आनन्दी सहाय शुक्ल की रचनाएँ

ऊधो अखना पखना जलते

ऊधो अखना पखना जलते ।
वन पाँखी की नुची लोथ पर वहशी बिम्ब मचलते ।।

लाल लाल अंगारे सुलगें
दीर्घ अँगीठी दहकें
कोरस गाएँ कबीले नाचें
मद डगमग पग बहकें
सींक कबाब भोज का मीनू कला-कुशल कर तलते ।।

पत्थर की बुनियादों पर ये
लोहे की सन्तानें
शहर जगमगे मनु के मन का
दर्द न बिल्कुल जानें
आबादी के सुरसा जंगल सब कुछ चले निगलते ।।

हानि-लाभ पर निर्भर रिश्ते
साँसों के बेपारी
क्रूर व्यवस्था के जबड़ों में
जीवन पान सुपारी
घर आँगन मरघट के रूपक ऐसे मूल्य बदलते ।।

ऊधो बाराबाँट गया 

ऊधो बाराबाँट गया ।
टनों बोझ लादे यह गदहा किस-किस घाट गया ।।

करुणा-कातर चीपों-चीपों
हास्य-प्रसंग बना
कान उमेठे क्रोधित धोबी
ऊपर लट्ठ तना
क्रूर विशेषण गायक वाला आँसू चाट गया ।।

क्षुद्र तलैया नाले-नदिया
कैसी लोल तरंग
दूर रही कलुषित अंगों से
परिमल पावन गंग
कशल भगीरथ खास क्षेत्र हित धारा काट गया ।।

कोमल कविता नहीं पुतलियाँ
आँखें शुष्क निबन्ध
कटु यथार्थ पथरीला जीवन
जर्जर जार कबन्ध
बिकना, बंधना तंग तबेले नींद उचाट गया ।।

ऊधो इस युग में क्या गाएँ

ऊधो इस युग में क्या गाएँ।
औरंगजेब अयातुल्ला ये गाता कण्ठ दबाएँ।।

हथकड़ियाँ बेड़ी औ’ कोड़े
दुर्लभ तोहफ़े पाएँ
छन्द गीत के हत्यारे अब
रचनाकार कहाएँ

राजनीति के तलुवे चाटें
कीर्ति-किरीट लगाएँ
जीवन-दर्शन बहस चलाना
मुद्दे रोज़ उठाएँ

जिह्वशूर बुद्धिजीवी ये
संस्कृति पार लगाएँ
गाते-गाते मरे निराला
पागल ही कहलाएँ

सुविधाजीवी छद्म-मुखौटे
मठाधीश बन जाएँ
भूखा बचपन तृषित जवानी
तन-मन बलि समिधाएँ

छुप-अनछुए दर्द-द्रवित हैं
कातर प्राण नहाएँ
चारों ओर ठगों के डेरे इनसे गाँठ बचाएँ ।।

ऊधो मैं मूरख मतिमन्द

ऊधो मैं मूरख मतिमन्द ।।
चन्द्रगुप्त चाणक्य नहीं जो खोद उखाडूँ नन्द ।।

धँसती नींव खिसकती ईंटे
प्रेत छाँह घर मेरा
चमगादड़ उल्लू साँपों का
इसमें सतत बसेरा
चीटी केंचुए खटमल मच्छर चौमुख मल की गन्द ।।

बन्द घेराव आग हड़तालें
आरक्षी का डण्डा
इतने डैनों सेवित पालित
लोकतन्त्र का अण्डा
हाथ पोलियो मारे मेरे कर न सके कुछ बन्द ।।

हिन्दू मानस मुद्रित अंकित
लेंगे प्रभु अवतार
दीनदयालु प्रगट हों जग में
दुःख करेंगे क्षार
तम के बादर पर्वत ऊपर लिखें किरन के छन्द ।।

ऊधो रंच न मन आनन्दा

ऊधो रंच न मन आनन्दा ।।
धिक ऐसी साँसों का जीवन जिसमें ताल न छन्दा ।।

थाका कसबल दृष्टि श्रवण
सब क्रमशः पड़ते मन्दा
कितनी निलज चाह जीने की
मरण न माँगे बन्दा

