आनंद खत्री की रचनाएँ

आओ इस उम्र के दरख़्त के साए में बैठें हम तुम

आओ इस उम्र के दरख़्त के साये में बैठें हम-तुम
ज़िन्दगी मेरी दराज़ में बंद है
और घड़ी फ़ुज़ूल घूम रही है
एक उम्र का पेड़ है बादलों से लदा
मेरी खिड़की पे थोड़ा सा झुका
रात चादर से लिपटी सोई है
और मन बेचैन सपनों के साथ खेल रहा है।

इस उम्र की पत्तियों की सरसराने की आवाज़
अकेले में ही सुनाई देती है
कुछ हसीं ख़्वाब हैं बेदर्द इतने
यादों की मिट्टी पे निशाँ छोड़ गए हैं
कभी गुज़रना इस राह तो थोड़ा रुकना
तुम्हारे साये से ज़मी को नमी मिलती है।

मेरे स्याही से लदे शब्द कालिक नहीं हैं
ये ख़्वाबों के बही खाते हैं
यहाँ सूद पे सूद चड़ता है
और हक़ीक़त चाहे कितना भी क़र्ज़ चुकाये
ख़्वाबों का खाता बना ही रहता है
कभी मिटटी फिर खिली,
तो सारा आसमान खरीद लेंगे।

इस बात पर दर्द कभी न रश्क करे
कि तुम, तुम नहीं और हम, हम नहीं रहे
जो ज़िन्दा हैं, वो ही तो हैं बदलते
साये में तो रंग भी ढक जाते हैं
ये तो मिट्टी है कभी भी खिल जाती है
तुम अपनी मुस्कराहटों को बचा के रखना।

अज्ञात-घटक 

जब भी तुमसे मिल के आता हूँ
तो कविता में एक नयापन
यूँ आ जाता है कि,
बहकर तुममें जब
मैं पूरा हो जाता हूँ
खाली-खाली तब
जगकर मुझमें, भीतर,
उसको भरने
एक अज्ञात-घटक
उभर आता है
उसको ही मैं लिख देता हूँ,
जी लेता हूँ,
समझो कविता कह लेता हूँ।

पिछले कुछ सालों में कविता में
बस मैं ही मैं हूँ।
अनजानापन ढूँढ रहा हूँ
आओ ले जाओ मुझसे मैं
मेरी कविता हल्की कर दो
मुझको मैं से खाली कर दो।

पर मैं अब वहाँ नहीं रहता 

कुछ लोग,
मुझमें मुझको ढूँढने आते हैं,
पर मैं अब वहाँ
नहीं रहता।

दोस्ती, कशिश, वस्ल की
सराय हैं
इन्हीं में अदावत और रंजिश
के बिस्तरों पर सुस्ताकर
गुज़रता हूँ।

बेनाम-उम्र में मीलों तक
ढूँढता हूँ खुद को,
कभी मिल जाऊँ तुमको तो
बता देना।

मैं मात्राओं का आदमी हूँ 

मैं
गोल, घुमावदार,
छल्ले-वाली,
सुडौल-स्वरांकनों का
मात्राओं का आदमी हूँ।

मेरी की और कि में
फ़र्क होता है
ऊ और आ के संयोग से
मेरे शब्द बनते हैं।
आधे अधूरे-अपंग वर्ण भी
कभी मिलकर कभी हलन्त के योग से
संधियाँ करते हैं।
सांसर्गिक मतलबों की भाषा
को शक़्ल देते हैं।
हर शब्द अपनी चुने हुए
स्वरों से
खुद से अलग महसूस
करता है।

कंठ, दंत, तालु, मूर्धा, होष्ठ के
स्पर्श से उदित चेतन – शब्द-व्यंजन
स्वरों से उछाल लेते हैं
उर्दू-ई दोस्ती के नुख़्ते
जो सफ़र-ज़हर का फ़र्क़
मोहब्बत में ही निभाते रहते,
पर रात चाँद की बातें करते वक़्त
खींचा-तानी में
मेरे कुर्ते पे चिपकी तुम्हारी बिन्दियां,
अनुनासिक्य और अनुस्वार का विवाद
ज़िन्दा कर आयीं हैं।

