्मल अपना-
हमने जब प्यार-दोस्ती देखी।

कोई हमदम या……………

कोई हमदम या कोई कातिल दो।
मेरी कश्ती को एक साहिल दो.

अब तो तन्हाइयां नहीं कटतीं-
दे रहे हो तो दोस्त-महफ़िल दो।

चांदनी में झुलस रहा है बदन
अब अमावस की रात झिलमिल दो।

उनकी मासूमियत का क्या कहना-?
दिल मिरा ले के कहें- “अब दिल दो.”

मुझको बख्शा है ग़र भटकना, तो-
मेरे पांवों को अब न मंजिल दो।

दोस्ती कर के देख ली मैंने-
एक दुश्मन तो मेरे काबिल दो-!

जिल्लतें, वस्ल, दर्द, तन्हाई-
कुछ तो मेरी वफ़ा का हासिल दो.

रोक पाएंगीं क्या ………

रोक पाएंगीं क्या सलाखें दो-?
जब तलक हैं य’ मेरी पांखें दो ।

जिसने सबको दवा-ए-दर्द दिया-
आज वो माँगता है- साँसें दो ।

चाह कर भी निकल नहीं सकता-
मुझको घेरे हुए हैं बाँहें दो ।

वो इबादत हो या की पूजा हो-
एक मंजिल है और राहें दो ।

मुझको कोई बचा नहीं पाया-
मेरी कातिल- तुम्हारी आँखें दो ।

या तो आंसू मिलें, या तन्हाई-
एक जुर्म की नहीं सजाएं दो ।

इक मुसाफिर ने कारवां पाया

इक मुसाफिर ने कारवां पाया।
कातिलों को भी मेहरबां पाया.

मेरे किरदार की शफाक़त ने-
हर कदम एक इम्तिहाँ पाया।

जुस्तजू में मिरी वो ताक़त है-
तुझको चाहा जहाँ-वहाँ पाया।

वो जो कहते हैं-मिरे साथ चलो
उनके क़दमों को बेनिशां पाया।

इक सितारा निशात का टूटा-
दर्द में हमने आसमां पाया.

सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी 

सूखते होंठों पे हमको तिश्नगी अच्छी लगी।
जिंदगी जीने की ऐसी बेबसी अच्छी लगी।

इस नुमाइश ने दिखाए हैं सभी रंजो-अलम-
इस नुमाइश की हमें ये तीरगी अच्छी लगी

हैं वसीले और भी, फितरत-बयानी के, लिए
पर हमें नज्मो-ग़ज़ल, ये शाइरी अच्छी लगी।

आलिमों ने इल्म की बातें बताईं हैं बहुत-
पर हकीकत में हमें दो-चार ही अच्छी लगी।

ख्वाहिशें सबकी कभी पूरी नहीं होतीं मगर-
जो तुम्हारे साथ गुज़री, जिंदगी अच्छी लगी।

आज इन हालत में भी हैं मेरे हमराह वो-
कुछ चुनिन्दा लोग- जिनको रोशनी अच्छी लगी।

तुम मुझसे बस शब्द और सुर ले पाये

तुम मुझसे बस शब्द और सुर ले पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे गीत-?

मुझको तो बस गीत सुनाना आता है,

होंठो पर संगीत सजाना आता है

गहरा रिश्ता है मेरा पीड़ाओं से-

फिर भी मुझको हास लुटाना आता है

तुम मुझको बस आह-कराहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे मीत-?

मैंने गीतों में अपनी वह प्यास पढ़ी है-

बरसों से जो प्यास उम्र के साथ चढी है

तृप्त कराने कोशिश जब जब भी हुई है-

तब-तब यह तो और उग्रतर हुई-बढ़ी है

तुम मुझको बस प्यासी तृष्णा दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी प्रीत -?

मैंने जीवन की बगिया में आंसू बोया है

मैंने जिसको चाहा है-बस उसको खोया है

पीड़ा से मेरी आँखें जब-जब भीगी हैं-

तब तब गले लिपट कर मुझसे, गीत भी रोया है।

तुम मुझको बस हार पुरानी दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी जीत -?

