आमिर उस्मानी की रचनाएँ

दर्द बढ़ता गया जितने दरमाँ किए प्यास बढ़ती गई जितने आँसु पिए 

दर्द बढ़ता गया जितने दरमाँ किए प्यास बढ़ती गई जितने आँसु पिए
और जब दामन-ए-ज़ब्त छुटने लगा हम ने ख़्वाबों के झूठे सहारे लिए

इश्क़ बढ़ता रहा सू-ए-दार-ओ-रसन ज़ख़्म खाता हुआ मुस्कुराता हुआ
रास्ता रोकते रोकते थक ज़िंदगी के बदलते हुए ज़ाविए

गुम हुई जब अंधेरों मे राह-ए-वफ़ा हम ने शम-ए-जुनूँ से उजाला किया
जब न पाई कोई शक्ल-ए-बख़िया-गरी हम ने काँटों से ज़ख़्मों के मुँह सी लिए

उस के वादों से इतना तो साबित हुआ उस को थोड़ा सा पास-ए-तअल्लुक़ तो है
ये अलग बात है वो है वादा-शिकन ये भी कुछ कम नहीं उस ने बाद किए

ख़त्म होने को है क़िस्सा-ए-ज़िंदगी अब हमें आप से कोई शिकवा नहीं
टल न जाए कहीं मौत आई हुई पुर्सिश-ए-ग़म की ज़हमत न फ़रमाइए

जब हिजाबों में पिन्हाँ था हुस्न-ए-बुताँ बुत-परस्ती का भी एक मेयार था
अब तो हर मोड़ पर बुत ही बुत जल्वागर अब कहाँ तक बुतों को ख़ुदा मानिए

कितने अरबाब-ए-हिम्मत ने उन के लिए बढ़ के मैदान में जान भी हार दी
अब भी उन की निगाहों में है बद-ज़नी अब भी उन को वफ़ा की सनद चाहिए

जिस ने लूटा था उस को सलामी मिली हम लुटे हम का मुल्ज़िम बताया गया
मस्त आँखों पे इल्जाम आया नहीं हम पे लगती रहीं तोहमतें बिन पिए

जिस ने ‘आमिर’ मता-ए-ख़ुदी बेच दी सच ये है इस्मत-ए-ज़िंदगी बेच दी
सर झुकाने से बेहतर है सर दीजिए भीक लेने से बेहतर है मर जाइए

दिल पे वो वक़्त भी किस दर्जा गिराँ होता है 

दिल पे वो वक़्त भी किस दर्जा गिराँ होता है
ज़ब्त जब दाख़िल-ए-फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ होता है

कैस बतलाएँ कि वो दर्द कहाँ होता है
ख़ून बन कर जो रग-ओ-पै में रवाँ होता है

इश्क़ ही कब है जो मानूस-ए-ज़बाँ होता है
दर्द ही कब है जो मोहताज-ए-बयाँ होता है

जितनी जितनी सितम-ए-यार से खाता है शिकस्त
दिल जवाँ ओर जवाँ और जवाँ होता है

वाह क्या चीज़ है ये शिद्दत-ए-रब्त-ए-बाहम
बार-हा ख़ुद पे मुझे तेरा गुमाँ होता है

कितनी पामाल उमंगों का है मदफ़न मत पूछ
वो तबस्सुम जो हक़ीक़त में फ़ुगाँ होता है

इश्क़ सर-ता-ब-क़दम आतिश-ए-सोज़ाँ है मगर
उस में शोला न शरारा न धुआँ होता है

क्या ये इंसाफ़ है ऐ ख़ालिक-ए-सुब्ह-ए-गुलशन
कोई हँसता है कोई गिर्या-कुनाँ होता है

ग़म की बढ़ती हुई यूरिश से न घबरा ‘आमिर’
ग़म भी इक मंज़िल-ए-राहत का निशाँ होता है

ग़म-ए-बेहद में किस को ज़ब्त का मक़्दूर होता है 

ग़म-ए-बेहद में किस को ज़ब्त का मक़्दूर होता है
छलक जाता है पैमाना अगर भरपूर होता है

कभी ऐसा भी होता है कि दिल रंजूर होता है
मगर इंसान हँसने के लिए मजबूर होता है

फ़ज़ा-ए-ज़िंदगी की ज़ुल्मतों के मर्सिया-ख़्वानो
अंधेरों ही के दम से इम्तियाज़-ए-नूर होता है

नहीं ये मरहला ऐ दोस्त हर बिस्मिल की क़िस्मत में
बहुत मुश्किल ये कोई ज़ख्म-ए-दिल नासूर होता है

ये सइ-ए-ज़ब्त-ए-ग़म आँखों में आँसू रोकने वाले
सफ़ीनों में कहीं तूफ़ान भी मस्तूर होता है