मैं मात्राओं का आदमी हूँ,
देसी हूँ, हिन्दी हूँ।

वाइल्ड-एलिक्सिर

एसटी-लाउडर के
वाइल्ड-एलिक्सिर की
महक में सराबोर
हिन्दी
अक्सर ही
जब तुम्हारे स्कूटी के
पीछे
जबरन चढ़ बैठती है
तो उसे चिढ़ाने के लिये
दायें-बायें, उल्टा-सीधा
चलाती हो तुम;
तब
देखा है मैंने कि
हिन्दी चीखकर
लिपट जाती है
कमर से तुम्हारी
करधनी बनकर
और फिर जब
अपने अधरों को
ले भिड़ती है
ज़ुबान
तुम्हारे ब्लाउज की
उजली पीठ की
रेफ पर
तब तुम्हारी रंगीली पाजेब
का एक नुख़्ता
खनक कर पाँव की
अँगुलियों की बिछिया में उलझी
कोहलापुरी को
गाड़ी की ब्रेक पर
उर्दू करता है।

माथे पे सजी बिंदियां
साड़ी, टीके, बिछिया, हिजाब
ठोड़ी के तिल
समेत
बिना ट्रैफिक के
एहसासों से
एक्सीडेंट कर पड़ी है।
अचेत कविता तुम्हारी
फिर भी
बेसुध
बुदबुदा रही है
प्यार-मोहब्बत की बातें।
कहती है
“चले आओ”

निसर्ग

एक कमज़ोर, थकी हुई
निढ़ाल ग़ज़ल के वक्ष पर
कुछ अक्षर, अल्फ़ाज़-मात्राएँ
चिपके हुए थे।
निसर्ग था
कि गोदते थे उसके स्तन
अपने
नये पैनिले दाँतों से।
वेग से कूद कर
कुछ पीछे जाते
फिर नोचते थे उसे
कुछ बूँद दूध या खूं के लिये भूखे थे।
वो उठी, आगे बढ़ी पर
कुछ दूर कूद कर रूक गयी थी।
अपनी वृति से मुँह मोड़ना
कुछ कठिन था।
हर अल्फ़ाज़ को जगह देती
जोड़ती, उनका पेट भरती चलती ये ग़ज़ल
अब कमज़ोर दिखती है मुझे
बे-मायने हो चली वो खूंखार ग़ज़ल।

मुक़ाम

इस धुएँ में महफूज़ हैं
कि शिद्दत से थे हम जिए
वीरानों में झुलस कर
ख़्वाबों को हम रोज़ सज्दा करते हैं

इस धुएँ में महफूज़ है
हर वो शाम, थे जिस पर गम सजे
महक इबादत में उठती है
लपटों से लिपटकर खिला करती है

इस धुएँ में महफूज़ हैं
कि बहुत शिद्दत से थे हम जिए….

बेख़ौफ़ बढता चल रहा था
शोलों पर यह कारवाँ
बेफिक्र सहर पर बिछी है
राख इसकी ए बे-ख़बर

एक अनकही टीस है
उससे सुलगकर लिपटकर
बेनाम नाबालिग़ मोहब्बत
हर शाम यहाँ एक क़र्ज़ अदा करती है

इस धुएँ में महफूज़ हैं
महक हर उस नक्श की
जो गुलिस्तान की ख़िलाफ़त में थे खड़े,
घडी गुज़र जाने के बाद

इस धुएँ में महफूज़ हैं
कि बहुत शिद्दत से थे हम जिए…

हरश्रृंगार 

अवर्तमान आदित्य के संयोग से
शरद ऋतू के आगमन पर
शीत ऋतु का विज्ञापन लेकर
हजारों दीयों के से टिमटिमाते
हरश्रृंगार के फूल
तुम्हारे साथ की खुशबु पा कर
मेरे अंतर मन में बस से गए हैं।

अक्सर ही मेरा मन
व्याकुल हो जाता है हरश्रृंगार के इस अभ्यास से
जीवन-दिन का उजाला जब लुप्त हो जाता है
तो शायद अपने लिए ही या उजाले के अभाव को मिटाने
यह फूल खिलते हैं और चढ़ती हुई लालिमा को प्रणाम करके
बिखर जाते है…

भीतर ही भीतर

कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
गुदगुदा के पन्ने पलटता है
कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
अँगुलियों से
वर्ण-माला छूता है
कागजों की करवट बदलता है
रोकता है पलटने से
जूड़े की कांटी से
कौन पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर
महसूस होता है कहीं पर
कोई पढ़ रहा है मुझको
भीतर ही भीतर