मुझे पता है- इन राहों में फूल नहीं हैं,

किंतु बताओ ! कहाँ जगत में शूल नहीं हैं-?

जब शूलों से यारी करना आवश्यक हो-

तब गीतों का साथ बनाना भूल नहीं है।

तुम मुझको बस चंद सलाहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी रीत -?

गर ज़मीं ……..

गर ज़मीं आशियाँ बनाने को-
तो फलक बिजलियाँ गिराने को।

किस तरह से कहें फ़साने को,
हर तरह उज्र है ज़माने को।

हमने चाहा है अश्क मिल जाए-
दर्द अपना कहीं छुपाने को।

उन गुलों को मसल दिया उसने-
जो मिले थे शहर सजाने को।

एक इंसान की ज़रूरत है-
प्यार का दीप फिर जलाने को।

जिसने बारिश की आहटें सुन लीं-
वो ही भागा है घर बचाने को।

कुछ तो उनमें वफ़ा रही होगी-
वो-जो आए हमें मनाने को।

चांदनी

क्या शरारत वहां कर रही चांदनी-?
रात भर खिडकियों पर रही चांदनी।

मैं तुम्हारे लिये गीत गाने लगा-
इसलिये आजकल डर रही चांदनी।

सब तुझे खोजते ही रहे उम्र भर-
तू छुपी सबके भीतर रही चांदनी।

फूल से सीख ली हैं सभी हरकतें-
हंस रही, खिल रही, झर रही चांदनी।

आइना देखने की ज़रूरत नहीं-
आपके हुस्न पे मर रही चांदनी।

“कृष्ण” की बांसुरी की मधुर गूंज पर
रात भर घर से बाहर रही चांदनी।

दोहे 

निकल पड़ा था भोर से पूरब का मज़दूर
दिन भर बोई धूप को लौटा थक कर चूर।

पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप
कहीं पेड़ की छाँव में इठलाता है रूप।

तपती धरती जल रही, उर वियोग की आग
मेघा प्रियतम के बिना, व्यर्थ हुए सब राग।

झरते पत्ते कर रहे, आपस में यों बात-
जीवन का यह रूप भी, लिखा हमारे माथ।

क्षीणकाय निर्बल नदी, पड़ी रेट की सेज
“आँचल में जल नहीं-” इस, पीड़ा से लबरेज़।

दोपहरी बोझिल हुई, शाम हुई निष्प्राण.
नयन उनींदे बुन रहे, सपनों भरे वितान।

उजली-उजली रात के, अगणित तारों संग.
मंद पवन की क्रोड़ में, उपजे प्रणय-प्रसंग।

गीत

तुम मुझसे बस शब्द और सुर ले पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे गीत-?

मुझको तो बस गीत सुनाना आता है,

होंठो पर संगीत सजाना आता है

गहरा रिश्ता है मेरा पीड़ाओं से-

फिर भी मुझको हास लुटाना आता है

तुम मुझको बस आह-कराहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरे मीत-?

मैंने गीतों में अपनी वह प्यास पढ़ी है-

बरसों से जो प्यास उम्र के साथ चढी है

तृप्त कराने कोशिश जब जब भी हुई है-

तब-तब यह तो और उग्रतर हुई-बढ़ी है

तुम मुझको बस प्यासी तृष्णा दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी प्रीत -?

मैंने जीवन की बगिया में आंसू बोया है

मैंने जिसको चाहा है-बस उसको खोया है

पीड़ा से मेरी आँखें जब-जब भीगी हैं-

तब तब गले लिपट कर मुझसे, गीत भी रोया है।

तुम मुझको बस हार पुरानी दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी जीत -?

मुझे पता है- इन राहों में फूल नहीं हैं,

किंतु बताओ ! कहाँ जगत में शूल नहीं हैं-?

जब शूलों से यारी करना आवश्यक हो-

तब गीतों का साथ बनाना भूल नहीं है।

तुम मुझको बस चंद सलाहें दे पाये-

पर बोलो ! कैसे छीनोगे मुझसे मेरी रीत -?

गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे 

गीत गाते रहे गुनगुनाते रहे।
रात भर महफिलों को सजाते रहे।

सबने देखी हमारी हंसी और हम-
आंसुओं से स्वयं को छुपाते रहे।

सुर्ख फूलों के आँचल ये लिख जायेंगे-
हम बनाते रहे वो मिटाते रहे।

रेत पर नक्शे-पा छोड़ने की सज़ा
उम्र भर फासलों में ही पाते रहे।

सबने यारों पे भी शक किया है मगर-
हम रकीबों को कासिद बनाते रहे।

हमको आती है यारो! ये सुनकर हंसी-
“वो हमारे लिए दिल जलाते रहे। ”

नीली आंखों के खंजर चुभे जब उन्हें-
दर्द में “कृष्ण” के गीत गाते रहे।

वे आँखें

वे आँखें जितनी चंचल हैं उससे ज्यादा मेरा मन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
कभी लजातीं, सकुचातीं सी,
और कभी झुक-झुक जाती हैं .
मुझे देखती हैं वे ऐसे-
धड़कन सी रुक-रुक जाती है .
कह देती हैं सब भेदों को, मौन नहीं हैं, वे चेतन हैं .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
ह्रदय तंत्र को छेड़-छेड़ कर,
मधुर रागिनी वे गाती हैं .
मुझको मुझसे बना अपरिचित-
इंद्रजाल-सा फैलाती हैं .
आंखों ने रच डाला जैसे-एक अनोखा-सा मधुवन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
कुछ क्षण मेरे पास बैठ कर-
आँखें दूर चली जाती हैं .
सच कहता हूँ- मुझसे मेरी-
साँसें दूर चली जाती हैं .
आंखों के जाने पर जाना- आंखों में सारा जीवन है .
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .
इठलाती मदमाती आँखें-
कितना मुझको तरसाती हैं .
सच बोलो-! क्या इन आंखों को-
थोड़ी लाज नहीं आती है-?
वे आँखें क्या नहीं जानतीं-चार दिनों का यह यौवन है-?
वे आँखें जिनमें तिर आया जैसे सारा नील गगन है .

वे संबोधन

वे संबोधन याद करो ।
अपने विगत क्षणों से प्रियतम- थोडा तो संवाद करो ।

अधरों ने विस्मृत करने का
बहुत अधिक आयास किया है ।
किंतु तुम्हारी सुधियों के संग
प्राणों ने वनवास किया है ।
स्वर्णपुरी से अब तो अपने स्वप्नों को आज़ाद करो ।
वे संबोधन याद करो ।

कभी गरजते बादल, लगता
जैसे तुमने मुझे पुकारा ।
सूखे पत्तों पर बूंदों का
राही चल-चल कर हारा ।
मेरे आंसू बह जाएंगे उनका नहीं विषाद करो।
वे संबोधन याद करो ।

जलती तप्त धरा जैसा है
मेरा मन उजडा वीराना।
नव-किसलय की कोमलता को
कभी नहीं उसने पहचाना।
अपनी मधुर हंसी से झरने जैसा कल-कल नाद करो ।
वे संबोधन याद करो ।

सोच लेंगे

सोच लेंगे कोई उलझन आ गई है बिन बुलाए-
हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।
तुम तनिक सी बात पर जब रूठते, मुंह फेर लेते,
कांपते अधरों से अस्फुट स्वरों में कुछ बोल देते
तब तुम्हारे गाल पर बिखरी हुई उस लालिमा में-
हृदय के गोपन कलश भी नेह के रंग घोल देते ।
आंसुओं से बोल दो- वे नयन में घर ना बसाएं ।
हम पहुंच जायेंगे तुम तक,क्या हुआ जो तुम ना आए ।
कल नदी ये पूछती थी – किसलिये बेचैन हो तुम १
मूर्तिवत से बैठ,विजड़ित,बन गए दो नैन हो तुम
धड़कनें ही गूंजती हैं, शब्द जैसे खो गए हैं –
वेदना का रूप धारे,ध्वनि रहित से बैन हो तुम ।
हम वहीं बैठे, तुम्हारी राह में पलकें बिछाए –
हम पहुंच जायेंगे तुम तक, क्या हुआ जो तुम ना आए ।

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