हक़ीर ख़ाक के ज़र्रे थे आसमान हुए

हक़ीर ख़ाक के ज़र्रे थे आसमान हुए
वो लोग जो दर-ए-जानाँ के पासबान हुए

शुदा-शुदा वही गुलशन के हुक्मरान हुए
जो ख़ार पी के गुलों का लहू जवान हूए

हम ऐसे अहल-ए-जुनूँ पर हँसे न क्यूँ दुनिया
कि सर कटा के समझते हैं कामरान हुए

ये कम नहीं कि बुझाई है प्यास काँटों की
बला से राह-ए-वफ़ा में लहूलुहान हुए

गुलों ने आबला-पाई की कोई दाद न दी
चमन में ख़ार ही छालों के मेज़बान हुए

किया जो भूल के दिल ने ख़याल-ए-तर्क-ए-वफ़ा
हम अपने आप से क्या क्या न बद-गुमान हुए

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है 

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है
आफ़तें बरसती हैं दिल सुकून पाता है

आज़माइशें ऐ दिल सख़्त ही सही लेकिन
ये नसीब क्या कम है कोई आज़माता है

उम्र जितनी बढ़ती है और घटती जाती है
साँस जो भी आता है लाश बन के जाता है

आबलों का शिकवा क्या ठोकरों का ग़म कैसा
आदमी मोहब्बत में सब को भूल जाता है

कार-ज़ार-ए-हस्ती में इज़्ज़-ओ-जाह की दौलत
भीक भी नहीं मिलती आदमी कमाता है

अपनी क़ब्र में तन्हा आज तक गया है कौन
दफ़्तर-ए-अमल ‘आमिर’ साथ साथ जाता है

थी सियाहियों का मस्कन मिरी ज़िंदगी की वादी 

थी सियाहियों का मस्कन मिरी ज़िंदगी की वादी
तिरे हुस्न के तसद्दुक़ मुझे रौशनी दिखा दी

तिरा ग़म समा गया है मिरे दिल की धड़कनों में
कोई ऐश जब भी आया मिरे दिल ने बद-दुआ दी

जो ज़रा भी नींद आई कभी अहल-ए-कारवाँ को
वही बन गए लुटेरे जो बने हुए थे हादी

वो कभी न बन सकी है वो कभी न बन सकेगी
किसी दिल की जो इमारत तिरी बे-रूख़ी ने ढा दी

ये कभी कभी इनायत है ब-मंज़िल-ए-सियासत
कि जफ़ाएँ सहने वाला कहीं हो न जाए आदी

हमें आख़िरत में ‘आमिर’ वही उम्र काम आई
जिस कह रही थी दुनिया ग़म-ए-इश्क़ में गँवा दी

न सकत है ज़ब्त-ए-ग़म की न मजाल-ए-अश्क-बारी 

न सकत है ज़ब्त-ए-ग़म की न मजाल-ए-अश्क-बारी
ये अजीब कैफ़ियत है न सुकूँ न बे-क़रारी

तिरा एक ही सितम है तिरे हर करम पे भारी
ग़म-ए-दो-जहाँ से दे दी मुझे तु ने रूस्तगारी

मिरी ज़िंदगी का हासिल तिरे ग़म की पासदारी
तिरे ग़म की आबरू है मुझे हर ख़ुशी से प्यारी

ये क़दम क़दम बलाएँ ये सवाद-ए-कू-ए-जानाँ
वो यहीं से लौट जाए जिसे ज़िंदगी हो प्यारे

तिरे जाँ-नवाज़ वादे मुझे क्या फ़रेब देते
तिरे काम आ गई है मिरी ज़ूद-ए‘तिबारी

मिरी रात मुंतज़िर है किसी और सुब्ह-ए-नौ की
ये सहर तुझे मुबारक जो है ज़ुल्मतों की मारी

लौटे कुछ इस तरह तिरी जल्वा-सरा से हम

लौटे कुछ इस तरह तिरी जल्वा-सरा से हम
बनते गए क़दम-ब-क़दम आइना से हम

इस दर्जा पाएमान न होते जफ़ा से हम
लूटे गए सियासत-ए-मेहर-ओ-वफ़ा से हम

बाक़ी ही क्या रहा है तुझे माँगने के बाद
बस इक दुआ में छूट गए हर दुआ से हम

देखी गई न हम से शिकस्त-ए-ग़ुरूर-ए-हुस्न
शरमा गए इरादा-ए-तर्क-ए-वफ़ा से हम

ये क्या कहा जुनूँ है मोहब्बत की इंतिहा
ऐ बे-ख़बर चले हैं इसी इंतिहा से हम

माना कि दिल को तेरे न मिलने का ग़म रहा
सद शुक्र बच गए तलब-ए-मा-सिवा से हम

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