शब्दों की धरा में
धंस सा गया था
हक़ कागजों को कलम से
लिखता गया था
खुद को ज़ाया किया है बहुत
मैंने
माया को कागज़ पे रचकर
कौन पढ़ रहा है मुझको
मेरे भीतर ही भीतर
हर बात जो लिखता था
हर बात जो कहता हूँ
वो सच नहीं
सपना भी नहीं, मगर
अल्फ़ाज़ों के मिलने जुलने से
हालात बदलते थे
सो लिखता था
हर मोड़ नए शब्द
शब्दों से मिलते थे
सो लिखता था
एहसासों का स्वाद है मुझको
सो कहता हूँ
कोई भीतर ही भीतर
पढ़ रहा मुझको
जानता हूँ।

जूलिएट का कमरा

आभूषण, इत्र, चूड़ियाँ,
खुले संदूकों मे साल तमाम
चप्पलें, रेशम, कंगन,
चेन, रंग, रोगन, रूज़, रूमाल, एहतिराम
बोर, सिंदूर, संदल, अलत्रक,
साड़ियाँ, अंजन, क़िमाम
मखमली-अंगिया,
रंगे हुए कपास के फाहे गुलफ़ाम
एक लदी हुई खुली अलमारी
बिस्तर से ड्रेसिंग टेबल तक बिखरे कपड़े गुमनाम
भ्रम, व्याकुलता और अस्वीकृति का समागम
इत्र झुलसे अक्स की लद्दर गुलाम
आइनों पर चिपकी कस्तूरी आंधियोंमें
चमकती बिंदियों की चांदनी इकराम
ज़ाफ़रान गुलाब और ख़स के सैलाब में
बेला के गजरे की बेड़ियों के अंजाम
ऊब जाता हूँ खुद मे रहता हूँ अगर
सफेद कुर्तों, साफ कागज़ मे हज़ार इल्ज़ाम
कुछ नही है मंज़ूर ज़िंदगी में
सादगी है मेरी बेनाम,
बस एक खाली नियाम

ख़यालों के जंगल

रात अपने ख़यालों के
जंगल में जाना
कभी तो
रास्ते किनारे
झील पे झुके पेड़ से
एक शरारत तोड़ लाना

फ़र्द में अधूरी
मिसरों के विलय में उलझी
ग़ज़ल की डालियों में चंद
हर्फ़ों के
कांटे बिखरे पड़े हैं

पाँव की कोरें में
चुभ गए अगर राज़ दोस्ती के
तो यादों की छाल से रिसते द्रव्य की
दो बूँद छुआना
और आगे बढ़ते जाना

याद है
वो पिछलेसाल
जब बारिश ज़्यादा हुई थी
और दो शामें चट्टानों पर
नंगे पैर दौड़ पड़ी थीं
वो सब तुमने एक रूमाल पे
काढ़ ली थीं
आज उसी
रूमाल का एक कोना
वक्त पर काम आया है मेरे

प्यार भी इंसान को कितना सिखाता है
दोस्ती का सफ़र रूमान हो
तो दूर तक जाता है

अचार की डेलियाँ और गस्से रोटी के 

बेइन्तहाँ अचार की डेलियाँ
रोम-रोम मसाले तर-बतर
नाख़ून के सिन्के में दाग़
अब भी गस्से मुलाकातों के
किस्मत की थाली से तोड़ के
कुछ अचारी यादों के मसाले
कोने से छुआ के चपाती का निवाला
दाँतों से पीस कर
सूखी रोटी के वज़ूद का
बदलता हुआ स्वाद
आहा !

सजी हुई कटोरियों की ताज़ी तरकारी
को अब क्या समझायें?
मुझे ये आचार की टुकड़ियों को
जीभ पे चलाना,
दबा के उभरते स्वाद का मज़ा,
एक खट्टी बिखरी डकार में बिखेरना
पसंद है।

माचिस की तीलियाँ 

बुझी हुई माचिस
की तीलियों की तरह
हम निढाल पढ़े हुए थे
सिरहाने पे।
सर की आग
पूरे जिस्म को
न जला पाई थी
मेरे गलने में अभी
एक सदी बाकी थी।
कुछ सूझता नहीं
क्यों काठ की तीली
इतनी लम्बी बनायी थी।

वो मसाला जो
तिल-सा कोने में चपका
क्या वही पहचान बनायी थी?
कुछ ताज़ा तीलियों को
देख के उस आग का
अंदाज़ महसूस होता है
जो कभी
हमारे सर भी थी।

