आनंद तिवारी की रचनाएँ

खूँटियों पर टँगे हैं लोग

नेकी बदी की
गठरी बाँधे
खूँटी-खूँटी टँगे हैं लोग
किसे क्या बताएँ
सब अपने
रंगों में ही रंगे हैं लोग ।

दुनिया लगती है
बेमानी
आसमान झूठा लगता है
अपने सब
जब रंग बदलते
मीठा दूध मठा लगता है
तंग गली में
दौड़ लगाते
देख-देख कर ठगे हैं लोग ।

कोहरे को
परदा मत समझो
इसके पीछे क्या कर लोगे
नदिया की धारा
बहने दो
रोकोगे तो ख़ुद भोगेगे
पुल पर क्या
चल पाएँगे ये
रेलिंग पर जो टंगे हैं लोग ।

गीतों में मेरे डूबो तो

  मेरे अंतस में मत झाँको
आँख तुम्हारी नम होगी
गीतों में मेरे डूबो तो
पीड़ाएँ कुछ कम होंगी ।

जीवन तो मृगतृष्णाओं के
जंगल जैसा है
जैसा तुमने सोचा समझा
जीवन वैसा है
एक चढ़ाई पार करो बस
धरती आगे सम होगी ।

अंतहीन ऊर्जा बिखरी
जो मुझे दीखती है
गिर-गिरकर फिर-फिर मत चढ़ना
उम्मीद सीखती है
लक्ष्य बना कर नहीं चले तो
सोच तुम्हारी भ्रम होगी ।

नदिया पर्वत काट-काट कर
आगे बढ़ा करे
अपनी ऊँचाई सिर लादे
पर्वत डरे-डरे
साथ-साथ चलने की इच्छा
जीवन का अनुक्रम होगी ।

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