अर्थ रज्जु गर्दन को जकड़े
गाँठ लगाए फन्दा
सबसे वृहत सवाल भूख का
दिन में दिखते चन्दा

नस्ल कमल की गुम होती है
सर में कीचड़ गन्दा
व्यर्थ हुए गुरुदेव निराला सार्थक गुलशन नन्दा ।।

ऊधो माटी नभ तन हेरे 

ऊधो माटी नभ तन हेरे ।।
बादल के वितरण में गड़बड़ चातक चौमुख टेरे ।।

घटाटोप मण्डराते घिरते
गरजें बजें दमामा
सूखे सावन जलते भादों
झूठमूठ हंगामा
बिजली तड़पे लपके टूटे
झोपड़-पट्टी दहले
तिनके उड़ते भू से क्षिति तक
कुटिल बवण्डर टहले
आश्वासन के बगुले उजले बूँद न फटके नेरे ।।

नहरों का जल काट-काट कर
पी जाती है लाठी
बन्दूकों की नली गढ़ रही
ऊँची-नीची काठी
हाथ याचना में उठते, या
रहते तन पर लटके
दूबर एततार साँसों का
प्यासे हंसा अटके
सीने पर सिल लदी सब्र की अनमिट अंक उकेरे ।।

ऊधो वक़्त हो गया नंगा

ऊधो वक़्त हो गया नंगा ।।
हाजी बखिया बीन बजायें नाचें बिल्ला-रंगा ।।

विधि विधान पुस्तक में सोए
ओढ़े कफ़न तिरंगा
जंगल का कानून चतुर्दिक
लाठी राज अभंगा
घर बाहर दहशत के डेरे कोई साथ न संगा ।

मनु का रक्त स्वास्थ्यवर्द्धक अति
पीने वाला चंगा
रोगी जल में कहाँ हिलोरें
उर्मिल मस्त तंरगा
शिव के जटा-जूट जा बैठी पतित पावनी गंगा ।।

ऊधो यक्ष प्रश्न के उत्तर

ऊधो यक्ष-प्रश्न के उत्तर
पूछ रहा है मुझसे मैं तो भट्टाचार्य निरक्षर ।।

तिनके चार मिले थे केवल
बने नशेमन कैसे
लड़ता नंगे हाथ कठिन-
जीवन का रन कैसे
शत्रु सैन्य से पटा इलाका जगह न बाक़ी तिल भर ।।

एक त्रासदी साँसें लेना
भय के कम्पित घेरे,
कटे-फटे शव घायल अणु-अणु
पानी-पानी टेरे
चोंच डूबाते गिद्ध घाव में फूटे शोमित निर्झर ।।

सात्विक क्रोध रक्त में लेकिन
हिंसा कभी न जागी
युद्ध क्षेत्र के लिए निरर्थक
कोमल मन अनुरागी
शोषण करते रहे उम्र भर पाजी ढाई अक्षर ।।

ऊधो संझा उतरी अंगना

ऊधो संझा उतरी अंगना ।।
तुलसी चौरा धूमिल घरतिन पहिने टूटा कंगना ।।

सारी उमर जठर ने फूँका
हर सतरंगी सपना
रोटी दाल इष्ट साँसों के
पेट देवता अपना
ऐसी मिली कामरी कारी चढ़ा दूसरा रंगना ।।

कशा लात थप्पड़ जूतों से
जी भर हुई कुटाई
तन आत्मा में नील हैं गहरे
ज़ख़्मों की परछाई
अगले जनम हाड़ के बदले अब पहाड़ है मँगना ।।

ऊधो रक्त श्वेत में डूबा

ऊधो रक्त श्वेत में डूबा ।
कोड़ों ने है खाल उधेड़ी यह दुश्मन का सूबा ।।

चन्दन वन की रुह देह में
चौमुखि सुरभि बिखेरी
यत्न आदमी रह पाने के
बने राख की ढेरी
सोने के आराध्य यहाँ के चाँदी की महबूबा ।।