ऐ अफ़रोज़ा

ऐ अफ़रोज़ा!
तेरे हर आलम,
हरकत-शरारत के ज़ेरे हिरासत
वो जवानी का फितूर
जो हर जुम्बिश
हर शक्ल-औ-अदा में
बेसब्र उफनता था
कहीं अपने शर्मीले बचपन को
बदमस्त बदन की तहों में
दबा सा गया था;
वो रिश्ता दर रिश्ता
जूझता-जीतता, बढ़ता-बदलता
उस मंज़िल पे ले आया जहाँ
पीछे मुड़ के कुछ देर
देखना भी मुमकिन न था,
जब तू
औरत बन के खिली-बिखरी
तासीर-ए-खुशबू की तरह,
और तेरे जिस्म के
नूर-ए-नक़्श
किसी मुक़ाम पे जा कर
खुद को उस अक्स से तोलते रहे
जहाँ से उभर के तू आयी थी,
तेरे उस बदलाव-ए-सफ़र
उस बाहरी रंग-ए-इश्क़ का
चाहने वाला भी
अब नज़र कमज़ोर कर बैठा है।

तेरे जिस्ता-ए-कुण्ड की ख़ुश्बू
अब उन रगों की हिरासत है
जो अपनी रवानी में तेरी जवानी को
बदन की तहों में दबा सी गयी है
हर उस याद को
जिस्म-ए-रेगिस में ढूँढने को
मुक़म्मल करने को
तेरे बदन पर कुछ साँसें लिये
सूँघता-टटोलता, करीब आता है
और उन पोशीदा चौबारों में
छिप जाना चाहता है।

तेरा हम-मुसाफिर
शायद अपनी जवानी
तुझमें खो देना चाहता है।

जलौनी 

दिन भर के किस्से
कैसे मौसम-बिखरे
तूफ़ान-उजड़ी सूखी टहनियाँ
बटोर-बटोर कर
शाम को सिर पे लादे
भूखी अंतड़ियों में लिपटी सांसें
इस उम्मीद पे चला मैं
घर के रास्ते,
कि शायद इस बार की बटोरी से
आग तेज़ दहकेगी।
पर सब्र रखना होगा
शायद, कुछ लकड़ियाँ गीली है
आँच कम और
धुआँ दे-दे के जलेंगी
रुलायेंगी।

पकी-मिट्टी के दिये

पल ही लगे थे
भीगी गुंथी हुई
कच्ची-मिट्टी को
कुम्हार के हाथ कि
सुगढ़-सुनारी अँगुलियों ने
चाक की अथक-बेरुक रफ़्तार से
कच्चे दिये बनाये थे।

नीम की ठण्डी छाँव में
सुखाया था इनको
कुछ दिये वहीँ पे टूटे आशिक़ से
बस पसरे और बिखर गये।
कुछ दिये, शायर, हम से थे
पकने को तैयार बहुत।

हयात की तपिश थी
शायर दिये पुख्ता हुऐ।
आज शाम कुछ देर को
नन्हीं सी लौ को रिझाने को
तेल और बाती से हम
सजाये जायेंगे।

घर का हर अँधेरा कोना
छत और तुलसी की छाओं
यहाँ कुछ देर को जलेंगे अपने हिस्से में
तुम्हारी दीवाली मानाने को।

हम जले हुऐ चिराग की मिट्टी
किसी की भी दीवाली को
दोबारा काम नहीं आती।
इस पके हुऐ पुख्ता बदन को
फ़िरमिट्टी में मिलाना
कच्चा हो जाना
सदियों की मशक्कत है।
किसी एक दिन को इतना रोशन किया
कि सब दिन इंतज़ार में निकल गये।

अंगूर के दाने

अंगूर के आकर्षक रंग-बिरंगे दाने
बेस्वाद सी बाहरी खाल में दबी
ग़ज़ब सी मिठास-भरा रसीला गूदा
दांत से दबाया तो रस ही रस था।

थोड़ा और चबाया, चखा तो
ज़ायके की खोज बीज तक पहुँची
बीज था बेस्वाद सा
या मैं सवाब नहीं समझ पाया।

इमली-कोठी 

मुनासिब नहीं था लौटना उसका
पर वजूद की खोज इब्तिदा से इन्तेहाँ तक थी
उसकी हसरत-ज़दा नज़रों में तड़प थी
शायद जीने का करीना जानती थी वो।

न जाने क्यूँ एक बार के लिए ही सही,
अपने भूले-गुज़रे घर ले जाना चाहती थी वो
मुझे दिखाना चाहती थी बचपन अपना
या खोए गुज़िश्ता से मिलाना चाहती थी वो।

और गया था मैं, यादों के शहर-हज़ारीबाग़
शायद जहाँ का आसमां तसव्वुर की हद छूता था
जहाँ की तंग, झिझकती, गुमसुम गलियाँ
तालाब के किनारे कच्चे घरों तक ही पहुँचती थी।

कहानियां जहाँ राजा के महल और शिकारगाह की
शहर के कोने में, जंगल की कछार पर बिखरी थीं
सहमे-उजड़े से घरौंदों के पेड़ों से ढके चेहरे
इन सबको अपने दोस्तों का घर बताती थी वो।

इमली-कोठी तककी सड़कें तब से कच्ची ही रहीं
जहाँ के इंसान समय पे है नहीं फ़िरते – बदलते
गैर-मुत्ताबद्दल होती है किस्मत उन बसेरों की
शायद इतना ही कहना चाहता था ये सफ़रमेरा।

साथ उसके रहा और देखा – महसूस किया
शायद उसके बचपन को था, मैं कहीं छू सा रहा
या मोहब्बत आइन्दा मुक़ाम से, बिसरी दीवारों से मिलने आयी थी
शायद वक़्त ठहरा हुआ था और गुज़र गयी थी वो।

…फिर वो सफर भर बेहिस सी रही।

जैसे कोई पुराना घर हो

वो
अचानक ऐसे
मिली थी मुझसे जैसे
सालों बाद कोई
अपने पुराने घर को
देख कर कुछ देर
रुक गया हो।

कुछ
पोशीदा नज़रें
ऐसे टिकी थीं मुझपे
और ओट ले रहीं थीं
जैसे
दरवाज़ा किसी दीवार पर
जा टिका हो।

मैं भी
बेदम सा रुका रहा
जैसे
हो बोझल सा कोई
सूना कमरा
धूल की चादर में
लिपटा हुआ।

आज
हाथ बहुत ही
खाली थे
जैसे
यादों की कड़ियों में
न तारीख़
और न पता हो घर का।

वो
रुकी नहीं या
चली गयी।
आयी भी थी
ये मालूम नहीं
बस एहसास
महज़ कुछ ऐसा था।

शरारती नज़्म

वो कहती ही नहीं थी
जो मैं उससे कई बार
सुनना चाहता था
उसकी पहचान
दर्ज़ कराना चाहता था।

लम्बी मुस्कराहटें
खर्च हुई हर बार
– कुछ ज़ाहिर ना हुआ
पर ये जज़्बात उसको
बेचैन ज़रूर करते रहे

अधलिखा सा आज मैंने उसको
फिर फिर गुनगुनाया
खोखला- अधूरा कर गयी थी वो।

इसलिए आज उस नज़्म से
मैंने दोस्ती तोड़ दी।

एक ख़याल, बुन्दा-बुन्दा सा 

कैसे रहा ज़ुल्फ़ की
तहरीर में गुम
एक ख़याल
बुन्दा -बुन्दा सा।
कभी-कभी झाँकता है
नज़र आता है
एक ख्याल
बुन्दा -बुन्दा सा।

काक के कोहराम सी
बेसाध लटें
उलझी हुई तश्बीहों को बुन
नज़र को मूंद चुकी थीं लेकिन
फिर भी कानों में
छनकता है
एक ख़याल
बुन्दा -बुन्दा सा।

साँसो की स्याही को
जिस्म की दवात पर
बार-बार बे-लिखे डुबोया
बेबसी में कुछ ढूँढने को
पलकों के कोरेपन पे
अनकही कुछ गूंथ रहा था
एक ख्याल
बुन्दा -बुन्दा सा।

तेरी ज़ुल्फ़ों की
भटकी हुई गलियाँ
मेरे जिस्म के
भूले हुए दायरों से
गुज़रा करती हैं
इन गलियों के बेसाध सायों में
छनकता है एक ख्याल
बुन्दा-बुन्दा सा।

तरकश

मय के प्यालों की
बंद अलमारी के
तलफ्फुज़ का सा
बदमस्त हसीन चेहरा।

तुम्हारे होंठ बड़े भी थे
कुछ कहने को
पर कान के बूंदों से
छनकती आवाज़
की ना मंज़ूरी पे रुके
झिझके और बिखर कर
मुस्कुरा दिए।