नाजी शिविर यातना चैम्बर
पग-पग क्रूर कसाई
जड़ से उखड़े धरती छूटी
मुँह बाए है खाई
मुँह बाए है खाई
धरा रह गया सूने दीवट हर रोशन मनसूबा ।।

अपमानों का केंसर काटे
छीजे धूनी मनीषा
उगते शूल, त्रिशूल शून्य में
सब कुछ जकड़े मीसा
शबनम रतन धूल पर बिखरे अर्ध्य सूर्य से ऊबा ।।

ऊधो साँसों का इकतारा

ऊधो साँसों का इकतारा
बजता रहे तार मत टूटे गाता रहे बनजारा ।।

यह घर यह परिवार मोह की
मदिरा के हैं प्याले
मित्र शत्रु-नगरी के वासी
अनगिन मकड़ी जाले
इसमें उलझा प्राण इसे यह सब कुछ कितना प्यारा ।।

कूचे गलियाँ सड़कें भीड़ें
रिश्ता कितना गहरा
लोहू कर्दम लथपथ साँसें
स्वर्गिक नर्क सुनहरा
फिर-फिर जनम मिले फिर भोगें फिर चूमें अंगारा ।।

बाणों की शय्या पर लेटा
फिर भी मृत्यु न चाहे
इस इच्छा इस आकर्षण को
रोये या कि सराहे
क्रूर कल्पना कितनी तट की बना रहे मँझधारा ।।

ऊधो टूटेगी तटबन्ध

ऊधो टूटेगी तटबन्ध ।।
इतने बादर इतना पानी अन्तर्यामी अन्ध ।।

हाड़-माँस माटी का पिंजर
बिजली वज्र रकीब
पीड़ा के गज अनथक झूमें
अत्याचार नकीब
मुरली फूँक रही है पावक कोयला सातों रन्ध ।।

रोम-रोम पर्याय क्षवण के
सबका कथ्य सुना
दर्दमन्द करुणार्द्र प्राण ने
रपटिल पन्थ चुना
रिसे मवाद स्नायुमण्डल में पसरे पाटल गन्ध ।।

एक अकण्ठित साथी मिलता
नग्र निर्वसन नाते
छाती पर यह शिला न होती
हानि लाभ बँट जाते
यों तो साथ कारवाँ पूरा लेकिन सभी कबन्ध ।।

ऊधो पूत मवेशी निकला

ऊधो पूत मवेशी निकला ।
श्यामलकाठी वर्णशंकरी पिंगलकेशी निकला ।।

तोड़ गुरुत्वाकर्षण सारे
शून्य कक्ष में उछला
माटी से सम्पृक्त नहीं है
रद्द कर चुका पिछला
अर्थहीन है कजरी विरहा
आल्हा गायक पगला
तुलसी सूर कबीरा मीरा

कौन खेत की मूली
आयातित दर्पण ही देखें
दृग में सरसों फूली
देख घुमड़ते बादल इसके
भीतर यक्ष न जगता
लहराती फ़सलों में नद-सा
रंच न वक्ष उमगता

संस्कृति मूत्र विसर्जन वाली
उठी श्वानवत टांगें
बीच सड़क पर नंगा नाचे
पितर क्षमा हैं माँगे
अँग्रेज़ी ध्वनियों पर इसका
रोम-रोम है मचला
लज्जित कोख, छुपाती मुखड़ा अंक ग्लानि से पिघला ।।

ऊधो सफ़र बड़ा रेतीला

ऊधो सफर बड़ा रेतीला ।।
घिस घुटनों तक पाँव रह गए, मरु की दारुण लीला ।।

हर बढ़ते पग के आगे
आड़े आया टीला
गिरते पड़ते पार किया तो
बदन पड़ गया ढीला
चक्रव्यूह टीलों का दुर्धर
ऊपर रवि चमकीला ।

रात न आती चाँद न उगता
केवल दिवस हठीला
रक्तवाहिनी नस में बहता
पावक तरल पनीला
ऊपर आगी नीचे आगी
सब कुछ रत्किम पीला
पड़े-पड़े असहाय देखता गड़ा वक्ष में कीला ।।

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