आँखों की तरकश में
जहाँ तने रहते थे
तीर काजल के
वहाँ पुतलियों की
कमानियां हताश किसी
ख्याल में खोयी हुई हैं।

उम्मीद है ये
मुस्कराहट बनी रहे
न सही मेरी आँखों को;
किसी के होठों को
तसल्ली तो है।

एक साड़ी में लपेट लिया

एक साड़ी में लपेट लिया
पूरी शाम को तुमने
हम सब बारी बारी से आते थे
तुम्हारे पास कभी छूने- चिपकने
कभी तुम्हारे स्पर्श को।

उधड़न जो तुम्हारे
ब्लाउज और बदन के बीच
से मिठास छलकाती है
जज़्बात जगती है और बेमर्म
मेरी नज़रों को चिकोटती रहती है।

नीचे से झलकते तुम्हारे
कागज़ीपाँवमें लिपटी
नाज़ुक सी बिछिया, पायल
गले में कंचन, कुण्डल
और सुर्ख रंग का श्रृंगार।

ना जाने खुद से ज़्यादा क्या दे दें तुमको?

जाने किसके साथ तुम रहती हो

जिसके साथ तुम रहती हो
वो कुछ कुछ मेरे जैसा है
जिसको चाहती हो दिलो जान से
और हर दिनों-दोपहर जिसके करीब
बीत रहे हैं हर मौसम
जो तुमको अच्छा लगता है
वो कुछ कुछ मेरे जैसा है।

कहीं पर हम दोनों एक से थे
वो तुम्हारे साथ चला गया
मुझको भी एक बेनाम कि छत है।
मिलता नहीं है अब मुझसे वो
जो कुछ कुछ मेरे जैसा है
तुम्हारे प्यार में वो खोया है
जो कुछ कुछ मेरे जैसा है।

वो कौन है, जिसे लोग, मेरे नाम से जानते हैं

अपनी हसरतों से अक्सर ही
मैं पूछता हूँ
वो कौन है, जिसे लोग
मेरे नाम से जानते हैं?

कुछ जो आये भी करीब
अधूरे से जज़बातों की
एक बेनाम शक़्ल से मिल कर
लौट गये।

हर रोज़ गहरीहो रही है
हक़ीक़त और वज़ूद की दरार
न जाने किस ज़िक्र पे
ये भर पायेगी।

बूचड़खाना

मेरे कसाई को मालूम है
जिस्म का कौन सा हिस्सा
किस काम का है।

और क्यूँ न हो
कटे हुऐ बदन को
बोटियों में बदलना
खाल को करीने से उतारना
अंतड़ियों को बाहर फेंकना
गुर्दे-कलेजी पे लगी चर्बी को
छीलना, साफ़ करना
रान और चाप की नज़ाकत
वो खूब समझता है।

मेरा रक्त-रेज़-कसाई
इस पेशे में, एक हुनर से
कला में पहचाना गया है।
इसी से मेरे क़ातिलकी
दुकान चलती है।

किसे पता था
खुले खलिहानों और
नम हरी दूब
पेड़ों की छाओं में
कूदें लगाते ये साल,
किसी दगा से
मेरे खरीदार के नाज़ के लिए
कभी ईद, होली, दिवाली को
कुछ गोश्त की बोटियों में
पहचानी जाएंगी।

आल्ता

सुर्ख वो सपनों की परत
जहाँ तुम चोरी चोरी जाते हो
उसकी मिट्टी के कुछ निशां
अल्ताई तुम्हारे पाओं में।

सुर्ख चाहत का बेसिरा नशा
जो रहते रहते ढलता है
अब भी एक लकीर बनकर
पावों के धीग पे खिलता है।

कुछ आस करीबी सपनों की
दिन धीरे धीरे ढलता है
माटी के दिए की बाती पर
इस शाम को लेकर जलता है।

हर बार तुम्हारे जीवन को
हर सौम्य सिन्दूरी आशीष रहे
हर साल तुम्हारी तीज पर
किसी चाहत का पैगाम रहे।

नशीली आशिया

महज़ दो पल दिलासा है, हामी-तरंग साँसों में
सुकून कहते हैं फ़शाँ होगा, इस कदर नशा चढ़ कर
गले को घेर लेते हैं तुम्हारी जिन्स के बादल
सिहर बदन में उठाता है अगर कश तेज़ खींचे तो।

जलती हो और फ़ना हो जाती हो अंजाम से पहले
दबा के बुझाने पर भी सुलगती हो धुआँ देकर?
कभी अंगार पहुंचे नहीं बेसब्र लबों के चुम्बन को
नशा छू कर गुज़रता है हमारी नफ़स में घुलकर।

खराकती है मेरी साँसें तुम्हारी तासीर सिने में
कशों में खींचे हैं ये जज़्बात नब्ज़ों तक
रिहा धुएं के छल्लों में हमारा जवाब अंजाम को
बसी है रोष तपिश की हमारी सुर्ख आँखों में।

बेबसी इन्तजार की अजब तरह से पालें क्यों?
हॊश रहता नहीं हर बार तुमको सुलगने से पहले
ज़िन्दगी के नशीले तरीके बहुत दूर तक नहीं जाते
ये जिस्म भी क्यों फ़ना है इकरार से पहले।

मेरे मन का सूनापन

कल मैं बहुत खेली थी
मेरी छुट्टी थी
माँ भी नहीं थी
पापा भी कहीं थे
थी बस एक बहन,
जो मुझसे बंधी थी
और मुझ सेजुड़ी थी

दादी के साए से पली
बाबा की कहानियों में बड़े हुए थे
हमारे बचपन के दिन

शायद माँ होतीं तो
रात के पहले पाँव धुलवाती
या पापा होते तो सोते ही मेरे पैर
पोछे जाते,
और मैं सोने का नाटक कर करवट बदलती
कल मैं बहुत खेली थी
मेरी छुट्टी थी
माँ भी नहीं थी
पापा भी कहीं थे

नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो।

नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो
बात बहकती नहीं हम-नशीन मिसरों में
रातों का सफ़र लम्बा है, कुछ तो कह दो
नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो।

मैं अफ़्सुर्द नहीं, कुतुबखाने में दफनाया हुआ
न ही आशिक हूँ किसी बाहों में सजाया हुआ
बहती है कलम मेरी हर रोज़ की बग़ावत है
नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो।

हैं तो हैरां पर तरस परस्तिश पे मुझे आता है
किसी के लब पे था और फिर भी खाली रहा
रस्म रोज़ की बनायी है, कभी-कभी निभाने को
नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो।

कोई शायर नहीं हम, कि महफ़िल बेताब रहे
तेरी आज़माइश के तलबगार भी नहीं रहते हैं
आसरा है आफ्रीदा, ज़र-खेज़ ख्यालों का
ज़ख्म सौदा हैं मुझे अल्फ़ाज़ों का मरहम दे दो।

नज़्म खाली है, मुझको दो अलफ़ाज़ दे दो।

मगर इस दरमियाँ जो इश्क़ है, आदाब मेरा है 

फ़ना तक सूफ़ियत जो जी गया, अलक़ाब मेरा है
हज़ारों रात की आवारगी, महताब, मेरा है

महकती है जो तनहाई,करार-ए-दिल की बाहों में
लिये चहरा किसी का हो, मगर असबाब मेरा है

हज़ारों तन बदन मिलते हैं, लाखों बार बिछड़े भी
मगर इस दरमियाँ जो इश्क़ है, आदाब मेरा है

बना करते हैं जब रिश्ते, गज़ब लाते हैं गहराई
जहाँ तुम साँस लेती हो वहाँ, पायाब मेरा है

तुम्हारी शोखियाँ हर बार जो, बारिश में भीगी थीं
सुनो हर बूँद की, उस कैफ़ियत में, ताब मेरा है

फक़त रानाइयो में संग तेरे जो भी था, वो हो
नसों में जो नशा बसता है, वो शादाब मेरा है

बहुत अहमक़, अनाड़ी है, जो नामो-दम पे जीता है
हमेशा शाद है, बेनाम वो, बेताब मेरा है

लगा रखती हो बातों में हमें तुम, जैसे बच्चा हूँ

वफ़ा-ए-ज़िन्दगीमुझसे समझना, और समझाना
खबर ले कर हमी से, फिर से हमको और उलझाना

लगा रखती हो बातों में हमें तुम, जैसे बच्चा हूँ
फ़क़त इस बचपने में, मुस्कराकर और सुलगाना

बला हो तुम भी कैसी, काजलों संग ख़ुशनुमा गजरे
हमारे, शौकत-ए-माज़ी काओंठो पे यूँ गदराना

नशेमन, मेरे कांधे सर टिका कर के, सजाना फिर
गुनाह-ए-हाल पर फिर से मोहब्बत में चले आना

सरल कर देना मुझको, मेरी उलझन में गले लगकर
गुदाज़-इ-इश्क़ की बाँहों में फिर सपने से फुसलाना

बहुत हैं दांव लगते, वस्ल, पेंच-ओ-ख़म तुम्हारा है
मशक़्क़त था तुम्हारे साथ में उस रात सो जाना

हूँ पच्चिस साल से ज़िन्दा, महज़ उस एक लम्हे में
दहर से दूर हैं रिश्ते हमारे, ग़श नही खाना

महकती ग़ज़ल में, छुअन ले के लौटा

सितमगर के दिल से, वो फ़न ले के लौटा
रूदाद-ए-दिलों की, चुभन ले के लौटा

वहाँ तंग गलियों, बसे लोग सौ-सौ
अजीबो-गरीबां, कथन ले के लौटा

अथक है पिपासा, बहे मन की सरिता
महकती ग़ज़ल में, छुअन ले के लौटा

महकते-बहकते मिलो, होश में अब
मैं मीलों सफर की, थकन ले के लौटा

समुन्दर किनारे बसा इक शहर है
नया उस शहर से चलन ले के लौटा

हूँ सूखा हुआ सा, मैं बंजर सा बदल
मगर सूफ़ियाना अगन ले के लौटा

अदावत रोज़ होती है, महोब्बत रोज़ मरती है 

सभी को ये शिकायत है, शिकायत क्यूँ नहीं करते
हमें तुम ये बताओ तुम, मुहब्बत क्यूँ नहीं करते

हजारों झूठ से, बेहतर है, ख़्वाहिश को भुला डालो
कहो तुम सच की, सपनों से हिफाज़त, क्यों नहीं करते

कहाँ पर खो गये हैं हम, नहीं मालूम खुद हमको
मगर तुमको भुलाने की हिमाकत, क्यों नहीं करते

अदावत रोज़ होती है, महोब्बत रोज़ मरती है
जहाँ वाले भी नफरत को ही, आदत क्यों नहीं करते

अगरचे हाथ मेरा छू गया हो 

कभी तुम साथ मेरे घर तो आना
हमारा घर भी तुमको घर लगेगा

अगर आओगे तुम कमरे के भीतर
तो शायर-मन, तुमे तलघर लगेगा

जहाँ है खाट औ उलझा सा बिस्तर
वहीं पे फिर ग़ज़ल दफ्तर लगेगा

पता कागज़ को रहता है तुमारा
नशा बस स्याही को पीकर लगेगा

सुनो तुम बैठना आराम करवट
अभी किस्सों में ये दिलतर लगेगा

अगरचे हाथ मेरा छू गया हो
तो शायद तुम को थोड़ा डर लगेगा

ये आलम आ ही जाता है इनायत
यूँ मौका ज़िन्दगी कमतर लगेगा

तग़ाफ़ुल शेर पे है शेर कहना
उफनता चाह का तेवर लगेगा

मुक़र्रर औ मुक़र्रर दाद रौनक
रवानी फासला खोकर लगेगा

तसव्वुर में कई जो ख्वाइशें है
ये अबतक उन से तो हटकर लगेगा

अगरचे गुदगुदी तुमको हुईतो
चुनाँचे तब यहाँ बिस्तर लगेगा

हमें जब भी मनाया, आप ने, हँस के मनाया है

नकाम-ए-इश्क़ को, हरेक क्यों, लगता पराया है
हमें जब भी मनाया, आप ने, हंस के मनाया है

जलोगे ही, अगरचे आग से खेलोगे, ज़िन्दा तुम
लपट की चाहतों में, जो भी आया, मर के आया है

बड़ी डिग्री है हासिल, इश्क़ में, जान-ए-तलब तुमको
हमें तो, प्यार की सरकार ने, अनपढ़ बताया है

फकत नाकामियों का इल्म तो, उम्र-ए-तकाज़ा था
इसी के दरमियाँ ही, खुद को भी बच्चा बनाया है

हमें अन्दाज़ कुछ तो था, कि हम उल्लू के पट्ठे हैं
मगर इस सच को, रह-रह आपने, अक्सर जताया है

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